शिक्षक दिवस: सरकारी और गैरसरकारी शिक्षकों के साथ भेदभाव बंद हो!

हमारे देश में सार्वजनिक तौर पर शिक्षा का प्रबंधन अंग्रेजों ने प्रारंभ किया। उससे पहले मदरसे और गुरुकुल हुआ करते थे। जिनमें अमूनन धार्मिक शिक्षा ,वर्ग विशेष को दी जाती थी वह धर्मगुरू ही देते थे।इन  शिक्षाओं का प्रबंधन समाज के लोग करते थे। अंग्रेजों ने भले ही, जैसा कि कहा जाता है देश में क्लर्क, कर्मचारी और ट्रांसलेशन की  ज़रुरत के लिए स्कूल खोले हों उनमें क्रिश्चियन स्कूल अधिक हों किन्तु सरकारी स्तर पर वाला उन्होंने ही खोली। मूलतः इनमें लड़कों को ही शिक्षा दी जाती थी जैसे गुरुकुल या मदरसे मेंदी जाती रही किंतु यह भी सच है कि मिशनरी स्कूलों में जाति या धर्म विशेष का कोई बंधन नहीं था।

चूंकि इन संस्थानों में लड़कियों को स्थान नहीं था इसके लिए सावित्री बाई फूले और फ़ाातिमा शेख ने पहले की उसके बाद से अंग्रेजों ने उन्हें भी अवसर दिया।धीरे धीरे शिक्षकों के साथ शिक्षिकाओं भी शामिल हो गई।

आज़ादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू और पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने शिक्षा पर ज़ोर देने लोगों का आव्हान किया जिससे बड़ी तादाद में स्वेच्छा से सरकारी स्कूल से ज्यादा निजी विद्यालय देश में खुल गए। विदित हो सरकारी स्कूलों का वेतनमान निर्धारण का काम सरकार के हाथ में था, जबकि निजी विद्यालयों में सेवा भाव से ज्ञान देते,अल्प वेतन में शिक्षक पढ़ाते रहे। किंतु जब इन स्कूलों में सेवा भाव की जगह नौकरी ने ले ली तो कुछ प्राइवेट संस्थानों और शिक्षकों ने सरकार से अनुदान मांगा तो पहले कामकाज हेतु सिर्फ मामूली सहायता मिली।

दिनों दिन लोगों की ज़रुरतों में इज़ाफ़ा होने तथा मंहगाई की मार से परेशान शिक्षकों ने अशासकीय माध्यमिक शिक्षक संघ के ज़रिए लंबे आंदोलन के बाद पहले 75%और फिर 100 फीसदी वेतनमान सरकार ने दिया।जबकि कई नए शैक्षणिक संस्थानों ने इससे दूरी रखी। उन्होंने नि: शुल्क शिक्षा को भारी शैक्षणिक शुल्क लेकर अंग्रेजी मीडियम के नाम पर आम जनता से इतना शुल्क लिया जिससे  समुचित सुविधा सम्पन्न आकर्षक स्कूल बनाए।इस बीच सरकार ने भी गांव गांव शिक्षा हेतु प्रायमरी,मिडिल स्कूल खोले।

इन स्कूलों में संविदा शिक्षक,गुरु जी या मौसमी शिक्षक लिए गए।जिनका वेतन बहुत कम था। इसलिए शिक्षा लापरवाही की भेंट चढ़ गई। दूसरी ओर अनुदानित संस्थाओं का सुख चैन राजनीति का शिकार बन गया।अनुदान का यह अधिनियम ही समाप्त कर दिया गया। इससे ऐसे विद्यालय फिर पुरानी स्थिति में पहुंच गए।

वर्तमान सरकार ने शिक्षा फंड में कभी की उच्चस्तरीय सुविधा पर भी हमला बोला।साथ ही साथ गांव गांव खुले स्कूलों को बंद कर वहां से संकुल हाईस्कूल और हायर सेकंडरी स्कूल बना दिया। जिससे शिक्षकों की संख्या और शिक्षा का भार सरकार पर कम हो गया है।

चूंकि आज शिक्षक दिवस है इसलिए सरकार  को शिक्षकों के बीच वेतन की जो असमानता है उसे ख़त्म करने पर विचार करना चाहिए। क्योंकि एक जैसे काम के एक जैसे दाम मिलने चाहिए। बड़े निजी संस्थानों से लेकर समस्त गैरसरकारी संस्थानों में सरकार के निरीक्षण के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वहां शिक्षकों को उनके काम के कितने दाम मिल रहे हैं? क्योंकि यह सच है कि आज के इस मंहगे दौर में शिक्षक यदि मानसिक तौर पर परेशान होगा तो वह छात्रों को किस तरह पढ़ाएगा।उनकी सिर्फ उपस्थित से बदलाव नामुमकिन है। दूसरे अब सेवाभावी काम युवाओं के बस का नहीं है इसके लिए ज़रुरी हो तो फिट रिटायर शिक्षकों की सेवाएं लीजिए।युवा शिक्षकों के साथ ऐसा व्यवहार नाइंसाफी है।

उम्मीद है सरकार देश की शिक्षा नीति पर विचार करेगी और बच्चों के बीच एक जैसी शिक्षा और शिक्षकों के साथ एक जैसे वेतनमान को अमल में लाएगी।एक देश, एक सी शिक्षा एक से शिक्षक की ओर कदम बढ़ाएगी।यह देश को सुदृढ़ करने वाला कदम होगा।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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