Wednesday, December 7, 2022

पश्चिम बंगाल का चुनाव: वर्गीय संघर्ष को सांप्रदायिकता की चादर से ढकने की कोशिश

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क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव हिंदू-मुसलमान के सवाल पर लड़ा जाएगा? क्या खुलेआम जनसभा करके हिंदू और मुसलमानों से मजहब के आधार पर वोट मांगा जाएगा? अगर ऐसा होता है तो यह पश्चिम बंगाल के इतिहास में पहला मौका होगा जब संप्रदाय के आधार पर चुनाव लड़े जाएंगे। यह मंजर मोहम्मद अली जिन्ना की याद को ताजा कर देता है।

तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में आए ममता बनर्जी सरकार के पूर्व मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 20 जनवरी को एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि उनका, यानी तृणमूल का, भरोसा 62000 पर है तो हमारा भरोसा 213000 पर है। यहां याद दिला दें कि नंदीग्राम विधानसभा में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 62 हजार के करीब है। भाजपा के किसी भी प्रदेश स्तर के नेता ने शुभेंदु अधिकारी के इस बयान का खंडन नहीं किया है। आमतौर पर किसी मुद्दे पर खामोशी का मतलब समर्थन ही माना जाता है। यह घटना 1945 की याद ताजा कर देती है। लॉर्ड वावेल ने एग्जीक्यूटिव काउंसिल के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग से सदस्यों का नाम मांगा था। मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि वे मुसलमानों का नाम देंगे और कांग्रेस हिंदुओं का नाम दे। कांग्रेस के इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए धर्म के आधार पर लोगों को अपना नुमाइंदा बनाया गया था। संदर्भ मौलाना आजाद की पुस्तक इंडिया विंस फ्रीडम से।

तो क्या भाजपा के नेता हिंदुओं के लिए जिन्ना का मुखौटा लगाकर चुनावी मैदान में उतरेंगे, लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास पर अभी तक तो सांप्रदायिकता का कोई धब्बा नहीं लगा है। मसलन 1967 का चुनाव खाद्य वस्तुओं की कीमत और महंगाई के नाम पर लड़ा गया था। इसमें तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रफुल्ल सेन चुनाव हार गए थे। संविधान की धारा 356 के सवाल पर 1971 का चुनाव लड़ा गया था। केंद्र सरकार की अपील और तत्कालीन राज्यपाल धर्मवीर की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने अजय मुखर्जी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। नक्सलवाद और कानून एवं व्यवस्था के सवाल पर 1972 का चुनाव लड़ा गया था। आपातकाल की ज्यादती 1977 में चुनावी मुद्दा बनी थी। नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग और 14 लोगों की मौत और सिंगूर में जबरन जमीन अधिग्रहण को ममता बनर्जी ने 2011 में वाममोर्चा सरकार के खिलाफ चुनावी मुद्दा बनाया था। ममता बनर्जी ने 2016 का चुनाव विकास के सवाल पर लड़ा था। अब 2021 के चुनाव का अंदाज-ए-बयां सोहरा वर्दी के डायरेक्ट एक्शन की अपील की याद दिला देती है। इस दौरान सोहरा वर्दी अविभक्त बंगाल के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। बहरहाल 2021 के विधानसभा चुनाव के बारे में यही कह सकते हैं कि आगाज हलाकत है अंजाम खुदा जाने।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और पश्चिम बंगाल में रहते हैं।)

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