Monday, December 5, 2022

तकनीक के शैतान की उपज है पराली समस्या

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धान की फसल कटते ही पूरे देश में प्रदूषण का शोर सुनाई देने लगा। राजधानी दिल्ली में तो दमा के मरीज़ हाय हाय करने लगे और सारा दोष आस-पास के राज्यों यानि पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के किसानों के सिर मढ़ दिया गया। या यूं कहें कि एक स्वर में उत्तर प्रदेश, पंजाब व हरियाणा के किसानों को खलनायक बना डाला गया।

धान की फसलों की कटाई के बाद पिछले दस सालों की तर्ज पर एक बार फिर मीडिया किसानों को प्रदूषण फैलाने वाला विलेन बताने में जुटा है। वहीं हर साल की भांति पराली मामला एक बार देश के सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।

जैसा कि भाजपा शासित तमाम राज्यों का चरित्र है, उत्तर प्रदेश में किसानों का अपराधीकरण कर उन पर दंडात्मक कार्रवाई करने पर सरकार और प्रशासन का पूरा ज़ोर है। देवरिया जिले में पराली जलाने वाले दो किसानों से 2500-2500 रुपये जुर्माने के तौर पर वसूला गया। इसके अलावा तीन कंबाइन हार्वेस्टर भी सीज कर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ के कर्मक्षेत्र यानि गोरखपुर जिले में किसानों को सीधे चेतावनी दी गई है कि अगर खेत में पराली जलाई तो किसानों को मिलने वाली कृषि विभाग से समस्त सम्मान निधि समाप्त कर दी जाएगी। सरकार का मानना है कि पराली जलाना वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बनता है जिसको लेकर सरकार काफी सख्त है।

बता दें कि एक सप्ताह पूर्व ज़ारी हुये उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के निर्देशानुसार, उत्तर प्रदेश में खेतों में कृषि अवशेष या कचरा जलाते हुए पकड़े जाने पर दो एकड़ से कम के खेतों के लिए 2500 रुपये, दो-पांच एकड़ के लिए 5,000 रुपये और पांच एकड़ से अधिक के खेतों के लिए 15,000 रुपये का जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है।

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हंसिया से धान कटे खेत की है जहां जमीन से बिठाकर काटने के चलते पराली का नामों निशान नहीं है।

बात उत्तर प्रदेश के किसानों की करें तो यहाँ अधिकांश किसानों के पास 2 एकड़ से कम ज़मीन है और ये किसान या तो अपने परिवार के साथ खेती का काम करते हैं या फिर समुदाय के बीच हूंड़ा पर खेती का काम करते हैं यानि एक दूसरे के खेतों में श्रम के बदले श्रम करते हैं। ऐसे में उन्हें अपने खेतों में कंबाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनें उतारने की ज़रूरत नहीं होती। पांच एकड़ या अधिक खेत वाले तथा केवल श्रम से परहेज़ करने वाले खेतधारकों को ही कटाई के लिये मशीनों की ज़रूरत होती है। लेकिन अधिकांशतः या तो उनके खेत दूसरी जातियों के किसान बटाई पर जोत लेते हैं या फिर उनके खेतों में लोग बाग पुआल की कीमत पर धान की फ़सल काट सटक लेते हैं तो ऐसे में उन्हें भी अपने खेतों में हार्वेस्टर उतारने की ज़रूरत नहीं पड़ती है।

वहीं एक दूसरी स्थिति खलार व ताल तराई के खेतों में पैदा होती है जहां धान की फ़सल डूबने के चलते किसान धान की बालियाँ ऊपर ऊपर बलौच लेते हैं। बाद में खेत का पानी निकालने के बाद पराली अगर सड़ने से बची हुई है तो किसान उसे जला देते हैं लेकिन इसकी तादाद बहुत कम है। इस तरह उत्तर प्रदेश में हरियाणा व पंजाब की अपेक्षाकृत पराली लगभग नहीं के बराबर ही खेतों में बचता है जिसे कि भाग में जलाने की ज़रूरत हो।

वहीं हरियाणा, पंजाब के किसानों की मजबूरी यह है कि अगली फसल की तैयारी के लिए उनके पास समय कम होता है, सात दिन का समय होता है, धान की कटाई व गेहूं की बिजाई में, क्या सात दिन में पराली को ठिकाने लगाना संभव है। दूसरी तरफ पराली को इकट्ठा करने में ख़र्चा भी आता है। पंजाब में 80 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम ज़मीन वाले हैं, वह तीन लाख रुपये का ट्रैक्टर व मशीनरी कैसे ख़रीद सकते हैं।

किसानों को पराली प्रबंधन के लिए 2 हजार रुपये प्रति एकड़ जेब से ख़र्च करने पड़ते हैं किसान पैसा नहीं ख़र्च करते हैं क्योंकि अधिकतर छोटे किसान ज़मीन को ठेके पर लेकर खेती करते हैं। अगर पराली न जलाई जाए तो खेतों में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और खेतों में ट्रैक्टर से जुताई में कई गुना समय लगता है। वहीं सरकार ज़मीनी स्तर पर दो मशीनों को पांच-पांच गांवों को दिया जाता है, जो सात दिन में पराली को खत्म नहीं कर सकती। उसको भी बड़े किसान इस्तेमाल करते हैं जबकि 80 फीसदी छोटे किसान हैं।

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पानी से डूबे ताल के खेत की है  जहां पराली बहुत कम मात्रा में है जो पलेवा करके जोतने के बाद खेत में मिल जाती है।

अखिल भारतीय किसान मज़दूर सभा के किसान नेता आशीष मित्तल पराली की समस्या को तकनीकि से उपजी समस्या बताते हुए कहते हैं – पराली की समस्या दरअसल तकनीकि से उपजी समस्या है। पहले जब किसान हसिया से धान काटते थे तो वो बिल्कुल ज़मीन से बैठाकर काटते थे। तो पराली इतनी नहीं निकलती थी। जो थोड़ी बहुत होती थी तो खेत जोतकर पलेवा कर देते थे तो सड़ जाता था और वह खाद के रूप में काम करती थी।

लेकिन अब धान की फ़सलें पहले से ही लेट हो रही है, किसान के पास समय नहीं है। पहले खेतों को जो एक डेढ़ महीने का समय मिलता था अब वो नहीं मिल रहा है।

आशीष मित्तल पराली के लिये हार्वेस्टर को जिम्मेदार बताते हुए आगे कहते हैं कि अब कंबाइन हार्वेस्टर से धान के फसल की कटाई के चलते खेतों में पराली छूट रही है। किसान एक बार धान की फसल की कटाई के लिये पैसे ख़र्च करे फिर दोबारा पराली काटने के लिये श्रम व पैसे खर्च करे तो ये संभव नहीं है अतः किसानों को सबसे आसान और सस्ता तरीका पराली जलाना नज़र आता है। या तो सरकार पराली काटने में होने वाला खर्च वहन करे जो कि सरकार नहीं कर रही है।

आशीष मित्तल प्रदूषण के मिथ पर कहते हैं कि पराली से पर्यावरण में प्रदूषण की अफवाह फैलायी गई है जबकि सबसे ज़्यादा प्रदूषण कंस्ट्रक्शन से हो रहा है। ठंड के चलते माइक्रोपार्टिकल्स कुहरे की चादर पर बैठ जाते हैं जिससे कंस्ट्रक्शन से पैदा होने वाला धूल गर्दा तथा कंपनियों से पैदा होने वाला केमिकल व गैस वातावरण में बढ़ जाती है और सारा दोष पराली व किसानों पर मढ़ दिया जाता है।

क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष डॉ. दर्शन पाल पराली के मसले पर कहते हैं कि पराली जलाना हमारा शौक नहीं है। धान की फसल पर पहले ही बहुत अधिक ख़र्च आता है। अगर सरकार के बताये तरीके से पराली से निपटने के लिए मशीनों का इंतजाम भी कर लिया जाये तो भी प्रति एकड़ पांच से छह हजार रुपये का ख़र्च आता है, वह कौन वहन करेगा? वो आगे कहते हैं कि किसानों की मज़बूरी यह है कि अगली फसल की तैयारी के लिए समय कम होता है, तो दूसरी तरफ पराली को इकट्ठा करने में खर्चा भी आता है। किसानों में हो रहे सकरात्मक बदलाव को रेखांकित करते हुए वो आगे कहते हैं कि पराली को लेकर जागरूकता आ रही है लेकिन समय लगेगा। किसान को हमेशा फसल प्यारी होती है, पराली को साफ नहीं करेगा तो गेहूं की फसल में सूंडी पैदा होने का ख़तरा मँडराता रहता है।

सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरमेंट में वायु प्रदूषण पर लम्बे समय से शोध कर रहे विवेक चट्टोपाध्याय पराली से प्रदूषण के मिथ पर कहते हैं कि दिल्ली की हवा में पराली की हिस्सेदारी काफी कम है। वो बताते हैं कि स्थानीय प्रदूषण बढ़ने के साथ ही रात के समय तापमान कम होने से हवा में मौजूद प्रदूषण 200 मीटर से ज्यादा ऊंचाई तक जा ही नहीं रहा है। वहीं दिन में गर्मी के चलते प्रदूषण तत्व 1200 मीटर से ज्यादा ऊंचाई तक नहीं जा रहे हैं। ऐसे में जिस ग्राउंड एयर जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसमें प्रदूषण का स्तर बेहद ख़तरनाक स्तर पर पहुंच रहा है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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