नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स करने पर पाक्सो केस से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कोई छूट नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्य शादी करने वाले पुरुष को, 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ सेक्स करने पर आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं मिलती है [बिलाल और अन्य बनाम दिल्ली सरकार (एसएचओ और अन्य के ज़रिए)]।

जस्टिस संजीव नरूला ने फैसला सुनाया कि पर्सनल लॉ, ‘बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012’ (पाक्सो एक्ट) और ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023’ (बीएनएस) के तहत मिलने वाली सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कहा, “…मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी, सिर्फ़ उस दर्जे की वजह से, उस पत्नी के साथ सेक्स करने के लिए पाक्सो या बीएनएस से छूट नहीं दे सकती जो उस समय अठारह साल से कम उम्र की थी। कोई भी दूसरा नज़रिया न्यायिक फैसले के ज़रिए एक ऐसा अपवाद बना देगा जिसे संसद ने साफ़ तौर पर बाहर रखा है।”

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति के खिलाफ बीएनएस की धारा 64(1) और पाक्सो  एक्ट की धारा 6 के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए की।

उस व्यक्ति और उसकी पत्नी ने याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और उत्पीड़न के लिए मुआवज़े की भी मांग की थी।

बताया गया कि उनकी शादी तब हुई थी जब महिला 16 साल और तीन महीने की थी, और पुरुष 28 साल का था। इसके बाद वे साथ रहने लगे और महिला गर्भवती हो गई। गर्भावस्था के दौरान जब वह सरकारी अस्पताल गई तो उसकी उम्र का पता चला।

महिला का कहना था कि शादी अपनी मर्ज़ी से और दोनों परिवारों की सहमति से हुई थी, और उस पर कोई ज़बरदस्ती या दबाव नहीं डाला गया था। उसने पुरुष की ज़मानत अर्ज़ी का भी समर्थन किया और गर्भावस्था के दौरान उसकी मौजूदगी की मांग की। अपनी याचिका में, जोड़े ने तर्क दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, जो मुस्लिम लड़की बालिग़ हो चुकी है (यानी यौवन प्राप्त कर चुकी है), वह शादी करने के योग्य है और शादी के वैध होने का मतलब है कि उसके बाद बने यौन संबंध के लिए कोई आपराधिक मामला नहीं बनता।

हालांकि, हाई कोर्ट ने शादी की सिविल वैधता और नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने के आपराधिक नतीजों के बीच अंतर किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी को वैध मान लिया जाए, फिर भी यह पाक्सो या बीएनएस  के नियमों में कोई छूट नहीं दे सकता।

कोर्ट ने कहा कि पाक्सो  के तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है और बच्चे की सहमति के बावजूद उसके साथ पेनिट्रेटिव यौन उत्पीड़न  को अपराध माना जाता है। इसी तरह, बीएनएस की धारा 63 के तहत 18 साल से कम उम्र की महिला के साथ यौन संबंध को रेप माना जाता है, जबकि वैवाहिक छूट केवल ऐसी पत्नी के मामले में लागू होती है जो 18 साल से कम उम्र की न हो।

बेंच ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि महिला की सहमति से मामला पाक्सो के दायरे से बाहर हो सकता है।

कोर्ट ने कहा, “सीधे शब्दों में कहें तो, शादी करने से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती। जो व्यक्ति शादी की रस्म से पहले सोलह साल का था, वह उसके बाद भी सोलह साल का ही रहता है। पाक्सो और बीएनएस  की धारा 63 के लिए, यही तथ्य यौन क्रिया के लिए सहमति देने की कानूनी क्षमता तय करता है।”

इसलिए, कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की याचिका के साथ-साथ पुलिस के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और मुआवजे की मांग को भी खारिज कर दिया।

इसी तरह का विचार केरल हाई कोर्ट ने भी इस साल की शुरुआत में व्यक्त किया था कि मुस्लिम कानून के तहत नाबालिग के साथ शादी की वैधता पाक्सो  एक्ट के तहत मुकदमा चलाने से कोई सुरक्षा नहीं देती है।

हालांकि, 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने इसके विपरीत विचार व्यक्त किया था। बेंच ने कहा था कि मुस्लिम शादी के मामले में, शादी के बाद नाबालिग लड़की और उसके पति के बीच शारीरिक संबंध बनाने पर पाक्सो  एक्ट लागू नहीं हो सकता है।

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी 2022 में इसी तरह का विचार व्यक्त किया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, 15 साल से अधिक उम्र की मुस्लिम लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ शादी का समझौता करने के लिए योग्य है। हालांकि, इस फ़ैसले में ऐसे मामलों में पाक्सो  एक्ट के लागू होने के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की गई।

जुलाई 26 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि विवाह की आयु के रूप में किशोरावस्था की शुरुआत को मान्यता देने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम जैसे कानूनों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि ये कानून बच्चों के साथ यौन संबंध को अपराध मानते हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही इंडिपेंडेंट थॉट वर्सेस यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में इसी दिशा में फैसला दे चुका है। कोर्ट ने कहा था कि 18 साल से कम उम्र की शादीशुदा लड़की को उसी उम्र की अविवाहित लड़की को मिलने वाली यौन सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

(जनचौक ब्यूरो)

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