Saturday, October 1, 2022

क्यों थमने का नाम नहीं ले रहा है झारखंड में डायन-बिसाही का अंधविश्वास?

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झारखंड में अंधविश्वास इस तरह हावी है कि डायन बिसाही और ओझागुनी के नाम पर महिलाओं की प्रताड़ना और हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। आए दिन ऐसी घटनाएं खबरों की सुर्खियां बनती रही हैं। राज्य में अंधविश्वास की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि डायन-बिसाही व ओझागुनी के नाम पर प्रताड़ना व हत्याएं आम बात हो गई है। ऐसा नहीं है कि इस अंधविश्वास में हुए अपराध पर कार्रवाई नहीं होती। आए दिन इन मामलों के आरोपी को जेल जाना पड़ रहा है, सजा भी होती है बावजूद इसके यह अंधविश्वास थम नहीं रहा है।

हाल ही में 5 अगस्त को गुमला जिला के पुसो गांव की है। डायन बिसाही का आरोप लगाकर प्रताड़ित करने के मामले में भगत (ओझा) सहित चार लोगों को पुसो थाना की पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। क्योंकि भगत के कहने पर एक महिला को डायन कहकर 15 हजार रुपये, खस्सी व पूजा सामग्री वसूलने के साथ-साथ मारपीट भी किया गया था।

सिसई थाना क्षेत्र के जलका गांव निवासी भगत बंधन उरांव, पुसो थाना क्षेत्र के दारी गम्हरिया गांव के बंधु महली, विजय महली व गोमद महली है। पुसो थानेदार सत्यम गुप्ता ने बताया कि गम्हरिया निवासी बुधाइन महली (38) ने उक्त चारों लोगों द्वारा डायन कहकर प्रताड़ित करने, मारपीट व डरा धमका कर उससे भगत-मति के नाम पर 15 हजार नगद सहित एक खस्सी एवं पूजा-पाठ के समान लेने का आरोप लगते हुए पांच अगस्त को प्राथमिकी दर्ज करायी है। कांड दर्ज कर सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर पूछताछ के बाद जेल भेज दिया गया है। जानकारी के अनुसार बुधु महली का बेटा कई दिनों से बीमार चल रहा था।

बुधु अपने बेटे की बीमारी को अंधविश्वास से जोड़कर देखते हुए उसे इलाज के लिए डॉक्टर के पास नहीं ले जाकर जलका गांव के भगत बंधन उरांव के पास झाड़-फूंक कराने ले जाता था। भगत बंधन उरांव ने बुधु के बेटे को बुधाइन महली द्वारा जादू टोना कर बीमार करने की बात कहते हुए उसे ठीक करने के लिए 15 हज़ार रुपया, एक खस्सी व पूजा पाठ के समान की मांग किया गया। जिसके बाद आक्रोशित बंधु महली, विजय महली व गोमद महली बुधाइन के घर पहुंचकर डायन बिसाही बोलकर मारपीट करने लगे। भगत से बीमारी को ठीक करने के नाम पर डरा धमका कर बुधाइन से 15 हजार रुपये, खस्सी व पूजा सामग्री की वसूली की थी।

पिछले महीने झारखंड के ही गढ़वा जिलान्तर्गत नगरउंटारी थाना क्षेत्र में डायन-बिसाही के नाम पर एक महिला की बलि चढ़ाये जाने का मामला प्रकाश में आया।

बताया जाता है कि पिछली 21 जून को नगरउंटारी के वार्ड संख्या 6 के उरांव टोला में डायन-बिसाही को लेकर ललिता देवी ने अपनी ही सगी बहन गुड़िया देवी 26 वर्ष  की अपने पति दिनेश उरांव के साथ मिलकर जीभ व बच्चेदानी काटकर बलि चढ़ा दी।

जानकारी के आलोक में कथित तौर पर ललिता और उसका पति दिनेश उरांव ओझा-गुनी का काम करते थे। वे मेराल थाना क्षेत्र के दलेली गांव के रहने वाले है़ं। खबर के मुताबिक उन्होंने बलि देने से पहले गुड़िया देवी की जीभ काटी और उसके बाद उसकी बच्चेदानी और अंतड़ी काटकर निकालकर उसकी बलि दे दी।घटना के बाद शव को रंका थाना के खुरा गांव में उसी दिन शाम को जला दिया गया।

गुड़िया के पति मुन्ना उरांव और उसकी देवरानी ऊषा देवी ने पुलिस को बताया कि उनके पड़ोसी रामशरण उरांव उर्फ गोटा ने अपने घर में खप्पर बैठाने (एक तरह की तांत्रिक क्रिया) के लिए ललिता देवी एवं दिनेश उरांव को दलेली गांव से बुलाया था। चार दिनों से रामशरण के यहां तांत्रिक क्रिया चल रही थी। कथित रूप से खप्पर बैठाने के बाद बलि देने की प्रथा है।

तांत्रिक क्रिया के चौथे दिन तंत्र-मंत्र के लिए ललिता देवी ने गुड़िया को सपरिवार रामशरण उरांव उर्फ गोटा के घर पर बुलाया। गुड़िया के साथ उसका पति मुन्ना उरांव, गोतनी ऊषा देवी, सास सूजी देवी भी वहां गयीं। वहां पहुंचने के बाद गुड़िया देवी अचानक झूमने लगी लोगों ने सोचा कि तांत्रिक क्रिया की वजह से वह झूम रही है।

इसी दौरान ओझा ललिता देवी ने सबके सामने गुड़िया के मुंह में हाथ डालकर उसकी जीभ खींची और धारदार हथियार से काट दिया। गुड़िया तड़पने लगी, तो उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया। इसके बाद उसकी बच्चेदानी और अंतड़ी निकाल लिया। इससे गुड़िया देवी की मौत हो गयी। मौत के बाद आनन-फानन में दोनों ने गुड़िया के शव को लेकर मायके रंका के खुरा गांव चले आये और वहां जंगल में शव को जला दिया।

गुड़िया की देवरानी ऊषा देवी ने बताया कि उसने अपनी जेठानी को प्रताड़ित करने का विरोध किया था, तब झूमते हुए गुड़िया ने ही उस पर लाठी से वार कर दिया। इसकी वजह से वह (ऊषा देवी) बेहोश हो गयी। जब वह होश में आयी, तब तक घटना घट चुकी थी। उसने बताया कि सब कुछ उसकी आंखों के सामने हुआ। वह काफी डरी-सहमी थी। इसलिए किसी से कुछ नहीं बताया।

काफी डरी सहमी ऊषा देवी ने बताया कि वह रामशरण उरांव के घर नहीं जा रही थी। गुड़िया देवी ही जबरन उसे और उसके पति शंभू उरांव को ले गयी थी। उसने बताया कि जेठानी की मौत के दौरान जब उसने इसका विरोध किया, तो उसे भी बुरी तरह से मारा-पीटा गया। ओझा ललिता देवी पटककर उसके (ऊषा देवी) के सीने पर चढ़ गयी और गला दबाने लगी। उसने किसी तरह से भागकर अपनी जान बचायी।

बताया जाता है कि रामशरण उरांव उर्फ गोटा, जिसके घर में तंत्र-मंत्र करने के लिए ललिता देवी व दिनेश उरांव आये थे, वह अवैध शराब की बिक्री करता था और वह घटना के बाद से वह फरार हो गया था।

इस घटना के कई दिनों बाद मामले को लेकर गांव में एक पंचायत भी हुई थी। इसमें वार्ड सदस्य का पति योगेश उरांव भी मौजूद था। पंचायत में मामले को दबाने के लिए कहा गया था। इसे लेकर वार्ड पार्षद के पति ने कहा कि जब मृतका के पति मुन्ना ने ही आगे कदम नहीं बढ़ाया और श्राद्धकर्म के बाद इस बारे सब कुछ बताने को कहा, तब हमने भी इसकी सूचना पुलिस को देना उचित नहीं समझा।

योगेश ने कहा कि घटना के बाद परिवार में आपस में झंझट होने लगा, तो पंचायत के लिए बैठक हुई थी। उक्त बैठक में मृतका गुड़िया देवी के पति मुन्ना उरांव ने श्राद्धकर्म के बाद ही सब कुछ बताने और मामले को आगे बढ़ाने की बात कही थी।

इस संबंध में थाना प्रभारी योगेंद्र कुमार ने कहा था कि पूछताछ के लिए 5 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जबकि किसी ने इस मामले की प्राथमिकी के लिए आवेदन नहीं दिया था।इस मामले पर वहां लोग कुछ बोलने को तैयार नहीं थे।

लेकिन बाद में पुलिस ने 28 जून को मामले में दो महिला समेत सात आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया। जिसमें मृतका गुड़िया देवी की बहन ललिता देवी, बहनोई दिनेश उरांव, सास सुरजी कुंवर, कुंदन उरांव, सूरज उरांव, पति मुन्ना उरांव एवं रामशरण उरांव के नाम शामिल थे।

वहीं 15 सितंबर, 2020 को राज्य की राजधानी रांची के बेड़ो थाना के इलाके में नेहालु पंचायत के रोगाडीह पतरा टोली गांव में अल सुबह डायन के शक में एक दंपति की हत्या कर दी गई। मृतकों में 75 वर्षीय मंगरा उरांव और उनकी 55 वर्षीया पत्नी बिरसी उराइन थे। इन दोनों की हत्या ग्रामीणों ने मिलकर की। भीड़ इन दोनों को लाठी-डंडों से तब तक पीटती रही जब तक कि दोनों अचेत नहीं हो गए। बिरसी उराइन ने मौका-ए-वारदात पर ही दम तोड़ दिया जबकि उनके पति मंगरा उरांव की मौत उसी दिन शाम हो गई। 

9 सितंबर, 2020 को गुमला जिले के घाघरा थाना क्षेत्र के सलामी गांव में इसी तरह की एक घटना घटित हुई। करीब 75 वर्षीय शनिचरिया देवी को डायन बताकर गांव के ही पांडु उरांव ने डंडे से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। इस मामले में ग्रामीणों ने पुलिस के डर से आरोपी पांडु उरांव को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस के मुताबिक आरोपी पांडु उरांव मानता है कि वृद्धा डायन थी। उसके टोने के कारण उसकी मां और पत्नी हमेशा बीमार रहतीं थीं। साथ ही, लगभग 20 वर्ष पूर्व उसके पिताजी को भी वृद्ध महिला ने जादू करके मार दिया था।

17 अगस्त 2020 को गिरिडीह के गांवा थाना क्षेत्र के खेसनरो गांव में एक 30 वर्षीय महिला गीता देवी को डायन बता कर कुल्हाड़ी एवं लाठी से मार कर हत्या कर दी गयी। बताया जाता है कि खेसनरो गांव निवासी मनोज यादव की पत्नी गीता देवी को बीते कई सालों से कुछ लोगों द्वारा डायन बता कर लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। जब वह 17 अगस्त की सुबह अपने घर आ रही थी तब 15-20 की संख्या में कुछ लोगों ने उस पर लाठी-डंडे व कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। इसके कारण घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई।

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इन समुदायों में ऐसी प्रवृत्ति क्या अशिक्षा के कारण है? इसके जवाब में आदिवासी मामलों की जानकार वंदना टेटे कहती हैं, “अंधविश्वास व अशिक्षा हर समाज में है, बावजूद इसके आदिवासी समाज पर ज्यादा फोकस इसलिए होता है कि सामान्य समझ में आदिवासी व दलित ही अशिक्षित होते हैं।” वे आगे कहती हैं कि “जहां तक आदिवासी समाज में डायन के नाम पर की जा रही हत्याओं का सवाल है, तो उसके कारणों में आदिवासी समाज में बाहरी तत्वों की घुसपैठ है।

इस कारण इस तरह की हत्याओं में वृद्धि हुई है। जो आदिवासी समाज कभी एक समूह हुआ करता था, वह व्यक्तिगत होता जा रहा है। आजीविका के संसाधन, जो आदिवासी समाज में सामूहिक हुआ करते थे, अब व्यक्तिगत होने की ओर बढ़ रहे हैं। इसका कारण है आदिवासी समाज में कारपोरेट दलालों की घुसपैठ। वे आदिवासियों को उनकी जमीन की कीमत बताने लगे हैं, ताकि आने वाले दिनों में उनकी जमीन को आसानी से कारपोरेट के हवाले किया जा सके।”

टेटे कहती हैं कि “डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या के पीछे खास कारण यह भी है कि महिलाएं जमीन के प्रति ज्यादा सजग होती हैं। इस तरह की घटनाओं में अन्य महिलाएं खामोश रहती हैं और घुसपैठिए आसानी से पुरूषों को अपने पाले में करके उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इसलिए डायन के नाम पर उन्हें टारगेट किया जा रहा है।”

वहीं आदिवासी साहित्यकार डॉ. शांति खलखो बताती हैं कि इन घटनाओं के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण तो यही है कि महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है। शिक्षा व अज्ञानता भी महत्वपूर्ण कारण है। साथ ही संपत्ति के लोभ में भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। डॉ. खलखो बताती हैं कि डायन जैसी कुप्रथा आदिवासियों की संस्कृति में नहीं रही है। हम आदिवासियों की संस्कृति प्रकृति-आधारित होती है। इसमें प्रेम और सामूहिकता निहित है। लेकिन ब्राह्मणवादी ताकतों ने इस कुप्रथा को बढ़ाया है। वे हम आदिवासियों की संस्कृति पर हमला कर रहे हैं।

झारखंड को अलग राज्य बने 22 वर्ष हुए हैं और इस दौरान राज्य में डायन-ओझा के संदेह में एक हजार से भी ज्यादा लोगों की हत्या हे गई है।

पिछले साल फरवरी मार्च में झारखंड के गुमला जिला मुख्यालय से कोई 80 किलोमीटर दूर कामडारा थाना क्षेत्र के बुरुहातू आमटोली गांव में अलग-अलग कारणों के चलते इस दो महीने के दौरान तीन लोगों की मौत हुई थी। इसे लेकर एक पंचायत बैठी। गांव के तकरीबन 80 लोग इकट्ठा हुए। इनमें तंत्र-मंत्र करने वाला एक ओझा भी था जिसने गांव वालों से कहा कि ये मौतें निकोदिन टोपनो और उसके घरवालों के कारण हो रही हैं। उस परिवार में एक डायन है। वही गांव के लोगों को खा रही है। पंचायत ने तय किया कि पूरे परिवार का सफाया कर देना है। फैसले पर तत्काल अमल हुआ। इसके लिए आठ लोग तैयार हुए सबने शराब पी और देर रात निकोदिन टोपनो के घर पर हमला कर दिया।

इस हमले में 60 वर्षीय निकोदिन टोपनो, उनकी पत्नी जोसपिना टोपनो, जवान पुत्र विनसेन्ट टोपनो, बहू शीलवंती टोपनो और पांच साल का पोते अल्बिन टोपनो को कुल्हाड़ी से काट डाला गया। परिवार में सिर्फ निकोदिन की आठ साल की पोती अंजना टोपनो बच गई क्योंकि उस रोज वह अपने एक रिश्तेदार के यहां रांची में थी। बाद में पुलिस ने वारदात को अंजाम देने वाले आठ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा।

दरअसल झारखंड में इस तरह की घटनाओं का अंतहीन सिलसिला रहा है। झारखंड को अलग राज्य बने 22 वर्ष हुए हैं और इस दौरान राज्य में डायन-ओझा के संदेह में एक हजार से भी ज्यादा लोगों की हत्या हो चुकी है। डायन हिंसा और प्रताड़ना का शिकार हुए लोगों में 90 फीसदी महिलाएं हैं।

बीते साल नवंबर में राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री से नवाजी गईं सरायकेला-खरसांवा जिले के बीरबांस गांव की रहनेवाली छुटनी देवी भी उन महिलाओं में हैं जिन्होंने डायन के नाम पर बेइंतहा सितम झेले हैं। पड़ोसी की बेटी बीमार पड़ी थी और इसका जुर्म छुटनी देवी के माथे पर मढ़ा गया था, यह कहते हुए कि तुम डायन हो।

साल 2022 में  2 जनवरी को गुमला जिले के सिसई थाना क्षेत्र के लकया गांव में कुछ लोगों ने एक महिला को डायन करार दिया। महिला के दो बेटों संजय उरांव और अजय उरांव ने विरोध किया तो दस लोगों ने मिलकर दोनों को पकड़कर खंभे से बांध दिया, बेरहमी से पीटा। इतना ही नहीं, अजय उरांव की बाईं आंख भी फोड़ दी गई। पुलिस ने इस मामले में लुकया ग्राम पंचायत की मुखिया सुगिया देवी सहित 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

बीते 30 जनवरी को झारखंड की राजधानी रांची स्थित राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल रिम्स की नर्स सलोमी मिंज सहित चार लोगों को खूंटी जिले की पुलिस ने गिरफ्तार किया। इन सभी ने 27 जनवरी को नोरा लकड़ा नामक एक महिला को डायन करार देकर उसकी हत्या कर दी थी और उसकी लाश एक कार में रखकर खूंटी थाना क्षेत्र के जंगल में फेंक दी। पुलिस ने सलोमी से पूछताछ की तो उसने बताया कि 17 जनवरी को उसके बड़े बेटे अभिषेक तिर्की की अचानक मौत हो गई थी। उसे आशंका थी कि उसके घर पर किराए पर रहने वाली नोरा लकड़ा ने जादू-टोने से उसकी जान ले ली है। 

बीते 5 जनवरी को खूंटी जिला अंतर्गत तिरला गांव में डायन और जादू-टोने के अंधविश्वास में दंपती की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. हत्यारों के खौफ के चलते गांव में यह मामला पूरे पांच दिनों तक दबा रहा। सिमडेगा में ठेठईटांगर थाना क्षेत्र के कुड़पानी गांव की रहने वाली झरियो को फुलरेंस नामक व्यक्ति ने डायन बताते हुए अपनी पत्नी की मौत का जिम्मेदार ठहरा दिया। इसके बाद फुलरेंस ने अपने साथियों के साथ मिलकर झरियो देवी पर पुआल और तेल डालकर आग लगा दी।

पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में डायन-बिसाही के नाम पर झारखंड में हर साल औसतन 35 हत्याएं हुईं हैं। अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में डायन बताकर 46 लोगों की हत्या हुई। साल 2016 में 39, 2017 में 42, 2018 में 25, 2019 में 27 और 2020 में 28 हत्याएं हुईं। 2021 के आंकड़े अभी पूरी तरह कंपाइल नहीं हुए हैं लेकिन इस वर्ष भी हत्याओं के आंकड़े करीब दो दर्जन बताए जा रहे हैं। इस तरह सात वर्षों का आंकड़ा कुल मिलाकर 230 से ज्यादा है। 

डायन बताकर प्रताड़ित करने के मामलों की बात करें तो 2015 से लेकर 2020 तक कुल 4556 मामले पुलिस में दर्ज किए गए हैं। यानी हर रोज दो से तीन मामले पुलिस के पास पहुंचते हैं। बीते छह वर्षों में सबसे ज्यादा मामले गढ़वा में आए। यहां 127 मामले दर्ज किए गए, जबकि पलामू में 446, हजारीबाग में 406, गिरिडीह में 387, देवघर में 316, गोड्डा में 236 मामले दर्ज किए गए हैं।

डायन के आरोप में प्रताड़ना और हिंसा की घटनाएं अक्सर बर्बरता की तमाम हदें लांघ जाती हैं। महिलाओं को मैला खिलाने, निर्वस्त्र करने, बाल काटने से लेकर निजी अंगों पर हमले जैसी घटनाएं आए रोज झारखंड में मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। सामाजिक एवं स्वयंसेवी संगठनों से जुड़ी छंदोश्री कहती हैं कि डायन कुप्रथा के पीछे अंधविश्वास और अशिक्षा तो है ही, कई बार विधवा-असहाय महिलाओं की संपत्ति हड़पने के लिए भी उनके खिलाफ इस तरह की साजिशें रच दी जाती हैं। गांव में किसी की बीमारी, किसी की मौत, यहां तक कि पशुओं की मौत और पेड़ों के सूखने के लिए भी महिलाओं को डायन करार दिया जाता है।

झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता और कई सामाजिक संगठनों से जुड़े योगेंद्र यादव बताते हैं, डायन प्रताड़ना के लगभग 30 से 40 प्रतिशत मामले तो पुलिस के पास पहुंच ही नहीं पाते। दबंगों के खौफ और लोकलाज की वजह से कई लोग जुल्म सहकर भी चुप रह जाते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं होती हैं। कई बार प्रताड़ित करने वाले अपने ही घर के लोग होते हैं।

योगेंद्र बताते हैं कि डायन-बिसाही के नाम पर प्रताड़ना की घटनाओं के लिए लिए वर्ष 2001 में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू हुआ था लेकिन झारखंड बढ़ने के बाद डायन प्रताड़ना और हिंसा के बढ़ते मामले यह बताते हैं कि कानून की नए सिरे से समीक्षा की जरूरत है। दंड के नियमों को कठोर बनाए जाने, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर ऐसे मामलों में जल्द फैसला लिए जाने और सामाजिक स्तर पर जागरूकता का अभियान और तेज किए जाने की जरूरत है।

झारखंड के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव मनीष रंजन का कहना है कि डायन कुप्रथा उन्मूलन के लिए सरकार पिछले डेढ़ साल से जेएसएलपीएस (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी) के जरिए गरिमा परियोजना चला रही है। डायन बताकर प्रताड़ित की गई महिलाओं को न सिर्फ चिन्हित किया जा रहा है, बल्कि इन्हें सखी मंडल से जोड़कर स्वावलंबी बनाया जा रहा है। डायन कुप्रथा की पीड़ित महिलाओं को काउंसेलिंग, कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक काउंसेलिंग की भी पहल गई है। राज्य में अब तक डायन कुप्रथा से पीड़ित लगभग एक हजार महिलाओं की पहचान की गई है। 450 से ज्यादा पीड़ित महिलाओं को सखी मंडल के जरिए आजीविका के विभिन्न साधनों से जोड़ा गया है, जबकि करीब 600 चिन्हित महिलाओं की मनोचिकित्सकीय काउंसेलिंग की गई है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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