राष्ट्रपिता का इस्तीफा और जंतर-मंतर

राजघाट में सुबह-सुबह ही पहुंच गया। कोशिश थी कि भीड़-भाड़ होने से पहले ही पहुंच कर, बर्थ डे बॉय से पूछ आऊं–157वें वर्ष में जाते हुए, बापू आप को कैसा लग रहा है? दिन चढ़ने के बाद तो सत्ताधारी और गैर-सत्ताधारी भी, नेताओं का तांता लग जाने वाला था। सुरक्षा घेरों की चखचख और। और जो कहीं पीएम जी चले आएं, तब तो राजघाट तक पहुंचने में ही नाकों चने चबाने पड़ जाएं। सो भीड़ आने से पहले ही मुलाकात कर के निकल जाऊं।

पर पहले तो लंबे-चौड़े परिसर में बुजुर्ग कहीं नजर ही नहीं आए। थोड़ा खोजने के बाद, दूर एक कोने में एक लैंप पोस्ट के नीचे, जानी-पहचानी कमजोर काया दिखाई दी। नजदीक जाकर देखा तो सिर झुकाए बुजुर्ग अपने उसी पुराने जमाने के पैन से, कागज पर तेजी से कुछ लिखने में लगे हुए थे। दूर से ही नमस्कार करने के साथ पूछा–जन्मदिन पर सुबह-सुबह क्या लिख रहे हैं? देश के नाम संदेश! एक शब्द का जवाब आया–इस्तीफा!

जन्मदिन के जश्न में ये इस्तीफा कहां से आ गया? इस्तीफा शब्द सुनकर चौंकना ही था। माना कि देश में इस्तीफा देने से ज्यादा इस्तीफा मांगने का सीजन चल रहा था, लेकिन बापू किस पद पर थे जो इस्तीफा देना चाहते थे।

पूछा–आप काहे से इस्तीफा देने चल दिए? इस्तीफा मांगा जा रहा है, ज्ञानेश कुमार का। उन पर चुनाव में धांधली और करोड़ों लोगों के वोट की चोरी का इल्जाम है। उससे पहले इस्तीफा मांगा जा रहा था अमित शाह का। उन पर नौजवान प्रदर्शनकारियों पर अपनी पुलिस से जुल्म कराने से लेकर उनकी जासूसी कराने तक के इल्जाम थे। उनसे पहले इस्तीफा मांगा गया और ले भी लिया गया धर्मेंद्र प्रधान का, उन पर देश की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्थाओं का कबाड़ा करने का इल्जाम था। डेमोक्रेसी के मुगालते में लोग, कुर्सीधारियों से जब-तब इस्तीफा मांगते ही रहते हैं, भले ही कोई इस्तीफा दे या नहीं दे। पर आप बिना किसी के मांगे काहे का इस्तीफा देने चल पड़े!

बापू धीमे किंतु दृढ़ स्वर में बोले–मुझे राष्ट्रपिता के पद से इस्तीफा देना है! मैं फौरन दबा नहीं लेता तो हंसी छूट जाती। राष्ट्रपिता पद से इस्तीफा? काहे का पद और काहे का इस्तीफा! पर मैं कुछ कहता, उससे पहले ही रुकी हुई हंसी को ताड़कर बुजुर्ग ने जोर देकर कहा–कोई कुछ भी समझे, मुझे इस्तीफा देना है। बस अब और मुझे राष्ट्रपिता नहीं रहना है। मुझे राष्ट्रपिता पद से इस्तीफा देना ही है! पर मुझे लगा कि कोई फौरी नाराजगी होगी। मैं बहस-सी करने लगा।

वहां देश भर में लोग जगह-जगह ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं। कह रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार के रहते, चुनाव कहलाने लायक चुनाव हो ही नहीं सकता। ज्ञानेश कुमार देश में जनतंत्र के लिए खतरा है। फिर भी इस्तीफा छोड़ो, ज्ञानेश कुमार के छुट्टी पर जाने तक के कोई आसार नहीं हैं। उल्टे हर जगह मोदी जी की पुलिस ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाने के लिए प्रदर्शनकारियों के जमा होने को लट्ठबळ से रोकने की ही कोशिशों में लगी है। दिल्ली में तो जंतर-मंतर पर ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ टाइप के इंतजाम हैं। और आप को…।

बापू ने बीच में ही रोक कर कहा–यहां राजघाट पर कौन सा परिंदे को पर मारने दिया जाएगा। थोड़ी देर में यहां भी सुरक्षा के नाम पर वैसी ही पाबंदियां होंगी। मेरा तो मन करता है कि मैं भी जंतर-मंतर पर चला जाऊं। मैं भी गला फाड़कर नारे लगाऊं। मैं भी जेन जी और जेन अल्फा के साथ ज्ञानेश और उसके संरक्षकों से कहूं–डन ब्रो! अरे बेईमान साबित होना नहीं होना कानूनी दांव-पेच की बातें हैं। असली बात यह है कि वह रेफ़री ही क्या जिस पर, प्रतिस्पर्धा करने वालों को भरोसा ही नहीं हो। ऐसा पंच रहना ही किसलिए, जिसे पक्षकार परमेश्वर नहीं मानें। पर साहब जबर्दस्ती पंच बने हुए हैं। इस्तीफा नहीं देने पर अड़े हुए हैं।

ऊपर से उसके संरक्षक अड़े हुए हैं कि मैच तो उनका रेफ़री कराएगा ही, उसके खिलाफ कोई विरोध, कोई प्रदर्शन, शांतिपूर्ण हो तब भी शांति से नहीं होने दिया जाएगा। जिस देश में सत्याग्रह कर-कर के अंग्रेज़ों को भगाया, उसमें सत्याग्रह भी नहीं होनेे देंगे? मेरे जन्म दिन पर भी नहीं। सत्याग्रह करने पर लाठी-जेल, यही है मेरा बर्थ डे गिफ्ट! मुझे ऐसे देश का राष्ट्रपिता बना रहना मंजूर नहीं है।

मैंने कहा ये तो अनहोनी बात होगी। राष्ट्रपिता पद से कौन इस्तीफा देता है? अब तक तो किसी ने ऐसा सुना नहीं। ये तो पिता से तलाक वाली बात हो गयी। पर बापू के पास इसका भी जवाब तैयार था। कहने लगे कि पिता के बताए से उल्टे रास्ते पर कौन सा राष्ट्र धकेला जाता है? पुत्र गलत रास्ते पर चले तो पिता उसको डिसओन तो कर सकता है, उससे नाता तो तोड़ सकता है। बस मुझे वही करना है।

और कुछ नहीं सूझा तो मैंने दुनिया क्या कहेगी की दलील दी? बिना राष्ट्रपिता का राष्ट्र, कैसा लगेगा? नंगा-बूचा सा। बापू तपाक से बोले–जो मुसलमानों का और बाकी गरीबों का भी वोट काटने वाले ज्ञानेश कुमार को चुनाव के लिए पंच चुन सकते हैं, वे उसी मिजाज का अपना कोई राष्ट्रपिता भी तो चुन सकते हैं। सावरकर की तस्वीर मुझसे ऊपर लगने ही लगी है। बना लें उन्हें ही राष्ट्रपिता अपने विकसित भारत का। बल्कि गोडसे को ही बना लें; सुना है, उसकी फांसी का भक्तों को बहुत मलाल है। बस मेरी जान बख्शी जाए। मुझे नेताओं से झूठी श्रद्धा के फूल चढ़वाने से छुट्टी दी जाए। मेरा इस्तीफा मंजूर किया जाए!

मैंने आखिरी हथियार आजमाया–सिस्टम में आप का नाम डेड/ परमानेंटली शिफ्टेड की सूची में जा चुका है, आप इस्तीफा दे भी देंगे तो सिस्टम उसे मंजूर ही नहीं करेगा। बापू खुश होकर बोले–डेड होने की अच्छी याद दिलायी। अब मुझे न राजघाट में बंद कर के रख सकते हैं और न जंतर-मंतर पर जाने से रोक सकते हैं। सिस्टम से ही बाहर जो हूं। सो मैं चला जंतर-मंतर। और सचमुच चल भी पड़े।

मैंने पीछे से याद दिलाया–इस्तीफा! बापू ने चिल्ला कर जवाब दिया–हो गया। याद दिलाया–बर्थ डे। बोले–अब वहीं मनेगा, जेन जी के साथ।  

(कार्टून : साभार मंसूर नकवी)

(राजेंद्र शर्मा का व्यंग्य)                                                        0

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