लोकतंत्र को अपने कोप-भवन की आवश्यकता होती है

उत्तर भारत में रामलीला का मौसम चल रहा है। इस प्राचीन कथा को देखने के लिए हर शाम सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की भीड़ उमड़ती है। कोई उनसे अनुमति नहीं मांगता। 11 अक्टूबर, रविवार की सुबह मुझे ‘रामायण’ महाकाव्य का एक प्रसंग याद आया। सुप्रीम कोर्ट की असाधारण बैठक हुई थी। रविवार का दिन आराम का दिन होता है, यहाँ तक कि उस इमारत में भी। पीठ ने वकीलों से विरोध प्रदर्शन और पुलिस की शक्ति से संबंधित प्रश्न पूछे। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि क्या पुलिस ने शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का उल्लंघन किया है। यह सही प्रश्न था। इसका कुछ उत्तर अयोध्या के एक कमरे में छिपा है।

‘रामायण’ में विरोध का एक स्थल वर्णित है। वाल्मीकि इसे क्रोधगृह कहते हैं, यानी क्रोध का कक्ष। बाद के वर्णनों में इसे कोप-भवन  कहा गया है । एक रानी, ​​जो किसी बात से दुखी थी, वहाँ गई। अपने राजसी वस्त्र और गहने उतारकर वह ज़मीन पर लेट गई। वह प्रतीक्षा करती रही। कैकेयी ने राजा से क्रोध करने की अनुमति नहीं माँगी। किसी रक्षक ने उसे द्वार पर नहीं रोका। किसी दरबारी ने महल के गलियारों को बंद नहीं किया।

अयोध्या में असहमति व्यक्त करने के लिए एक कमरा बनाया गया था, और वह कमरा खुला था। राजा उसके पास आए। उन्हें सुनना ही पड़ा। हम कैकेयी की माँगों पर बहस कर सकते हैं, लेकिन हम उस स्थल ‘कोप-भवन ’ पर बहस नहीं कर सकते। राज्य ने क्रोध के लिए एक स्थान निर्धारित किया और क्रोधित लोगों को वहाँ पहुँचने दिया।

दिल्ली का अपना एक कोप-भवन  है, जिसे जंतर-मंतर कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल के रूप में मान्यता दी है। लेकिन दिल्ली पुलिस इसके साथ अलग तरह से व्यवहार करती है। जब नागरिक जंतर-मंतर के लिए निकलते हैं, तो पुलिस अक्सर यह सुनिश्चित करती है कि वे कभी वहां पहुंच ही न पाएं। शहर भर में मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं। सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए जाते हैं। ट्रेनें रद्द कर दी जाती हैं।

किसानों को राजधानी की ओर जाने वाले रास्ते कंक्रीट और लोहे की कीलों से भरे मिले। जंतर-मंतर पर बैठे पहलवानों को हटा दिया गया और जगह खाली करा दी गई। निर्धारित स्थान खुला रहता है, लेकिन वहां जाने वाली सड़क बंद कर दी जाती है। जिस जगह तक आप पहुंच ही नहीं सकते, वहां विरोध करने का अधिकार केवल कागजों पर ही है। यह उस थिएटर के टिकट जैसा है जिसके दरवाजे बंद हैं।

पाठ से शुरू करें। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ख) में कहा गया है कि सभी नागरिकों को “शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार होगा।” इन शब्दों को ध्यान से पढ़ें। इनमें यह नहीं कहा गया है कि राज्य नागरिकों को इकट्ठा होने की अनुमति दे सकता है। ये उस अधिकार की घोषणा करते हैं जो नागरिक को पहले से ही प्राप्त है। इस खंड में किसी दाता का नाम नहीं है। अनुमति देने की व्यवस्था एक दाता को जोड़ देती है। फिर क्रिया: अधिकार है इकट्ठा होने का। यह इकट्ठा होने का अधिकार है, न कि इकट्ठा होने के लिए आवेदन करने का अधिकार। संरक्षण तब लागू होता है जब लोग एक साथ आते हैं। 

अगर इस अधिकार पर एक ऐसा नियम थोप दिया जाए जो किसी अधिकारी द्वारा फॉर्म पर हस्ताक्षर करने के बाद ही सभा को वैध बनाता हो, तो वह अधिकार ही बेमानी हो जाएगा। इसीलिए संविधान ने इसे ऐसा नही बनने दिया।

संविधान ने कुछ शर्तें भी रखी हैं: सभा शांतिपूर्ण होनी चाहिए; उसमें हथियार नहीं होने चाहिए। ये दोनों शर्तें सभा में उपस्थित लोगों के आचरण से संबंधित हैं। इनमें से किसी का भी संबंध किसी अधिकारी की स्वीकृति से नहीं है। “शांतिपूर्ण” एक क्रियाविशेषण है। आचरण का आकलन सभा के दौरान या उसके समाप्त होने के बाद किया जाता है। परमिट में अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पहले से ही तय कर ले कि अभी तक आयोजित न हुई सभा शांतिपूर्ण रहेगी या नहीं।

संविधान आचरण का एक मानक निर्धारित करता है। लाइसेंसिंग कार्यालय पूर्वानुमान का मानक लागू करता है। ये दोनों एक ही मापदंड नहीं हैं। संविधान निर्माताओं ने दो शर्तें निर्धारित कीं। वकीलों को यह पुरानी कहावत पता है: expressio unius est exclusio alterius (एक बात कहना दूसरी बात को नकारना है)। यदि संविधान निर्माता पूर्व अनुमति की तीसरी शर्त चाहते, तो वे उसे अन्य दो शर्तों के साथ लिख देते।

राज्य अनुच्छेद 19(3) के माध्यम से उत्तर देता है। यह खंड सार्वजनिक व्यवस्था और भारत की संप्रभुता एवं अखंडता के हित में उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। मैं इसे स्वीकार करता हूँ। लेकिन मुख्य शब्दों पर ध्यान दें: “अधिकार के प्रयोग पर प्रतिबंध।”

किसी अधिकार के प्रयोग पर प्रतिबंध यह मानकर चलता है कि उस अधिकार का प्रयोग किया जा रहा है। यह समय, स्थान और तरीके को नियंत्रित करता है। लाइसेंस कुछ और ही करता है। यह अधिकार को तब तक निलंबित रखता है जब तक कि प्राधिकारी सहमति न दे दे। यह एक छूट के साथ निषेध है, प्रतिबंध नहीं। अनुच्छेद 19(6) इस बात को सिद्ध करता है। व्यापार और व्यवसायों के लिए, संविधान निर्माताओं ने “पेशेवर या तकनीकी योग्यताओं” को निर्धारित करने वाले कानूनों की अनुमति दी। यह एक पूर्व शर्त है, जिसे स्पष्ट रूप से कहा गया है। खंड (3) में ऐसी कोई भाषा नहीं है। जहाँ संविधान का उद्देश्य राज्य को किसी स्वतंत्रता पर पूर्व शर्त लगाने की अनुमति देना था, वहाँ उसने ऐसा कहा। जहाँ ऐसा नहीं था, वहाँ हमें कोई पूर्व शर्त नहीं जोड़नी चाहिए।

इन सब बातों से पुलिस असहाय नहीं हो जाती। वे पूर्व सूचना मांग सकते हैं। पूर्व सूचना से उन्हें यातायात मोड़ने, पुलिस बल तैनात करने और भीड़ के लिए योजना बनाने में मदद मिलती है। पूर्व सूचना अधिकार की रक्षा करती है। अनुमति उस अधिकार का स्थान ले लेती है। पूर्व सूचना देने वाला नागरिक राज्य को बताता है कि वह क्या करेगा। अनुमति मांगने वाला नागरिक राज्य से पूछता है कि वह क्या कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय पहले भी इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त (1973) मामले में, इसने उस नियम को रद्द कर दिया था जिसके तहत पुलिस आयुक्त अपने विवेक से सड़क सभाओं की अनुमति देने से इनकार कर सकता था। रामलीला मैदान घटना मामले (2012) में, इसने आधी रात को सो रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा किए गए हमले की निंदा की थी।

लेकिन हाल के फैसलों का रुख इसके उलट है। मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) मामले में, न्यायालय ने जंतर-मंतर के पास रहने वाले निवासियों के हितों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों का मूल्यांकन किया। अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (शाहीन बाग मामला, 2020) मामले में, इसने कहा कि विरोध प्रदर्शन निर्धारित स्थानों पर ही होने चाहिए। ये सभी निर्णय संतुलन की बात तो करते हैं, लेकिन व्यवहार में, इन सभी निर्णयों का पलड़ा पुलिस के पक्ष में ही झुका हुआ है।

संतुलन एक सम्मानजनक शब्द है। लेकिन किसी मौलिक अधिकार की तुलना दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा से इस प्रकार नहीं की जा सकती जैसे दोनों बराबर पलड़े पर रखे हों। संविधान सर्वोपरि है। पुलिस अधिनियम उसी के दायरे में काम करता है। जब न्यायालय किसी वैधानिक शक्ति को समान भार के तराजू की तरह मानता है, तो संतुलन बिगड़ जाता है। अधिकार अपवाद बन जाता है और निषेधाज्ञा नियम बन जाती है।

न्यायमूर्ति बागची का प्रश्न इसी मुद्दे से संबंधित है। इसमें यह नहीं पूछा गया है कि पुलिस को अपनी शक्तियों का प्रयोग कैसे करना चाहिए। इसमें यह पूछा गया है कि क्या ये शक्तियां अनुच्छेद 19(1)(ख) के अनुरूप हैं। न्यायालय ने दशकों से इस जांच को टाल रखा है। एक ऐसा कानून जो किसी अधिकारी को अशांति की आशंका के आधार पर पहले से ही सभा पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, उसकी गहन जांच होनी चाहिए। यह दायित्व राज्य पर है, न कि उन नागरिकों पर जो एकत्र होना चाहते हैं।

इस खतरे का पूर्वाभास हो चुका था। संविधान सभा में सोमनाथ लाहिड़ी ने शिकायत की थी कि कई मौलिक अधिकार “पुलिस कांस्टेबल के दृष्टिकोण से” तैयार किए गए थे। उन्हें डर था कि कांस्टेबल इस संविधान को अनुमतियों की सूची समझेगा। उनहत्तर साल बाद, कांस्टेबल के पास मेट्रो का नक्शा और बैरिकेड्स का ढेर है।

मैं एक परीक्षण प्रस्तुत करना चाहूँगा। हमारे पास मौलिक अधिकार हैं जो उचित प्रतिबंधों से बंधे हैं। हमारे पास तर्कसंगत अधिकार नहीं हैं जो मौलिक प्रतिबंधों से बंधे हों। अधिकार नियम है। प्रतिबंध अपवाद है, और राज्य को प्रत्येक मामले, स्थान और समय के अनुसार इसका औचित्य सिद्ध करना होगा। जब कोई आयुक्त कुछ सौ लोगों को रोकने के लिए एक दर्जन मेट्रो स्टेशन बंद कर देता है, तो वह इस क्रम को उलट देता है। वह प्रतिबंध को मौलिक अधिकार और अधिकार को एक उपकार मानता है।

लोकतंत्र को अपने कोप-भवन  की आवश्यकता होती है । उसे एक ऐसे कमरे की आवश्यकता होती है जहाँ पीड़ित व्यक्ति ज़मीन पर लेटकर राजा की प्रतीक्षा कर सके। अयोध्या ने यह समझ लिया था कि जब तक रानी चलकर उस कमरे तक नहीं पहुँच सकती, तब तक वह कमरा बेकार है। दिल्ली ने उस कमरे को अपने पास रखा है और गलियारे को अवरुद्ध कर दिया है। कैकेयी ने दशरथ से क्रोधित होने की अनुमति नहीं माँगी थी। भारतीय नागरिकों को आयुक्त से अनुमति नहीं माँगनी चाहिए।

(फोटो : प्रतीकात्मक, फाइल फोटो)

(संजय हेगड़े का लेख‘द ट्रिब्यून’ से साभार, प्रस्तुति : शैलेश)

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