Thursday, October 6, 2022

बेरोजगारी की दर 7.80%, तो 97 करोड़ से ज्यादा लोगों को स्वस्थ आहार का घोर अभाव

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थिंक टैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि देश में बेरोजगारी की दर जून में मासिक आधार पर 0.68% बढ़कर कुल वर्क फोर्स के 7.80% पर पहुंच गई है, जो मई में 7.12% के स्तर पर थी। बेरोजगारी दर में यह इजाफा मुख्य रूप से गांवों में बेरोजगारी की दर में बढ़ोतरी के कारण हुआ है, जो जून में मासिक आधार पर 1.41% बढ़कर 8.03% दर्ज हुई है।

वहीं संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी 22 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो कुपोषित हैं। 97 करोड़ से ज्यादा लोगों को स्वस्थ आहार (हेल्दी डाइट) नहीं मिल रहा है। चीन में स्वस्थ आहार नहीं ले पाने वालों की संख्या भारतीयों से 5 गुना कम है।

2022 में बेरोजगारी की बात करें तो शहरी बेरोजगारी दर जून में मासिक आधार पर 0.91% बढ़कर 7.30% दर्ज हुई है। यह बीते एक साल में इसका सबसे कम आंकड़ा है। मई में यह 8.21% के स्तर पर थी। सीएमआईई (CMIE) के एमडी महेश व्यास कहते हैं कि, जून के दौरान लगभग 1.3 करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं। जबकि बेरोजगारों की संख्या में महज 30 लाख की बढ़ोतरी हुई, क्योंकि बाकी लेबर मार्केट से बाहर हो गए। इसने श्रम भागीदारी दर (LPR) को जून में सबसे कम 38.8% पर ला दिया। यह इससे पिछले दो महीनों (अप्रैल-मई) में 40% थी।

रोजगार में यह तेज गिरावट चिंताजनक है। कृषि क्षेत्र में जून में लगभग 80 लाख लोगों ने रोजगार छोड़ा है, क्योंकि जून माह में देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से कम हुई। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों की बुआई का काम रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। खेती-किसानी में मजदूरी करने वालों की तैनाती में देरी होने से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ी है। इस दौरान 40 लाख लोगों को काम भी मिला, जो 2020 और 2021 में समान अवधि के मुकाबले कम था। आने वाले हफ्तों में मानसून के तेज होने से श्रमिकों की भागीदारी में सुधार हो सकता है।

आंकड़ों के अनुसार, बेरोजगारी की सबसे ऊंची दर हरियाणा में 30.6 प्रतिशत रही। इसके बाद क्रमश: राजस्थान में 29.8 प्रतिशत, असम में 17.2 प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर में 17.2 प्रतिशत और बिहार में 14 प्रतिशत रही। व्यास ने कहा है कि, यह चिंताजनक है कि इतनी बड़ी संख्या में कामगारों पर मानसून का असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि दूसरा चिंताजनक आंकड़ा जून, 2022 में वेतनभोगी कर्मचारियों की 25 लाख नौकरियों घटने का है। जून में वेतनभोगी नौकरियों में कमी को लेकर भी चिंता बढ़ी है। सरकार ने सशस्त्र बलों की मांग को कम कर दिया और निजी इक्विटी-वित्त पोषित नौकरियों में अवसर भी कम होने लगे। केवल अच्छे मानसून से ये नौकरियां नहीं बच सकतीं हैं। अर्थव्यवस्था को इस तरह की नौकरियों को बचाने और उत्पन्न करने के लिए निकट भविष्य में तेज गति से वृद्धि की जरूरत है।

दूसरी तरफ हम स्वस्थ आहार की बात करें तो दुनिया में हर 10 में से 3 कुपोषित भारतीय हैं, खाना इतना महंगा कि 97 करोड़ लोग हेल्दी डाइट नहीं ले पाते हैं।

जबकि सच है कि दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं-चावल का उत्पादन करने में भारत दूसरे नंबर पर है और यहां 70 फीसदी से ज्यादा लोगों को हेल्दी डाइट नहीं मिलना कितना दुर्भाग्य पूर्ण है।

ये जानकारी संयुक्त राष्ट्र की ‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2022’ की इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक दुनियाभर में 307.42 करोड़ लोग ऐसे थे जिन्हें हेल्दी डाइट नहीं मिल रही थी। यानी, दुनिया की 42 फीसदी आबादी स्वस्थ आहार नहीं ले पा रहा है। वहीं, भारत में स्वस्थ आहार नहीं लेने वालों की संख्या 97.33 करोड़ है। इस हिसाब से 70 फीसदी भारतीयों को स्वस्थ आहार नहीं मिल रहा है।

इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि हर दिन एक व्यक्ति स्वस्थ आहार लेता है तो उसे कितना खर्च करना होगा? इसमें बताया गया है कि भारत में एक दिन एक व्यक्ति स्वस्थ आहार लेता है, तो उसे इसके लिए 2.9 डॉलर यानी 235 रुपये से ज्यादा खर्च करना होगा। इस हिसाब से हर दिन हेल्दी डाइट लेने के लिए हर व्यक्ति पर हर महीने 7 हजार रुपये से ज्यादा का खर्च आएगा। जो यह बताता है कि महंगा खाना होने की वजह से लोग स्वस्थ आहार नहीं ले पा रहे हैं।

हालांकि, ये रिपोर्ट ये भी कहती है कि भारत में हालात सुधर रहे थे, लेकिन कोरोना महामारी ने इस पर ब्रेक लगा दिया। 2017 में 75% भारतीयों को स्वस्थ आहार नहीं मिल रहा था। 2018 में ये संख्या कम होकर 71.5% और 2019 में 69.4% पर आ गई, लेकिन 2020 में ये आंकड़ा फिर बढ़कर 70% के पार चला गया।

भारत में ये समस्या कितनी बड़ी है, इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि हमसे ज्यादा आबादी चीन की है, लेकिन वहां हेल्दी डाइट नहीं लेने वालों की संख्या भारतीयों की तुलना में 5 गुना कम है. चीन में 17 करोड़ से भी कम लोग ऐसे हैं, जो स्वस्थ आहार नहीं ले पा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 15 साल में कुपोषित लोगों की संख्या कम तो जरूर हुई है, जबकि दुनिया में कुपोषित भारतीयों की संख्या बढ़ गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2004-06 में 24.78 करोड़ लोग कुपोषित थे, जिनकी संख्या 2019-21 में घटकर 22. 43 करोड़ हो गई। लेकिन 2004-06 में दुनियाभर के कुल कुपोषितों में 31% भारतीय थे, जबकि 2019-21 में भारतीयों की संख्या बढ़कर 32% हो गई।

इतना ही नहीं, अभी भी भारत में 5 साल से कम उम्र के 2 करोड़ से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन ऊंचाई के हिसाब से कम है। जबकि, 5 साल से छोटे 3.6 करोड़ से ज्यादा बच्चे ठिगने हैं।

पिछले साल नवंबर में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 6 से 23 महीने के सिर्फ 11.3% बच्चे ही ऐसे हैं, जिन्हें पर्याप्त आहार मिल पाता है।

अमेरिका की फॉरेन एग्रीकल्चर सर्विस (FAS) का कहना है कि दुनिया में सबसे ज्यादा चावल और गेहूं का उत्पादन चीन के बाद भारत में होता है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक, 2021-22 में भारत में करीब 13 करोड़ टन चावल और 11 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ था।

भारत में नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत गरीबों को सस्ती दरों पर अनाज मिलता है। मार्च 2020 से केंद्र सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ गरीबों को हर महीने 5 किलो अनाज मुफ्त दे रही है। ये योजना सितंबर 2022 तक लागू है। इस पर सरकार 3.40 लाख करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है।

सभी सरकारी स्कूलों में पहली से 8वीं तक पढ़ने वाले या 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को दोपहर का खाना मुफ्त दिया जाता है। अब इस योजना का नाम मिड-डे मील स्कीम से बदलकर पीएम-पोषण स्कीम कर दिया गया है। पीएम-पोषण के तहत, 2021-22 से 2025-26 तक 1.31 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

बावजूद ऐसी स्थिति का होना व्यवस्थागत भ्रष्‍टाचार की ओर इशारा करता है।

हम आए दिन सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं में हो रहीं लूट की खबरों को सुर्खियां बनते देखते हैं कि कैसे प्रशासनिक, राजनीतिक और बिचौलियों की मिलीभगत से इन जन-कल्याणकारी योजनाओं की अवधारण को तार तार किया जा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ सरकार की नीतियों में रोजगार की किसी तरह का मजबूत संरचना का भी घोर अभाव है।

केवल सत्ता में बने रहने के लिए हर तरह के अलोकतांत्रिक कदम सरकार की प्राथमिकता बन गई है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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