Tuesday, July 5, 2022

यूपी: मनरेगा मजदूरों को महीनों से नहीं मिली मजदूरी, सड़क पर उतरने के लिए हुए मजबूर

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लखनऊ। अपनी दूसरी पारी शुरू कर चुकी प्रदेश की योगी सरकार इन दिनों अपने 100 दिन के “एक्शन प्लान” में प्रदेश की जनता के लिए बहुत कुछ करने का दावा करती नजर आ रही है। 100 दिन में हजारों नौकरियां देने का वादा 100 दिन में कई लाख गरीबों को पक्की छत देने का वादा 100 दिन में आवारा जानवरों की समस्या का समाधान का वादा आदि इन्हीं में से एक एक्शन प्लान है मनरेगा के तहत गांवों में नहरों का निर्माण, तालाबों का गहरीकरण, अमृत सरोवरों का निर्माण, पशु बाड़ा निर्माण जैसे कामों के जरिए लाखों ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ना इसके साथ ही सरकार ने प्रदेश में 61 नदियों का मनरेगा के तहत एक साल के भीतर पुनरूद्धार करने की बात भी कही है।

निश्चित ही सरकार का एक्शन प्लान यह जताने के लिए काफी है कि प्रदेश खुशहाली के रास्ते पर है यानि ” All is well” . लेकिन जब हम इन सच्चाइयों  से रू-ब-रू होते हैं कि बजट के आभाव में प्रदेश के लाखों मनरेगा मजदूरों को कई महीनों से भुगतान नहीं हो पाया है या भुगतान हुआ भी तो काम किया किसी और का पैसा चला गया किसी और के खाते में यानी खुलेआम पैसों का फर्जीवाड़ा , तो सरकारी योजनायें बस सब्ज बाग से ज्यादा कुछ नजर नहीं आती। कोरोना की पहली लहर और देशव्यापी लॉक डाउन के चलते जब उत्तर प्रदेश के लाखों श्रमिक अपना रोजगार गँवा कर, खाली हाथ अपने गांव वापस आये तो प्रदेश सरकार ने उन श्रमिकों के लिए एक पूरा एक्शन प्लान तैयार करने की बात कहते हुए मनरेगा के तहत हर हाथ को काम देने और उनके जीवन को सुरक्षित करने का वादा किया लेकिन जब उसी काम के बदले उन श्रमिकों को पैसा नहीं मिल रहा और महँगाई दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है तो आख़िर जीवन कैसे सुरक्षित रहेगा?

प्रदेश की भाजपा सरकार का यह दावा है कि उसने अपने कार्यकाल में मनरेगा के तहत जितने भी काम किये और जितने भी ग्रामीणों को रोजगार दिया उतना आज तक प्रदेश की किसी भी पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ।  लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि अपनी मेहनत की कमाई को हासिल करने के लिए मनरेगा मजदूरों को अनिश्चित कालीन धरने पर बैठना पड़ रहा है उसके बावजूद उनकी कोई सुनवाई नहीं। सीतापुर जिले के सकरन ब्लॉक के तहत आने वाले भिटमनी गाँव में ब्लॉक के तकरीबन दस गाँव के मनरेगा मजदूर पिछले 18 दिनों से अपनी मजदूरी पाने के लिए अनिश्चित कालीन धरने पर बैठे हैं। इस धरने में महिला,पुरुष दोनों की भागीदारी है।

हर दिन धरने में आने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि सब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, क्योंकि इनके मेहनत का पैसा हड़प लिया गया है। करीब डेढ़ साल पहले (दिसंबर 2020 से जनवरी 2021 के तहत आई मनरेगा योजना) जिस सेठिया तालाब की खुदाई के काम में इन मजदूरों ने अपना खून पसीना बहाया, नौ-नौ घंटा काम किया उसका पैसा अभी तक इन्हें नहीं मिला जबकि सब जॉब कार्ड धारक हैं। मजदूरों का बैंक खाता खाली है लेकिन अधिकारी कहते हैं मनरेगा के तहत जो काम हुआ उसका पैसा तो निकल चुका है तो आखिर वे पैसा गया कहाँ यही इन मजदूरों का सवाल है।

सकरन ब्लाक की मनरेगा महिला मजदूर

मजदूर नेता संतराम के मुताबिक तकरीबन दस गाँव के मनरेगा मजदूरों का चार लाख बकाया है, जबकि आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है क्योंकि अन्य कई और गाँवों से भी उन्हें इस बाबत शिकायत मिल रही है। वे कहते हैं यह केवल बकाया भुगतान की लड़ाई नहीं यह लड़ाई फर्जीवाड़े और भ्रष्टाचार के भी खिलाफ़ है क्योंकि अधिकारी कहते हैं पैसा निकल चुका है और खातों में जा चुका है लेकिन हैरानी की बात है कि जिनके खातों में पैसा गया उन्होंने कभी मनरेगा में काम किया ही नहीं था यानी मामला घोटाले का है।

वे कहते हैं किसी मजदूर ने 40 दिन तो किसी ने 35 तो किसी ने 45 दिन काम किया जिसमें से बस सबके खाते में 6 दिन का पैसा आया और बाकी भुगतान का फर्जीवाड़ा कर दिया गया क्योंकि स्थानीय प्रशासन द्वारा जो सूची उन्हें दी गई है उनमें ऐसे लोगों का नाम शामिल हैं जिन्होंने मनरेगा में काम किया ही नहीं यानी लिस्ट फर्जी है। वे आरोप लगाते हुए कहते हैं असली हक़दारों का हक़ मारा जा रहा है जबकि बेईमानों की तिजोरी गरीबों के पैसों से भर रही है जो यह दिखाता है कि अभी भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है फिर योगी सरकार कितना भी भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा क्यों न कर ले।

तालाब खुदाई मनरेगा मजदूरों के अलावा इस अनिश्चितकालीन धरने में सकरन ब्लॉक के कुंसर गाँव के वे मनरेगा मजदूर भी बैठे हैं जिन्होंने मिट्टी पटाकर अपने गाँव में कच्ची सड़क बनाने का काम पिछले साल किया था लेकिन भुगतान आज तक नहीं हुआ। धरने में शामिल मनरेगा मजदूर उमाशंकर चौरसिया और जान आलम के मुताबिक 2021 की जुलाई में इनके गाँव कुंसर में कच्ची सड़क निर्माण की योजना आई। चूँकि छोटी ही सड़क बनानी थी इसलिए मात्र 6 दिन का काम था जिसमें इनके गाँव के तीस लोगों ने काम किया था। उमाशंकर कहते हैं काले रोड से शिव लाल नेता के खेत तक कच्चा पटान का काम था, 200 रुपये दिहाड़ी पर 6 दिन काम चला लेकिन उतने दिन तक का पैसा प्रशासन नहीं दे पा रहा।

वे बताते हैं कि चुनाव से पहले उन लोगों ने ब्लॉक पर धरना भी दिया था तब BDO ने लिखित में आश्वासन भी दिया था कि दस दिन के भीतर भुगतान हो जायेगा लेकिन हुआ नहीं उसके बाद आचार संहिता लग गई और आश्वासन धरा का धरा रह गया। उमा शंकर कहते हैं सेक्रेटरी से लेकर प्रधान तक कोई सुनने को तैयार नहीं इसलिए अब उन्हें मजबूरीवश धरना करना पड़ रहा है। तो वहीं जान आलम कहते हैं लिखित से बड़ा आश्वासन और क्या होगा और वह लिखित आश्वासन की कॉपी दिखाने लगते हैं। जान आलम कहते हैं हम सब मजदूर अपनी रोज की दिहाड़ी छोड़ धरने पर बैठे हैं, और इसके लिए प्रशासन ने ही मजबूर किया है, हम दोहरी मार झेल रहे हैं एक तो पहले की मजदूरी नहीं मिली और अब भी रोजमर्रा की दिहाड़ी का नुकसान उठाना पड़ रहा है आख़िर इसका जिम्मेदार कौन है।

संतराम जी बताते हैं, जब से मजदूर धरने पर बैठे हैं उनसे लगातार अन्य और गाँव के वे मनरेगा मजदूर भी संपर्क कर रहे हैं जिनको अपने काम का पैसा अभी तक नहीं मिला। वे कहते हैं बीडीओ, सेक्रेटरी, एसडीएम सबसे मिले लेकिन जब मजदूरों के पक्ष में कुछ ठोस होता नजर नहीं आया अनिश्चितकालीन धरने का निर्णय लिया गया। अभी भी अधिकारी केवल आश्वासन ही दे रहे हैं। वे कहते हैं उनकी यह लड़ाई तब तक नहीं रुकेगी जब तक सैकड़ों मजदूरों की मजदूरी का भुगतान नहीं हो जाता और जरूरत पड़ी तो यहाँ से मजदूरों का जत्था पैदल मार्च करते हुए लखनऊ तक मुख्यमंत्री के द्वार तक जायेगा।

यह केवल एक जिले या ब्लॉक भर की बात नहीं, मनरेगा मजदूरों की मजदूरी लंबे समय से न मिलने की आये दिन विभिन्न जिलों से आती खबरों ने इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि तस्वीर उतनी भी ख़ुशहल नहीं जितनी बताई जाती रही है। अभी कुछ दिन पहले हाथरस से खबर आती है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बावजूद मनरेगा के करीब 500 मजदूरों को उनके काम का पैसा नहीं मिला। जिला मुख्यालय का चक्कर लगा रहे इन मजदूरों की जानकारी जब ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक को हुई तो उन्होंने सभी बीडीओ की बैठक बुलाकर जल्द ही मजदूरों के खातों को दुरुस्त कराकर भुगतान करने के निर्देश दिए।

जानकारी के मुताबिक केन्द्र द्वारा बजट जारी न करने की वजह से प्रदेश के करीब 10 लाख मनरेगा मजदूरों का कई महीनों का भुगतान अटका पड़ा है। गये वित्तीय वर्ष में प्रदेश के अधिकांश जिलों में तालाब खुदाई, बरसाती पानी की निकासी के लिए नाला, खड़ंजा, चक और संपर्क मार्ग निर्माण, पीएम व सीएम आवास, खेत की मेड़बंदी और समतलीकरण जैसे काम मनरेगा के तहत हुए। मनरेगा में सौ दिन काम करने के बाद भी श्रमिकों को तीन चार महीने से मजदूरी नहीं मिली है। मनरेगा में अभी 17 लाख 9 हजार से अधिक श्रमिक नियोजित हैं। इन्हें 213 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती है। नियमानुसार 15 दिन के अंदर इन्हें मजदूरी मिलनी चाहिए, लेकिन इन्हें तीन-चार महीने से भुगतान नहीं हुआ है। एक-एक परिवार का 20 से 21 हजार रुपये बकाया है। श्रमिक आए दिन ग्राम सचिवालय में संपर्क करते हैं, लेकिन जल्द बजट मिलने का आश्वासन लेकर लौटा दिया जाता है।

पिछले दिनों आइपीएफ के संगठन महासचिव दिनकर कपूर ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा। पत्र में मनरेगा के तहत मजदूरी मद समेत सभी बकाया भुगतान करने, सभी जाब कार्ड धारकों को न्यूनतम 100 दिन काम की गारंटी करने और मनरेगा मजदूरी 350 रुपये करने की मांग की गई है। पत्र में प्रदेश में 10 लाख मनरेगा मजदूरों की मजदूरी के बकाया भुगतान पर चिंता जताते हुए मनरेगा कार्यों में सामग्री मद के 1800 करोड़ समेत सभी बकाया का अविलंब भुगतान की मांग की गई है। पत्र में जिक्र किया गया है कि प्रदेश में मनरेगा मजदूरी की दर 213 रुपये तर्कपूर्ण नहीं है। उक्त दर हरियाणा, केरल, गोवा आदि राज्यों के सापेक्ष मजदूरी से बेहद कम है।

खुद उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा सिंचाई परियोजनाओं में कुओं और तालाबों की खुदाई समेत तमाम कामों में 366.54 रूपए मजदूरी तय की गयी है। अन्य तमाम सरकारी कामों में मजदूरी की दर औसतन 350 रुपये है। यहां तक कि मनरेगा में कुल बजट का 40 प्रतिशत निर्माण सामग्री मद में आवंटित होता है। आठ महीने से केंद्र ने भी इस मद में प्रदेश को बजट जारी नहीं किया है। वहीं दूसरी तरफ आजादी के अमृत महोत्सव के तहत प्रदेश में 5600 अमृत सरोवर की खुदाई मनरेगा से होनी है। ज़ाहिर सी बात है श्रमिकों का भुगतान नहीं होने से ये कार्य प्रभावित हो सकते हैं। मनरेगा में ग्राम रोजगार सहायक, परियोजना अधिकारी, तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखाकार सहित अन्य करीब 40 हजार से अधिक संविदा कर्मियों को भी तीन महीने से मानदेय नहीं मिला है तो वहीं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कहते हैं कि मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान जल्द कराने के लिए कहा गया है। निर्माण सामग्री का बजट भी जल्द जारी कराने का प्रयास है लेकिन ये सारे प्रयास कब तक कार्य रूप लेंगे इसका जवाब फिलहाल सरकार के पास नहीं है।

(सीतापुर से सरोजिनी बिष्ट की रिपोर्ट।)

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