Thursday, October 6, 2022

आरएसएस के मिटाए से न मिट सकेगा जलियाँवाला बाग

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जलियाँवाला बाग को ज़्यादा खूबसूरत बनाने के नाम पर उन निशानियों को मिटाया जा रहा है जिसकी वजह से 1919 में हुए खूनी जनसंहार को आज तक याद रखा गया। प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार 29 अगस्त को इसके नए स्वरूप का दिल्ली में बैठकर उद्घाटन किया। ग्लोबल एंड इंपीरियल हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर किम ए. वैगनर ने इस पर एतराज जताया है। इसके अलावा देश में भी प्रबुद्ध लोगों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

अमृतसर का जलियाँवाला बाग भारत के लोगों के दिलो दिमाग़ पर छाया हुआ है। इससे पहले यहाँ जब जब भी जीर्णोद्धार का काम हुआ, इस बात का हमेशा ख़्याल रखा गया कि जलियाँवाला बाग के मूल चरित्र में कोई बदलाव नहीं आए।

इस बार वहाँ जो जीर्णोद्धार का काम हुआ, उसकी आड़ में उस रास्ते की निशानी को ख़त्म कर दिया गया, जिस पतली गली से जनरल डायर उस जगह घुसा और निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया था। अब उस पतली गली को सजाकर उसमें महिला-पुरुषों की कलाकृति लगा दी गई है और ज़बरदस्त लाइटिंग कर दी गई है। आने वाली पीढ़ी के लोग जब कभी जलियाँवाला बाग आएँगे तो उन्हें यह बताने वाला कोई नहीं होगा कि इस रास्ते से कभी जनरल डायर गुजरा था और उसने वो ख़ूँख़ार आदेश जारी किया था। लोगों के लिए वो कलाकृतियाँ होंगी जिसे तेज रोशनी में निहारते हुए लोग आगे बढ़ जाएँगे।

अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक़ जलियाँवाला बाग के नए स्वरूप का काम पीडब्ल्यूडी की देखरेख में हुआ, जिसका देश के गौरवशाली इतिहास से लेनादेना नहीं है। आमतौर पर अभी तक भारतीय पुरातत्व विभाग ऐसे काम कराता रहा है लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि पीडब्ल्यूडी से एक राष्ट्रीय हेरिटेज साइट का काम कराया गया है।

इतिहासकार किम ए. वैगनर का कहना है कि जलियाँवाला बाग के मूल स्वरूप से पहले भी छेड़छाड़ हुई है लेकिन ऐसी कोशिश नहीं हुई कि उसके मूल चरित्र को ही मिटा दिया जाए। अपनी किताब जलियाँवाला बाग में उन्होंने कभी लिखा था कि भारत जब आज़ाद हुआ तो इस जगह इसके मूल रूप में रखा जाना चाहिए था लेकिन जगह को खूबसूरत बनाने के चक्कर में छेड़छाड़ होती रही। अब जो हुआ वह मुझे स्तब्ध कर गया है।

यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के फ़ाउंडर अमनदीप मादरा ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के पत्र की प्रति साझा करते हुए कहा है कि शुक्र है ऐसी घटनाएँ ऐसे पत्रों के ज़रिए सुरक्षित रहेंगी, बेशक अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान को जलियाँवाला बाग से क्यों न मिटा दिया जाए। इतिहास ने दर्ज किया है कि 1919 में अमृतसर की इस घटना के विरोध में टैगोर ने वायसराय को अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी थी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह पत्र आज भी सुरक्षित है और जलियाँवाला बाग में अंग्रेजों की हरकत बताने के लिए काफ़ी है।

आरएसएस के लोगों पर अंग्रेजों की मुखबिरी के आरोप प्रमाण सहित सामने आ चुके हैं। लोग सोशल मीडिया पर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या आरएसएस ने अंग्रेजों से कोई गुप्त समझौता किया था जिसमें जनरल डायर के पाप धोने का वादा किया गया था? याद रखिए, एक दिन यही संघी रणनीतिकार भगत सिंह की शहादत की निशानियों को भी मिटा देंगे।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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