इस साल मार्च में, कोलकाता के बालीगंज निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची से मेरा नाम हटा दिया गया। ऐसा इसलिए किया! गया क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 2002 की मतदाता सूची में न तो मेरा नाम मिला और न ही मेरे दिवंगत पिता का। मेरे पिता एक गांधीवादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर और केरल में ‘गांधी स्मारक निधि’ के पूर्व राज्य सचिव थे, जिनका 2016 में निधन हो गया। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि उनके जैसे जागरूक और ईमानदार मतदाता का नाम सूची से कैसे गायब हो सकता है।
पश्चिम बंगाल के लगभग 27 लाख अन्य निवासियों की तरह, मुझे भी तथाकथित लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज़ के कारण सूची से बाहर कर दिया गया। जब मैंने अपना मैट्रिक का सर्टिफिकेट जमा किया, तब भी मुझे कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। अब मेरी अपील सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत बने ट्रिब्यूनल के सामने पेंडिंग है। इसके परिणामस्वरूप, मैं हाल के चुनावों में वोट भी नहीं डाल पाया।
इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात मेरे पासपोर्ट के रिन्यूअल के आवेदन के साथ हुई। मैंने 19 मार्च, 2026 को बायोमेट्रिक की औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं, लेकिन पुलिस वेरिफिकेशन को मंजूरी नहीं मिली है क्योंकि मेरा नाम अब मतदाता सूची में नहीं है। कई अन्य वैकल्पिक दस्तावेज जमा करने के बावजूद, मुझे बताया गया कि वे काफी नहीं हैं। वास्तव में, आज (27 जून, 2026) पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए मेरे बायोमेट्रिक्स लिए जाने का 100वां दिन है।
पिछले हफ्ते पासपोर्ट जारी करने वाली अथॉरिटी ने मुझे औपचारिक रूप से सूचित किया था कि कोलकाता पुलिस ने एक नेगेटिव रिपोर्ट भेजी है, जिसमें मतदाता सूची से मेरा नाम हटाए जाने का हवाला दिया गया है। मुझसे “तुरंत” कलकत्ता के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में उपस्थित होने के लिए कहा गया है। जब मैंने अपॉइंटमेंट मांगा, जिसके बिना वहां प्रवेश करना मुश्किल है, तो मुझे 17 जुलाई, 2026 की तारीख मिली है।
इस बीच, कैलिफोर्निया में पत्रकार, हमारी बेटी की शादी 17 अप्रैल को सैन फ्रांसिस्को में हुई। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वैध 10-वर्षीय अमेरिकी वीजा होने के बावजूद, एक्टिव पासपोर्ट के बिना मेरे लिए उस शादी में शामिल होना असंभव था।
व्यावहारिक रूप से, मैं खुद को एक नागरिक अनिश्चितता की स्थिति में पा रहा हूँ, हालांकि हाल ही में सरकार ने दोहराया था कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। अब मेरा अधिकांश समय दशकों पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों को दोबारा जुटाने की कोशिशों में लग रहा है….
मेरे दिन की शुरुआत मेरी वोटिंग अधिकार अपील की स्थिति और फिर पासपोर्ट ट्रैकर की जांच करने से होती है।
मैंने उस कॉलेज को पत्र लिखा जहाँ मेरी माँ ने 1965 में पढ़ाया था, और उनके उस स्कूल को जहाँ से उन्होंने 1959 में पढ़ाई पूरी की थी, ताकि कोई ऐसा दस्तावेज़ मिल सके जो यह साबित करे कि वे इस दुनिया में थीं। स्कूल ने बहुत मदद की है, लेकिन कॉलेज ने नहीं। इसी तरह, मैं केरल में शराबबंदी अभियान के कार्यकर्ताओं से बात की। एक ग्रुप में अचानक एक कार्यकर्ता का नाम दिखने के बाद मैंने कुछ लोगों की सूची जुटाई थी। मैं उनसे कोई ऐसी अखबार की कतरन या तस्वीरें मांग रहा हूँ, जिसमें मेरे पिता को अवैध शराब की दुकानों और सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रचार करते हुए दिखाया गया हो।
कुछ करीबी दोस्तों और सार्वजनिक शख्सियतों ने इन सभी प्रयासों में मेरी मदद की है। हालाँकि, मुझे नहीं पता कि किसी मीडिया संस्थान या पत्रकारों के संघ या गिल्ड (जिसका मैं सदस्य नहीं हूँ) ने मेरी स्थिति में कोई दिलचस्पी दिखाई है या नहीं। एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे याद दिलाया कि यह स्थिति अनोखी नहीं है, क्योंकि रिजेक्शन सदियों से करोड़ों भारतीयों के सामने रोज़ आने वाली एक कड़वी सच्चाई रही है। मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ।
मेरा इरादा कभी भी खुद को एक पीड़ित के रूप में पेश करने का नहीं रहा है। बल्कि, मैं एक बड़े मुद्दे को रेखांकित करना चाहता हूँ: यदि कोई व्यक्ति जिसने अपना पूरा पेशेवर जीवन पत्रकारिता में बिताया और एक जाने-माने अखबार का संपादन किया, उसे ऐसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, तो कोई केवल कल्पना ही कर सकता है कि वास्तव में हाशिए पर पड़े लोगों को क्या कुछ सहना पड़ता होगा।
क्या मैंने किसी अखबार से संपर्क किया? नहीं, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि यह सिर्फ मुझसे जुड़ा मुद्दा बने। क्या संपादकों और पत्रकारों को मेरी इस समस्या के बारे में पता है? बेशक, कई लोगों को पता है। अगर वे नहीं जानते, तो उन्हें इस पेशे में होना ही नहीं चाहिए, क्या आपको ऐसा नहीं लगता?
फिर भी, इस मुद्दे पर अखबारों की पूरी तरह से चुप्पी ने मेरे उस संदेह की पुष्टि कर दी है, जो अब व्यक्तिगत अनुभव से और पक्का हो गया है, कि तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता का मेरे जीवन से कोई लेना-देना नहीं है। मैं अब कोई अखबार नहीं “पढ़ता”। मैं कुछ पर सरसरी नज़र ज़रूर डालता हूँ, लेकिन मुश्किल से ही कोई ऐसी चीज़ मिलती है जो मेरी रुचि को जगाए।
(आर. राजगोपाल, पूर्व संपादक, द टेलीग्राफ, का नोट। हिंदी अनुवाद मोहम्मद शाहिद अख़्तर की फेसबुक वॉल से।)