क्या होगा यदि आरएसएस का पंजीकरण हो जाए?

कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे ने इस पुराने सवाल को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। उन्होंने संघ की कानूनी स्थिति, वित्तीय स्रोतों और संगठनात्मक जवाबदेही को लेकर प्रश्न उठाए हैं। पहली नज़र में यह एक प्रशासनिक सवाल लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारतीय लोकतंत्र में शक्ति और उत्तरदायित्व के रिश्ते से जुड़ा प्रश्न है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आड़ में टैक्स से मुंह चुराने का मुद्दा है।

सवाल का जवाब सवाल नहीं होता

यदि कोई पूछे कि संघ का पंजीकरण क्यों नहीं है, तो जवाब मिलता है—पहले हिंदू धर्म का पंजीकरण कराइए। यदि सरकार से पारदर्शिता की मांग की जाए तो जवाब आता है—पिछली सरकारों ने क्या किया था? इस तरह मूल प्रश्न धीरे-धीरे बहस से गायब हो जाता है।

लोकतंत्र में सवालों का जवाब सवालों से नहीं दिया जाता। यदि कोई नागरिक किसी संस्था की वित्तीय या कानूनी स्थिति के बारे में जानना चाहता है तो उसे यह अधिकार होना चाहिए कि उसे स्पष्ट उत्तर मिले।

संघ का लंगड़ा तर्क

संघ का तर्क है कि वह कोई कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का संगठन है। यह भी कहा जाता है कि ब्रिटिश काल में उसकी स्थापना हुई थी और तब पंजीकरण की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन यह तर्क ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 से अस्तित्व में था। धार्मिक और परोपकारी संस्थाओं के लिए भी कानूनी ढाँचे उपलब्ध थे। स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन बाद में विधिवत पंजीकृत संस्था बना। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने विश्वभारती की स्थापना की और उसे संस्थागत स्वरूप दिया। भारत के अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षिक संगठनों ने सार्वजनिक जीवन में भूमिका निभाते हुए कानूनी ढाँचे को स्वीकार किया।

संघ के मामले में अलग व्यवस्था क्यों?

संघ स्वयं को केवल सांस्कृतिक संगठन बताता है, लेकिन आज धर्म, सरकार, न्यायपालिका, कार्यपालिका, उद्योग जगत, शिक्षा, श्रम, किसान-मज़दूर संगठन, छात्र राजनीति, आदिवासी क्षेत्र, संदिग्ध एवं अपारदर्शी गतिविधियाँ, उग्र महिला संगठन, ग़ुलाम मीडिया और नियंत्रणकारी राजनीति— यानी शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र है जहाँ संघ की प्रभावी उपस्थिति न हो। भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय मंत्रीगण स्वयं संघ के साथ अपने वैचारिक संबंधों को खुलेआम स्वीकार करते हैं।

पिछले एक दशक में यह प्रभाव और अधिक प्रत्यक्ष दिखाई दिया है। अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता पर बहस, इतिहास और पाठ्यक्रमों में बदलाव—इन सभी मुद्दों को संघ लंबे समय से उठाता रहा है। यदि कोई संगठन राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, तो क्या उससे संविधान के अनुपालन की अपेक्षा अनुचित है?

यहाँ मुद्दा संघ-विरोध या संघ-समर्थन का नहीं है। मुद्दा समान मानदंडों का है। यदि एक छोटे से गैर-सरकारी संगठन को अपने खातों का ऑडिट कराना पड़ता है, अपने पदाधिकारियों का विवरण देना पड़ता है और विभिन्न कानूनों का पालन करना पड़ता है, तो देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली सामाजिक संगठनों में से एक के लिए अलग मानदंड क्यों हों?

पंजीकरण के संभावित लाभ

पंजीकरण हो जाने से संघ की शाखाएँ बंद नहीं हो जाएँगी। उसके स्वयंसेवक काम करना नहीं छोड़ देंगे। उसके विचार समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन संभव है कि पहली बार उसकी वित्तीय संरचना, आय के असली स्रोत, धन प्रवाह, प्रशासनिक ढाँचे और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध हो जाए। यदि वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे छिपाने की आवश्यकता हो, तो फिर पंजीकरण से परहेज़ क्यों? बल्कि ऐसा करने से उसे आयकर और ऋण योजनाओं में छूट भी प्राप्त होगी।

पंजीकरण के बाद दायित्व बढ़ेगा

किसी भी गोपनीय वित्तीय ढांचे और सदस्यता के अपारदर्शी स्वरूप से षड्यंत्रकारी उद्देश्यों की बू आ सकती है। पंजीकरण का अर्थ केवल कानूनी मान्यता प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि संगठन को कई प्रकार की वैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन भी करना पड़ता है। 

तब आरएसएस को नियमित वित्तीय विवरण, ऑडिट रिपोर्ट, वार्षिक सूचनाएँ और अन्य आवश्यक दस्तावेज़ संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत करने होंगे। संगठन की संरचना, पदाधिकारियों, संपत्तियों और वित्तीय गतिविधियों से जुड़ी जानकारी अधिक औपचारिक और अभिलेखीय रूप में दर्ज करनी पड़ेगी। इसके साथ ही सरकारों और नियामक संस्थाओं को संगठन की वित्तीय तथा प्रशासनिक गतिविधियों की निगरानी का कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाएगा।

लोकतंत्र में शक्ति का स्रोत चाहे चुनाव हो, पूँजी हो, मीडिया हो, धार्मिक प्रभाव हो या वैचारिक संगठन— क्या हर शक्ति को सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में नहीं आना चाहिए?

(विजयशंकर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार, कवि और कथाकार हैं)

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