ऐसे में राष्ट्रगान भुलाने की तैयारी तो नहीं…

जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय स्तर पर विवाद उठ खड़ा हुआ है तब इस बात की आशंका प्रबल हो जाती है कि कहीं इस खींचतान में राष्ट्रगान भुला न दिया जाए। चूंकि जनगणमन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकृत होने में पंडित जवाहर लाल नेहरू की प्रमुख भूमिका बताई जाती है इसलिए संघ परिवार के निशाने पर अगर यह हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

क्योंकि जनगणमन के बारे में यह प्रचार लोकमानस में बार-बार घूमता रहता है कि इसे तो 1911 में जार्ज पंचम के भारत आगमन पर गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने उनके स्वागत में तैयार किया था। जनगणमन को पहली बार कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में 27 दिसंबर 1911 को स्वयं गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने गाया था। वह अधिवेशन का दूसरा दिन था। संयोग से उस अधिवेशन में जार्ज पंचम का अभिवादन और धन्यवाद भी दिया गया था। कांग्रेस के उस अधिवेशन में सदैव की तरह वंदे मातरम् भी गाया गया था।

उसी समय यह विवाद उठा कि गुरुदेव ने इस गीत में जनगणमन अधिनायक, भारत भाग्य विधाता और चिरसारथि जैसे विशेषणों का प्रयोग जार्ज पंचम के लिए किया है। गुरुदेव ने इसे सख्त शब्दों में खारिज किया था। उनका कहना था कि “अगर मैं इस तरह के मूर्खतापूर्ण आरोपों का जवाब देने बैठ जाऊं तो मैं अपने को ही अपमानित करूंगा। भला मैं जार्ज पंचम के लिए ‘पतन-अभ्युदय बंधुर पन्था युग युग धावति यात्री, हे चिरसारथि तव शंखध्वनि बाजे, संकटदुःखत्राता’ जैसे रूपकों का प्रयोग कैसे कर सकता हूं।”

यानी मानव जाति के समयातीत इतिहास में युगों-युगों से चली आ रही यात्रा का ‘चिर सारथि’ जार्ज पंचम को बताने का साहस तो कोई नासमझ ही कर सकता है। या फिर वह कर सकता है जिसका उद्देश्य बंकिम चंद्र चटर्जी और गुरुदेव को आपस में लड़ाकर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद को इस देश पर थोपना है। गुरुदेव के स्पष्टीकरण के बाद यह विवाद शांत हो जाना चाहिए था कि इसे जार्ज पंचम के लिए लिखा गया था।

लेकिन अनौपचारिक तौर पर संघ परिवार के लोग इसे कुरेदते रहते हैं। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को एक दूसरे से लड़ाने का उद्देश्य राष्ट्रगान को पृष्ठभूमि में डालने वाला भी हो सकता है।

जनगणमन पहली बार जनवरी 1912 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ में प्रकाशित हुआ था। बाद में गुरुदेव ने ही 1919 में ‘मार्निंग सांग आफ इंडिया’ शीर्षक से इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। 

लेकिन राष्ट्रगान का इतिहास इतना भर नहीं है। इसे नेशनल एंथम यानी राष्ट्रगान के रूप में 11 सितंबर 1942 को सबसे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी के हमबर्ग में ‘फ्री इंडिया सेंटर’ के कार्यक्रम में गवाया था। बाद में यह आजाद हिंद फौज की राष्ट्रीय धुन बन गया। जिसे 1947 में न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन में आर्केस्ट्रा की धुन पर बजाया गया और बहुत सारे देशों को यह काफी पसंद आया।

हालांकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने यह फैसला 2 नवंबर 1941 को अपने निर्वासन के दौरान ही ले लिया था कि जनगणमन ही हमारा राष्ट्रगान होगा। सुभाष बाबू 17 जनवरी 1941 को अपने कोलकाता आवास की नजरबंदी से फरार होकर अफगानिस्तान, सोवियत संघ से होते हुए जर्मनी पहुंचे थे। 

सुभाष बाबू ने जनगणमन को पहली बार राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था यह रहस्योद्घाटन उनके सहयोगी रहे नरहरि गोविन्द गणपुले ने किया। गणपुले के पास 1942 में जर्मनी में फ्री इंडिया सेंटर के कार्यक्रम में गाए गए राष्ट्रगान का वह मूल टेप था। बाद में इस टेप को आल इंडिया रेडियो की अधिकारी चित्रा नारायण ने 1977 में हासिल किया और 1980 में इस बार एक वृत्तचित्र फीचर(डाक्यूमेंट्री फीचर) बनाया जिसका नाम था- ‘ए नेशनल एंथम बार्न इन इग्जाइल’।

इसे 23 जनवरी 1980 यानी नेताजी के जन्मदिन पर प्रसारित किया गया। एन जी गणपुले ने इस बारे में 1964 में एक पुस्तक भी लिखी है जिसका शीर्षक है—‘नेताजी इन जर्मनीः अ लिटल नोन चैप्टर’(भारतीय विद्या भवन)। 

गणपुले लिखते हैं कि फ्री इंडिया सेंटर की पहली बैठक 2 नवंबर 1941 में जर्मनी में हुई। इस बैठक में चार प्रस्ताव पारित किए गए। वे क्रमशः इस प्रकार थे—जय हिन्द हमारा नारा होगा, सुभाष चंद्र बोस जो हमारे राष्ट्र नायक हैं उन्हें नेताजी कहा जाएगा। जनगणमन हमारा राष्ट्रगान (नेशनल एंथम) होगा। हिंदुस्तानी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। गणपुले के अनुसार उस बैठक में यह चर्चा हुई कि जब बंग भंग के कारण राष्ट्रीय आंदोलन में उग्रवादी समूहों का प्रभाव बढ़ने लगा तो कांग्रेस के अधिवेशनों में वंदेमातरम् भी गाया जाने लगा।

लेकिन वह गीत सिर्फ धार्मिक भावनाओं को अधिक अपील करता था क्योंकि उसमें भारतमाता की वंदना की गई थी। बैठक में यह तर्क दिया गया कि जनगणमन वास्तव में भारत के विभिन्न प्रांतों और धर्मों का उल्लेख करते हुए राष्ट्र को उन सभी एक संयुक्त उपक्रम बताता है इसलिए इसे राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया जाना अधिक उचित है।

जनगणमन को हमबर्ग में इंडो-जर्मन कल्चरल सोसायटी के आरंभिक अधिवेशन में राष्ट्रगान के रूप में गाया गया इसके साथ पूरा आर्केस्ट्रा बजाया गया। इस मौके का एक ग्रामोफोन रिकार्ड बनाया गया जो आज तक उपलब्ध है। इस मौके पर पहली बार तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में फहराया गया और साथ में जर्मनी का ध्वज भी फहरा रहा था। वहां मौजूद हमबर्ग के मेयर और दूसरे देशों के राजनयिकों ने नेताजी को एक स्वतंत्र देश के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में सम्मान दिया। 

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि इस टेप को प्रमाणित करने के लिए भारत सरकार ने हैदराबाद से लेकर जर्मनी और हमबर्ग तक बहुत सारे स्रोतों के माध्यम से उस कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों को खंगाला। तब जाकर आल इंडिया रेडियो ने डाक्यूमेंट्री बनाई।

संविधान सभा में 25 अगस्त 1948 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रगान के रूप में जनगणमन को अपनाए जाने के पक्ष में जो दलील दी उसमें आजाद हिन्द फौज का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा, “15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो यह सवाल अहम हो गया कि एक ऐसा राष्ट्रगान होना चाहिए जिसकी धुन को बैंड और आर्केस्ट्रा दोनों पर बजाया जा सके। रक्षा सेवाओं, दूतावासों, विदेशी मिशनों और दूसरे प्रतिष्ठानों के लिए ऐसा किया जाना जरूरी हो गया था। हमसे लगातार पूछा जा रहा था कि ऐसे मौकों पर कौन सी धुन बजाई जाए। लेकिन जब तक संविधान सभा कोई फैसला न ले ले हमारे पास इसका कोई उत्तर नहीं था। लेकिन जनगणमन को थोड़ी अगर धुन के साथ आजाद हिन्द फौज द्वारा राष्ट्रगान के रूप में बजाया गया था। इसलिए इसकी पूरे भारत में लोकप्रियता हो चुकी थी।

जब 1947 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा के सामने यह सवाल उठा और कहा गया कि ऐसा गीत दीजिए जिसे आर्केस्ट्रा पर बजाया जा सके। तब हमारे प्रतिनिधिमंडल  के पास जनगणमन का एक रिकार्ड था जिसे बजाया गया। वहां काफी प्रतिनिधि थे और सभी को यह पसंद आया।”

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान के बारे में जो अंतिम निर्णय सुनाया वह इस प्रकार था, “शब्द और धुन को मिलाकर जनगणमन की जो संरचना की गई है वही सरकारी उद्देश्य के लिए भारत का राष्ट्रगान होगा। इसमें अलग-अलग मौके के लिए सरकार शब्दों में अपने लिहाज से फेरबदल कर सकेगी। जबकि वंदे मातरम् जिसने स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है वह भी बराबर का दर्जा रखेगा।”

इस तरह सेना के मुख्यालयों ने राष्ट्रगान के जो सही शब्द अपनाए हैं वे पांच छंदों में से पहला छंद ही लिया गया है। कहने का तात्पर्य है कि जनगणमन भी वंदेमातरम की तरह बहुत ही लंबा है और उसके किसी छंद पर वंदेमातरम पर की तरह किसी को आपत्ति भी नहीं है। लेकिन वह भी महज पांचवां हिस्सा ही गाया जाता है।

यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि गांधी और नेहरू की तरह नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी संस्कृत निष्ठ हिन्दी के बजाय हिन्दुस्तानी के ही पक्ष में थे और उन्होंने आजाद हिन्द फौज के लिए हिन्दुस्तानी में इस गीत को रूपांतरित भी करवाया था। उसके बोल हैः—शुभ सुख चैन की वरखा बरसे/ भारत भाग है जागा। पंजाब, सिन्ध गुजरात मराठा, द्राविड़, उत्कल बंगा। चंचल सागर विन्ध्य हिमाचल, नीला यमुना गंगा। तेरे नित गुन गाएं, तुझसे जीवन पाएं, सब जन पाएं आशा। सूरज बन कर जग पर चमके भारत नाम सुभागा। 

इसलिए ध्यान देने की बात है कि वंदे मातरम् विवाद के बहाने कहीं उस राष्ट्रगान को भुला न दिया जाए जो गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस और पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे महान व्यक्तित्वों की राष्ट्र को विशिष्ट देन है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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