आजकल चुनाव आयुक्तों की चर्चा जोर-शोर से हो रही है। पूर्व मुख्य चुनावआयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने अपनी पुस्तक India and I: A Hundred Memories, Not a Memoir का एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया है।
जनवरी 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का माहौल था। डॉ मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री थे। उस समय के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक चुनावी रैली में, कांग्रेस के सत्ता में आने पर मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाने की बात कही थी। एस.वाई. कुरैशी जो धर्म के लिहाज से खुद मुसलमान हैं और तब मुख्य चुनाव आयुक्त थे। चुनाव आयोग ने खुर्शीद के इस बयान पर आपत्ति जताई और खुर्शीद की निंदा की। इसके बाद कुछ केंद्रीय मंत्रियों ने चुनाव आयोग के कामकाज पर टिप्पणियां कीं, जिससे कुरैशी आहत हुए।उन्होंने प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे से शिकायत की।
अगले दिन डॉ. मनमोहन सिंह ने कुरैशी को 7 रेस कोर्स रोड बुलाया। कुरैशी के अनुसार, प्रधानमंत्री दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहे थे। बैठते ही उन्होंने व्यथित और भावुक स्वर में कहा — “हरीश ने मुझे बताया कि आपने क्या कहा।अगर आप ऐसा सोचते हैं, तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।” मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी स्तब्ध रह गए। शिकायत प्रधानमंत्री के विरुद्ध नहीं, बल्कि कुछ मंत्रियों के आचरण के विरुद्ध थी। डॉ. सिंह ने यह सोच लिया था कि कुरैशी उनकी नीयत पर संदेह कर रहे हैं। उन्हें शांत करने में कुछ समय लगा। बहुत दिन नहीं हुए हैं! जानना जरूरी है कि आखिर नैतिकता की डोर कब, कहां, कैसे हाथ से फिसल गई!
इसके बाद डॉ. सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग केवल भारत का गौरव नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। यदि हम इसे खो देते हैं तो सब कुछ खो देंगे।उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें पहले जानकारी होती तो वे संबंधित मंत्रियों को फटकार लगाते और भविष्य में कोई शिकायत हो तो सीधे उन्हें फोन करने को कहा।
कुरैशी ने इस घटना को प्रधानमंत्री की संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गहरी संवेदनशीलता का उदाहरण बताया है। आंख में आंसू का उल्लेख सीधे नहीं मिलता, पर सभी वृत्तांतों में उन्हें अत्यंत भावुक और व्यथित बताया गया है।
भारत के इतिहास में अब तक के एक मात्र गैर-हिंदू प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के जन्म दिन पर सादर प्रणाम। धर्म के चश्मे से देखना ठीक नहीं, जानता हूं। लेकिन जब देश के ढेर सारे लोगों की आंख उतारकर धर्म का चश्मा पहनाया जा चुका है, तब यह कहना ही पड़ता है कि भारत के इतिहास में अब तक के एक मात् गैर-हिंदू प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह हैं।
डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को हुआ था। 26 दिसंबर 2024 को उनका निधन हुआ। आज उनका जन्मदिन उनके निधन के बाद दूसरी बार मनाया जा रहा है।
जनवरी 2014 की उस अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था कि इतिहास समकालीन मीडिया और संसद में विपक्ष की तुलना में उनके प्रति थोड़ा दयालु होगा। यह बात अब कई स्तरों पर दोहराई जा रही है — उनके निधन के बाद कुछ अदालती फैसलों और आर्थिक नीतियों के दीर्घकालिक मूल्यांकन में। डॉ मनमोहन सिंह की कही बात लोगों के दिल-दिमाग में बार-बार कौंध रही है।
मनमोहन सिंह पहले अर्थशास्त्री-प्रशासक थे, फिर राजनीतिज्ञ बने। पंजाब विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड से पढ़े। आरबीआई गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके थे। 1991 में पी.वी. नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री बने। उस समय भारत के पास कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। उन्होंने रुपये का अवमूल्यन, औद्योगिक लाइसेंसिंग खत्म करना, आयात शुल्क घटाना और एफडीआई खोलना शुरू किया। यही 1991 के उदारीकरण का मूल था। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी पहचान इसी विरासत से जुड़ी रही।
2004 में यूपीए की अप्रत्याशित जीत के बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया और सिंह को चुना गया। वे स्वतंत्र भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री और जवाहरलाल नेहरू के बाद पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जो पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा चुने गए।
प्रधानमंत्री कार्यकाल के आर्थिक अवदात
यूपीए-I (2004-09) में अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ी। औसत वृद्धि दर लगभग 8 प्रतिशत के आसपास रही। वैश्विक वित्तीय संकट 2008 का असर भारत पर अपेक्षाकृत कम पड़ा। गरीबी में भारी कमी आई—टेन्डुलकर समिति के अनुमानों के अनुसार 2004-05 में 37.2 प्रतिशत से 2011-12 में 21.9 प्रतिशत। करोड़ों लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए —
– डॉ मनमोहन सिंह के जिन महत्वपूर्ण नीतिगत कदम को याद किया जाता रहेगा —
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005
– सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005
– शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009
– राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013
– आधार की नींव
भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता, 2008—जो भारत को परमाणु अलगाव से निकालने वाला बड़ा कूटनीतिक कदम था। ये कार्यक्रम बाद की सरकारों ने भी जारी रखे या उन पर निर्माण किया। निवेश दर ऊंची रही और अर्थव्यवस्था का आकार 2004 के करीब 700 अरब डॉलर से 2014 तक 2 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच गया।
यूपीए-II में स्थिति बदली। मुद्रास्फीति ऊंची रही, 2013 में रुपये में गिरावट आई और नीतिगत गतिरोध का आरोप लगा। फिर भी दस साल की औसत वृद्धि दर करीब 7.6-7.7 प्रतिशत बताई जाती है।
राजनीतिक वातावरण और आलोचना
यूपीए गठबंधन सरकार थी। वामदलों का समर्थन पहले कार्यकाल में था, दूसरे में क्षेत्रीय दलों का। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री के बीच दोहरी शक्ति संरचना की चर्चा लगातार रही। सिंह को “कमजोर प्रधानमंत्री” कहा गया—मंत्री नियंत्रित न कर पाने और निर्णायक कार्रवाई न करने का आरोप लगा।दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोप केंद्र में आए —
– 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन
– कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट)
– राष्ट्रमंडल खेल
– आदर्श सोसाइटी आदि
सीएजी रिपोर्टों में अनुमानित नुकसान के बड़े आंकड़े आए। अन्ना हजारे का आंदोलन, मीडिया का दबाव और विपक्ष का हमला—इन सबसे सरकार की छवि बुरी तरह प्रभावित हुई। 2014 में कांग्रेस की भारी हार हुई।
व्यक्तिगत रूप से सिंह पर कोई आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं हुए। 2जी मामले में अदालत ने बाद में कई आरोपियों को बरी किया। कोयला मामले में भी कुछ फैसलों में आपराधिकता साबित नहीं हुई।
दो बातें साथ चलती हैं —
पहली यह कि अर्थशास्त्री और नीति-निर्माता के रूप में उनका योगदान स्थायी है। 1991 के सुधारों ने भारत की विकास गति बदली। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने उस गति को बनाए रखा और अधिकार-आधारित कल्याणकारी ढांचा खड़ा किया। व्यक्तिगत ईमानदारी का आंकड़ा लगभग सर्वसम्मत रहा।
दूसरी यह कि गठबंधन की मजबूरी, पार्टी के अंदर की शक्ति संरचना और संकट के समय संचार तथा नियंत्रण की कमजोरी ने दूसरे कार्यकाल को नुकसान पहुंचाया। वे नैतिक रूप से स्वच्छ रहे, लेकिन व्यवस्था में व्याप्त गड़बड़ियों के बारे में प्रभावी ढंग से मीडिया को साध नहीं पाये। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया का रुख और रवैया बदल चुका था। अण्णा हजारे के आंदोलन नेराजनीतिक वातावरण को उत्तेजना और उन्माद से भर दिया था। इतना ही नहींखुद भारतीय जनता पार्टी के जिन नेताओं को संघ सरकार के काम-काज औरथोड़ा-बहुत भी लोकतांत्रिक लोक-लिहाज बचा हुआ था उन्हें समझ में आने लायक पूंजीवाद के आंतरिक और उदार हस्तक्षेप से मार्गदर्शक मंडल में भेजने की तैयारी हो चुकी थी। जाहिर है कि बेलिहाज पूंजीवाद, क्रोनी कैपिटलिज्मके बदलते रुझानों को रोकने में राजनीति के प्रपंच से दूर रहनेवाले डॉ मनमोहन सिंह पर्याप्त रूप से प्रभावी साबित नहीं हुए। मीडिया और विपक्ष कठोर का रुख और रवैया बना रहा।
आर्थिक आंकड़े और कल्याणकारी कानूनों की निरंतरता डॉ मनमोहन सिंह के पक्ष में जाती है। लेकिन इतिहास इतने से संतुष्ट नहीं होता है, इतिहास पूरी तरह “दयालु” नहीं होता — वह जटिल होता है। मनमोहन सिंह उस जटिलता का उदाहरण हैं: एक ईमानदार, विद्वान और सुधारक, जो गठबंधन राजनीति और अपनी स्वभावगत संयमित शैली के कारण राजनीतिक रूप से कमजोर दिखे। उनका कथन आंशिक रूप से सही साबित हो रहे हैं।
किसी से कम समस्या-ग्रस्त और सं
उन्होंने अपनी गरीबी और व्यक्तिगत स्थितियों को कभी उस तरह से सहानुभूतिसंग्राही नहीं बनने दिया! डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के गाह गांव में हुआ था। यह गांव आज पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चकवाल जिले में है, इस्लामाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर। परिवार खत्री सिख समुदाय का था। पिता सरदार गुरुमुख सिंह कोहली सूखे मेवे के छोटे व्यापारी थे और पेशावर में दुकान चलाते थे।
डॉ मनमोहन सिंह की माता अमृत कौर का निधन डॉ मनमोहन सिंह के बचपन में ही टाइफाइड से हो गया। कुछ विवरणों के अनुसार वे तब इतने छोटे थे कि उनकी कोई याद नहीं रही। पालन-पोषण दादी जमना देवी ने किया, जिनसे वे बहुत जुड़े रहे। परिवार साधारण था — बिजली, पाइप वाला पानी और अस्पताल जैसी सुविधाएं गांव में नहीं थीं।
गाह के सरकारी प्राथमिक स्कूल में 17 अप्रैल 1937 को दाखिला हुआ। स्कूल रजिस्टर में उनका नाम मनमोहन सिंह, पिता गुरुमुख सिंह, जाति कोहली और पिता का पेशा दुकानदारी दर्ज है। वहां चौथी कक्षा तक उर्दू माध्यम से पढ़ाई की। नामकरण की कहानी यह है कि जन्म के बाद पंजा साहिब, हसन अब्दाल ले जाया गया। गुरु ग्रंथ साहिब खोलने पर पहला शब्द ‘म’ से शुरू हुआ, इसलिए नाम मनमोहन रखा गया। बचपन में उन्हें मोहना कहा जाता था। पढ़ने की आदत बहुत गहरी थी। रात को मिट्टी के तेल के लैंप की रोशनी में पढ़ते थे। बाद में उन्होंने खुद कहा था कि कम रोशनी में घंटों पढ़ने से आंखें कमजोर हो गईं। स्कूल दूर था, पैदल जाना पड़ता था। आठवीं कक्षा की परीक्षा में प्रांत में तीसरे स्थान पर रहे।
करीब 11-12 साल की उम्र में पिता उन्हें पेशावर ले गए। वहां खालसा हाई स्कूल में पढ़े। हॉकी और फुटबॉल पसंद थे, हालांकि खेल में खास नहीं थे। पिता ने दूसरी शादी की। सौतेली मां सितावंती कौर स्नेहपूर्ण रहीं। 14 अगस्त 1945 को स्कूल में मिठाइयां बंटीं तो उन्होंने विरोध किया कि भारत अभी आजाद नहीं हुआ है।
बंटवारे का दंश और व्यथित बचपन
1947 का बंटवारा परिवार के लिए निर्णायक मोड़ बना। मैट्रिक की परीक्षा उसी अशांत समय में दी, परिणाम घोषित नहीं हो सका। परिवार पेशावर से अमृतसर चला आया। पिता कुछ समय संपर्क से कट गए और बाद में शिविर में मिले। पहले हल्द्वानी भी ठहरे, फिर अमृतसर बस गए। अमृतसर के हिंदू कॉलेज में दाखिला लिया क्योंकि खालसा कॉलेज दूर था और हॉस्टल का खर्च उठाना मुश्किल था। पिता चाहते थे बेटा डॉक्टर बने, इसलिए प्री-मेडिकल में दाखिला लिया, लेकिन कुछ महीने बाद छोड़ दिया। दुकान में काम भी पसंद नहीं आया। दादी के आग्रह पर फिर कॉलेज लौटे। पिता की इच्छा के अनुसार डॉक्टर तो बने लेकिन अर्थशास्त्र के!
1948 में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास की। इंटरमीडिएट और फिर अर्थशास्त्र में स्नातक (1952) तथा स्नातकोत्तर (1954) पंजाब विश्वविद्यालय से किए। उस समय विश्वविद्यालय होशियारपुर में शिफ्ट हो चुका था, कुछ छात्र तंबुओं में भी रहते थे। हर स्तर पर विश्वविद्यालय में प्रथम रहे। शिक्षक आई.जी. पटेल जैसे लोगों ने उन्हें कैम्ब्रिज जाने के लिए प्रेरित किया। पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रवृत्ति मिली।
1955 में कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज गए। 1957 में इकोनॉमिक्स ट्राइपॉस में प्रथम श्रेणी ऑनर्स किया। एडम स्मिथ पुरस्कार और रेनबरी स्कॉलर चुने गए। वहां जीवन बहुत सादा था — सब्सिडी वाले भोजन पर गुजारा, ठंडे पानी से नहाना, बाहर खाना कम ही खाना। पिता से पैसे आने में देरी होती तो कभी चॉकलेट से काम चलाते। 1957 में भारत लौटकर पंजाब विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। 1958 में गुरुशरण कौर से विवाह हुआ।1960 में ऑक्सफोर्ड के नफील्ड कॉलेज गए। 1962 में डी.फिल पूरी की। शोध विषय था भारत का निर्यात प्रदर्शन और नीतिगत निहितार्थ। यही बाद में उनकी पुस्तक India’s Export Trends and Prospects for Self-Sustained Growth बनी। छात्र जीवन में वे लगातार मेधावी, किफायती और पढ़ाई के प्रति एकनिष्ठ रहे। गांव की सादगी, मां की कमी, बंटवारे की उथल-पुथल और छात्रवृत्तियों पर टिकी पढ़ाई—यही उनके व्यक्तित्व की नींव बनी। बाद में वे अक्सर कहते थे कि वे बंटवारे के वंचित बच्चे थे, जिन्हें इस देश ने ऊंचा उठने का मौका दिया।
उनके निधन के बाद नरम पड़ा है। विरोधी दलों के नेताओं ने भी उनकी विद्वत्ताऔर योगदान का जिक्र किया। अदालती प्रक्रिया ने कुछ आरोपों की हवानिकाली। कुछ लोगों में यह धारणा बनी हुई है और कुछ लोग किताबों, लेखों के जरिए ऐसी धारणाएं बनाने में लगे रहे कि डॉ मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप सेविफल रहे थे।
यह नहीं भूलना चाहिए कि डॉ मनमोहन सिंह बहुत कठिन राजनीतिक औरआर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत के वित्त मंत्री और फिर आगे चलकर भारतके प्रधानमंत्री बने थे। उन की सरकार को रिमोट कंट्रोल से चलनेवाली सरकारकहकर मजाक उड़ाया जाता रहा है। उन्होंने मनमौन कहे जाने को भी बर्दाश्तकिया। डॉ मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप से कितने सफल रहे यह जितना महत्वपूर्ण है उस से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने भारत के लोकतंत्र के ढांचे को सफलतापूर्वक बचा लिया था। कहना न होगा कि आज भारत मेंलोकतंत्र के ढांचा का क्या हाल है?
राजनीतिक विफलता बनाम लोकतंत्र
04 जनवरी 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में अपने अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में डॉ मनमोहन सिंह से जब प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिएविनाशकारी होगा!
डॉ मनमोहन सिंह इन दिनों याद बहुत आते हैं, उन को प्रणाम!
(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक और राजनीतिक–सामा