वोट नहीं तो लोकतंत्र कैसा

चुनाव आयोग की साख को एक बार फिर बट्टा लगा है। हाल ही में एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने छापा है कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले दस महीनों में 14 बार पत्र लिखकर आपत्ति जताई है कि चुनाव आयोग में कई कार्य नियम पूर्वक नहीं किये जा रहे हैं। यहां तक कि संविधान के अनुरूप भी नहीं हो रहे हैं। उनका मुख्य आरोप यह है कि चुनाव आयोग की बैठकों के एजेंडे के बारे में उन्हें पहले जानकारी नहीं दी जाती और न ही बाद में उनके मिनट्स दिये जाते हैं ताकि पता चल सके कि क्या-क्या फैसले चुनाव आयोग ने लिये हैं। उनको इस बात की भी आपत्ति है कि प्रेस नोट चुनाव आयोग के नाम से जारी किया जाता है जबकि उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं होती।

उन्होंने मतदाता सूची संबंधी फॉर्म छह और सात को लेकर भी आपत्ति जताई है। फॉर्म छह के जरिये नये मतदाता बनाये जाते हैं, जबकि फॉर्म सात के जरिये मतदाताओं के नाम काटे जाते हैं। आयोग के सदस्यों का कहना है कि फॉर्म छह में बदलाव बिना संसद या सरकार की अनुमति के नहीं किया जा सकता जबकि किसी ने बिना अनुमति के ही फॉर्म छह में बदलाव कर दिया है जो कि गैर संवैधानिक है। एक और बड़ी आपत्ति यह है कि चुनाव आयोग के डाटा का केंद्रीयकरण किया जा रहा है। उनके अनुसार नए मतदाता बनाने और नाम हटाने का अधिकार क्षेत्रीय अधिकारियों ( ईआरओ ) को होता है लेकिन उनसे यह अधिकार छीन कर केंद्रीकृत कर दिया गया है।

इस खबर के छपने के बाद भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया है। कांग्रेस ने देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रदर्शन किया है। इस प्रदर्शन पर सरकार ने कहीं लाठी चार्ज किया है तो कहीं पानी की बौछार की है और कहीं प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने पेपर लीक आउट की तरह एक बार फिर से जंतर मंतर पर दो अक्टूबर से आंदोलन करने का एलान किया है। इंडिया गठबंधन ने तीस सितंबर को नई दिल्ली में बैठक भी आयोजित की है, जिसमें नए खुलासे की रोशनी में वोट चोरी रोकने पर रणनीति बनाई जाएगी। इस बैठक की खास बात यह है कि आम आदमी पार्टी, जो कि अपने आप को इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं मानती और कुछ दूसरी पार्टियों ने भी कहा है कि वे बैठक में तो हिस्सा नहीं लेंगी लेकिन उसके फैसलों पर सहमति जताएंगी।
आपको याद होगा कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सात अगस्त 2025 को भी एक घंटे से ज्यादा का एक बड़ा प्रजेंटेशन दिया था।

जिसमें उन्होंने कर्नाटक और महाराष्ट्र की वोटर लिस्ट दिखाते हुए दावा किया था कि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर अवैध और संदिग्ध नाम जोड़े गये थे। तब उन्होंने लोकसभा चुनावों के साथ ही महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनावों में भी गड़बड़ी किये जाने के संकेत दिये थे। इसके बाद उन्होंने 18 सितंबर 2025 और बाद के दिनों में भी चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए चुनावी डाटा और गड़बड़ियों के सबूतों का हवाला दिया था। वे चाहते थे कि चुनाव आयोग उन्हें मतदाता सूची की डिजिटल कॉपी मुहैया कराये लेकिन चुनाव आयोग ने उनके बार-बार मांगे जाने के बावजूद वो सूची उपलब्ध नहीं कराई। राहुल गांधी तब ये आशंका जता रहे थे कि यह काम या तो सीधे चुनाव आयोग से या चुनाव आयोग द्वारा किसी व्यक्ति को दिये गये एक्सेस के जरिये वोट जोड़े और घटाये जा रहे हैं। राहुल गांधी ने जो आंकड़े दिये थे वे काफी हद तक विश्वसनीय थे और बाद में चुनाव आयोग ने जब सफाई दी तो भी उसने राहुल गांधी द्वारा उठाये गये मुद्दों का सिलसिलेवार ढंग से कोई जवाब नहीं दिया। इससे उस पर शक और गहरा गया था।

राहुल गांधी ने पिछली जो दो-तीन प्रेस कांफ्रेंस की थीं उससे यह लगता था कि पूरा चुनाव आयोग मिलकर यह गड़बड़ी कर रहा है। लेकिन अब अंग्रेजी अखबार ने जो खबर प्रकाशित की है उससे आभास होता है कि पूरा चुनाव आयोग भी नहीं बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त और एक दो उनके बेहद विश्वसनीय अधिकारी मिलकर यह काम कर रहे हैं। मतलब वह शक का घेरा अब और कस गया है। वह घेरा दो चुनाव आयुक्तों से हटकर अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और ईसीआई नेट प्लेटफॉर्म की एक अधिकारी सीमा गुप्ता की तरफ कस गया है। राहुल गांधी ने तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को यहां तक सलाह दी है कि वे सरकारी गवाह बन जाएं और पूरी सच्चाई बताएं कि किसके कहने पर वो ये सब कर रहे हैं। लोगों को शक है कि किसी आईएएस अधिकारी में इतना माद्दा नहीं है कि वह अपने बूते वोट काटने और जोड़ने का खेल कर सके। फिर उसे लाभ भी क्या होना है ? इससे जिसको लाभ हो रहा है उसके कहने पर ज्ञानेश कुमार ये कर रहे हैं। विपक्ष का इशारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर है। क्योंकि मतों में गड़बडी का लाभ उन्हीं की पार्टी को मिल रहा है।

दोनों चुनाव आयुक्तों ने दस महीने में 14 बार आपत्ति जताई है। चुनाव आयोग के काम करने का एक तरीका है। इसमें तीन आयुक्त हैं। एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। लेकिन अधिकार सभी के बराबर हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते ज्ञानेश कुमार के पास कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं है। वे बस तीन में प्रथम हैं। तो अगर किसी मुद्दे पर तीन में से दो आयुक्त एकमत हैं और इनकी इच्छा या जानकारी के बिना चुनाव आयोग ने चुनाव आयोग के नाम पर कोई फैसला लिया है तो वह फैसला ही अवैध है। जैसे कई मामलों के बारे में दोनों आयुक्तों ने कहा है कि उन्हें जानकारी ही नहीं होती थी और चुनाव आयोग के नाम पर आदेश जारी कर दिये जाते थे। मतलब यह कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोनों चुनाव आयुक्तों की उपेक्षा करके एकतरफा फैसला ले लिया। तो जितने फैसले उन्होंने लिये हैं , वे सभी असंवैधानिक हो गये।

हालांकि चुनाव आयोग ने एक बैठक करके तीनों चुनाव आयुक्तों की एक फोटो जारी की है और मामले को कमतर बताने की कोशिश की है लेकिन उससे बात बनी नहीं है। लोग कह रहे हैं कि अगर चुनाव आयोग में सब कुछ ठीक है तो तीनों चुनाव आयुक्त एक साथ बैठकर संवाददाता सम्मेलन क्यों नहीं करते ? चुनाव आयोग में मतभेद और मनमाने गैर संवैधानिक फैसलों को लेकर सीधे जवाब क्यों नहीं देते ?

विपक्ष का आरोप है कि पहले चुनाव आयोग मनमाने तरीके से गोपनीय ढंग से मतदाता सूचियों में लोगों के नाम जोड़कर, काटकर सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचा रहा था। राहुल गांधी के 2025 में प्रजेंटेशन के बाद जब चोरी पकड़ी गई तो सीधे एसआईआर का फरमान जारी कर दिया गया और बड़े पैमाने पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये। करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से तरीबन हटा दिये गये हैं। 2024 के लोक सभा चुनाव में कुल 96.88 करोड़ मतदाता थे। जिसमें से अब 13 करोड़ कम हो जाने की आशंका है।

यानी करीब 13 प्रतिशत मतदाता कम हो जाएंगे। अब तक हर आम चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़ रही थी। यह पहला मौका है जब 2029 के आम चुनाव में मतदाताओं की संख्या कम हो जाएगी। वह भी थोड़ा बहुत नहीं बल्कि 13 प्रतिशत। बड़ी मुश्किल से भारत ने सभी वयस्कों के लिए मतदान का अधिकार हासिल किया था जिसे यह सरकार कम कर रही है। क्या मताधिकार के बिना आपकी आजादी बची रहेगी ? वोट नहीं तो लोकतंत्र कैसा ?

(अमरेंद्र राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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