पंजाब लैंड पूलिंग नीति 2025: विकास के नाम पर किसानों की जमीन बिल्डरों और कॉरपोरेट को देने की योजना

पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की नई लैंड पूलिंग नीति 2025 का विरोध शुरू हो गया है। विपक्षी दलों ने इसे भगवंत मान सरकार द्वारा गरीब किसानों की जमीन को शहरी विकास के नाम पर हथियाकर बिल्डरों, डेवलपर्स और बड़ी कारोबारी कंपनियों को देने की योजना बताया है। विभिन्न किसान संगठनों ने भगवंत मान सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। भूमि अधिग्रहण कानून के समानांतर एक नई नीति के तहत पंजाब के 17 बड़े शहरों के आसपास की कृषि भूमि का उपयोग बदलकर सतत शहरी विकास के लिए अधिग्रहण की योजना को सरकार लागू करने के लिए किसानों को ‘समझाने’ में लगी है।

सार्वजनिक प्रयोजन यानी सार्वजनिक मान्यता प्राप्त उद्देश्य या लोक कल्याणकारी उपक्रम के लिए सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहित की जाती है। अनिवार्य भूमि अधिग्रहण, जिसे भूमि अधिग्रहण भी कहा जाता है, सरकार की वह शक्ति है, जिसके तहत वह निजी भूमि को सार्वजनिक हित में, भू-मालिक की सहमति के बिना, अपने कब्जे में ले सकती है। यह शक्ति आमतौर पर बुनियादी ढांचे के विकास, जैसे सड़कें, रेलवे, बांध, अस्पताल, स्कूल, बिजलीघर और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए उपयोग की जाती है।

भारत में भूमि अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 जैसे कानून मौजूद हैं।

पारंपरिक भू-स्वामियों से भूमि अधिग्रहण में राज्य सरकार उन्हें उचित मूल्य/मुआवजा देकर अधिग्रहण करती है, वहीं पंजाब सरकार की नई लैंड पूलिंग नीति में भू-स्वामियों को तत्काल मुआवजा और पुनर्वास देने के बजाय भविष्य में लाभ का आश्वासन स्वैच्छिक भूमि संग्रहण का आधार बनाया गया है। इस योजना के तहत पंजाब सरकार विभिन्न शहरों के आसपास की लगभग 1 लाख एकड़ कृषि भूमि को सतत शहरी विकास के लिए योजनाबद्ध क्षेत्रीय विकास के दायरे में परिवर्तित करना चाहती है। शहरी वैश्विक जीवन के भविष्य से प्रेरित उद्देश्य के साथ मानव बस्तियों को आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की योजना का स्वप्न पंजाब सरकार दिखा रही है।

भूमि अधिग्रहण के मामले में केंद्र या राज्य सरकार, जो भी अधिग्रहण कर रही हो, को भू-मालिकों को उचित मुआवजा देना होता है, जो भूमि के बाजार मूल्य, संरचनाओं, पेड़ों और अन्य संपत्तियों के मूल्य पर आधारित होता है। 2013 के अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि सरकार को प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन के लिए व्यवस्था करनी होगी। इसके साथ-साथ भविष्य में परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करके वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी बनानी होंगी।

2013 का अधिनियम कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में 1894 के अधिनियम की कमियों को दूर करने के लिए लाया गया था, जिसमें भू-स्वामियों को उचित मुआवजे और पुनर्वास की कमी शामिल थी। 2013 का भूमि अधिग्रहण अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि भू-मालिकों को उनकी भूमि के लिए उचित मुआवजा मिले और परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन के लिए सरकार द्वारा उचित व्यवस्था की जाए।

भूमि संपत्ति का अधिग्रहण भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में आता है, जिसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में कानून बना सकती हैं। लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार अपने कार्यकाल के लगभग साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद नीति निर्धारण करके नियोजित शहरी विकास के उद्देश्य को आधार बनाकर एक नई नीति को प्रदेश में लागू कर रही है, जिसे लैंड पूलिंग नीति 2025 कहा गया है। दरअसल, 2013 में अकाली दल सरकार के कार्यकाल में लैंड पूलिंग नीति बनाई गई थी।

पृथ्वी पर महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में सबसे अहम संसाधन भूमि है। जल, जंगल, खनिज, अन्न, आवास और मनुष्य के लिए अन्य सहायक पदार्थ सब भूमि से ही प्राप्त होते हैं। भूमि का स्वामित्व निजी मूल का है। वर्तमान आधुनिकीकरण के दौर में पूंजीवादी व्यवस्था के लिए भूमि सबसे बड़े लाभ का स्रोत है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक कल्याण और उपयोग के लिए भूमि का अधिग्रहण सरकार द्वारा विधिसम्मत कानून के तहत किया जाता है।

पंजाब सरकार की इस नई लैंड पूलिंग नीति 2025 का विरोध शुरू हो गया है, क्योंकि बुनियादी सवालों के जवाब इस नीति में गायब हैं। सतत शहरी विकास के लक्ष्यों से पहले मौजूदा शहरी मूलभूत संरचना में जोखिम न्यूनीकरण और स्थानीय आपदा प्रबंधन की समस्याओं में वांछित सुधार और योजनागत प्रगति नगण्य है। अव्यवस्थित अतिक्रमण, कचरा प्रबंधन, मलजल निकासी, प्रदूषण नियंत्रण, गुणवत्तापूर्ण स्वच्छ जल की उपलब्धता, स्वास्थ्य सुविधाएं आदि के साथ-साथ असंतुलित रोजगार के अवसर, आय की असमानता और शहरी गरीबी की विसंगतियों का समाधान अभी पूरी तरह से नहीं हो पाया है। उच्च जनसंख्या घनत्व में मूलभूत सुविधाओं के प्रति अधिक संवेदनशील प्रबंधन प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करता है।

कृषियोग्य भूमि को शहरी विकास और आवास योजना में परिवर्तित करके सरकार किस वर्ग को सुविधा प्रदान करना चाहती है, यह सवाल भी इस नीति के विरोध में उठा है। सरकार इस भूमि को जिस उद्देश्य के लिए विकसित करना चाहती है, उसकी कोई समय-सीमा तय नहीं है।

मुख्यमंत्री भगवंत मान जहां एक ओर सार्वजनिक मंचों से लैंड पूलिंग नीति के फायदे गिनवा रहे हैं कि जमीन के विकसित होने पर उसके मूल्य में वृद्धि होगी और उसका लाभ भू-मालिक को मिलेगा (जिन्हें कुछ हिस्सा जमीन वापस मिलेगा), वहीं विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि पहले की अधिग्रहित जमीन पर योजनाएं कितने समय से लंबित हैं और दशकों बाद भी पूर्ण विकास नहीं हो पाया है, ऐसे में इस नीति की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है।

भगवंत मान का कहना है कि प्रदेश में गैरकानूनी अनधिकृत कॉलोनियों के विस्तार को रोकने और अव्यवस्थित शहरी विकास को नियंत्रित करने के लिए यह नीति सहायक होगी। लेकिन विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि इस नीति के तहत संग्रहित भूमि में आवासीय योजना के विकास के लिए सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, तो क्या निजी डेवलपर्स को विकसित करने के लिए शामिल किया जाएगा। सरकार ने अभी बताया है कि ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA) द्वारा इस योजना को विकसित किया जाएगा।

लैंड पूलिंग नीति के अंतर्गत बुनियादी ढांचे के विकास में भू-स्वामियों की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राज्य ने भूमि पूलिंग योजना अधिसूचित की है। इस योजना के तहत, भू-स्वामियों के पास अपनी अधिग्रहित भूमि के बदले आवासीय और व्यावसायिक दोनों प्रकार की भूमि रखने का विकल्प है। भू-मालिकों के पास अपनी पसंद के अनुसार भूखंडों का आकार चुनने का विकल्प होगा। उदाहरण के लिए, अधिग्रहित एक एकड़ भूमि के बदले, भू-मालिक 500, 400, 300, या 200 वर्ग गज के आकार के भूखंड ले सकता है।

व्यावसायिक भूमि आवंटन के मामले में, भू-स्वामी को आकार चुनने का कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा। व्यावसायिक स्थान को बड़े से छोटे आकार में वरीयता देते हुए आवंटित किया जाएगा। बूथ, आवासीय और वाणिज्यिक स्थलों का आवंटन लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा। भू-मालिक संयुक्त रूप से या आश्रित रूप से भूमि पूलिंग के लिए आवेदन कर सकते हैं। 10 वर्ग गज से 40 वर्ग गज तक की जमीन अधिग्रहण करने पर साइट के बजाय बूथ आवंटित किया जाएगा। इन बूथों का निर्माण GMADA द्वारा किया जाएगा, लेकिन निर्माण पर आने वाली लागत भू-मालिकों द्वारा अग्रिम रूप से चुकाई जाएगी।

एक एकड़ से कम जमीन के लिए, भू-मालिक नकद मुआवजा ले सकता है या विशेष आशय पत्र (LOI) प्राप्त कर सकता है, जिसे वह बेच या खरीद सकता है। किसी एक योजना के आशय पत्र और विशेष आशय पत्र को एक साथ जोड़ा जा सकता है। आशय पत्रों की बिक्री/खरीद पर 2% का हस्तांतरण शुल्क लिया जाएगा।

पुनर्वास नीति के अंतर्गत भू-स्वामी द्वारा आच्छादित क्षेत्र के स्थानांतरण का विकल्प: सरकार ने गांव में रहने के इच्छुक भू-स्वामियों के लिए एक पुनर्वास नीति तैयार की है। इस नीति के अनुसार, अधिग्रहित भूमि के आच्छादित क्षेत्र के अनुपात में, स्वामी को गांव के बाहरी इलाके में भूमि आवंटित की जाएगी। निर्मित क्षेत्र का मुआवजा भूमि अधिग्रहण नीति के अनुसार दिया जाएगा।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। राज्य के किसान संगठन भी इसके विरोध में उतर आए हैं और एक नए आंदोलन की तैयारी में हैं। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के तर्क और गणित के अनुसार, पहले की सरकारें भू-माफियाओं से मिली हुई थीं, इसलिए किसानों को उनकी जमीनों का उचित दाम नहीं मिला। इस नीति के तहत किसान को एक एकड़ पर लगभग 4.2 करोड़ का लाभ होगा।

पुरानी नीति के अनुसार, एक एकड़ जमीन की बाजार कीमत 1.25 करोड़ है, जबकि नई लैंड पूलिंग नीति के तहत एक एकड़ जमीन देने पर किसान को 1000 वर्ग गज आवासीय और 400 वर्ग गज व्यावसायिक भूखंड मिलेगा, जिसकी कीमत विकसित होने पर 30,000 रुपये प्रति वर्ग गज (3 करोड़) और व्यावसायिक 60,000 रुपये प्रति वर्ग गज (1.24 करोड़) होगी।

लेकिन विपक्षी दलों का तर्क है कि नई नीति बनाने में किसी भी किसान या किसान संगठन से कोई परामर्श नहीं किया गया। यह नीति भगवंत मान सरकार द्वारा उन पर थोपी जा रही है, जबकि मुख्यमंत्री को पंजाब की कैबिनेट में प्रस्ताव पास करके सभी लोकल डेवलपमेंट बोर्ड्स के चेयरमैन पद से हटा दिया गया और मुख्य सचिव को नया चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया।

मोहाली में नए सेक्टरों को विकसित करने के लिए 9 गांवों की 6285 एकड़ जमीन अधिग्रहण के लिए चिह्नित की गई है, जहां किसानों और भू-मालिकों ने नई लैंड पूलिंग नीति को अस्वीकार कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि नई नीति केवल कॉरपोरेट और बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है। किसानों के हितों का ध्यान नहीं रखा गया है। पंजाब के 17 शहरों को इस नीति के लिए चिह्नित किया गया है।

पंजाब में आवासीय विकास के लिए पंजाब अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (PUDA) और GMADA की ओर से विभिन्न शहरों के बाहरी इलाकों में कॉलोनियों और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है। कृषि की उपजाऊ जमीन में अब कांग्रेस घास उग आई है, जिसमें कोई विकास कार्य नहीं हुआ। पंजाब में 50 हजार से अधिक बनी कॉलोनियों में आधे प्लॉट खाली पड़े हैं और उनमें बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

सवाल कई हैं और बड़े भी हैं। पूर्ववर्ती सरकारों पर आरोप लगाकर अपनी नीति को बेहतर बताने में क्या आम आदमी पार्टी भाजपा का अनुसरण नहीं कर रही? पंजाब में आम आदमी पार्टी इन सवालों के चक्रव्यूह से निकलती नहीं दिख रही। आने वाले 2027 विधानसभा चुनावों तक यह मुद्दा निरंतर आम आदमी पार्टी को चुभता रहेगा।

(जगदीप सिंह सिंधु स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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