चुनाव आयोग की ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश ने खड़े कर दिए कई और सवाल

चुनाव आयोग में मतभेद उजागर होने के बाद आयोग ने शनिवार को बैठक बुलाकर एक प्रेस नोट के जरिए कई बातों को सामने रखा और निष्पक्ष छवि पर लगे दाग को छिपाने की कोशिश की। लेकिन आयोग के प्रेस नोट ने खुद ही कई और सवाल खड़े कर दिए हैं।

चुनाव आयोग में अंदरुनी असहमति, एसआईआर को लेकर चिंता और बढ़ता राजनीतिक तूफान और सुप्रीमकोर्ट में जनहित याचिका ,अवमानना याचिका दाखिल करने का प्रयास के साथ सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को नई याचिका दायर कर ज्ञानेश कुमार, मनीष गर्ग, सीमा खन्ना समेत चुनाव आयोग के कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ वैधानिक कर्तव्य उल्लंघन के मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग के बीच चुनाव आयोग ने शनिवार 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने अपनी बैठक की। बैठक में तीनों आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता, सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी मौजूद थे। इसके बाद प्रेसनोट जारी हुआ। चुनाव आयोग इंडियन एक्सप्रेस में 23 सितंबर को प्रकाशित किसी भी तथ्य का खंडन नहीं कर पाया।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, वोटर लिस्ट के विवादित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (एसआईआर) को रद्द करने और आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन इस सबके शनिवार दोपहर को तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक से यह भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि सब कुछ ठीक है।

एसआईआर के दौरान नोटिस वाले लोगों के लिए सुविधा:चल रहे एसआईआर में अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के कारण नोटिस जारी किए गए व्यक्तियों के घर ब्लॉक लेवल ऑफिसर (बीएलओ) जाएंगे।

ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की समीक्षा के लिए चुनाव आयोग ने एक्सपर्ट की कमेटी बनाई है। क्या बदलाव होगा यह साफ नहीं है।

इसके अलावा दिल्ली और महाराष्ट्र में अभी एसआईआर चल रहा है। वहां दावों और आपत्तियों के लिए तारीख बढ़ा दी गई है। दिल्ली में 30 नवंबर और महाराष्ट्र में 10 नवंबर तक तारीख बढ़ाई गई है।

सबसे महत्वपूर्ण फैसला उन लोगों को लेकर है जिन्हें एसआईआर के दौरान अनमैप्ड या लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। अब ऐसे लोगों को हर मामले में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी एईआरओ के दफ्तर में सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी। बीएलओ संबंधित मतदाता के घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। इसके बाद ईआरओ उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर फैसला कर सकेंगे।

चुनाव आयोग की तरफ से जारी किया गया साधारण सा प्रेस नोट—जोकि बहुत देर से आया हुआ बताया जा रहा है—वह आयोग की छवि और विश्वसनीयता को हुए नुकसान की भरपाई करने की नाकाम कोशिश और हताशा, दोनों को दर्शाता है।

26 सितंबर 2026 को जारी प्रेस नोट में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट और पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 अलग-अलग मौकों पर उठाए गए किसी भी मुद्दे से इनकार नहीं किया गया है (जैसा कि ‘एक्सप्रेस’ और अन्य ने बताया है)।

असल में, प्रेस नोट यह मानता है कि आयोग की बैठकों से पहले कोई एजेंडा नहीं बांटा जाता था और बाद में कोई मिनट्स (बैठक का ब्योरा) भी जारी नहीं किए जाते थे। इसमें कहा गया है कि आयोग ने आज आदेश दिया है कि अब से एजेंडा और मिनट्स बांटे जाएं।

प्रेस नोट के अनुसार, आयोग ने यह बात रिकॉर्ड पर रखी कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने आदेश में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के तहत प्रक्रियाओं को मंज़ूरी दी थी। इसमें नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ में ऑनलाइन बदलाव भी शामिल थे। हालांकि, ‘फॉर्म 6’ में यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के आदेश के डेढ़ महीने बाद, यानी जुलाई 2026 में किया गया था।

मुख्य चुनाव आयुक्त को छोड़कर बाकी दो आयुक्तों ने भी इस मुद्दे को उठाया था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंज़ूरी कैसे दी होगी?

इसके अलावा, प्रेस नोट में इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में सिर्फ़ बिहार में पिछले साल हुए एसआईआर को मंज़ूरी दी थी। पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में एसआईआर को चुनौती देने वाली कई अन्य याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।

प्रेस नोट इस बात से इनकार नहीं करता है कि कमीशन की बैठक न हो पाने के कारण सालाना परफॉर्मेंस अप्रेज़ल रिपोर्ट  रुकी हुई थीं। प्रेस नोट में बस यह बताया गया है कि कमीशन ने 31 दिसंबर, 2026 तक सभी लंबित अप्रेजल रिपोर्ट्स को निपटाने का फ़ैसला किया है।

प्रेस नोट इस बात से इनकार नहीं करता कि आयोग के कर्मचारियों को चुनाव आयोग की मंज़ूरी या अनुमति के बिना विदेश यात्रा करने की इजाज़त दी गई थी। अपनी ही गलती मानते हुए, प्रेस नोट में यह कहा गया है कि अब से कोई भी कर्मचारी मंज़ूरी और उचित अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं करेगा।

कमीशन इस बात से इनकार नहीं करता कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ईआरओ), खासकर गोवा में, ईसीआईनेट का इस्तेमाल करने और कम से कम 91 मामलों में गलत तरीके से हटाए गए नामों को ठीक करने में नाकाम रहे। आयोग को इस बाबत आठ रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला और आईटी की डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि उन्हें हर बार इसकी जानकारी दी गई थी। प्रेस नोट में अब बस यह कहा गया है कि गोवा में 91 में से 83 वोटरों ने फॉर्म 6 भरा था और उन्हें वोटर लिस्ट में वापस शामिल किया जा रहा है।

आयोग का प्रेस-नोट अपने टेक्नोलॉजी प्लेटफ़ॉर्म ईसीआईनेट के बारे में किसी भी तरह की शंकाओं का समाधान नहीं करता है। इस प्लेटफ़ॉर्म में बिना किसी टेस्ट के और बिना यह सर्टिफ़ाई किए कि इसमें कोई समस्या नहीं है, बीएलओ ऐप, ईआरओनेट और 41 अन्य ऐप्स को इंटीग्रेट किया गया था।

हालांकि, अब आयोग ने ईसीआईनेट की जांच के लिए एक एक्सपर्ट पैनल बनाने और आईआईटी से एक एक्सपर्ट को बुलाने का फ़ैसला किया।

आयोग ने साफ़ किया कि फ़ॉर्म 6 के साथ लगा डिक्लेरेशन सिर्फ़ एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ही भरना होगा, जबकि नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए पहले वाला फ़ॉर्मेट ही लागू रहेगा; जिन वोटर्स को एसआईआर प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उन्हें “मैप” नहीं किया गया था या उनमें “लॉजिकल गड़बड़ी” पाई गई थी, उन्हें सुनवाई के लिए नोटिस नहीं भेजा जाएगा। इसके बजाय, बूथ लेवल ऑफ़िसर्स (बीएलओ) घर-घर जाकर ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करेंगे; आयोग ने महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समय-सीमा भी क्रमशः 12 अक्टूबर और 30 अक्टूबर तक बढ़ा दी है।

हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग के भीतर अधिकारियों की भूमिका और कामकाज को लेकर उठे सवालों के बीच आयोग ने कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र पर भी स्पष्टीकरण दिया। आयोग के मुताबिक यह पत्र आयोग या उसके आईटी डिवीज़न की किसी नीतिगत व्यवस्था से संबंधित नहीं था। पत्र का संबंध ईसीआई में प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से था।

आयोग ने कहा कि संबंधित अधिकारी की ओर से जारी किया गया कार्य-पुनर्वितरण आदेश वास्तव में लागू नहीं हुआ, क्योंकि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से जारी आदेशों के बाद उसे लागू नहीं किया गया था। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आईटी डिवीज़न पर वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की निगरानी कभी वापस नहीं ली गई।

आयोग ने गोवा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने संबंधित बीएलओ को छूटे हुए मतदाताओं के घर जाकर फॉर्म 6 जमा कराने के निर्देश दिए हैं। आयोग के मुताबिक ऐसे 97 मतदाताओं में से 81 ने फॉर्म 6 भर दिया है। यह उदाहरण आयोग की उस व्यवस्था से जुड़ा है जिसके तहत एसआईआर के दौरान छूटे पात्र मतदाताओं को बाद की निरंतर अपडेट प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में शामिल कराने की सुविधा दी जा रही है।

नयी याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग, डायरेक्टर जनरल (आईटी) सीमा खन्ना तथा जांच में जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। आरोप है कि चुनाव आयोग के तमाम विवादित फैसलों में मनीष गर्ग की भूमिका रही है। सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियों में कई बार मनीष गर्ग का नाम लिया है। सीमा खन्ना ईसीआईनेट की प्रमुख हैं ।

याचिकाकर्ता ने सक्षम प्राधिकारी को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करने और अभियोजन शुरू करने का निर्देश देने की मांग की है। यह धारा मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन या सुधार से जुड़े कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करती है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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