महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी (एमएसपीएस) एक्ट का बचाव करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में कहा है कि शहरी आबादी सबसे ज़्यादा होने के कारण प्रदेश “माओवादी शहरी नेटवर्क” का केंद्र बन गया है।
राज्य के गृह विभाग के उपसचिव प्रीतमकुमार जावले की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि राज्य के पास “वामपंथी उग्रवाद” से प्रभावित अन्य राज्यों (तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) की तरह फ्रंटल संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट जैसा कोई कानूनी ढांचा नहीं था।
कांग्रेस, भाकपा और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती याचिकाएँ दाखिल की हैं।
सरकार के हलफनामे में कहा गया है कि कानून “गैर-कानूनी, विध्वंसक और चरमपंथी गतिविधियों को रोकने और उनसे निपटने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा बनाने” के मकसद से बनाया गया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून शांतिपूर्ण और जायज विरोध को रोकता है और सरकार को “बिना किसी न्यायिक जांच या निगरानी के” संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए “व्यापक, मनमानी और अत्यधिक शक्तियां” देता है।
इस एक्ट में चार दंडनीय अपराध बताए गए हैं: किसी गैर-कानूनी संगठन का सदस्य होना, उसके लिए फंड इकट्ठा करना, उसे चलाने में मदद करना या “गैर-कानूनी गतिविधि” करना। यह राज्य को किसी भी संदिग्ध संगठन को “गैर-कानूनी संगठन” घोषित करने का अधिकार देता है।
एल्गार परिषद और अन्य मामलों का हवाला देते हुए हलफनामे में दावा किया गया है कि देश में सबसे ज़्यादा फ्रंटल संगठन (64) महाराष्ट्र में हैं। इसमें कहा गया है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड ने ऐसे ही कानूनों के तहत ऐसे समूहों पर प्रतिबंध लगाया था जो “न्यायिक जांच में खरे उतरे”, इसलिए महाराष्ट्र को भी “स्थानीय सुरक्षा हालात” के लिए ऐसा कानून बनाने का अधिकार था। राज्य ने कहा कि अगर यह कानून लागू नहीं किया गया, तो इससे “वामपंथी उग्रवाद” प्रभावित इलाकों में माओवादियों से लड़ने के लिए ज़रूरी ‘सुरक्षा संबंधी खर्च’ फंड पाने के अधिकार पर असर पड़ेगा।
राज्य ने कहा कि कानून अस्पष्ट नहीं है और न ही यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का उल्लंघन करता है, जिस पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यह कानून “नागरिकों की बुनियादी आज़ादी और सार्वजनिक व्यवस्था व राष्ट्रीय अखंडता बनाए रखने के अहम कर्तव्य के बीच संतुलन बनाता है।”
राज्य ने इस बात से भी इनकार किया कि “गैर-न्यायिक सलाहकार बोर्ड” में सरकारी वकील की नियुक्ति गैर-कानूनी थी।
राज्य ने कहा कि यह कानून किसी भी हिंसा या जान-माल के नुकसान से पहले ही कार्रवाई करने की इजाज़त देकर “एक अहम विधायी कमी” को पूरा करता है, क्योंकि उग्रवादी गतिविधियां “सिर्फ़ विचारधारा के दम पर नहीं चलतीं; बल्कि उन्हें मज़बूत लॉजिस्टिकल सप्लाई चेन, सुरक्षित ठिकानों, गुप्त वित्तीय नेटवर्क और संस्थागत मोर्चों की ज़रूरत होती है।”
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ताओं को हलफ़नामे के जवाब में एक और जवाब दाखिल करने की इजाज़त दी और मामले की सुनवाई के लिए 16 अक्टूबर की तारीख तय की।
(जनचौक ब्यूरो)