Thursday, October 6, 2022

स्पेशल स्टोरी: नीतीश कुमार की क्षेत्रवादी सोच का नतीजा है अलग मिथिला राज्य की मांग

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पटना “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक जाति और एक क्षेत्र के मुख्यमंत्री बनकर रह गए हैं। राजगीर और नालंदा घुम आइए फिर मिथिलांचल आइए आपको नीतीश कुमार के क्षेत्रवाद विचार की असली बू नजर आ जाएगी। इस देश में भाषा को लेकर पहले भी राज्य की मांग की जा चुकी है और बना भी है। हम लोग भी अलग भाषा और अलग संस्कृति को लेकर अपना एक अलग राज्य चाहते हैं। ताकि हमारे लोग भी विकास देख सकें। मिथिलांचल के सर्वांगीण विकास के लिए पृथक मिथिला राज्य का गठन बहुत जरूरी है। ” मिथिलावादी पार्टी के इंजीनियर शरत झा बताते हैं।

‘अब समय आ गया है कि हम मिथिला के लोग पूरे भारत में यह डंके की चोट पर ऐलान करें कि हम मैथिल छी बिहारी नहीं।’ यह आवाज ट्विटर पर विगत 15 दिनों से ट्रेंड कर रही है वही मिथिलांचल खासकर दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी के इलाके में खूब जोर शोर से सुनाया जा रहा है। 

आंदोलन की वजह क्या बनी?

“जाम में घिसटते रहो.. पटना में जाकर गिड़गिड़ाते रहो.. एम्स.. ओवरब्रिज.. फ्लाईओवर के लिए तरसते रहो.. न पार्क मिलेगा.. न रिवरफ्रंट.. न मेट्रो.. मिथिला क्षेत्र एक रूपतापुर बन चुका है। एक वक़्त था कि मिथिला देश का सबसे इंडस्ट्रियलाइज्ड एरिया हुआ करता था। लगभग हरेक जिले में कोई न कोई औद्योगिक मिल या संयंत्र था। आज मिथिला लेबर जोन बन गया है। इसे बनाने में बहुत लोगों का हाथ है। अब हमें अपनी संस्कृति और भाषा के नाम पर अलग राज्य चाहिए।” मिथिला छात्र संघ के अध्यक्ष अनूप मैथिली मीडिया को बताते हैं।

“बी. एन. मंडल यूनिवर्सिटी हो या पूर्णिया यूनिवर्सिटी 5 वर्ष लगाता है स्नातक पूर्ण करने में। किशनगंज का एएनएमयू अभी तक पूरा नहीं हुआ है। भागलपुर के ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की पढ़ाई शून्य हो गई है। विद्वानों की धरती कहा जाने वाला मिथिला अभी अच्छी पढ़ाई के लिए भी तरस रहा है। आखिर कब तक? मिथिला सिर्फ शब्द या नाम नहीं एक भावना है। भाषा व संस्कृति है। 7 करोड़ से अधिक लोगों का अस्तित्व, आत्मबल है।” अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ महेंद्र राम बताते हैं।

मगध जैसा विकास मिथिला में क्यों नहीं?

“मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मगध को तो विकास का प्रतीक बना डाला है वही मिथिला को रूकतापुर। नालंदा में ग्लास ब्रिज के लिए सरकार के पास फंड की कोई कमी नहीं है दूसरी ओर मिथिला के लिए चचरी पुल पर भी संकट है। देश का सबसे पहला विश्वविद्यालय विक्रमशिला अभी भी खंडहर बना हुआ है और मगध का नालंदा विश्वविद्यालय अपने अतीत की ओर वापस लौट रहा है। क्षेत्र के नाम पर विकास का मापदंड गलत है। मैथिलों का सम्मान व स्वाभिमान दोनों जाग गया है। जिस दिन मिथिला राज्य बन गया उसके 5 साल के बाद कोई मैथिल कम से कम मजदूरी करने तो आपके प्रदेश में नहीं जाएगा। हम अपनी खोई हुई संस्कृति वापस लौटाएंगे” भूपेंद्र मंडल विश्वविद्यालय के पूर्व कुल सचिव सचिंद्र महतो बताते हैं।

मिथिला प्रदेश एक जाति की मांग

इंडिया टुडे के पूर्व संपादक प्रोफेसर दिलीप मंडल सोशल मीडिया पर मिथिला राज्य के बारे में लिखते हैं कि “मैं झा लोगों द्वारा अलग मिथिला राज्य माँगे जाने का समर्थन करता हूँ। भारत सरकार मैथिल ब्राह्मणों के इस पर विचार करे”। 

वहीं मिथिला छात्र संघ के एक और पूर्व सदस्य रह चुके कृष्णा लिखते हैं कि, “मिथिला राज्य की मांग ब्राह्मणों की मांग है। सारे मिथिलावासी इस से सहमत नहीं हैं, कुछ संगठन को छोड़ कर। 1990 के बाद से एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनाने के लिए अलग मिथिला राज्य की माँग कर रहे हैं।”

आंदोलन को कमजोर करने की साजिश

“कुछ लोग कह रहे हैं मिथिला राज्य सिर्फ ब्राह्मणों की मांग है। जा कर देखिए तो मधेपुरा में यादव और सुपौल में कुर्मी लोग भी इसका समर्थन कर रहे हैं। हर जाति का प्रतिनिधित्व है। आंदोलन को कमजोर बनाने के लिए ऐसा बोला जा रहा है।” सहरसा में मिथिला स्टूडेंट यूनियन के सदस्य अंकित सिंह बताते हैं।

वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति झा आजाद लिखते हैं कि, “आंदोलन को कमजोर करने के लिए नेताओं के द्वारा साजिशें की जाती हैं। इसी साजिश के तहत इस आंदोलन को ब्राह्मण का आंदोलन कहा जाने लगा है। वह लोग अपना काम करते रहें। हम लोग मिथिलांचल के वर्तमान को सुधारने के लिए इस आंदोलन को जारी रखेंगे। जब तक मिथिला राज्य नहीं बनता तब तक लड़ते रहेंगे अपने हक की लड़ाई।” गौरतलब है कि कीर्ति झा आजाद राज्य सभा में भी मिथिला राज्य की मांग उठा चुके हैं।

(पटना से राहुल की रिपोर्ट।)  

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