Friday, October 7, 2022

इंस्पेक्टर के हत्यारोपियों के स्वागत पर परिजनों ने जताया सख्त एतराज, कहा- रद्द होनी चाहिए इनकी जमानतें

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बुलंदशहर। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में पिछले साल दिसम्बर में हुई हिंसा में शहीद हुए इंस्पेक्टर के परिजन ने वारदात के आरोपियों के जमानत पर रिहा होने पर उनके फूलमालाओं से स्वागत का वीडियो वायरल होने के बाद सरकार से ऐसे अराजक तत्वों को सलाखों के पीछे ही रखने की मांग की है। रविवार को सामने आए वीडियो में बुलंदशहर हिंसा के अभियुक्तों शिखर अग्रवाल और जीतू फौजी का फूल माला पहनाकर स्वागत किये जाने और जश्न के माहौल में उनके समर्थकों को नारे लगाते देखा जा सकता है। पिछले साल तीन दिसम्बर को बुलंदशहर के महाव गांव के पास कथित रूप से प्रतिबंधित पशुओं के कंकाल बरामद होने के बाद हुई हिंसा में शहीद इंस्पेक्टर सुबोध सिंह के परिजन ने इस वीडियो पर सख्त एतराज जताया है। 

सुबोध सिंह की पत्नी ने कहा कि इस फैसले से मैं बेहद दुखी हूं, मुझे नहीं समझ आ रहा कि किस आधार पर उन आरोपियों को जमानत पर रिहा किया गया। सुबोध सिंह की पत्नी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि रिहा हुए आरोपियों की जमानत को निरस्त किया जाए और जेल में दोबारा भेजा जाए। 

सिंह के बेटे श्रेय सिंह ने कहा कि ऐसे अपराधी तत्वों को सलाखों के पीछे ही रखना ठीक है। ‘मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आग्रह करता हूं कि इन अपराधियों को समाज के हित में जेल में ही रखा जाना चाहिये। मेरा मानना है कि ऐसे लोगों का बाहर रहना ना सिर्फ मेरे लिये बल्कि दूसरे लोगों के लिये भी खतरनाक है।’ शहीद इंस्पेक्टर की पत्नी ने भी सवाल किया कि क्या ऐसे अपराधियों को महज छह महीने के अंदर आजाद कर देना उचित है? इस बीच, प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि बुलंदशहर हिंसा के आरोपियों का स्वागत किये जाने की घटना से सत्तारूढ़ भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। 

उन्होंने कहा कि अगर किसी के समर्थक और रिश्तेदार जेल से छूटने पर उसका स्वागत करते हैं तो इससे सरकार और भाजपा का क्या लेना-देना है? विपक्ष को ऐसी चीजों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। गौरतलब है कि पिछले साल तीन दिसम्बर को बुलंदशहर के महाव गांव के पास गोवंशीय पशुओं के कंकाल बरामद होने पर भड़की भीड़ की हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या कर दी गयी थी। इस मामले के छह आरोपियों को अदालत ने शनिवार को जमानत पर रिहा कर दिया था।

बीजेपी सार्वजनिक तौर जो भी स्टैंड ले। लेकिन पूरा देश जानता है कि इन आरोपियों के स्वागत करने के पीछे कौन लोग हैं। और इस पूरे प्रकरण में सरकार खुद अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर इन आरोपियों को जमानत कैसे मिल गयी। ये किसी सामान्य हत्या के आरोपी नहीं थे बल्कि इनके ऊपर एक इंस्पेक्टर की हत्या का आरोप है। सरकारी महकमे के काम में बांधा डालने पर किसी को जेल की सलाखों के पीछे डाला जा सकता है यहां तो एक वर्दीधारी इंस्पेक्टर की अपनी ड्यूटी के दौरान हत्या हुई थी।

बीजेपी को यह जरूर समझना चाहिए कि इसके जरिये वह जो संदेश देना चाहती है वह बेहद खतरनाक है। वह समाज में न सिर्फ अपराधियों के मनोबल को बढ़ाएगा बल्कि एक ऐसे भस्मासुर को पैदा कर रही है जो एक दिन खुद उसे ही लीलने पर उतारू हो जाएगा। राह चलते होने वाली हत्याओं का सिलसिला अब केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं रहा। इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह उसके महज एक पड़ाव भर थे।

पश्चिम से लेकर पूरब तक जिस तरह से बच्चा चोरी की अफवाह के नाम से 50 से ज्यादा लोग मॉब लिंचिंग के शिकार हो गए। यह घटना बताती है कि हालात बेहद गंभीर हो गए हैं। और चीजें हाथ से निकलने की तरफ बढ़ रही हैं। अनायास नहीं अंग्रेजों के दौर से कानून और व्यवस्था तथा कानून की प्रक्रिया को पूरा करने पर सबसे ज्यादा जोर रहा करता था। इस मामले में अंग्रेजों से सीख लेने की जरूरत है। क्योंकि वह अपने दुश्मनों को भी खत्म करने के लिए कानून की प्रक्रिया का ही सहारा लेते थे। ऐसा नहीं था कि किसी को भी राह चलते मरवा दें। किसी भी मामले में बाकायदा मुकदमा चलाया जाता था और उसके जरिये सजा दी जाती थी।

क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की यह बुनियादी शर्त होती है। और राज्य का यह बुनियादी कर्तव्य होता है कि वह उसे पूरा करे। बार-बार यह बात कही जाती रही है कि राज्य और समाज के बीच जो पहला करार होता है वह जनता के जान-माल की सुरक्षा का। और राज्य अगर अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी को भी नहीं पूरा कर पाता है तो उसे अस्तित्व में बने रहने का काई अधिकार नहीं है। मौजूदा दौर की मॉब लिंचिंग अगर बीजेपी का आदर्श है तो फिर जंगल राज क्या बुरा है। सीधे उसी दौर में लोगों को छोड़ दिया जाना चाहिए। कम से कम कानून, शासन और व्यवस्था का कोई भ्रम तो नहीं रह जाएगा। इस देश में अगर एक इंस्पेक्टर नहीं सुरक्षित है तो भला किसी नागरिक के सुरक्षा की क्या गारंटी दी जा सकती है? उसके परिजनों के मान-सम्मान की सुरक्षा नहीं हो सकती है तो आम लोगों की क्या बिसात है।

लेकिन सूबे की योगी सरकार एक के बाद दूसरा ऐसा फैसला कर रही है जिसमें इस बात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वह न केवल अपराधियों के साथ है बल्कि उन्हें उसका खुला संरक्षण हासिल है। इतना ही नहीं बाकायदा वे सरकार के हिस्से बने हुए हैं। कैबिनेट विस्तार में जिस तरह से सुरेश राणा जिन पर दंगों में सीधे शामिल होने के आरोप हैं, को शामिल किया गया है वह इसकी जीती जागती नजीर है।

(कुछ इनपुट एनडीटीवी से लिए गए हैं।)

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