Wednesday, August 10, 2022

आर्थिक सर्वे बताता है कि और चौड़ी होगी अमीरों और गरीबों के बीच की खाईं

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आर्थिक सर्वेक्षण देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ का लेखा जोखा पेश करता है। इसलिए सबकी निगाह उसी तरफ लगी रहती है। देश जिस राह में चल रहा है और चलना चाहता है उसकी एक बानगी उसमें दिखाई देती है। चुनौतियां क्या हैं? राहें कौन-कौन सी हैं? हम सब की नुमाइंदगी करने वाली सरकार इस खुली किताब के माध्यम से, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों के बीच से देश को विकास के किस पथ पर ले जाना चाहती हैं-बताती है। कुछ के लिए ये तो एक कुंडली जैसी है जो कि आगामी बजट में होने वाले परिवर्तनों का आभास दे देती है। तो जानने कि व्यग्रता तो होनी ही है ।

2021-22 के आर्थिक सर्वेक्षण ने स्पस्ट कर दिया है की देश की आर्थिक डगर, काटों भरी होगी लेकिन समाधान भी होंगे। नवउदारवाद के कांटे अर्थव्यवस्था को चुभोते रहेंगे-चुनौतियां देंगे। विकास की दौड़, बाजार और उसकी मांग की समस्याएं एवं दशायें, समाधान के कुछ चिरपरिचित कदम आने वाले वर्ष में और बजट में दिखाई देंगे। अब इस सारांश को आर्थिक सर्वेक्षण के चश्मे से देखने, जानने और समझने की जरूरत है।

नवउदारवाद की सबसे बड़ी चुनौती विकास दर को बढ़ाने की होती है। हमारी सरकार की भी यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। 2021-22 में विकास दर 9.2 प्रतिशत रहेगी -ऐसा सरकार का अनुमान है। अगले वित्तीय वर्ष अर्थात 2022-23 में इसके 8 से 8.5 रहने का अनुमान है। स्पस्ट है ‘ग्रोथ’ दर कम होगी । फिर भी सरकार इससे खुश ही होग । सरकार मानती है की आर्थिक गतिविधियां -कोविड पूर्व की स्थिति पर आने वाली हैं। यह सरकार और देश के लिए एक शुभ स्थिति को व्यक्त करता है। ऐसा कैसे होगा? टीकाकरण ने सरकार की मुश्किल और चुनौतियों को कम कर दिया है। आपूर्ति की चुनौतियों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया है। ‘पूर्ति’ में सुधार हुआ है और सरकार मानती है कि सरकार की ‘पूर्ति पक्ष प्रबंधन’ ने लाभांश देना शुरू कर दिया है । यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह उभरा है कि आर्थिक सर्वेक्षण ने यह माना है कि सरकार ने ‘मांग पक्ष’ कि बजाय अब तक पूर्ति पक्ष पर ज्यादा ध्यान दिया था।

सरकार ने कोविड के दौरान जो भी आर्थिक नीतियाँ-रीतियां अपनाई, उसने जो भी मदद दिया वह सब कारोबारियों और उद्योगपतियों को समर्पित था। सरकार अब भी ऐसा ही करेगी। पिछले वर्ष आम जनता के हाथ में प्रत्यक्षतः कोई क्रयशक्ति सरकार के द्वारा नहीं दी गई थी। ऐसा ही इस वर्ष भी होने की सम्भावना है । दूसरी एक महत्वपूर्ण बात जो सरकार ने बताई है वह है कि निर्यात बढ़ा है और सरकार कि राजकोषीय स्थिति में सुधार हुआ है। इसके परिणाम क्या होंगे । करों में परिवर्तन हो सकते हैं। लेकिन परिवर्तन कितना और कैसा होगा यह राजकोषीय स्थिति पर निर्भर करेगा । परन्तु यह तय है कि पूंजीगत व्यय में वृद्धि होगी । यह सबसे आवश्यक भी है । यदि यह व्यय बढ़ा तो मांग और रोजगार में वृद्धि को सहारा मिलेगा । इसकी कमी पिछले वर्षों में महसूस की जा रही थी ।सरकार इससे  निजी निवेशकों को भी प्रोत्साहित करना चाहती है । इसका प्रभाव ‘ग्रोथ’ बढ़ने पर सकारात्मक होगा ।

निजी निवेश को वित्तीय प्रणाली में सुधार के कारण भी सहयोग मिलने कि सम्भावना है  सरकार ने बताया है कि वर्ष 2020-21 में कोरोना काल में सरकार के राजस्व का घाटा ज्यादा था और कर्ज का बोझ भी बढ़ गया था । लेकिन उसने यह अनुमान किया है कि 2021-22 में इस स्थिति में सुधार होगा जिसके परिणामस्वरूप उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी। मजबूत वित्तीय स्थिति कई बातों का संकेत देती है । कर व्यवस्था में परिवर्तन हो सकते हैं या सामाजिक कल्याण के कामों पर सरकार का खर्च बढ़ सकता है या सरकार स्वयं द्वारा निवेश कर सकती है। इन सब कार्यों पर सरकार का खर्च बढ़ेगा कि नहीं, सब इस बात पर निर्भर करेगा कि वित्तीय स्थिति कि मजबूती कितनी और कैसी है? किन्तु सरकार प्रत्यक्ष निवेश करेगी इसकी संभावना सबसे कम  है। क्योंकि मोदी सरकार अभी तक निजी निवेश को ही प्रोत्साहित करती आयी है। सरकार कि सबसे बड़ी खुशी इस बात में है कि देश में विदेशी मुद्रा का भंडार यथेष्ट है। अतः भविष्य में किसी तरह कि अस्थिरता कि संभावना कम है। वित्तीय स्थिति को बजबूत करने के लिए सरकार विनिवेशीकरण की नीति को बढ़ावा देती रहेगी।

सरकार कि आय बढ़ने का यह एक पक्का जरिया बना रहेगा। एयर इंडिया का सौदा सफल रहा-सरकार खुश है। इसलिए ऐसे और भी सौदों को अमलीजामा पहनाने कि कोशिशें जारी रहेंगी। आर्थिक सर्वेक्षण ने सरकार कि चिंताओं को भी बता दिया है। कीमतों का बढ़ना उसकी सबसे बड़ी चिंता भी है और उसके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भी। इससे निपटने के लिए सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने कि कोशिश करेगी। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल के बढ़ते दाम और उसके परिणाम स्वरूप कीमतों कि वृद्धि, उसकी अभी तक कि सबसे गंभीर समस्या है और एक अनबूझ  पहेली भी। भविष्य में बढ़ने वाले दामों से जनता द्वारा उसे कलंकित न किया जा सके, इससे अपने को बचाने के लिए, स्वयं को सतर्क रहने कि नसीहत भी दी गई है। इसी तरह तिलहन और दलहन के दामों में होने वाली वृद्धि को इनका घरेलू उत्पादन में वृद्धि करके लोहा लेने कि रणनीति अपनाने का संकल्प व्यक्त किया गया है। बागवानी के विस्तार का भी सुझाव व्यक्त किया गया है। एक और महत्वपूर्ण संकल्प यह है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाली विभीषिका से अपने और विश्व को बचाना है। इसके लिए भारत 2070 तक शून्य उत्सर्जन कि नीति को अपनाएगा और धनराशि के लिए आग्रह बनाये रखेगा ।

आर्थिक समीक्षा के निहितार्थ क्या हैं? सरकार अपनी आर्थिक नीतियों पर चलती रहेगी। उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं होगा। सरकार द्वारा अपनी नीतियों की सफलता की स्वीकारोक्ति इस बात को स्थापित करती है। सरकार ने स्वीकारा है कि पूर्ति पक्ष की नीति सफल रही। अर्थात भविष्य में भी उद्योगपतियों, व्यापारियों को नीतियों और साधनों की पूर्ति में प्राथमिकता होगी। सरकार निवेश नहीं करेगी। अपितु विनिवेश को बढ़ावा देने की नीति पर चलती रहेगी। विदेशी निवेश और निवेशकों को प्राथमिकता होगी। ‘मांग पक्ष’ की अनदेखी बरक़रार रहेगी अर्थात आम आदमी की प्रत्यक्ष रूप से क्रयशक्ति में वृद्धि नहीं की जाएगी। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जायेगा। सरकार नवउदारवाद के सर्वोच्च उद्देश्य की अर्थव्यवस्था में ‘वृद्धि’ को बढ़ावा दिया जाए को जोर शोर से मजबूती देगी।

आर्थिक सर्वेक्षण बजट में क्या होने वाला है का संकेत भी करता है। सरकार राजकोषीय घाटा कम कर अपने खर्च को सीमित कर सकती है जिससे महंगाई रुके। स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकार के प्राथमिकता वाले क्षेत्र होंगे। करों की व्यवस्था में तार्किक सुधार करने की कोशिश हो सकती है। निजी निवेशकों को बढ़ावा मिल सकता है। सरकार जन कल्याण के कुछ कदम ले सकती है। विनिवेश के माध्यम से राजस्व एकत्र करने की नीति पर सरकार चलती रहेगी। सरकार का ध्यान छोटे उद्योगों, कृषि क्षेत्र के उद्धार पर भी जा सकता है। शून्य उत्सर्जन की नीति को सफल करने के लिए कुछ निर्णय लिए जा सकते हैं। ये सब परिवर्तन सम्भाव्य है। लेकिन एक लक्ष्य अपरिवर्तनीय है- भारत में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की स्थापना के सच को सच साबित करना। एक रात्रि का इंतजार कीजिये और इस सच को बजट में सच होते देखिये।

(लेखक विमल शंकर सिंह, डीएवीपीजी कॉलेज, वाराणसी के अर्थशात्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे।)

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