एक तरफ़ एक न्यायाधीश ने आकृति चौधरी, जो नोएडा मज़दूर आन्दोलन में गिरफ़्तार 8 लोगों में शामिल 25 वर्षीय थिएटर कलाकार और इतिहासकार हैं, के बारे में पुलिस के विवरण को “मनगढ़ंत” क़रार दिया वहीं ‘साज़िश’ के इस मामले की कमज़ोरियों की कड़ियों में पुलिस के परस्पर-विरोधी रिकॉर्ड, विवादित सबूत और प्रक्रियागत चूक के आरोप भी शामिल हैं। अब तक जेल में बन्द लोगों में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, एक कारख़ाना मज़दूर, एक कलाकार, एक विधि-छात्र, पीएचडी के छात्र और एक ऐसे पत्रकार शामिल हैं, जो एक दशक से भी अधिक समय से नोएडा गये ही नहीं थे।
नई दिल्ली : अप्रैल 2026 में मानेसर और पानीपत के मज़दूरों के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में हज़ारों मज़दूर न्यूनतम वेतन बढ़ोत्तरी और बेहतर कार्यस्थिति की माँग को लेकर असेम्बली लाइंस छोड़ कर कारख़ानों से बाहर निकल आए।
ज़िला प्रशासन के मुताबिक़ नोएडा उत्तर भारत के मुख्य विनिर्मान केन्द्रों में से एक है, जहाँ तक़रीबन 12,000 औद्योगिक इकाईयाँ हैं जिनमें 13 लाख लोग कार्यरत हैं। यहाँ के कारखानों में कपड़ा, एलेक्ट्रोनिक्स और ऑटोमोबाइल के कल-पुर्जों का निर्माण होता है।
राखी सहगल, जो एक स्वतंत्र मज़दूर शोधकर्ता और दो दशक से लम्बे समय से यूनियन की कार्यकर्ता हैं, कहती हैं, “ये प्रदर्शन स्वतःस्फूर्त थे। मानेसर और पानीपत में अलग-अलग कारणों से लगी इस चिंगारी की आग नोएडा तक भी पहुँची।”
मानेसर के होण्डा प्लाण्ट में मज़दूरों की न्यूनतम वेतन बढ़ोत्तरी की माँग उठने के बाद नोएडा के प्रदर्शन 80 स्थलों तक फैल गये। आन्दोलन फिर अन्य ऑटोमोबाइल कारख़ानों और आसपास के गारमेण्ट फ़ैक्ट्री तक पहुँच गया।
सहगल के अनुसार “नोएडा के लिए हाल ही में हुए मानेसर के आन्दोलन ने चिंगारी का काम किया जहाँ हरियाणा सरकार को 11 साल बाद न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी की घोषणा करनी पड़ी।”
उनके अनुसार, “वेतन का मसला, बेशक, एक तात्कालिक मसला था लेकिन उतना ही गहन मसला ज़िल्लत का भी था। उनकी अस्मिता के पर होने वाली चोट का था। जीवनयापन का ख़र्चा – जो ईरान युद्ध के कारण हुये ईंधन संकट के कारण भी प्रभावित हुआ – दूसरा कारण बना। वे भूखे पेट काम पर आते थे और कई कम्पनियों ने तो कैण्टीनें तक बन्द कर दीं। ऐसे कई सारे पहलू थे जिसने मज़दूरों के गुस्से को भड़का मे भूमिका अदा की।”
कुशल मज़दूरों को लगभग 11,000 से 14,000 रुपये मिलते थे और 40,000 से ज़्यादा मज़दूरों ने वेतन बढ़ोत्तरी की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया।
न्यूनतम वेतन को 20,000 रुपये करने की माँग उठने के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल से एक अन्तरिम न्यूनतम वेतन बढ़ोत्तरी लागू की। गौतमबुद्ध नगर और गाज़ियाबाद में अकुशल मज़दूरों के लिए न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 11,313 रु से 13,690 रु कर दिया गया, वहीं अर्द्ध-कुशल और कुशल मज़दूरों के लिए न्यूनतम वेतन क्रमशः 15,059 रु और 16,868 रु कर दिया गया।
इस बढ़ोत्तरी के नाम पर प्रदर्शनों को कुचल दिया गया। लेकिन इसके बाद के महीनों में सरकार ने भयंकर दमन किया, 150 से ज़्यादा लोग हिरासत में ले लिये गये और 1,200 से ज़्यादा डिटेन कर लिये गये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन प्रदर्शनों को “उन तत्वों” द्वारा “नक्सलवाद के ख़तरे को फिर से जीवित करने की एक बड़ी साज़िश” बताया जो उत्तर प्रदेश की “वृद्धि और समृद्धि” के ख़िलाफ़ हैं।
20 अगस्त को द इण्डियन एक्सप्रेस द्वारा 222 बेल ऑर्डर के किये गये विश्लेषण में पाया गया कि 188 मामलों यानी कि 84% मामलों में ज़मानत दे दी गयी। लेकिन इस तथाकथित साज़िश को अंजाम देने वाले आठ आरोपी अभी तक जेल की सलाखों के पीछे हैं।
विरोधाभास
आठ आरोपियों में से दो – 25 वर्षीय नाटक कलाकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर आकृति चौधरी और 65 वर्षीय पत्रकार और अनुवादक सत्यम वर्मा – के ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) भी लगाया गया जिसके तहत बिना मुक़दमे के अधिकतम 12 महीने तक ऐहतियाती हिरासत में रखने का प्रावधान है।
2 सितम्बर 2026 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चौधरी पर लगाये गये रासुका को रद्द कर दिया और सरकार के पक्ष को “मनगढ़न्त कहानी” बताया। वह अब भी 11 एफ़आईआर के सम्बन्ध में सलाखों के पीछे हैं।
सभी आठ आरोपियों ने अलग-अलग एफ़आईआर में ज़मानत की अर्ज़ी दी है, कुछ एफ़आईआर में ज़मानत मिल चुकी है बाक़ी के कारण वे अब भी हिरासत में हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में कई सारी प्राथमिकी को एक साथ जोड़ने के साथ-साथ चौधरी और वर्मा पर लगे रासुका पर सुनवाई चल रही है।
वर्मा की पत्नी शाकम्भरी ने उनके ऐहतियाती हिरासत के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया है जबकि विधि छात्र योगेश मीणा ने पुलिस द्वारा प्रताड़णा के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया है।
आनन्द और रॉय ने हिरासत में यातना के मामले में उच्चतर न्यायालय का रुख़ किया है।
आरोपियों की ओर से केस लड़ रहे वकील कबीर अली ज़िया चौधरी और माणिक गुप्ता ने आर्टिकल 14 को बताया कि पुलिस ने आरोपियों की गिरफ़्तारी के दौरान न तो वॉरेण्ट मुहैया किया न ही उन्हें गिरफ़्तारी के आधार की जानकारी दी, और न ही उनके परिवार वालों को मेजिस्ट्रेट के सामने हुई उनकी पेशी से पहले कोई जानकारी दी।
तीन महिलाएँ – चौधरी, कलाकार सृष्टि गुप्ता और कारख़ाना मज़दूर मनीषा चौहान – के वकीलों का कहना है कि उनको बिना किसी महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी में दिल्ली के बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से 11 अप्रैल को डिटेन किया गया था।
देश में दो साल पहले लागू किये गये आपराधिक संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 43(5) के अनुसार सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले आम परिस्थितियों में किसी भी महिला को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता। अपवादस्वरूप परिस्थितियों में ऐसा किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए किसी महिला पुलिस अधिकारी को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट से लिखित अनुमति प्राप्त करनी होगी।
अन्य अनियमितताएँ
पुलिस की चार्जशीट में दर्ज गिरफ़्तारी की तारीखों और रिमाण्ड शीट में दर्ज तारीखों के बीच भी विसंगतियाँ दिखायी देती हैं। इसी तरह, पुलिस द्वारा दर्ज किये गये स्थानों और उन स्थानों के बीच भी अन्तर है, जहाँ से परिवारों और वकीलों के अनुसार कुछ आरोपियों को वास्तव में हिरासत में लिया गया था।
उदाहरण के लिए, वर्मा, जो लखनऊ में बसे पत्रकार हैं, के दोस्तों के अनुसार वे पिछले 12 वर्षों से ज़्यादा समय से नोएडा गये भी नहीं थे, लेकिन फिर भी इस तथाकथित साज़िश का हिस्सा क़रार दिये गये।
वकील चौधरी ने कोर्ट रिकॉर्ड में भी मौजूद असामान्य अन्तर की ओर भी ध्यान इंगित कराना चाहा। उन्होंने बताया कि ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर कोर्ट के ऑर्डर में आरोपियों के वकील की मौजूदगी दर्ज नहीं है जो उनकी ओर से पेश हुए थे और तर्क और लिखित दलीलें दी, इसके बावजूद कि उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज करने की अपील भी की थी।
वकील चौधरी ने कहा “सबसे संगीन बात यह है कि इन मामलों में दलीलें पेश करने वाले हम सभी वकीलों ने ग्रेटर नोएडा की सूरजपुर अदालत में पेश हुए वकीलों की मौजूदगी दर्ज होने का कोई रिकॉर्ड नहीं पाया। हममें से पाँच ने अपनी मौजूदगी दर्ज किए जाने का अनुरोध किया। इसके अलावा, जिन आदेशों में ज़मानत नामंज़ूर की गयी है, उनमें से किसी में भी यह नहीं बताया गया है कि अभियोजन पक्ष के वकील ने इसके लिए क्या दलील दी थी।”
जेल में बन्द इन आठ लोगों के मामले में ये विसंगतियाँ भूमिका तैयार करती हैं। दर्ज किये गये 11 एफ़आईआर में से प्राथमिकी 163, 164, 165 और 169 में दर्ज चार आरोप पत्र में गिरफ़्तारी के ब्योरे, स्थान और प्रदर्शनों में भूमिकाओं के विवादास्पद विवरण हैं।
इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि जिस दिन 13 अप्रैल को हिंसा भड़की, जेल में बन्द कार्यकर्ता प्रदर्शन स्थल पर मौजूद ही नहीं थे; इनमें से चार 11 अप्रैल को ही गिरफ़्तार किये जा चुके थे। फिर भी उनपर हत्या के प्रयास का और ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों को चोट पहुंचाने समेत कई आरोप लगाये गये हैं।
हर मामले का ब्यौरा :
आदित्य आनन्द : सॉफ्टवेयर इंजीनियर, मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता

एनआईटी जमशेदपुर के इंजीनियर के छात्र और सॉफ्टवेयर कर्मी, 28 वर्षीय आदित्य आनन्द अपनी नौकरी के साथ-साथ बच्चों के लिए एक पुस्तकालय चलाया करते थे और मज़दूर अधिकारों की बात करने वाले मज़दूर बिगुल अख़बार में कारख़ाना मज़दूरों की ज़िन्दगी के हालातों के बारे में लिखा करते थे।
वकील अली ज़िया कबीर चौधरी, जो आनन्द और क़ैद किये हुए अन्य कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने बताया कि आनन्द ने प्रदर्शन के दौरान मज़दूरों के क़ानूनी-अधिकारों की बात की थी और रिकॉर्ड किये गये साक्ष्य में शान्तिपूर्ण प्रदर्शन की अपील की उनकी कोशिश का साफ़ सबूत मिलता है।
एफ़आईआर संख्या163/2026 में दायर आरोपपत्र में पुलिस ने यह आरोप लगाया है कि 11 अप्रैल को 1,500 से अधिक मज़दूरों ने नोएडा स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन की एक सड़क को जाम कर दिया था और हिंसा के लिए उकसाने वाले भड़काऊ भाषण दिये थे। मज़दूरों पर सम्पत्ति के तोड़फोड़ और पुलिस पर पत्थरबाज़ी और जान से मारने की धमकी का आरोप है।
आनन्द के भाई केशव बताते हैं कि वे 10 और 11 अप्रैल को नोएडा में चल रहे आन्दोलन के मज़दूर बिगुल की ओर से दस्तावेजीकरण के लिए गये थे।
केशव कहते हैं “हमारे पास ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिसमें रूपेश और वह साफ़-साफ़ मज़दूरों से शान्ति बनाये रखने की अपील कर रहे हैं, यहाँ तक की अहिंसा की शपथ तक दिलवा रहे हैं। पुलिस को यह क्यों नहीं नज़र आता?”
फ़िलहाल क़ैद आदित्य आनन्द और रूपेश रॉय ने 11 अप्रैल को आन्दोलनरत मज़दूरों को सम्बोधित किया था और उनसे शान्तिपूर्ण तरीक़े से आन्दोलन चलाने की अपील की थी। इस वीडियो में वे अपने हाथ खड़े कर सामूहिक रूप से शपथ लेते और यह कहते नज़र आते हैं : “हम अपनी यह हड़ताल बिलकुल ही शान्तिपूर्ण तरीक़े से चलाएँगे। हम किसी भी तरीक़े का हिंसा नहीं करेंगे…”
बाद में 11 अप्रैल को, आनन्द अन्य सह-आरोपी रूपेश रॉय, सृष्टि गुप्ता, आकृति चौधरी और मनीषा चौहान के साथ बोटानिकल गार्डेन मेट्रो की ओर गये। गुप्ता ने इन्स्टाग्राम पर लाइव वीडियो जारी किया जिसमें सादे कपड़े और वर्दी में पुलिसकर्मी उन्हें और उनके साथियों को डिटेन करते नज़र आ रहे हैं।
केशव बताते हैं, “आदित्य किसी तरह बच निकले। वहाँ गिरफ़्तारी जैसा कुछ नहीं था, बल्कि वह तो अपहरण था। कोई भी महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी, पुरुष पुलिसकर्मियों ने गिरफ़्तार की गयी लड़कियों के साथ बदसलूकी की, और उन्हें कोई वॉरेण्ट नहीं दिया गया न ही गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी बतायी गयी।”
वकील अली ज़िया कबीर चौधरी और कंवलप्रीत कौर ने कहा कि आरोपियों को पुलिस वैन में अज्ञात स्थानों पर ले जाया गया था और “दो से तीन घण्टे बाद” ही पुलिस थाने पहुँचाया गया।
मीडिया रिपोर्टों में “मास्टरमाइण्ड” क़रार दिये गये आनन्द को रेलवे पुलिस बल ने तमिल नाडु के तिरुचिरापल्ली स्टेशन से 17 अप्रैल की रात को गिरफ़्तार किया था। उनके भाई ने बताया कि इस दौरान तय प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ : तमिल नाडु के एक मजिस्ट्रेट के ट्रांज़िट रिमाण्ड देने से इंकार कर देने के बावजूद उत्तर प्रदेश पुलिस उन्हें अपने साथ ले गयी।
केशव ने बताया कि जब आनन्द 19 अप्रैल को उत्तर प्रदेश पहुँचे तब उन्हें कोई चोट नहीं लगी हुई थी। लेकिन बाद में जब उन्हें लुक्सर जेल से सूरजपुर के ज़िला सत्र न्यायालय में पेश किया गया तब उनके हाथों में भयंकर सूजन थी। 8 मई को केशव ने इस दावे के साथ सुप्रीम कोर्ट मे एक रिट याचिका दायर की कि पुलिस हिरासत के दौरान उनके भाई को प्रताड़ित किया गया।
आर्टिकल 14 ने गौतम बुद्ध नगर कि पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह से इस मामले में फ़ोन व व्हाट्सऐप के ज़रिये टिप्पणी लेनी चाही। उनका कोई जवाब नहीं आया। जवाब आने पर इस स्टोरी में शामिल कर लिया जाएगा।
आनन्द के ऊपर हत्या के प्रयास, सरकारी कर्मचारी को स्वेच्छा से गम्भीर चोट पहुँचाने, दंगा करने, ग़ैर-क़ानूनी जमावड़ा करने, आपराधिक धमकी देने तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने से सम्बन्धित अपराधों समेत कई आरोप लगाये गये हैं।
वे 11 एफ़आईआर में नामज़द हैं और लुक्सर जेल में न्यायिक हिरासत में हैं।
रूपेश रॉय : ऑटोचालक, मज़दूर कार्यकर्ता

नोएडा में बसे 44 वर्षीय ऑटोचालक रूपेश रॉय “रिचा ग्लोबल नोएडा” के व्हाट्सऐप ग्रुप का संचालन करते थे जहाँ मज़दूर प्रदर्शन से जुड़ी ख़बरें साझा करते थे। वे एकता संघर्ष समिति के भी सदस्य थे जो नोएडा के स्थानीय इलाके में मज़दूरों और बच्चों के मसलों पर सक्रिय थे और मज़दूरों की रिहायशी बस्तियों में सस्ते बिजली की माँग को लेकर अभियान चलाते थे।
रॉय को 11 अप्रैल को गुप्ता, चौहान और चौधरी के साथ हिरासत में लिया गया था – 13 अप्रैल को हुई हिंसा के 2 दिन पहले, जिसका उन्हें मास्टरमाइण्ड बताया जा रहा है। केशव आनन्द, जो आठों आरोपियों की रिहाई के एक मंच का संचालन करते हैं, बताते हैं कि रॉय ने व्हाट्सऐप ग्रुप में कोई सन्देश नहीं भेजा था जबकि आनन्द ने मज़दूरों से शान्ति बनाये रखने की अपील करते हुए वीडियो डाले थे।
आनन्द ने पुलिस के आरोपपत्र और रिमांड पत्र में रॉय और उनके साथ गिरफ़्तार अन्य तीन के हिरासत में लिए गये दिन में विसंगति पर भी ध्यान दिलाया।
अदालती दस्तावेज़ों में एक और असामान्य विवरण मौजूद है : दस्तावेज़ों के अनुसार सब-इंस्पेक्टर बीना कौर ख़ुद “रिचा ग्लोबल” ग्रुप की मेम्बर थीं जिसे पुलिस ने “साज़िश” का हिस्सा बताया है और ख़ुद जलती हुई गाड़ियों की तस्वीरें साझा की थी।
आर्टिकल 14 ने कौर से सम्पर्क किया, जिन्होंने फ़ोन काट देने से पहले यह कबूला कि नम्बर उन्हीं का है। ग्रुप में उनकी मौजूदगी की संपुष्टि द वायर की 23 मई की एक स्टोरी में होती है।
रॉय के समर्थकों द्वारा नामज़द पुलिस स्रोतों के अनुसार कौर वहाँ खुफ़िया जानकारी जुटा रहीं थीं। उनपर कार्यकर्ताओं की तरह कोई कार्रवाई नहीं की गयी है।
रॉय ऑटो चला कर मासिक तौर पर तक़रीबन 15,000 रुपये कमाते थे। उनकी पत्नी एक गारमेण्ट कारख़ाना में मज़दूरी करती थीं, उनके दो बच्चे हैं जो स्कूल में पढ़ते हैं। उनकी गिरफ़्तारी के बाद परिवार दोस्तों और रिश्तेदारों पर आश्रित है।
उनके भाई मदुरेश, जिनपर भी पुलिस ने हिंसा करने का आरोप लगाया है, को पुलिस ने धमकाया पर अब उन्हें ज़मानत मिल चुकी है।
रॉय न्यायिक हिरासत में हैं और 11 एफ़आईआर में नामज़द हैं।
आकृति चौधरी : नाटक कलाकार, इतिहास की स्नातक

दिल्ली यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल कर चुकी 25 वर्षीय आकृति चौधरी प्रशिक्षण से इतिहासकार हैं, फ़िलहाल क़ानून की छात्रा हैं और प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग से जुड़ी नाटक कलाकार हैं और मज़दूर बिगुल से जुड़ी हैं। वे जर्मनी के उत्कृष्ट नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट और भारतीय नाटककार और कार्यकर्ता सफ़दर हाशमी के नाटकों की प्रस्तुति में शामिल रह चुकी हैं और बच्चों के लिए कार्यशालाएं आयोजित की हैं।
पुलिस ने 11 अप्रैल को उन्हें नई दिल्ली के बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से गिरफ़्तार किया था।
12 मई को उनपर 13 अप्रैल को हुई हिंसा भड़काने के आरोप में रासुका लगाया गया था। रासुका के तहत बिना मुक़दमे की प्रक्रिया चलाये आरोपी को 12 महीने तक की ऐहतियाती हिरासत में रखने का प्रावधान है।
उनके वकील अली ज़िया कबीर चौधरी ने सबसे महत्वपूर्ण विसंगति को रेखांकित किया : अगर आकृति 11 अप्रैल को ही हिरासत में थी तो फिर दो दिन बाद हुई हिंसा कैसे भड़का सकती थीं। उनके पिता, अरुण, ने बताया कि पुलिस के रिकॉर्ड में उनकी गिरफ़्तारी का दिन 12 अप्रैल दर्ज है।
वे कहते हैं, “मेरी बेटी, जो 11 अप्रैल से ही हिरासत में थी, 13 को हुई हिंसा की ज़िम्मेदार कैसे हो सकती है? पुलिस ने भी उसके हिरासत का दिन 12 अप्रैल दर्ज किया हुआ है।”
आर्टिकल 14 ने गौतम बुद्ध नगर कि पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह से इस मामले में फ़ोन व व्हाट्सऐप के ज़रिये टिप्पणी लेनी चाही। उनका कोई जवाब नहीं आया। जवाब आने पर इस स्टोरी में शामिल कर लिया जाएगा।
1 सितम्बर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की जस्टिस अतुल श्रीधरण और जस्टिस अचल सचदेवा वाली बेंच ने पुलिस को यह आदेश दिया था कि वह वीडियो साक्ष्य पेश करें जिसमें आकृति ने आन्दोलनकारियों को पत्थरबाज़ी और आगजनी के लिए भड़काया था। जस्टिस श्रीधरण ने पूरी जाँच प्रक्रिया पर नाराज़गी जतायी थी और कहा था कि उसकी हिरासत की अवधि बढ़ाने के लिए मनमाने तरीक़े से अपने अधिकारों का इस्तेमाल करता हुआ पाये जाने पर अधिकारियों को हर्जाना भुगतना पड़ेगा।
2 सितम्बर को इस बेंच ने उस पर लगाया गया रासुका रद्द कर दिया।
अरुण ने पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज आकृति की गिरफ़्तारी की जगह को लेकर भी सवाल खड़े किये। उन्होंने बताया की एफ़आईआर में उनके हिरासत का स्थान एक पुलिस स्टेशन दर्ज किया गया है जबकि वीडियो फूटेज के अनुसार उन्हें बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से उठाया गया था। वे बताते हैं कि कोई भी महिला पुलिसकर्मी उस दौरान मौजूद नहीं थी, जो क़ानूनी तौर पर ज़रूरी होता है और पुरुष पुलिसकर्मियों ने उन्हें सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान के साथ हिरासत में लिया था।
अरुण कहते हैं कि उनकी बेटी ने 13 मई को उन्हें फ़ोन करके रासुका लगाये जाने की ख़बर दी थी, इससे ज़्यादा सूचना उनके परिवार को नहीं मिली। उनके वकील अली ज़िया कबीर चौधरी बताते हैं कि उन्हें 2 हफ्तों बाद अदालत में पेश किया गया था, जब उन्हें रासुका के तहत डिटेन्शन ऑर्डर कि एक प्रति प्राप्त हुई।
अरुण कहते हैं “हमें रासुका के डिटेन्शन ऑर्डर की कॉपी तक मुहैया नहीं करवायी गयी। जब उसे अदालत में पेश किया गया तब जा कर हमें ऑर्डर की प्रति प्राप्त हुई।”
रासुका के धारा 8 के अनुसार आम तौर पर हिरासत के आधारों की जानकारी पाँच दिनों के अन्दर देना ज़रूरी है। असाधारण परिस्थितियों में कारणों के लिखित रिकॉर्ड के साथ यह अवधि 10 दिनों तक हो सकती है।
आकृति ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में स्नातक किया है, नेट के पेपर में उत्तीर्ण होते हुए पीएचडी की तैयारी कर रही थी। उन्होंने हाल में ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के विधि की परीक्षा भी पास की थी और एलएलबी के प्रथम वर्ष की छात्रा थीं।
उनके पिता कहते हैं “मुझे फ़ख़्र है अपनी बेटी पर। वह बहुत साहसी है; वह, उसके साथी आज के समय के भगत सिंह हैं। मुझे उस पर गर्व है। उसने कभी ग़लत नहीं किया न किसी और पर हुए जुल्म को बर्दाश्त किया। उसे ग़रीबों के बीच काम करना, जनता के लिए नाटक करना और उन तक किताबें पहुँचना बेहद पसन्द था।“
हालाँकि अदालत ने उसपर लगाया गया रासुका रद्द कर दिया है, 11 एफ़आईआर में नामज़द आकृति अभी भी हिरासत में है।
सत्यम वर्मा : पत्रकार, अनुवादक, भगतसिंह पर अध्येता

65 वर्षीय सत्यम वर्मा ने 1991 से 2004 के दरमियान यूनीवार्ता के साथ काम किया है और उसके बाद से जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान, जागरूक नागरिक मंच और मज़दूर बिगुल के साथ जुड़े रहे हैं। वे एक विपुल अनुवादक हैं और हाल में ही उन्होंने भगतसिंह और उनके साथियों पर एक किताब तैयार की है।
17 अप्रैल को पुलिस ने वर्मा को लखनऊ स्थित जनचेतना पुस्तक केन्द्र से इस नाम पर गिरफ़्तार किया कि लखनऊ में हुए प्रदर्शनों में उनकी भागीदारी थी।
उनके वकीलों और उनकी साथी और सह-प्रकाशक कात्यायनी के अनुसार उनका डिटेन्शन ग़ैर-क़ानूनी था। उन्होंने कहा कि निराला नगर पुलिस थाने ने जनचेतना पुस्तक केन्द्र और पुस्तकालय पर रेड डाली और उन्हें बिना किसी अरेस्ट मेमो, वॉरेण्ट या ज़ब्ती वॉरेण्ट के ले गये और दो दिनों बाद उन्हें नोएडा की अदालत में पेश किया, उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें नोएडा से गिरफ़्तार किया गया था जबकि असल में उन्हें लखनऊ से ले जाया गया था।
पुलिस की ओर से हुई चूकों के आरोपों को लेकर पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह से बात करने के लिए फोन कॉल और व्हाट्सऐप मेसेज के ज़रिये सम्पर्क करने की कोशिश की गयी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। यदि उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया आती है, तो इस स्टोरी को अपडेट किया जाएगा।
उनके ऊपर 13 मई को रासुका लगाया गया था।
आर्टिकल 14 ने 170 पृष्ठों वाले रासुका दस्तावेज़ की एक प्रति हासिल कि, और हालाँकि ज़्यादातर हिस्सा हिन्दी में है, लेकिन साक्ष्य के प्रमुख स्रोतों में से एक, जो ‘परिशिष्ठ संख्या 3’ के तहत दर्ज है, पूर्ण रूप से अँग्रेजी में है।
द वायर द्वारा की गयी जुलाई 2026 की पड़ताल के तहत, परिशिष्ठ संख्या 3 के तहत नोएडा ज़िला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने एक दक्षिणपंथी ट्वीटर अकाउण्ट ‘द क्रोनोलोजी’ से कॉपी किये साक्ष्य का हवाला दिया है।
इसमें फिलिस्तीन के समर्थन में हुए एक प्रदर्शन की तस्वीर शामिल है जिसमें से सत्यम सीताराम येचुरी और प्रकाश करात जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के साथ शामिल थे, जिसे पुलिस ने एक ख़तरनाक विचारधारा के साक्ष्य के रूप में परिशिष्ट में शामिल किया।
पुलिस ने शुरुआत में यह आरोप लगाया था कि सत्यम को डॉलर, पाउण्ड और यूरो जैसी विदेशी मुद्रा में 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि प्राप्त हुई थी, पर उनके वकील चौधरी के अनुसार कि पुलिस ने अब तक इसके पक्ष में कोई साक्ष्य अदालत में जमा नहीं किये हैं। चौधरी कहते हैं यह राशि “उन्हें उनके काम के ऐवज़ मे मिला नियमित भुगतान थी जो कई सालों की अवधि में जमा हुई थी”, इसे तोड़मरोड़ कर 1 करोड़ फ़ण्ड का रूप दिया जा रहा है।
वर्मा की पत्नी शाकम्भरी ने लखनऊ स्थित पुस्तक केन्द्र के सीसीटीवी फ़ुटेज के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की है जो पुलिस के उस रिकॉर्ड का खण्डन करती है जिसमें उनकी गिरफ़्तारी का स्थान नोएडा के एक पुलिस थाने को दिखाने की कोशिश की गयी है।
वर्मा को मधुमेह, थाइरोइड और हाई ब्लड प्रेशर की बीमारियाँ हैं। उनकी साथी कात्यायनी बताती हैं कि उन्हें गिरफ़्तारी के “तक़रीबन 48 घण्टे” बाद तक कोई दवा नहीं मुहैया करायी गयी।
वर्मा पर रसुका लगाया गया हाई और वे 11 एफ़आईआर में नामज़द किये गये हैं।
11 अप्रैल को हुई गिरफ्तारियाँ : सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान
28 वर्षीय विजुअल आर्टिस्ट सृष्टि गुप्ता ने इन्स्टाग्राम पर ख़ुद के डिटेन्शन का दस्तावेज़ीकारण साझा किया था जिसमें सादे कपड़ों और वर्दी, दोनों में पुलिस उन्हें 11 अप्रैल को हिरासत में लेते हुए नज़र आते हैं।
उनकी गिरफ़्तारी के तक़रीबन पाँच महीने बाद उनकी रिहाई के लिए अभियान चलाने वाले उनके दोस्त और साथियों ने पुलिस अधिकारियों द्वारा उनके मोबाइल फ़ोन की फ़र्जी “बरामदगी” किये जाने और उनके घर पर सबूत प्लाण्ट करने की कोशिश का वीडियो साक्ष्य भी जारी किया है, जो पुलिस के ख़िलाफ़ गम्भीर आरोपों की ओर इशारा करता है।
शान्तिनिकेतन की स्नातक गुप्ता ने मज़दूर बिगुल के इन्स्टाग्राम पेज से यह बताते हुए लाइव वीडियो जारी किया था कि किस तरह सादे कपड़ों में एक पुलिसकर्मी वर्दी पहने हुए पुलिसकर्मियों के साथ उन्हें और उनके तीन साथियों को बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से गिरफ़्तार कर रहे हैं।
वकील अली ज़िया कबीर चौधरी बताते हैं कि पुलिस ने कोई अरेस्ट मेमो या वारण्ट नहीं दिया था और इस मौक़े पर कोई भी महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी।
उसकी गिरफ़्तारी के समय कोई गिरफ़्तारी वारण्ट या मेमो नहीं दिया गया था, इसके बजाय पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 (शान्ति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति/बॉन्ड देने का प्रावधान), 135 (सूचना की सत्यता की मजिस्ट्रेट द्वारा जांच) और 170 (संज्ञेय अपराध किए जाने से रोकने के लिए गिरफ्तारी) के तहत 12 अप्रैल को जारी किये गये “शान्ति बनाये रखने के लिए ज़मानत देने में विफल रहने पर प्रतिबद्धता वारण्ट” का हवाला दिया था। इसमें 50,000 रुपये की ज़मानत राशि जमा न कर पाने के बाद उन्हें एहतियाती हिरासत में लिए जाने का उल्लेख है।
अदालत में दायर किये गये एक शपथपत्र में गुप्ता ने यह भी दावा किया कि उन्हें 11 अप्रैल को चौधरी, चौहान और रॉय के साथ हिरासत में लिया गया था। इसमें उन्होंने कहा कि उनमें से किसी को भी गिरफ़्तारी वारण्ट, डिटेन्शन मेमो या कोई लिखित ऑर्डर पेश नहीं किया गया; उन्हें हिरासत में लिए जाने के आधार नहीं बताये गये; और न तो उनके परिवार वालों को और न ही उनके परिचितों को उनके ठिकाने की जानकारी दी गयी।
उन्होंने यह भी बताया कि बाद में 12 अप्रैल को उन्होंने कई पुलिसकर्मियों को “रूपेश रॉय पर मुक्कों और डण्डों से शारीरिक चोट पहुँचाते हुए” देखा और उन्हें और साथ में गिरफ़्तार अन्य महिलाओं को भी यह महसूस कराया गया कि उनके साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया जा सकता है। यही नहीं, 11 अप्रैल को हिरासत में ले लिये जाने के बावजूद, पुलिस की रिमाण्ड शीट और चार्जशीट में दर्ज की गयीं उनकी गिरफ़्तारी की तारीखों में विसंगतियाँ हैं (जैसा कि उनके साथ गिरफ़्तार अन्य तीन लोगों के मामले में भी है)।
उदाहरण के लिए, एफ़आईआर 163 की रिमाण्ड शीट में उनकी गिरफ़्तारी की तारीख 15 अप्रैल 2026 दर्ज है, जबकि उसी एफ़आईआर की चार्जशीट में यह तारीख 24 अप्रैल 2026 दर्ज है।
ऐसे ही विरोधाभास एफ़आईआर 164 और 165 की रिमण्डशीट और चार्जशीट के बीच मौजूद हैं।
उनकी गिरफ़्तारी के पाँच महीने का समय गुज़रने के साथ उनके मामले ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी आक्रोश देखने को मिला है, सैंकड़ों कलाकारों ने उनकी और आकृति चौधरी की रहाई की माँग को लेकर याचिका पर दस्तख़त किये हैं। एक कलाकार के तौर पर उनके समूचे रचनात्मक कार्य में स्थानीय समुदायों के साथ उनकी सक्रिय भागीदारी और राजनीतिक सरोकार भी नज़र आता है।
गुप्ता के दोस्त विनोद कार्की कहते हैं, “कला को अक्सर केवल एक विषय के रूप में समेट दिया जाता है। आप पोर्टफ़ोलियो तैयार करते हैं, पढ़ते हैं, जितना बताया जाता है उसी दायरे में रहते हैं। लेकिन सृष्टि का ज़ोर कला को जन के बीच लेकर जाने पर था। हम दिल्ली कॉलेज ऑफ़ आर्ट में साथ पढ़ते थे, फिर वह शान्तिनिकेतन चली गयी। वहाँ वह राजनीतिक तौर पर और सचेत हुई।”
गुप्ता न्यायिक हिरासत में हैं और 11 एफ़आईआर में नामज़द हैं।
मनीषा चौहान, कारखाना मज़दूर

25 वर्षीय मनीषा चौहान, जो मूल रूप से बिहार से हैं, गिरफ़्तारी के वक़्त नोएडा में कार्यरत थीं। उनके बयान के अनुसार, पुलिस ने उन्हें गुप्ता, चौधरी और रॉय के साथ 11 अप्रैल को बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से डिटेन किया था।
पुलिस की चौहान के व्हाट्सऐप चैट्स पर अत्यधिक निर्भरता है और आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शन से पहले मज़दूरों का जुटान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इन चैट्स को सार्वजनिक नहीं किया गया है। आठ आरोपियों में एक वे ही हैं जिनकी सक्रियता मुख्यतः उन कारख़ानों में कम करने और मज़दूर हितों की आवाज़ उठाने की थी जिनकी कार्यस्थितियों से प्रदर्शनों की शुरुआत हुई थी।
चौहान नोएडा औद्योगिक क्षेत्र के एक कारख़ाने में काम करती थीं और मासिक तौर पर 22,000 कमाती थीं। उनके पिता 60 वर्ष से ऊपर हैं और हाथ में चोट के कारण आर्थिक तौर पर पूरी तरह से उनपर निर्भर हैं।
उनके वकील ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उनके खिलाफ़ सभी 11 एफ़आईआर को जोड़ देने की अपील डाली है, इस बात पर ज़ोर देते हुए की लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया ही अपने आप में सज़ा साबित हो रही है और परिवार की आर्थिकी अलग-अलग मसलों में ज़मानतदारों कि व्यवस्था कर पाने में मुश्किलों का सामना कर रहा है।
चौहान न्यायिक हिरासत में हैं और 11 एफ़आईआर में नामज़द हैं। उनके ऊपर रासुका नहीं लगाया गया है।
हिमांशु ठाकुर : पीएचडी कि तैयारी कर रहे छात्र संगठनकर्ता

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के छात्र, 24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर पीएचडी में दाख़िले की तैयारी कर रहे थे जब पुलिस ने उन्हें उनके शालीमार बाग स्थित कमरे से 18 अप्रैल को हिरासत में लिया था।
उनकी बहन नेहा आर्टिकल 14 को बताती हैं, “जब यह सब हुआ तब उनका जामिया में पीएचडी के इंटरव्यू की तारीख़ आयी थी।”
नेहा ने बताया कि एक दिन से ज़्यादा समय गुज़र जाने तक उनके परिवार को कोई ख़बर नहीं थी और अधिकारियों ने बिना कोई औपचारिक ज़ब्ती मेमो दिये सभी इलेक्ट्रोनिक डिवाइस ज़ब्त कर लिये। वे बताती हैं, ठाकुर को उनके कमरे से हिरासत में लेने के 36 घण्टे बाद जाकर न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था और तब तक उनके परिवार वालों को उनके ठिकाने की कोई सूचना नहीं थी।
नेहा ने आरोप लगाया कि हिरासत में उनके साथ मारपीट भी की गयी।
नेहा कहती हैं, “वे उसे शालीमार बाग थाना ले गये और पुलिस वर्दी की बेल्ट से उसे पीटा। उनके मेडिको लीगल केस में यह दर्ज नहीं है लेकिन जब हमने हिमांशु से बात की तब उसने हमें यह बातया।
शालीमार बाग थाना और नोएडा पुलिस कमिश्नर से फोन और व्हाट्सऐप पर सम्पर्क करने की कोशिश की गयी लेकिन किसी ने भी हिरसत में हुई मारपीट पर कोई जवाब नहीं दिया।
ठाकुर दिशा छात्र संगठन से जुड़े हुए थे और उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्र संघ चुनाव भी लड़ा था।
वे न्यायिक हिरासत में हैं और 11 एफ़आईआर में नामज़द हैं।
योगेश मीणा : विधि के छात्र

गिरफ़्तार लोगों में सबसे छोटे और सबसे आख़िर में हिरासत में लिये गये 23 वर्षीय योगेश मीणा दिल्ली यूनिवर्सिटी के विधि संकाय के छात्र हैं और श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स के पूर्व छात्र हैं।
30 मई की दोपहर को, मीणा रामजस कॉलेज के पास अपने दोस्त समीर के साथ थे, जो 18 वर्षीय प्रथम वर्ष के छात्र हैं जब एक गाड़ी उनके बगल में आकार रुकी। उनके समर्थकों के अनुसार गाड़ी के अन्दर कुछ सादे कपड़ों में और कुछ पुलिस के वर्दी में बैठे लोग थे। उन्होंने मीणा को नाम से पुकारा और बिना कोई वॉरेण्ट, अरेस्ट मेमो या पहचान पत्र दिखाये दोनों को गाड़ी के अन्दर खींच लिया।
समीर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसके और मीणा के खिलाफ़ उनके दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के के नाम पर जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल किया। समीर को कुछ घण्टों के बाद रिहा कर दिया गया; उत्तर प्रदेश पुलिस मीणा को साथ ले गयी।
मीणा कि गिरफ्तारी एफ़आईआर संख्या 196/2026 के संदर्भ में कि गयी जो नोएडा फ़ेस 2 पुलिस थाने में 23 अप्रैल को 10 से 13 अप्रैल के बीच हुई घटनाओं के मद्देनज़र दर्ज की गयी थी।
पुलिस कि चार्जशीट के अनुसार मीणा व्हाट्सऐप ग्रुपों में “भड़काऊ मेसेज” भेज रहे थे। इसमें उनके द्वारा भेजे गये वॉइस रिकॉर्डिंग के स्क्रीनशॉट संलग्न हैं।
उनके वकील अली ज़िया कबीर चौधरी इस बात को रेखांकित करते हैं कि चार्जशीट में उनके वॉइस मेसेज के ट्रांस्क्रिप्ट नहीं जोड़े गये हैं जो बताये की मीणा ने असल में कहा क्या था। स्क्रीनशॉट से केवल इतना ज़ाहिर होता है कि वॉइस मेसेज भेजे गये थे।
केशव आनन्द के अनुसार ‘रिचा ग्लोबल’ व्हाट्सऐप ग्रुप में किये गये मीणा के मेसेज उल्टा “मज़दूरों को सावधान रहने और पुलिस प्रोपगण्डा से बचने को कह रहे थे।”
रिचा ग्लोबल फ़ैक्ट्री वर्कर्स व्हाट्सऐप ग्रुप के स्क्रीन शॉट्स में योगेश मीणा (यह नम्बर योगेश) मज़दूरों को “तोड़फोड़” न करने कि सलाह दे रहे थे। वो कहते हैं, “हमें शान्तिपूर्ण तरीक़े से हड़ताल करनी है”, यह चेतावनी देते हुए की पुलिस और कारख़ाना मालिक उन्हें भड़काने की पूरी कोशिश करेंगे।
आनन्द बताते हैं कि मीणा ने बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से अगवा किये गये कार्यकर्ताओं का मसला भी रेखांकित किया था और मैसेज भड़काऊ नहीं थे बल्कि महज़ तथ्य पर आधारित थे।
उन्होंने आर्टिकल 14 के साथ मीणा के मैसेज भी साझा किये।
पुलिस ने मीणा का अनिल कुमार से सम्बन्ध दिखाया है, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का ड्राईवर जिसे कार्यकर्ताओं ने व्हाट्सऐप ग्रुप में घुस कर हिंसा भड़काने वाला असल ‘एजेण्ट प्रोवोकेटर’ बताया है।
जून 2026 में हालाँकि एक कोर्ट ने कुमार को ज़मानत दे दी है। कुमार और मीणा के बीच का तथाकथित सम्बन्ध छात्र मीणा के ख़िलाफ़ पुलिस केस का हिस्सा है। जहाँ एक तरफ कुमार, जिनकी भूमिका को मीणा के ख़िलाफ़ केस में शामिल किया गया है बेल पर बाहर हैं वहीं मीणा जेल की सज़ा भुगत रहे हैं।
वे न्यायिक हिरासत में हैं, 10 एफ़आईआर में नामज़द हैं और उंकपर रासुका नहीं लगाया गया है।
(स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका सबा गुरमत की रिपोर्ट, तस्वीरें आर्टिकल 14 से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।)