पूर्वोत्तर भारत की पत्रकारिता से राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले पत्रकार अमरनाथ झा अपने गृह प्रदेश बिहार की राजधानी पटना की श्रद्धांजलि सभा में अलग अंदाज में याद किए गए।
1 जुलाई, बुधवार को पटना के माध्यमिक शिक्षक संघ के सभागार में जनवादी लेखक संघ, सबाल्टर्न पत्रिका परिवार और पटना के पत्रकार समाज की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पत्रकार, साहित्यकार, प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अपने परिजनों की उपस्थिति में अमरनाथ जी याद किए गए।
दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अमरनाथ जी की शोक सभा के बाद पटना में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके जीवन के कई रोचक प्रसंग उभर कर सामने आए। दिवंगत पत्रकार के निकटस्थों ने उनके बारे में ऐसी बातें बताई, जिसके बारे में वे कभी किसी से चर्चा नहीं करते थे।नदी-पानी, बाढ़ – सूखा, विस्थापन और जनांदोलन लिखते हुए राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले एक पत्रकार के जीवन संघर्ष की बनावट – बुनावट को उनकी मौत के बाद जानने की कोशिश उनकी लोकप्रियता को स्थापित करता है
गांधीवादी, समाजवादी, सर्वोदयी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध अमरनाथ जी के पिता नर्मदेश्वर झा बिहार सरकार के अपर महाधिवक्ता और जनसंघ के बड़े नेता थे। इस नई जानकारी के बाद सब विचारते रहे कि जनसंघ और आरएसएस की प्रयोगशाला से अमरनाथ जी ने किस मशक्कत और जद्दोजहद से खुद को प्रगतिशील बनाया होगा।
खादी के कुर्ते, खादी की गमछी और श्वेत दाढ़ी के साथ सदैव निश्चल मुस्कुराने वाले अमरनाथ जी के आदर्श, मूल्य और पत्रकारीय संकल्प को पत्रकारिता की कसौटी के रूप में याद किया गया। 63 वर्ष की अल्पायु में हुई अमरनाथ जी मौत का दर्द सबको कचोटता रहा।17 जून 2026 को ब्रेन हेमरेज की वजह से असमय अमरनाथ जी की मौत हो गई थी।
लोक प्रतिष्ठित पत्रकार अमरनाथ जी की श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ साहित्यकार रविन्द्र भारती ने कहा, “अमरनाथ उम्र में मुझसे छोटे थे और मुझे उनकी श्रद्धांजलि में आना पड़ेगा। ऐसा अकल्पीय था।जब वे गुवाहाटी में थे तो वहां के राजनेताओं के साथ -साथ असमिया रंगमंच और नाट्य निदेशकों से भी उनका रिश्ता था। असमिया भाषा और संस्कृति से आपसदारी की वजह से अमरनाथ जी ने वहां की पीड़ा को केंद्र सरकार के शासकीय मानदंड से भिन्न तरीके से समझा। यही वजह थी कि अहिंदी क्षेत्र की पत्रकारिता करते हुए हिन्दी पत्रकार अमरनाथ ने पूर्वोत्तर का भरोसा और सम्मान हासिल किया।
समाजशास्त्री महेंद्र सुमन ने बताया कि गोवा मुक्ति आंदोलन के 75 वर्ष पर जो स्मारिका छपी थी, उसके प्रकाशन में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी। वे उस आयोजन में गोवा भी गए थे।
प्रोफेसर सफदर इमाम कादरी ने अमरनाथ जी के साथ के कई संस्मरण सुनाए।
उन्होंने कहा, “अमरनाथ हमारे ऐसे दोस्तों में थे। जिन्हें पहली मुलाकात से अब तक हम लोग एक दूसरे को तुम कहते थे।हम लोग सहपाठी थे। 88 में हमलोगों ने एक उर्दू अखबार की कल्पना की थी।अमरनाथ उस उर्दू अखबार के लिए हिंदी में रिपोर्ट लिखते थे।जाबिर हुसैन उस अखबार के संपादक थे। संघर्ष वाहिनी, गंगा मुक्ति आंदोलन और पत्रकारिता से जुड़ाव के साथ उसने नई धारा पकड़ी। शुरुआत में अंग्रेजी भी अच्छी नहीं थी पर मेहनत कर अंग्रेजी में भी खुद को दक्ष किया। भोजपुरी वाले अमरनाथ बंगाली, असमिया सीखते हुए अध्ययन, शोध की धुन में आगे बढ़ते गए। खुद को निर्मित करना और इस तरह देश भर में इतना नाम कमाना सबके वश की बात नहीं है।अमरनाथ फ़ुनगी पर नहीं टिके थे।उनकी जड़ धरती के नीचे काफी गहराई में तह तक धंसी हुई थी।साधारण अमरनाथ ने अपने अदम्य संघर्ष से खुद को असाधारण बनाया।यही उसके होने का आकर्षण था।उसकी यही अपनी चमक थी।”
कथाकार शिवदयाल ने कहा कि वह अमरनाथ जी को बहुत करीब से जानते थे था पर यहां आकर उनसे जिस तरह परिचित हुए, उन्हें अत्यधिक गर्व महसूस हो रहा है। हकीकत यह है कि वे मुद्दों में इस कदर डूबे रहते थे कि अपने बारे में बताने की उन्हें सुध ही नहीं रहती थी। डेढ़ दशक पूर्व उनके घर जाने पर उन्हें पहली बार मालूम चला था कि वे एक धनी परिवार में जन्मे थे पर वे अपनी वेश-भूषा, जीवन शैली में बहुत साधारण दिखते थे। अमरनाथ जी सहयात्री पत्रिका के संपादन मंडल में शामिल थे। 2005 में उन लोगों ने सहयात्री की ओर से प्रशासन पर एक अंक निकाला था और पहली बार बिहार में इस विषय पर सेमिनार हुआ था।साधारण दिखने वाले अमरनाथ जी साधारण नहीं थे।यह उनकी श्रद्धांजलि में आकर जाहिर हुआ।
शिक्षाविद ज्ञानदेव मणि त्रिपाठी ने अमरनाथ जी को प्रारब्ध से स्मरण करते हुए बताया कि अखबारी लेखन का क्रम उन दोनों का एक साथ शुरू हुआ था।लिखते -लिखते, खूब लिखना उनकी आदत थी पर काम करते हुए किसी दूसरे मुद्दे में उलझकर पिछले काम को अधूरा छोड़ देना भी उनकी प्रकृति थी।
उन्होंने कहा, “हम दोनों ने लेखन और शोध के कई कार्य साथ-साथ शुरू किए थे। उनकी इच्छा थी कि गुवाहाटी में गोपाल सिंह नेपाली की जयंती हो और प्रभाष जी आएं।अत्यधिक बारिश और जल जमाव से बाढ़ सदृश स्थिति की वजह से प्रभाष जी नहीं आ पाए पर उन्होंने कार्यक्रम को रोका नहीं। वे अपनी ध्वजा नहीं लहराते थे पर अपनी जिद को अंजाम देने के लिए पूरी तरह संकल्पित रहते थे। कॉमन स्कूलिंग सिस्टम की रिपोर्ट का उन्होंने बहुत अच्छा अनुवाद किया था।21 वीं सदी में उनमें नदियों से प्रेम जगा। नदियों से प्रेम करते हुए, नदियों के बारे में बातें करते हुए वे बहुत बेचैन होते रहते थे।उनके नाम के साथ स्वर्गीय लिखना मेरे वश की बात नहीं है।”
बीबीसी पत्रकार सीटू तिवारी ने कहा कि अमरनाथ जी एक धारा के विशेषज्ञ थे।रंजीव जी के साहचर्य में अमरनाथ जी ने पर्यावरण और नदी की धारा पर गहराई से अध्ययन किया था। उनके पास अपने विषय की गहरी जानकारी थी। इनकी अकादमिक पूंजी काफी मजबूत थी इसलिए हम सदृश पत्रकारों के लिए वे अनुकरणीय थे। सादगी के साथ, अहंकार मुक्त ,स्वार्थ मुक्त निश्चल प्रेम करने वाले अमरनाथ जी भीड़ से अलग कोटि के पत्रकार थे।
इंडिया टुडे के पत्रकार पुष्यमित्र ने कहा, “आज जब लोग अपने बारे में बताने के लिए व्याकुल रहते हैं। उनकी सबसे अच्छी खूबी यही थी कि वे अपने बारे में किसी से कुछ नहीं बताते थे।अमरनाथ जी से रंजीव जी के साथ मेरा परिचय हुआ था।मैं उन्हें पानी के विषय के पत्रकार के रूप में जानता था। वे मुझे लगातार पढ़ते रहते थे और हमारे लेखन को प्रोत्साहित करते रहते थे। रंजीव जी की मौत के बाद रंजीव जी के दस्तावेजों के ढेर से हम दोनों ने साथ मिलकर जरूरी दस्तावेज ढूंढे थे।”
पत्रकार मनीष शांडिल्य ने कहा कि सबाल्टर्न के पास उनका कुछ अनुवाद है। जो छपेगा पर अब उनकी अधूरी चीजें भी प्रकाशित होंगी। वे दस्तावेजों के संकलन में सिद्धहस्त थे। उनके संस्मरणों को संग्रहित करना एक जरूरी काम है।
जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय, बिहार की ओर से सामाजिक कार्यकर्ता उदयन रॉय ने कहा कि जब मैं जेल गया था तो मेरे प्रति उनकी सहानुभूति को मैं कभी नहीं भूल सकता हूँ। वे मुझे धैर्य से सुनते थे। किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुनते हुए वे कभी बोर नहीं होते थे। मुझे साइकिल चलाते हुए देख कर वे मुझे हर बार बहुत शाबाशी देते थे। उन्होंने कहा था कि मैं भी साइकिल चलाना चाहता हूँ।साइकिल चलाने की वजह से मुझे वे जिस तरह से सम्मान देते थे।उस सम्मान ने मुझे उनका कायल बनाया और साइकिल से मेरी मुहब्बत ज्यादा मजबूत हुई।अभी वे मिलते तो हम उनसे पूछते कि यूरोप में बढ़ते तापमान के लिए एसी को जिम्मेवार मानकर एसी के खिलाफ जो खिलाफ अभियान चल रहा है।उसके बारे मेरा ज्ञान वर्धन करिए।हजारों पेड़ों को काटकर सैकड़ों करोड़ की लागत से गरीब प्रदेश में जो बापू टावर खड़ा किया है।उसकी असलियत और अनुपयोगिता के बारे में सोचना ही अमरनाथ जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इंजीनियर संतोष यादव ने बताया कि वे सबाल्टर्न के संपादकीय समूह से जुड़े हुए थे। नदी, पानी, पर्यावरण न्याय और अनुवाद के क्षेत्र में उनका काम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।वे जनपक्षधर पत्रकारिता के सजग प्रहरी थे।
संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने उनके टोपी प्रेम की चर्चा करते हुए उनसे टोपी प्रसंग में हुए संवाद की चर्चा की।अनिल अंशुमन ने जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें जनता के हक का सच्चा पत्रकार बताया।
अध्ययनशील,शोधार्थी ,संवेदनशील, वैचारिक रूप से ईमानदार और जनपक्षधर पत्रकार के रूप में उन्हें सबने याद किया गया।
पाटलिपुत्र टाइम्स, पूर्वांचल प्रहरी के साथ जुड़े अमरनाथ जी ने जनसत्ता के पूर्वोत्तर संवाददाता रूप में काफी सम्मान हासिल किया था।कालांतर में डाउन टू अर्थ ,प्रथम प्रवक्ता, यथावत, जनचौक में नदी- पानी,पर्यावरण -विस्थापन के मुद्दे लिखते रहे।पीटीआई के साथ अनुवादक के रूप में जुड़े अमरनाथ जी ने अंग्रेजी से हिन्दी और असमिया से हिंदी में अनुवाद कर सिद्धहस्त अनुवादक की प्रतिष्ठा हासिल की।
पूर्वोत्तर विषयों के कथाकार चितरंजन भारती, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक डॉ.मनोज प्रभाकर, अंग्रेजी के प्राध्यापक डॉ.घनश्याम, पत्रकार राजेश ठाकुर, पत्रकार सुमिता जायसवाल, पत्रकार अनंत, शोधार्थी आशुतोष, सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर, श्याम बाबू सहित कई बुद्धिजीवी सभा में शरीक हुए।
पत्रकार कुलभूषण ने आग़तों के प्रति धन्यवाद प्रकट किया तो पुष्पराज ने सभा का संचालन किया। कार्यक्रम के संयोजन में अरुण नारायण ने महती भूमिका निभाई।माध्यमिक शिक्षक संघ ने सभागार उपलब्ध कराकर पत्रकारिता का मान बढ़ाया।
पुष्पांजलि के साथ श्रद्धांजलि सभा की शुरुआत हुई थी तो दो मिनट के मौन के साथ सभा का समापन हुआ।
(पटना से पुष्पराज की रिपोर्ट)