Wednesday, December 7, 2022

बकाया वेतन और कम बजट आवंटन से ग्रस्त यूपी की मध्याह्न भोजन योजना

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इस साल जनवरी में कड़ाके की ठंड में, प्रयागराज शहर में स्कूली बच्चों के लिए सरकार की मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) द्वारा नियोजित रसोइयों का एक जत्था धरने पर बैठा था। वे उत्तर प्रदेश शासन द्वारा बिना कोई कारण बताए, कोविड महामारी के चरम काल में आठ महीने से अधिक समय से रोके गए अपने वेतन की मांग कर रही थीं ।

प्रयागराज जिले में सादियापुर के एक सरकारी स्कूल में काम करने वाली रसोइया नीलम निषाद का कहना था, “हम बारिश में बाहर बैठे रहे, और कोई अधिकारी हमसे पूछने तक नहीं आया कि हम वहां क्यों बैठे हैं। जब हमारा वेतन 8 महीने के लिए रोक दिया गया हो तो हम करते भी क्या?”

उनके अनुसार एमडीएमएस के रसोइये उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें पिछले साल नवंबर में दिवाली के त्योहार से पहले भुगतान मिल जाएगा। लेकिन ब्लॉक स्तर के नोडल अधिकारी ने कहा कि अनुदान नहीं आया है इसलिए वे इस बारे में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। उनके अनुसार एमडीएम योजना में विलंबित भुगतान एक नियमित समस्या है।

नीलम पिछले 2 वर्षों से काम कर रही हैं और राज्य के 3.95 लाख एमडीएम रसोइयों में से एक है; वह जिले में रसोइयों, जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं, को यूनियन बनाने के लिये प्रेरित करती रही हैं। वह अब प्रयागराज जिला एमडीएम वर्कर्स यूनियन की अध्यक्ष हैं, लेकिन अफसोस है कि महिलाएं ज्यादातर यही कहती हैं, “कुछ नहीं से कुछ भला “

महामारी की चरम अवधि के दौरान यह सच था क्योंकि जहां कई पुरुष घर पर बेकार बैठे थे,  उस वक्त कम से कम कुछ आय की गारंटी बनी हुई थी। लेकिन 2022-23 के बजट ने वेतन वृद्धि की उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। उनका मानदेय वही बना हुआ है, जबकि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं।

एमडीएम योजना-पृष्ठभूमि

मध्याह्न भोजन योजना, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत केंद्र सरकार की एक योजना है, जिसे 1995 के शुरूआती दिनों में, बढ़ते बच्चों को पोषण प्रदान करने, स्कूलों में नामांकन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के लिए शुरू किया गया था, खासकर गरीब बच्चों और लड़कियों के लिए । यह योजना महिला एवं बाल मंत्रालय के तहत बनाई गई थी।

तमिलनाडु, गुजरात, उड़ीसा, केरल और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़कर, जहां गर्म पका हुआ भोजन परोसा जा रहा था, 2001 तक अधिकांश राज्यों में केवल सूखा राशन दिया जा रहा था। योजना के लिए आवंटन 2004 के बजट में प्रदान किया गया था और इसका कार्यान्वयन 2005 में शुरू हुआ था।

यह अपनी तरह की सबसे बड़ी योजना है, जो सरकारी स्कूलों या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और मदरसों में स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए एक पौष्टिक भोजन प्रदान करती है। योजना को चलाने की लागत का 60% केंद्र सरकार से आता है जबकि 40% हिस्सा राज्य सरकार से आता है। केंद्र से लेकर ग्राम स्तर तक सभी स्तरों पर निगरानी समितियां हैं, जो यह देखने के लिए बनी हैं कि योजना को ठीक से लागू किया जा रहा है या नहीं। फिर भी यह योजना कई समस्याओं से घिरी हुई है।

नीलम ने कोविड रिस्पॉन्स वॉच से अपनी बातचीत में कहा, “जब हम खुद पीड़ित हैं, तो हम बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं? यही वह कारण है जो बहुतों को भ्रष्ट करता है। हम लंबे समय से सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि हमें बिना किसी वैध कारण के कभी भी निकाला जा सकता है”। उनके अनुसार हम वेतन में 10,000 रूपये प्रति माह की वृद्धि और 12 महीने के वेतन के साथ-साथ हर महीने के पहले सप्ताह के भीतर भुगतान चाहते हैं।

“अभी तक हमारा मानदेय मात्र 1000 रुपये था और पिछले साल से ही हमें 500 रुपये की मामूली वृद्धि मिली है। ऐसे में प्रभावी रूप से हमें प्रति दिन केवल 50 रुपये मिलते हैं। वह भी 10 महीने के लिए दिया जाता है और अक्सर इसमें देरी हो जाती है। क्या हम 1500 रुपये प्रति माह लेकर घर का प्रबंधन कर सकते हैं? यह सिर्फ एक सांकेतिक राशि है, बख्शीश की तरह, न्यूनतम मजदूरी के बराबर भी नहीं।”

एमडीएमएस के रसोइयों की शिकायत है कि होली और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों के लिये उन्हें कभी बोनस नहीं दिया जाता है। पिछले साल वे दिवाली भी नहीं मना सके क्योंकि भुगतान लंबित था। इसके अलावा, इलाहाबाद के कुछ क्षेत्रों में, उदाहरण के लिए, झूसी में, कई संगरोध (quarantine) केंद्र कोविड पोजिटिव लोगों के लिए स्थापित किए गए थे, और एमडीएमएस के रसोइयों को उनका खाना बनाना और पहुंचाना पड़ता था। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए था, लेकिन चूंकि स्कूल बंद थे, इसलिए कोई पैसा नहीं दिया गया।

नीलम कहती हैं कि मनरेगा के लिए काम करने वाले लोगों को प्रतिदिन 202 रुपये मिलते हैं। “हम 7-8 घंटे न केवल खाना पकाने में बिता देते हैं, बल्कि बेंच और खिड़कियों को साफ करने, कक्षाओं और बरामदों की सफाई करने, शिक्षकों के लिए छोटे-मोटे काम करने और जाने से पहले बर्तन साफ ​​करने में भी लगाते हैं। राज्य में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां रसोइयों को बाथरूम तक साफ करने पड़े हैं। मेरी बहन 4 लोगों के परिवार के लिए खाना बनाती है और उसे 6000 रुपये वेतन मिलता है और साथ ही त्योहार का बोनस भी मिलता है।”

वह कहती हैं, “सरकार हाई कोर्ट के आदेश पर भी ध्यान नहीं देती है।”

उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन

2019 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि एमडीएमएस रसोइयों को 12 महीने का वेतन दिया जाए, लेकिन सरकार अभी भी केवल 10 महीने का मानदेय देती है। इसके अलावा, रसोइया चंद्रावती बनाम यूपी राज्य और 6 अन्य के मामले में, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की खंडपीठ ने 15 दिसंबर 2020 को कहा था कि “किसी को इस तरह के वेतन के लिए काम कराना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत ‘बेगार और बलात श्रम’ है। “

माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और सभी जिलाधिकारियों को एमडीएमएस रसोइयों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अनुसार मानदेय देने और 2005 से 2020 तक के वेतन में विसंगति को 4 महीने के भीतर बकाया के रूप में भुगतान करने का भी निर्देश दिया था। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कुछ नहीं किया गया है। ताजा बजट में भी उनका मानदेय नहीं बढ़ा है।

प्रयागराज के शिवराजपुर से सात किलोमीटर दूर बारा प्रखंड में रसोइया का काम करने वाली मंजू देवी 13 साल से सरकारी स्कूल में कार्यरत विधवा हैं, उनका कहना है कि गुजारा करना नामुमकिन होता जा रहा है। एमडीएम की गाइडलाइंस के मुताबिक नियुक्तियों में वंचित समूहों की महिलाओं को प्राथमिकता दी जानी है। मंजू का अस्तित्व ही संकटपूर्ण है।

वह अफसोस करती है, “मेरा सबसे बड़ा बच्चा एक बेटा है जो अब बारहवीं कक्षा में है और दूसरी बेटी कक्षा 8 में है। सबसे छोटा 7 साल का है और उस स्कूल में पढ़ता है जहाँ मैं काम करती हूँ। मुझे उनकी शिक्षा के लिए धन की आवश्यकता होगी। मैं सुबह 8 बजे घर से निकलती हूं और शाम 4 बजे तक घर वापस आ पाती हूं। फिर मैं घर का सारा काम करती हूं। जब हम निकलते हैं तो बहुत ठंड होती है, लेकिन हम सर्दियों में वर्दी (साड़ी) या शॉल और स्वेटर के भी हकदार नहीं होते। स्कूलों के खुलने के बाद, हमें टीका लगवाने और काम पर जाने के लिए कहा गया। कोविड की तीसरी लहर के दौरान भी, जबकि बच्चे स्कूल नहीं आते हैं, लेकिन शिक्षक मौजूद होते हैं इसलिए हमें उनके जाने तक ड्यूटी पर रहना होगा। हमें अब बच्चों के माता-पिता को भी सूचित करना होगा कि खाद्यान्न वितरित किया जा रहा है, इसलिए उन्हें जाकर उसे लेना होगा। ”

महामारी के समय (2020-21) उत्तर प्रदेश में यह योजना निष्क्रिय थी। मई 2021 में ही बच्चों के लिए भोजन उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया था। लेकिन कार्यान्वयन सितंबर 2021 में शुरू हो सका। केवल चावल और गेहूं वितरित किया जा रहा था, लेकिन दाल नहीं। दूध और फलों का पैसा सीधे माता-पिता के बैंक खातों में जाता है। लेकिन कई परिवारों ने शिकायत की कि उन्हें खाद्यान्न या नकद नहीं मिला और यहां तक ​​कि जिन लोगों को मिला उन्होंने कहा कि आपूर्ति अनियमित थी। कई परिवारों ने अन्य आवश्यक सामान खरीदने के लिए खाद्यान्न बेच दिया।

मऊ के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका उषा सिंह कहती हैं, “महामारी के दौरान, जब बच्चों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो बच्चों के लिए पका हुआ मध्याह्न भोजन नहीं भेजा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अधिकांश रसोइया अनपढ़ हैं और स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में कुछ नहीं जानती हैं। उन्हें किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा प्रशिक्षित नहीं किया जाता है कि उन्हें कोविड के समय में क्या करना है, उदाहरण के लिए, सब्जियों, बर्तनों को कैसे धोना है और रसोई को कैसे साफ रखना है। फिर लक्षण वाले रसोइयों के लिए नियमित परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाएगा। नहीं तो गांवों में संक्रमण बहुत तेजी से फैल सकता है। लेकिन नकद और सूखा अनाज स्कूल बंद होने के पहले दिन से ही भेज दिया जाना चाहिए था।”

दिशानिर्देशों का उल्लंघन और लीकेज

सरकार ने एमडीएम योजना के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। खाना पकाने के लिए स्कूल का एक उचित साफ और अलग हिस्सा आवंटित किया जाना चाहिए। क्षेत्र खुला नहीं होना चाहिए। उचित बर्तनों का उपयोग करना होगा और गैस सिलेंडरों को बच्चों की पहुंच से दूर सुरक्षित स्थान पर रखना होगा।

लेकिन यूपी में इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति बेहद खराब है। वास्तव में देश भर में यूपी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। वर्ष में 200 दिन गर्म पका हुआ भोजन परोसा जाना चाहिये और उपयोग किए जाने वाले सभी सामग्रियों में एगमार्क लगा होना चाहिए, जो दर्शाता है कि वे कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा स्थापित विपणन और निरीक्षण निदेशालय द्वारा अनुमोदित मानकों के अनुरूप हैं। कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को 450 कैलोरी और छठी से आठवीं कक्षा के बच्चों को 700 कैलोरी मिलनी चाहिए। प्राथमिक स्तर के बच्चों को 100 ग्राम गेहूं/चावल, 12 ग्राम प्रोटीन, 5 ग्राम तेल, 50 ग्राम सब्जियां, 200 ग्राम दूध और एक फल प्रतिदिन दिया जाना है। बड़े बच्चों को 150 ग्राम गेहूं/चावल, 20 ग्राम प्रोटीन, 75 ग्राम सब्जियां, 7.5 ग्राम तेल के अलावा 250 ग्राम दूध और एक फल देना होता है। संतुलित आहार के लिहाज से भी यह आवश्यकता से काफी कम है।

एमडीएमएस रसोइयों को सक्रिय रूप से संगठित करने वाले एक कार्यकर्ता डॉ. कमल उसरी कहते हैं, “पहले रसोई के बर्तनों और उपकरणों की खरीद के लिए प्रावधान और नकद राशि को स्कूल के प्रधानाचार्य के माध्यम से ग्राम प्रधान द्वारा वितरित किया जाता था। बहुत भ्रष्टाचार था और अक्सर बच्चों को दूध या फल नहीं मिल पाता था। हर उम्र के बच्चों को तय से कम खाना दिया जाता था। दाल अक्सर बहुत पतली होती थी और सब्जियां निर्धारित से कम मात्रा में दी जाती थीं। लेकिन अब शिक्षक ही सब कुछ मैनेज करते हैं, इसलिए थोड़ा सुधार हुआ है क्योंकि उन्हें वही खाना खाना पड़ता है। फिर भी लीकेज को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि निगरानी करने वाले खुद भ्रष्ट हैं।”

नाम न बताने की शर्त पर भदोई के एक शिक्षामित्र ने कहा, “मेरे स्कूल के कुछ वरिष्ठ शिक्षकों ने घी और अचार का आर्डर दिया था, लेकिन वह केवल शिक्षकों के बीच बांटा जाता है। यह एक अच्छा उदहारण नहीं है। शिक्षकों को बच्चों के साथ वही खाना चाहिए जो वे खाते हैं।”

एक बाल विशेषज्ञ के अनुसार संतुलित आहार में प्रति भोजन 120 ग्राम अनाज (4-6 वर्ष), 180 ग्राम अनाज (7-9 वर्ष) और 240-300 ग्राम (10-12 वर्ष), हरी पत्तेदार/हरी सब्जियां क्रमशः 50 ग्राम, 75 ग्राम और 100 ग्राम होनी चाहिए। इसी प्रकार चीनी 7 ग्राम, 7 ग्राम और 10 ग्राम , वसा 8 ग्राम, 10 ग्राम और 10 ग्राम  और दूध एवं दुग्ध उत्पाद 500  और 100 ग्राम फल प्रतिदिन होना चाहिए। मध्याह्न भोजन योजना को इसका पालन करना चाहिए, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यह एकमात्र उचित भोजन है जो एक बच्चे को एक दिन में मिलता है।

भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाए ?

नागालैंड में एक सकारात्मक प्रयोग किया गया जहां सार्वजनिक संस्थान और सेवा का सामुदायिकरण अधिनियम 2002 (Nagaland Communitisation of Public Institution and Services Act 2002) लागू है। शिक्षा की गुणवत्ता की जांच करने और एमडीएम में लीकेज को रोकने के साथ-साथ इसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसे शुरू किया गया था। वीईसी (ग्राम शिक्षा समितियां) का गठन बच्चों के माता-पिता के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों, कार्यकर्ताओं और शिक्षकों के सदस्यों को लेकर सामुदायिकरण किया गया था। सर्वेक्षण में शामिल 94 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि शिक्षण और पोषण स्तरीय है। स्कूलों के प्रबंधन के लिए वीईसी को पैसा दिया गया था। काम न करने पर शिक्षकों का वेतन रोकने का भी उन्हें अधिकार था। वीईसी द्वारा सामान खरीदे गए और भोजन की गुणवत्ता और मात्रा में काफी सुधार हुआ। इस प्रयोग को सार्वभौमिक बनाने की जरूरत है।

योजना का विस्तार हुआ लेकिन फंड कम हुआ

शिक्षा मंत्री के अनुसार, एमडीएम योजना का विस्तार बालवाटिका नामक प्री-प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को शामिल करने के लिए किया गया है, जो आईसीडीएस (ICDS) के तहत थे। यह 2021-22 से 2025-2026 (पीएम पोषण योजना) तक चालू रहेगा।

पिछले वर्ष के बजट में वर्ष 2021-22 (संशोधित अनुमान) के लिए मध्याह्न भोजन योजना पर 10,233.75 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। 2022-23 के बजट में भी बजट अनुमान में 10,233.75 करोड़ रुपये की समान राशि निर्धारित की गई है। यानी कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। फिर पीएम-पोषण अम्ब्रेला योजना के तहत, 2022-23 के लिए, मध्याह्न भोजन योजना और आईसीडीएस (आंगनवाड़ी) योजना तथा किशोरियों के लिए योजना के लिए कुल आवंटन केवल 20,263.07 करोड़ रुपये हैं।

लेकिन 2020-21 के बजट में, शिक्षा मंत्रालय के तहत मध्याह्न भोजन योजना के लिए आवंटन 10,233.75 करोड़ (RE) था और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत आंगनवाड़ी / आईसीडीएस योजना के लिए आवंटन 20,938.31 करोड़ रुपये था।  लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से, अम्ब्रेला स्कीम के तहत कुल 20,263.07 करोड़ रुपये है, जो अकेले आईसीडीएस के लिए जितना था उससे भी कम है।

सुश्री निर्मला सीतारमन 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमी को कैसे समझाएंगी, खासकर एक साल के लिए, जब स्कूल फिर से खुल रहे हैं? इस बजट में यह रहस्य बना हुआ है। इतना ही नहीं, 2015-16 के केंद्रीय बजट में भी, मध्याह्न भोजन और आईसीडीएस कार्यक्रमों के लिए कुल आवंटन 24,577.98 करोड़ रुपये था। अब, छह वित्तीय वर्षों के बाद, वित्त मंत्री ने केवल 20,263.07 करोड़ रुपये आवंटित किए, जो 4,314.91 करोड़ रुपये या 17.56% कम है। इसी अनुपात में, राज्यों का हिस्सा भी कम होगा।

क्या पीएम-पोषण योजना के तहत मध्याह्न भोजन योजना और आईसीडीएस योजना का विलय योजनाओं के संक्षिप्त संस्करणों को लागू करने की एक चाल है?

यदि हम मिड-डे मील योजना को ही ले लें, तो 2022-23 के बजट में आवंटन वही था जो 2021-22 के बजट में रहा- 10,233.75 करोड़ रुपये, जो कि 2020-21 के बजट में 12,878.15 करोड़ रुपये के आवंटन से काफी कम है। यानि, दो साल में 2,644.40 करोड़ रुपये की कमी? बच्चों के लिए आ रहे पैसे कौन खा रहा है?

ऐसे में, कोई आश्चर्य की बात नहीं कि 2021 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, भारत 2020 में 94वें स्थान से फिसलकर 2021 में 101वें स्थान पर आ गया है और प्रत्येक 3 बच्चों (0-4 वर्ष) में से 1 का वजन कम है। नवंबर 2020 और अक्टूबर 2021 के बीच गंभीर रूप से तीव्र कुपोषित (SAM) बच्चों की संख्या में 91% की वृद्धि हुई है। और, 43% छह साल से कम उम्र के SAM बच्चे यूपी से हैं। क्राई की सीईओ पूजा मरहावा ने सरकार को चेतावनी दी है कि महामारी ने सभी सामाजिक संकेतकों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, और यदि तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो देश कभी भी इस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा। क्या सरकार सुन रही है?

इन्हीं वर्षों में राज्य घटक क्रमशः 5,974 करोड़, 6,277 करोड़, 6,383 करोड़, 6,492 करोड़ और 6,604 करोड़ होगा। 5% से अधिक मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए, वास्तविक निर्धारित राशि से बहुत कम होगा। साथ ही रसोइयों के मानदेय में कोई प्रस्तावित वृद्धि, अंडे, फोर्टिफाइड बिस्कुट, फलों या दूध की मात्रा में वृद्धि जैसे अतिरिक्त पोषण की कोई योजना नहीं है।

(कुमुदिनी पति लेखिका और राजनीतिक चिंतक हैं। यह लेख काउंटर करेंट्स में प्रकाशित उनके लेख का हिंदी अनुवाद है। इसे वहां भी पढ़ा जा सकता है।)

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