Saturday, October 1, 2022

महाराष्ट्र: लंपट गुजराती और देसी मराठी पूंजी की लड़ाई में सियासी ड्रामा चालू आहे

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महाराष्ट्र से शिवसेना के राज्यसभा सदस्य संजय राउत को केन्द्रीय वित्त मंत्रालय के एंफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट यानि ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) द्वारा गिरफ्तार करने से ऐन पहले उन्होंने दावा किया था कि राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी यानि भाजपा के समर्थन से बनी एकनाथ शिंदे सरकार अपने ही अंदरूनी कलह से गिर जाएगी।

शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता राउत ने मुंबई में मीडिया से बातचीत में कहा था,‘‘हम भाजपा की तरह लाउडस्पीकर पर तारीख नहीं देंगे। लेकिन यह सरकार निश्चित रूप से लंबे अर्से तक चलने वाली नहीं है।’’ उनका कहना था शिंदे सरकार बन जाने के माह भर बाद भी उसके जारी अंदरूनी कलह के कारण ही उसका विस्तार नहीं किया गया और ना ही उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों के बीच विभागों का बंटवारा किया जा सका है। उनके शब्दों में यह सरकार मजबूत नींव पर नहीं टिकी है और इसलिए उसका अपने ही अंतर्विरोध से गिरना अवश्य संभावी लगता है।

चंद्रकांत पाटिल

उसके एक दिन पहले शनिवार को भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा था कि उनकी पार्टी ने देवेंद्र फडणवीस के बजाय शिवसेना के बागी नेता शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भारी मन से लिया था। शिंदे सरकार में उपमुख्यमंत्री बने फडणवीस ने शिवसेना के मराठी मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक राउत को ऐसा लाउडस्पीकर बताया था जिससे लोग आजिज आ गये हैं। इस पर राउत जी ने कहा उनका लाउडस्पीकर महाराष्ट्र के लोगों की आवाज है और वह उस आवाज पर जोर देते रहेंगे। शिवसेना का लाउडस्पीकर 56 वर्षों से बज रहा है। लोग हमेशा यह जानने उत्सुक रहते हैं लाउडस्पीकर क्या बोल रहा है।

इस बीच भारत के सुप्रीम कोर्ट का एक फ़ैसला ईडी के पक्ष में आया है। कोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लाउंड्रिंग एक्ट यानि पीएमएलए के उसके किसी से पूछताछ, गिरफ़्तारी और संपत्ति ज़ब्त करने के अधिकार को सही ठहराया है। कोर्ट ने इस क़ानून के तहत ज़मानत मिलने के कड़े प्रावधानों को भी बरक़रार रखा है।

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी

उधर, लगभग तय हो गया है कि महाराष्ट्र के तीन बरस से राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अब और आगे राज्य में नहीं रहेंगे। यह स्थिति कथित रूप से उनके द्वारा महाराष्ट्र की अस्मिता को ठेस पहुंचाने के बाद उत्पन्न हुई है। शिवसेना ही नहीं बल्कि भाजपा और एकनाथ शिंदे के बागी शिवसेना गुट की भी महाराष्ट्र अस्मिता का सम्मान करने की मजबूरी है। कोश्यारी के दिए गए स्पष्टीकरण के बावजूद राज्य में हावी मराठी सियासत में बवाल मचा हुआ है। इसकी परिणति मोदी सरकार द्वारा कोश्यारी को राज्य के राज्यपाल पद से हटाकर किसी और प्रदेश में भेजने में हो सकती है। बीते तीन बरसों में भगत सिंह कोश्यारी ने पहले भी कुछेक बार अपने बयानों से ऐसी ही स्थिति पैदा की है जिससे महाराष्ट्र की अस्मिता को ठेस पहुंची है। मगर, इस बार मामला संगीन नजर आता है।

राज्यपाल कोश्यारी ने 29 जुलाई को मारवाड़ी समाज के एक कार्यक्रम में कहा कि महाराष्ट्र से, खासतौर से मुंबई और ठाणे से गुजराती और राजस्थानी समाज के लोग दूर जाने का फैसला कर लें, तो यहां का सारा पैसा खत्म हो जाएगा और मुंबई देश की आर्थिक राजधानी रह ही नहीं जाएगी। बाद में उनकी जो सफाई आयी इसमें कहा गया कि वे मराठी को कम नहीं आंकते।

उद्धव ठाकरे ने दो टूक कहा राज्यपाल कोश्यारी को वापस या जेल भेजा जाए। यह तय करने का वक्त आ गया है। उन्होंने कोल्हापुरी चप्पल देखने-दिखाने की बात भी कही।

उद्धव ठाकरे।

मुख्यमंत्री शिंदे, उपमुख्यमंत्री फडनवीस से लेकर सोनिया गांधी की कांग्रेस, शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी समेत किसी भी पार्टी के किसी भी नेता ने राज्यपाल कोश्यारी का बचाव नहीं किया। वह यह बयान देकर फंस चुके और अकेले पड़ गये हैं। मुख्यमंत्री शिंदे ने कोश्यारी जी के बयान से अपना पल्ला झाड़ लिया है और कहा है कि यह उनका निजी बयान है।

बतौर राज्यपाल कोश्यारी जी ने भाजपा की कई बार खूब सियासी मदद की चाहे वह रात के अंधेरे में अल्पमत की देवेंद्र फडणवीस सरकार और उसके मंत्री के रूप में तब एनसीपी के बागी नेता अजित पवार को शपथ दिलाने का मामला हो या फिर उद्धव ठाकरे सरकार को अल्पमत में आ जाने के अपने निष्कर्ष का आधार ई-मेल बनाना हो या फिर शिंदे सरकार का गठन में हामी भरने का मामला हो।  

महाराष्ट्र विधानसभा, बृहन्मुंबई महानगर निगम यानि बीएमसी और ठाणे महानगरपालिका के भी चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में मोदी सरकार और उनकी भाजपा महाराष्ट्र अस्मिता के मुद्दे पर विपक्ष को हावी नहीं होने देगी। पिछली महाविकास अघाड़ी सरकार यानि एमवीए का जन्म मराठी अस्मिता के नाम पर क्षत्रपों की एक छतरी तले आ जाने से हुआ। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कई बार मुख्यमंत्री रहे और पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार ही नहीं बल्कि कांग्रेस के मराठा नेताओं के समर्थन से इस नए गठबंधन और उसकी सरकार का नेतृत्व किया। इस सरकार को गिराने में भी मराठा अस्मिता की भूमिका रही।

एकनाथ शिंदे के खिलाफ बोलने कोई मराठा नेता सामने नहीं आया और न ही शिंदे या उनके गुट ने कभी किसी मराठी नेता पर शाब्दिक प्रहार किया। भाजपा ने भी मराठी अस्मिता से नहीं टकराने की सियासी मजबूरी के कारण ही पहले एक बार मुख्यमंत्री रह चुके देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री बनाया है। भाजपा अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाती तो मराठी एकजुटता फिर पैदा होने का खतरा था।

हयात होटल में विधायकों के साथ शरद।

एकनाथ सरकार बन जाने के बाद भाजपा के प्रांतीय नेता किरी सोमैया ने उद्धव ठाकरे पर शाब्दिक प्रहार कर उन्हें माफिया लीडर की संज्ञा दी तो मुख्यमन्त्री शिंदे ने इसका कड़ा विरोध किया। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के सख्त निर्देश पर सोमैया को अपना वह बयान वापस लेना पड़ा।

वैसे, शिवसेना शासित बृहन्मुंबई महानगरपालिका की 2009 में तैयार मानव विकास रिपोर्ट में 2001 की जनगणना के हवाले से बताया गया था कि बृहन्मुंबई में गुजरातियों की आबादी 9.58 फीसद और राजस्थानियों की आबादी 3.87 फीसद है। उद्योग-व्यवसाय में उनका योगदान इनकी आबादी के अनुपात से बहुत ज्यादा है। मुंबई में 60 से 65 फीसद कंपनियां गुजरातियों और राजस्थानियों के हैं। उनकी हिस्सेदारी थोक व्यापार में 70 फीसद और खुदरा व्यापार में 60 फीसद हैं। विभिन्न कारणों से मुंबई और इसके आसपास की औद्योगिक इकाइयां बंद हो गईं हैं फिर भी उनमें 40 फीसद हिस्सेदारी उन्हीं तबकों की है।

करीब 80 फीसद रोजगार गुजराती और राजस्थानी उद्योगपति और व्यापारी ही उपलब्ध कराते हैं। बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, एफएमसीजी प्रोडक्शन और आयात-निर्यात में 50 फीसद बाजार इन्हीं के अधीन है। डायमंड, गोल्ड, टेक्सटाइल,  मेटल, अनाज एवं तेल जैसे बाजारों पर तो 90 फीसद मारवाड़ी, गुजराती काबिज हैं।  बहरहाल,जैसे हम आर्थिक मामलों के अध्येता और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट मुकेश असीम के एक अध्ययन के पहले भी लिख चुके हैं मूल लड़ाई मराठी-देसी पूंजी और लंपट गुजराती पूंजी की है जिसमें अधिकतर सियासी नेता सिर्फ मोहरे हैं।

(सीपी नाम से चर्चित आजाद सहाफी,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता और पुस्तक लेखन करते है।)

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