Friday, August 12, 2022

जुगनू शारदेय: स्वाभिमान का सूरज और यायावरी का बादल

प्रदीप सिंहhttps://janchowk.com
लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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जुगनू शारदेय अब इस दुनिया में नहीं हैं। दिल्ली के बदरपुर बॉर्डर श्मशान घाट पर जब उनकी चिता ठंडी हो गयी तब वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा के फेसबुक पोस्ट से पता चला कि अद्भुत जीवन जीने और अनूठी शख्सियत के मालिक जुगनू इस दुनिया से कूच कर गए हैं। वह इस दुनिया के थे भी नहीं। उनकी एक अलग दुनिया थी। अपनी दुनिया के वह पहले और आखिरी बाशिंदे थे। उनके जाने के बाद वह दुनिया बिल्कुल सूनी हो गयी। और जिस दुनिया में हम लोग रहते हैं, उस दुनिया में भी उनके जाने के बाद बहुत कुछ रिक्त हो गया है, हमेशा के लिए खाली। शायद ही आने वाले दिनों में कोई जन्म ले, जो जुगनू की यायावरी, बहादुरी और स्वाभिमान का मुकाबला कर सके।

दिल्ली पुलिस द्वारा लावारिश खाते में दाह-संस्कार कर देने की घटना ही उनके बारे में बहुत कुछ बयां करती है। जुगनू न किसी के वारिस थे और न ही कोई उनका वारिस बन सका। अपने “कुल” और “कुनबे” के वह पहले और अंतिम व्यक्ति थे। न भूतो न भविष्यत!

जुगनू का जन्म (1950 के आस-पास) बिहार के औरंगाबाद जिले में एक व्यापारी परिवार में हुआ। इंटर तक की शिक्षा भी वहीं मिली। इसके बाद वह पटना पहुंचे। पटना में रहते हुए वह समाजवादी आंदोलन, पत्रकारिता, साहित्य, राजनीति और सिनेमा की कई बड़ी शख्सियतों के करीब आए। जेपी आंदोलन के समय प्रण किया कि परिवार और व्यक्तिगत संपत्ति नहीं बनायेंगे और आजीवन उस व्रत का पालन किया। फिर सत्ता के काफी करीब होने के बाद भी उनके मन में परिवार और संपत्ति बनाने का मोह नहीं आया।

सत्तर के दशक में एक बार घर से निकले तो फिर परिवार से कोई नाता नहीं रहा। परिवार छोड़ा, जाति-धर्म से कभी कोई नाता नहीं। फक्कड़ और अलमस्त जीवन के लिए यायावरी की। पिता और मां के जिंदा रहते साल-दो साल में कभी वह पैतृक घर औरंगाबाद चले जाते थे। मां के निधन के बाद परिवार के लोगों से भी मुलाकात बंद हो गयी। पटना, बनारस या इलाहाबाद में कभी कभार परिवार के लोगों या रिश्तेदारों से मुलाकात हो गयी तो ठीक, नहीं तो वह परिजनों और रिश्तेदारों से मिलने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाते थे। कारण पूछने पर उन्होंने एक बार कहा था कि- “पटना से दिल्ली तक मेरे संपर्क में नेताओं और अधिकारियों की लंबी सूची है। मेरे लोग मेरे नाम का गलत फायदा उठाते हैं।”

जीवन को अपनी शर्तों पर जीने वाले जुगनू न तो किसी से उसके परिवार के बारे में पूछते थे और न ही अपने परिवार, घर, जाति के बारे में बताते। वह जीवन को बहुत अलग अंदाज से जीते और देखते थे। उनको देखकर बहुत से लोग घबराते तो बहुत से लोगों को क्रोध भी आता। लेकिन अप्रिय और कड़वा सच बोलने से वह चूकते नहीं थे। चाहे उसकी कीमत जो भी चुकानी पड़े।

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय (राय साहब) से जुगनू शारदेय का नाम तो पहले ही सुना था। लेकिन उनसे पहली मुलाकात 2007 में प्रथम प्रवक्ता के दफ्तर में हुई थी। तब वे नोएडा के सेक्टर-56 में रहते थे। प्रथम प्रवक्ता के दफ्तर में हम अपना असाइन्मेंट लेकर जाते तो कभी-कभार उनको वहां बैठा देखते। उनकी बेखौफ बातचीत और बेलौस अंदाज से उनके निकट नहीं जा सका। 

“संभवत: वर्ष 2009 था, साल भर पहले जुगनू जी नोएडा/दिल्ली से पटना चले गये। और उसके कुछ दिनों बाद ही पता चला कि उन्हें फेफड़े में कैंसर हो गया था। बीच-बीच में उनके मुंह से खून निकल आता था। सांस लेने में परेशानी हो रही थी। लेकिन वह अकेले पटना, मुंबई और दिल्ली जाकर अपना इलाज करा रहे थे। इसी दौरान वह दिल्ली आए थे। मैं भी उनसे मिलने के लिए प्रवक्ता ऑफिस जा पहुंचा। मेरे मन में यह था कि अब परिवार का कोई सदस्य या नजदीकी उनके साथ होगा। जुगनू जी से पूछा, कैसे आए! तो उन्होंने कहा कि पटना से टिकट लिया और राजधानी में बैठा आनंद विहार स्टेशन उतर गया। राय साहब को फोन किया और उन्होंने रवीन्द्र (ड्राइवर) को भेज दिया और राय साहब के यहां पहुंच गया। डॉक्टर को कब दिखाएंगे के सवाल पर कहा, आज शाम को दिखाऊंगा, राय साहब रवीन्द्र को भेज दिये तो ठीक, नहीं तो ऑटो से जाकर दिखाकर चला आऊंगा। फिर पटना का टिकट लूंगा और राजधानी पर बैठ कर रात भर में वापस पटना।”

जुगनू शारदेय कि यह जीवटता ही थी जिससे उन्होंने कैंसर पर विजय पायी। जुगनू जी की बातों ने मेरे ऊपर गहरा असर किया। उस समय मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत उहापोह की स्थिति से गुजर रहा था। मेरे ऊपर गांव से पत्नी और बेटे को लाने का दबाव था। लेकिन आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं दे रही थी। लेकिन जुगनू जी की बातों को सुनने के बाद मैं आत्मविश्वास से भर गया। मुझे लगा कि कैंसर जैसी महामारी से ग्रस्त व्यक्ति कितने आत्मविश्वास से अकेले अपना इलाज करा रहा है, न कोई डर और न किसी सहारे की उम्मीद। ऐसे में मैं तो स्वस्थ और युवा हूं। मैं क्यों नहीं अपने परिवार को साथ रख सकता हूं?

यथावत पत्रिका में उनके साथ काम करने पर उनको बहुत नजदीक से जानने-समझने का अवसर मिला। पटना, मुंबई, जबलपुर और दिल्ली जैसे शहरों में वो रहे। जीविकोपार्जन के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया लेकिन पत्रकारिता को कभी अपना पेशा नहीं बनाया। युवावस्था में जेब में पैसा होने के बाद वह देश के किसी हिस्से में घूमने निकल जाया करते थे। यायावरी उनका शौक था। देश-विदेश घूमे, लेकिन किसी ठौर से बंधे नहीं। पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य, राजनीति और सिनेमा के बड़े लोगों से उनका संपर्क संबंध था। लेकिन यह संपर्क औऱ संबंध सिर्फ पेशेवाराना ही रहा। किसी संबंध का उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग नहीं किया। उनके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष था स्वाभिमान और साफगोई। गलत बात उनको बर्दाश्त नहीं होती थी और सच कहना आज के समय बदजुबानी है। यह बदजुबानी वे आजीवन करते रहे यानि सच बोलते रहे। सत्ताधीशों के समीकरणों में भी वे फिट नहीं बैठे, क्योंकि उनकी कोई जाति नहीं थी, वे कुजात थे। जुगनू सही अर्थों में डॉ. राममनोहर लोहिया के कुजात-गांधीवादी थे। 

जुगनू जी वन्यजीव के जानकार थे। सफेद बाघों पर लिखी उनकी पुस्तक “मोहन प्यारे का सफेद दस्तावेज” बहुत चर्चित पुस्तक रही। पत्रकारिता में धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, अज्ञेय और सुरेंद्र प्रताप सिंह से उनके अच्छे संबंध थे। राजनीति में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी आदि से संबंध और जेपी आंदोलन के ढेर सारे नेताओं से पहचान थी। लेकिन किसी से कभी व्यक्तिगत सहायता की ‘याचना’ नहीं की बल्कि हर जगह ‘रण’ ही किया। जुगनू शारदेय का जाना मानव सभ्यता के एक अनूठे योद्धा का जाना है, जो जीवन भर समाज की सड़ी-गली परंपराओं और विचारों से व्यवहारत: लड़ता रहा। जुगनू जी को हृदय की गहराइयों से प्रणाम!

(प्रदीप सिंह पत्रकार हैं और यथावत पत्रिका में जुगनू शारदेय के सहकर्मी रहे हैं।)

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