झारखंड जनाधिकार महासभा ने प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा 20 जुलाई को प्रेस वक्तव्य जारी कर महासभा की ओर से उठाए गए एसआईआर में तार्किक विसंगति संबंधित मुद्दे को ‘भ्रामक और दुष्प्रचार’ बताये जाने की निंदा की है।
महासभा ने यहाँ जारी बयान में कहा कि यह भी हास्यास्पद है कि अधिकारी एक ओर महासभा द्वारा उठाए गए मुद्दे को मान रहे हैं और दूसरी ओर खंडन भी कर रहे हैं। महासभा ने 17 जुलाई को यह मुद्दा उठाया था कि आदिवासी क्षेत्रों के एक-एक बूथ में लगभग 30% मतदाताओं के नाम एसआईआर की लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी सूची में दिख रहे हैं। इसके अलावा हर बूथ में कई मतदाता हैं जिनके पूर्वजों का नाम 2003 सूची में नहीं है। ऐसे में लाखों आदिवासी नोटिस के शिकार और परेशान होंगे और उनका नाम कट सकता है।
महासभा विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर पूरे राज्य में एसआईआर की प्रक्रियाओं में लोगों को जमीनी स्तर पर मदद कर रही है। महासभा ने जमीनी तथ्यों के आधार पर यह मुद्दा उठाया था। महासभा ने 15 जुलाई को पत्र के माध्यम से भी आयोग को इस मुद्दे के संबंध में जानकारी दी थी।
महासभा का मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के वक्तव्य का बिंयदुवार खंडन निम्न है:-
आयोग ने कहा है कि वर्तमान के इन्यूमरेशन फेज में यह बता पाना कि कितने प्रतिशत मतदाताओं के इन्यूमरेशन फॉर्म में तार्किक विसंगतियां प्राप्त हुई है, संभव नहीं है।
महासभा के अनुसार यह सच्चाई नहीं है। बीएलओ के मोबाइल ऐप में एक विकल्प दिखता है “व्यू लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ उसे क्लिक करने पर उस बूथ में मैपिंग के दौरान तार्किक विसंगति पाए जाने वाले सभी मतदाताओं की सूची दिखती है एवं हर ऐसे मतदाता के विसंगति का कारण भी दिखता है।
महासभा ने कई बूथों का अवलोकन किया एवं हर बूथ में यह तार्किक विसंगति वाली सूची में 25-45% मतदाता पाए गए।
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने अपने वक्तव्य में यह माना है कि तार्किक विसंगति वाले मतदाताओं को ईआरओ/एईआरओ द्वारा नोटिस जारी किया जाएगा और आवश्यक दस्तावेज़ लेकर विसंगति का सुधार किया जाएगाग।
महासभा ने यही आशंका जताई थी कि ऐसे में लाखों आदिवासियों को नोटिस का शिकार होना पड़ेगा और वे और परेशान होंगे।
महासभा ने बताया है कि तार्किक विसंगति 2003 की सूची में दर्ज जानकारी और वर्तमान की मतदाता सूची में दर्ज जानकारी के तुलना पर आधारित है। न 2003 की सूची में मतदाताओं के नाम, रिश्तेदार के नाम व उम्र की गलत एंट्री के लिए मतदाता जिम्मेवार हैं और न वर्तमान सूची में गलत एंट्री के लिए।
झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी-मूलवासी समुदायों के दस्तावेज़ों में दर्ज जानकारी खास कर के नाम के स्पेलिंग व उम्र में अनेक त्रुटियाँ हैं। उदहारण के लिए, अनेकों के वोटर कार्ड, आधार, खतियान और 2003 की सूची में नाम के स्पेलिंग या टाइटल में फ़र्क है।
महासभा ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का ध्यान पश्चिम बंगाल के एसआईआर में तार्किक विसंगति संबंधित आंकड़ों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर दिलाया और कहा कि पश्चिम बंगाल में 1.25 करोड़ मतदाताओं को तार्किक विसंगति में चिन्हित किया गया जिसमें लाखों को नोटिस मिला और 27 लाख नागरिक आखिरकार मतदाता सूची से हटाए गए।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस जन विरोधी प्रक्रिया का संज्ञान लेते हुए आदेश दिया था कि आयोग तार्किक विसंगति की सूची को सार्वजनिक करे एवं ऐसे मामलों के निपटारे के लिए विशेष न्याययिक पदाधिकारियों को नियुक्त करने का आदेश दिया था।
तार्किक विसंगति व आयोग के वक्तव्य के परिप्रेक्ष में महासभा ने माँग की है कि लाखों आदिवासियों समेत सभी नागरिकों को 2003 में दर्ज सूची में महज नाम की स्पेलिंग व उम्र में विसंगति के कारण परेशान न किया जाए और झारखंड में एसआईआर में तार्किक विसंगति की प्रक्रिया को निरस्त करना चाहिए।
महासभा ने यह मांग भी की है की चुनाव आयोग 5 अगस्त के ड्राफ्ट मतदाता सूची के साथ-साथ तार्किक विसंगति की सूची भी सार्वजनिक करे। साथ ही, आयोग यह स्पष्ट बताए कि तार्किक विसंगति में दर्ज मतदाताओं के लिए विसंगति सुधार की क्या प्रक्रिया होगी। इससे संबंधित सरकारी आदेश / अधिसूचना को सार्वजनिक करे।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)