Monday, August 15, 2022

‘बाइज़्ज़त बरी’ किताब की समीक्षा : बेगुनाहों की दर्द भरी दास्तां का दस्तावेजीकरण

ज़रूर पढ़े

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही देश के अंदर आतंकवाद की घटनाओं में अचानक इजाफ़ा हुआ और आरोपी के तौर पर लगातार मुसलमानों की गिरफ़्तारी हुई। जब भी देश के अंदर कहीं आतंकवाद की कोई घटना घटती, मुसलमानों को निशाना बनाया जाता। देश के अलग-अलग हिस्सों से उनकी धर-पकड़ शुरू हो जाती। यह सिलसिला साल 2008 तक चला। महाराष्ट्र एटीएस द्वारा मालेगांव बम विस्फोट साजिश ख़ुलासे के बाद यह मालूम चला कि न सिर्फ़ मालेगांव के मुस्लिम इलाके बल्कि हैदराबाद की मक्का मस्ज़िद, दिल्ली जामा मस्ज़िद, अजमेर दरगाह शरीफ़ और समझौता एक्सप्रेस आदि जगह में हुए बम विस्फोटों में चरमपंथी हिन्दू संगठन और उससे जुड़े लोगों का हाथ था। इस सनसनीखे़ज़ खु़लासे के बाद तमाम मुस्लिम नौजवानों की ज़ेलों से रिहाई हुई। उनको ज़ेल से बाइज़्ज़त बरी किया गया।

ऐसे ही चौहदह बेगुनाह मुसलमानों की दर्द भरी कहानियों का दस्तावेजीकरण है, किताब ‘बाइज़्ज़त बरी ?’सीनियर जर्नलिस्ट मनीषा भल्ला और जर्नलिस्ट-एक्टिविस्ट डॉ. अलीमुल्लाह खान की इस साहसिक किताब में साज़िश के शिकार उन बेकसूर नौजवानों की दर्द भरी दास्तां है। किस तरह से वे पुलिस और जांच एजेंसियों के पूर्वाग्रह, साम्प्रदायिक नज़रिए, तानाशाही रवैये और साजिश के शिकार हुए। कैसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी के अनमोल साल ज़ेल की काल कोठरियों में शारीरिक एवं मानसिक यातनाओं के बीच गुज़ारे। इस दरमियान उनके परिवार ने क्या-क्या ज़िल्लतें और दुःख-दर्द झेले। जब वे ज़ेल में दस-बारह साल गुज़ारने के बाद, अदालत से बाइज़्ज़त बरी हुए, तो उनकी दुनिया कितनी बदल गई।

केन्द्र या मुल्क के तमाम सूबों में सरकार कोई सी भी रही हो, पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में कोई फ़र्क नहीं दिखलाई देता। मुसलमानों के जानिब उनका नज़रिया और बर्ताव वही भेदभाव एवं पक्षपातपूर्ण वाला रहता है। किताब में जिन चौदह नौजवानों की दर्दनाक दास्तां दर्ज है, उनमें से ज़्यादातर राजग और संप्रग सरकार के दौरान गिरफ़्तार हुए। आतंकवाद से निपटने का इन सरकारों का रवैया और पॉलिसी एक जैसी ही नज़र आती है। मानवाधिकारों की परवाह किसी ने भी नहीं की। यही वजह है कि इस दरमियान बेकसूर नौजवानों का भयानक दमन और उत्पीड़न हुआ। अफ़सोस, यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। आज भी सैकड़ों बेकसूर लोग जे़ल के अंदर सड़ रहे हैं। ये लोग इतने खु़शकिस्मत नहीं कि इनकी रिहाई के लिए कोई पैरवी करे ? किताब ‘बाइज़्ज़त बरी ?’ में जो लोमहर्षक वाक़ये दर्ज हैं, वे कमजोर दिल वालों एवं जज़्बाती लोगों को परेशान कर सकते हैं।

पुलिस एवं जांच एजेंसियों की अवैध हिरासत, थाने एवं ज़ेल के अंदर बेगुनाह लोगों पर जो जुल्म ढाए गए, वे ऐसे हैं कि उन्हें बयां नहीं किया जा सकता। किताब मीडिया के गैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव और समाज के असंवेदनशील रवैये पर भी सवाल उठाती है। सवाल उस व्यवस्था से भी है, जिन पुलिसवालों और जांच एजेंसियों के अफ़सरों ने सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों और परिवारों को एक प्लानिंग के तहत तबाह कर दिया, उनकी जवाबदेही कब तय होगी ? उन्हें अपने किए की सज़ा कब मिलेगी ? क्या ज़ेलों में एक लंबा अरसा गुज़ारने के बाद, वे मुस्लिम नौजवान वास्तव में ‘बाइज़्ज़त बरी ?’ हुए हैं ? या फ़िर यह उनके साथ एक धोख़ा भर है। क्या उनके साथ वाकई इंसाफ़ हुआ है ?

किताब में लेखक-चिंतक प्रोफेसर अपूर्वानंद, राज्यसभा सांसद मनोज झा, जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी वगैरह के विचारोत्तेजक पैगाम भी शामिल किए गए हैं। अपूर्वानंद अपने पैगाम में जहां बड़े ही मायूसी से यह बात बयां करते हैं, ‘‘…धीरे-धीरे यह राष्ट्र अपनी शक्ल बदल रहा है। यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की जगह अब एक मुसलमान शंकालु राष्ट्र में तब्दील हो रहा है।’’ तो वहीं उनका यहां तक मानना है कि जो नौजवान आतंकवाद के इल्जाम में गिरफ़्तार हुए, वे दरअसल बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के शिकार हैं। अपूर्वानंद की यह बात बहुत हद तक सही भी है। रहमान युसूफ़ फारुक़ी से लेकर सैयद वासिफ़ हैदर, मुमताज़ अहमद, अब्दुल वाहिद शेख़, रज्जब अली, रियाज़ अहमद मोहम्मद ख़ान, मोहम्मद इलियास और इरशाद अली वगैरह को अपने मुसलमान होने की ही कीमत चुकाना पड़ी। सिर्फ़ इस एक बिना पर कि मुसलमान हैं, वे पुलिस और जांच एजेंसियों के शक के दायरे में आ गए। दहशतगर्दी के इल्ज़ाम से बरी हुए ज़्यादातर नौजवानों ने किताब में लेखकों को बतलाया है कि वे मुसलमान हैं, इसलिए उन पर बम धमाके का इल्ज़ाम थोपा गया।

अपने मज़हब की वजह से उन्हें इतनी परेशानियां और ज़िल्लत झेलनी पड़ी। मीडिया, जिसका काम इस तरह के मामलों में बेहद संज़ीदगी और जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग, निष्पक्ष जांच-पड़ताल करना है, वह भी अक्सर पुलिस और जांच एजेंसियों के प्रवक्ता के तौर पर काम करती है। ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस तरह की ख़बर आते ही जिस तरह से मुल्ज़िम का मीडिया ट्रायल होता है, जुर्म साबित होने से पहले ही उसे गुनहगार साबित कर दिया जाता है। यह सोचे बिना कि इस मीडिया ट्रायल का उसके परिवार और उसकी आने वाली ज़िंदगी पर क्या असर होगा ? जो लोग इन गंभीर इल्ज़ामों से बरी हुए, आज भी उनकी ज़िदगी अज़ाब बनी हुई है। जे़ल की सलाखों के पीछे उन पर जो जुल्म हुए, उससे वे न सिर्फ़ जिस्मानी बल्कि जे़हनी तौर पर भी टूट गए हैं। एक ज़िंदा लाश की तरह वे अपनी बाकी ज़िंदगी गुमनामी में गुज़ार रहे हैं।

‘बाइज़्ज़त बरी ?’ में सिर्फ़ एक बात अख़रती है, बेगुनाह मुस्लिम नौजवान किस तरह से पुलिस और जांच एजेंसियों का निशाना बने और जे़ल में उन पर क्या-क्या जुल्म हुए ?, यह सब बातें तो किताब में तफ़्सील से दर्ज हैं (कमोबेश सभी मामलों में एक ही पैटर्न दिखाई देता है।), लेकिन जे़ल से उनकी रिहाई कैसे मुमकिन हुई ? उनका मामला लड़ रहे वकीलों ने अदालत में क्या-क्या अहम दलीलें और उन्हें बेगुनाह साबित करने के लिए क्या सबूत पेश किए ?, किताब में यह सब बातें भी आना लाज़िमी थी। यही नहीं इन नौजवानों को ‘बाइज़्ज़त बरी ?’ करते वक्त अदालतों ने पुलिस, जांच एजेंसियों और पूरे सिस्टम पर जो तल्ख़ टिप्पणियां कीं, उन्हें निर्देश दिए, किताब में इन सब बातों का भी ज़िक्र ज़रूरी था। इस मामले में यह किताब कुछ अधूरी लगती है।

किताब का प्रोडक्शन और उसकी पब्लिसिटी स्ट्रेटजी लेखकद्वय और प्रकाशक ने बेहतरीन ढंग से बनाई है, लेकिन किताब में वर्तनी की गड़बड़ियां और लंबे-लंबे वाक्याशों में भी अल्प विराम चिन्ह यानी कोमा का इस्तेमाल न करना नाक़ाबिले बर्दाश्त है। किताब का कवरपेज, कुछ-कुछ फिल्मी पोस्टर जैसा लगता है। फॉन्ट साइज भी कुछ ज़्यादा ही बड़ा है। इन छोटी-छोटी कमियों को यदि छोड़ दें, तो ‘बाइज़्ज़त बरी ?’ उन किताबों में शामिल की जाएगी, जिन्हें लिखने के लिए मज़बूत इच्छाशक्ति और अदम्य साहस की ज़रूरत होती है। ऐसे दौर में जब सत्ता प्रतिष्ठानों और हुक्मरानों के खि़लाफ़ ज़रा सा भी मुंह खोलना, देशद्रोह हो जाता हो। सत्ता की नीतियों से असहमति जताना, अपराध हो। सिस्टम की गड़बड़ियों से पर्दा हटाना, किसी के लिए भी ख़तरे से खाली नहीं। ‘बाइज़्ज़त बरी ?’ जैसी किताब लिखना वाक़ई हिम्मत का काम है। इस ग़ज़ब के कारनामे के लिए दोनों ही लेखक तारीफ़ के मुस्तहक़ हैं।

किताब समीक्षा : ‘बाइज़्ज़त बरी ?’, लेखक : मनीषा भल्ला, डॉ. अलीमुल्लाह ख़ान
प्रकाशक : भारत पुस्तक भंडार दिल्ली-110090, मूल्य : 295, पेज : 296

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

जश्न और जुलूसों के नाम थी आज़ादी की वह सुबह

देश की आज़ादी लाखों-लाख लोगों की कु़र्बानियों का नतीज़ा है। जिसमें लेखक, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों ने भी अपनी बड़ी...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This