उद्धव ठाकरे की शिवसेना एक बार फिर टूट गई है। पार्टी के छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल हो चुके हैं। इससे महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है। भाजपा और उसके सहयोगी इस घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे द्वारा “हिंदुत्व छोड़ने” का परिणाम बता रहे हैं। उनका तर्क है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करके उद्धव ने बालासाहेब ठाकरे की मूल राजनीतिक लाइन से समझौता किया, इसलिए सांसदों ने उनका साथ छोड़ दिया। लेकिन यही वह बिंदु है जहां कई गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं।
अगर कांग्रेस के साथ जाना ही शिवसेना के टूटने का कारण है, तो फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल जदयू , तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), लोक जनशक्ति पार्टी, अपना दल या अन्य क्षेत्रीय दलों के सांसद क्यों नहीं टूट रहे? ये सभी दल अपने-अपने राज्यों में बहुधार्मिक, बहुजातीय और समावेशी राजनीति करते हैं। इनमें से कई दल खुले तौर पर धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बात करते हैं।
जेडीयू लंबे समय से सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का दावा करती रही है। टीडीपी का वोट बैंक भी केवल हिंदुत्व आधारित नहीं है। फिर भाजपा यह कैसे समझाती है कि हिंदुत्व से कथित विचलन केवल उद्धव ठाकरे के मामले में ही पार्टी टूटने का कारण बन जाता है?
दरअसल, यह उतना हिंदुत्व का सवाल नहीं दिखता, जितना सत्ता और प्रभाव का। महाराष्ट्र में 2022 में हुई बगावत और 2026 में सांसदों की नई टूट को देखें तो एक समान पैटर्न दिखाई देता है। जो नेता सत्ता के करीब गए, वे सुरक्षित रहे; जो विपक्ष में रहे, वे लगातार दबाव में दिखाई दिए। ऐसे में यह दावा कि केवल वैचारिक असहमति के कारण सांसदों ने पार्टी छोड़ी, पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह झूठी कहानी से ज्यादा कुछ भी नहीं।
दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस देश की राजनीति का एकमात्र वैध आधार हिंदुत्व ही है? यदि भाजपा का तर्क मान लिया जाए कि कांग्रेस के साथ जाना हिंदुत्व से विचलन है, तो क्या कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, वाम दलों या अन्य क्षेत्रीय दलों को वोट देने वाले करोड़ों भारतीय हिंदू नहीं हैं? क्या वे अपने धर्म और सांस्कृतिक पहचान से कटे हुए लोग हैं
भारत के चुनावी आंकड़े इसके विपरीत कहानी कहते हैं। कांग्रेस को वोट देने वालों में बड़ी संख्या हिंदुओं की है। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और यहां तक कि दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों के समर्थकों में भी बहुसंख्यक हिंदू मतदाता शामिल हैं। वे मंदिर भी जाते हैं, धार्मिक परंपराओं का पालन भी करते हैं और चुनाव में भाजपा के बजाय किसी अन्य दल को वोट भी देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदू होना और भाजपा का समर्थक होना एक ही बात नहीं है।
यहीं पर भाजपा के हिंदुत्व और व्यापक सांस्कृतिक हिंदू पहचान के बीच फर्क का प्रश्न उठता है। आलोचकों का आरोप है कि भाजपा ने हिंदुत्व को एक राजनीतिक परियोजना में बदल दिया है, जहां राष्ट्रीयता, धर्म और चुनावी समर्थन को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है। उनके अनुसार, यह हिंदुत्व अक्सर मुस्लिम समुदाय के प्रति अविश्वास या राजनीतिक ध्रुवीकरण के जरिए अपनी ऊर्जा प्राप्त करता है।
हालांकि भाजपा इस आरोप को खारिज करती है और कहती है कि उसका हिंदुत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सभ्यतागत पहचान का प्रतीक है, किसी धर्म विशेष के विरोध का नहीं। फिर भी सवाल बना रहता है कि यदि हिंदुत्व केवल सांस्कृतिक पहचान है, तो उसके नाम पर राजनीतिक वैधता का प्रमाणपत्र कौन बांट रहा है? क्या किसी दल का कांग्रेस के साथ गठबंधन उसे “कम हिंदुत्ववादी” बना देता है, जबकि वही दल भाजपा के साथ आते ही “असली हिंदुत्व” का प्रतिनिधि बन जाता है?
उद्धव ठाकरे की शिवसेना में आई नई टूट केवल महाराष्ट्र की घटना नहीं है। इसने भारतीय राजनीति के उस बड़े अंतर्विरोध को उजागर कर दिया है, जहां विचारधारा की भाषा में सत्ता की राजनीति खेली जाती है। भाजपा के सामने चुनौती यह नहीं है कि वह अपने विरोधियों को हिंदुत्व का पाठ पढ़ाए, बल्कि यह स्पष्ट करे कि हिंदुत्व की उसकी परिभाषा क्या वास्तव में सभी भारतीयों को समाहित करती है, या फिर वह केवल एक चुनावी औजार बनकर रह गई है। यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी भी भारतीय राजनीति तलाश रही है।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)