Wednesday, August 10, 2022

कोविड काल में 80% बच्चों में सीखने में आयी कमी और 10 % बच्चे बन गए बाल श्रमिक: रिपोर्ट

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भारत में कोरोना के कारण जनता कर्फ्यू के रूप में 22 मार्च 2020 को लॉकडाउन की शुरुआत हुई। इस लॉकडाउन के कारण सबसे अधिक शिक्षा के क्षेत्र में असर पड़ा। इस प्रभाव को ग्रामीण क्षेत्रों के SC, ST, OBC तथा निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों के स्कूल बंद हो जाने के कारण शिक्षा पर क्या और कितना प्रभाव पड़ा? इसे जानने के लिए भारत ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड इकाई के द्वारा गिरिडीह जिले के 2 प्रखंडों, गिरिडीह और जमुआ में घर-घर जाकर के 9151 बच्चों की शिक्षा का मूल्यांकन किया गयाI इस मूल्यांकन के लिए ऐसे बच्चों का चयन किया गया जो कोरोना के कारण स्कूल से ड्रॉप आउट हो चुके थेI

कहना ना होगा कि कोविड काल का सबसे ज्यादा असर समाज के गरीब तबके पर पड़ा है। सारे सर्वेक्षण यह बताते हैं कि कोविड बीमारी का आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक प्रभाव दुनिया के गरीब तबके को ही बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। हमारे देश में मध्यम वर्ग के लगभग 4.30 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए हमारे नीति निर्धारकों को राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्रों में एक साथ काम करना पड़ेगा।

उसमें सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है शिक्षा, खासकर प्राथमिक शिक्षा।

बताते चलें कि पिछले 19 महीने से बच्चे स्कूल से वंचित हैं, जिन बच्चों का प्रथम वर्ग में नामांकन किया गया है, उन्होंने अभी तक स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है।

इस बाबत भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय महासचिव काशीनाथ चटर्जी बताते हैं कि ऐसी परिस्थिति में भारत ज्ञान विज्ञान समिति और झारखंड में ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड, कोविड काल में बच्चों पर स्कूली शिक्षा के प्रभाव और ऑनलाइन शिक्षा पर प्रभाव का डोर-टू-डोर व्यापक अध्ययन किया है।

इसके लिए ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड द्वारा 16 जिलों के 5118 परिवारों के बच्चों का सर्वेक्षण किया गया और इसमें यह पाया गया की 95% बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित हैं, साथ-साथ वे शब्द भी भूलने लगे हैं,  साथ ही उनके व्यवहार में भी बदलाव आया है।

इसमें OBC परिवारों के कुल 59% बच्चे, ST परिवारों के कुल 16.6% बच्चे एवं SC परिवारों के कुल 19.9% बच्चों का मूल्यांकन किया गयाI  मूल्यांकन के लिए प्राथमिक और मध्य विद्यालय जाने वाले बच्चों का चयन किया गयाI  मूल्यांकन के दौरान बच्चों की मानसिक बौद्धिक और आर्थिक स्थिति का आकलन किया गयाI  आकलन में यह पाया गया कि कुल बच्चों में से 80% बच्चों के सीखने की क्षमता में कमी आई है, 10% बच्चे ऐसे भी थे जो अपने माता-पिता के साथ बाल श्रमिक बन चुके थेI

समिति के सदस्यों द्वारा जब यह सर्वेक्षण पूर्ण हुआ तो स्वयंसेवकों ने अभिभावकों और समुदाय के साथ संवाद करना शुरु कियाI जिससे यह बात साफ हो गई कि बच्चों की शिक्षा की स्थिति को सुधारने हेतु आवश्यक कदम उठाने की जरूरत हैI इसी के लिए ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड इकाई द्वारा 5 जिलों गिरिडीह, दुमका, धनबाद, पलामू और बोकारो के 15 प्रखंडों और इसके 100 पंचायतों में समिति के सदस्यों द्वारा 125 सामुदायिक शिक्षण केंद्र खोलकर खेत खलिहान में 9809 बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। जिसे फिर स्कूल चलो अभियान का नाम दिया गया है। इस अभियान की सफलता को देखते हुए यूनिसेफ ने भी इसे सहयोग प्रदान किया है समिति के लक्ष्य के अनुसार इससे कुल 15,000 बच्चों को जोड़ने की योजना है।

इस चुनौती का सामना करने के लिए ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड, अपने संगठन में स्वयंसेवकों को सामुदायिक शिक्षण केंद्र खोलने का आग्रह किया ताकि हम खेत-खलिहान में बच्चों को सीखने सिखाने के आनंद के साथ पढ़ाएं। अगस्त 2021 में समिति ने सर्वेक्षण किया उसके बाद स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देकर सामुदायिक शिक्षण केंद्र की शुरूआत की। सबसे अधिक सामुदायिक शिक्षण केंद्र रांची के खूंटी, गिरिडीह, धनबाद, पलामू व दुमका में शुरू किया गया।

इसके बाद ही यूनिसेफ दिसंबर माह में समिति को सहयोग करने के लिए आगे हाथ बढ़ाया और उन्होंने गिरिडीह जिला के दो प्रखंड गिरिडीह और जमुआ के 15 पंचायतों में सघन काम करने के लिए प्रस्ताव दिया। इस काम का उद्देश्य था कि 10,000 बच्चों का इन दो प्रखंडों के 15 पंचायतों में आकलन करे और उनका शैक्षणिक सहयोग करे। इसके साथ-साथ बाकी पचासी पंचायत और 15 प्रखंड में भी समुदाय को जोड़कर कोविड काल में शिक्षा की चुनौती से निपटने के लिए कार्य योजना बनाया गया। इस तरह से गिरिडीह के दो प्रखंड के 15 पंचायतों में 9151 बच्चों के आकलन के साथ सामुदायिक शिक्षण केंद्र के जरिए उन्हें शिक्षा देने का काम शुरू किया गया है। समिति का उद्देश्य स्वयंसेवक को बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित कर जो गांव में ही रहते हैं, उन्हें तैयार करना है।

इस बाबत काशीनाथ चटर्जी बताते हैं कि अभी तक हम लोग 8180 बच्चों का आकलन 15 पंचायतों में कर चुके हैं, जिसमें 80% बच्चे में कोविड काल में सीखने में कमी आई है। 10 प्रतिशत बच्चे माता पिता के साथ काम करने लगे हैं। अर्थात वह धीरे-धीरे बाल श्रमिक के रूप में बढ़ने लगे हैं। इन चीजों को देखते हुए हम लोगों ने पंचायत में समुदाय के साथ संवाद, शिक्षकों के साथ संवाद, पंचायती राज के साथ संवाद करना शुरू किया है। बड़े पैमाने पर समुदायों के साथ बैठक आयोजित किया जा रहा है। वे बताते हैं कि इन 2 प्रखंडों में 115 सामुदायिक शिक्षण केंद्र चल रहे हैं जिसमें से 81 सामुदायिक शिक्षण केंद्र गिरिडीह प्रखंड के 8 पंचायतों में हैं। 32 सामुदायिक शिक्षण केंद्र जमुआ में हैं।

अभी तक कुल 5800 बच्चे इन केंद्रों में शिक्षण पा रहे हैं। सामुदायिक शिक्षण केंद्र का मूल उद्देश्य बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाना और रूचिकर पढ़ाई के साथ जोड़ना है, ताकि वह फिर अपनी स्कूली शिक्षा और पाठशाला में खुशी-खुशी के साथ जा सके। इन सामुदायिक शिक्षण केंद्रों में कोविड प्रोटोकॉल के साथ बैठाया जाता है। साथ में कोविड के बारे में जानकारी से लैश किया जाता है। उनके माता-पिता के साथ भी बैठक की जाती है। इस काम में समुदाय के लोग भी आगे आए हैं, कई लोग अपने आंगन व खलिहान में बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह दे रहे हैं। बैठने के लिए बोरा दे रहे हैं। जगह की लिपाई-पोताई कर रहे हैं। जगह को साफ सुथरा कर रहे हैं। समुदाय इस काम में ज्ञान विज्ञान समिति के साथ आने लगे गांव और टोला के नौजवान खुशी से हमारे साथ आ रहे हैं और कोविड से उपजी शिक्षा की चुनौती का सामना कर रहे हैं। वे स्वयंसेवी भावना से पिछले 6 माह से लगातार हमारे साथ इन सामुदायिक शिक्षण केंद्र में काम कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि हमें लगता है कि बच्चों के लिए सीखने का सामुदायिक शिक्षण केंद्र एक सशक्त माध्यम होगा।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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