कहीं कांवड़ की आड़ में गुंडागर्दी का प्रशिक्षण तो नहीं!

पिछले कई वर्षों से कांवड़ियों के जुल्मों सितम निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। इस बार हद तो तब हो गई जब ट्रैफिक पुलिस महिला कर्मी पर हरिद्वार में कांवड़ियों ने हमला कर दिया जो उनके लिए मार्ग बनाने में सहयोग कर रहीं थीं। वहीं एक पुलिस कर्मी चिकित्सालय में मौत से जूझ रहा है। यहां पैरामिलिट्री फ़ोर्स लगाई जा रही है। पिछले बरस तो कांवड़ियों पर आतंकी हमला होने का ख़तरा बताया गया था और उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। इस बार ये कांवड़िया आतंकियों की तरह ही व्यवहार कर रहे हैं। कुछ दिन पहले इन्होंने एक महिला संचालक के ढाबे को तहस नहस कर दिया था तथा एक कार पर लाठी डंडे बरसाए थे।

आखिरकार ये कांवड़िए पिछले सात-आठ सालों से ऐसा व्यवहार क्यों करने लगे हैं। कांवड़ यात्रा तो कोई नई नहीं है। जो यात्रा मुगल काल और अंग्रेजी शासन के दौरान कभी विवादित नहीं रही वह आज इतनी उग्र क्यों हो गई है। इसके कारणों की पड़ताल करने पर यह ज्ञात होता है कि यह यात्रा शिव भक्ति की प्रतीक थी। प्रसिद्ध शिव मंदिरों में, भक्त कांवड़ में गंगा जल लाकर उनका अभिषेक करते रहे हैं। कांवड़ में जल लाने वाले कांवड़िया कहे जाते थे। ये अभिषेक किसी मनौती के लिए होता था। आम तौर पर इसमें शिवभक्त ही होते थे। यह भी यहां बता दें कि कांवड़ यात्रा के शुरुआत की कहानी को लेकर कई तरह के किस्से प्रचलित हैं। देश के हर हिस्से में कांवड़ यात्रा को लेकर कई तरह की कहानियां मशहूर हैं।

पहली कहानी शिवजी के भक्त परशुराम की है जिसमें गढ़मुक्तेश्वर गंगाजल लाकर उनका जलाभिषेक किया था। कई लोग इसे ही पहली कांवड़ यात्रा कहते हैं। कुछ लोग भगवान राम को पहले कांवड़िए के रूप में देखते हैं। इस मान्यता के हिसाब से भगवान राम ने देवघर बिहार में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। कुछ मान्यताओं में कांवड़ की कहानी श्रवण कुमार से जुड़ी है। उन्होंने अपने माता-पिता को कांवड़ पर बिठाकर हरिद्वार तक का सफर पूरा किया था। इस किस्से को भी कांवड़ की पहली यात्रा के रूप में देखा जाता है। एक और मान्यता के अनुसार कांवड़ को रावण और समुद्र मंथन की कहानी से जोड़ा जाता है। 

लेकिन दूर क्षेत्रों से पवित्र जल लाकर शिव का जलाभिषेक होता रहा है। महाराष्ट्र में ताप्ती और मध्यप्रदेश में नर्मदा जल से शिव अभिषेक की परम्परा है। इस बार तो महाराष्ट्र में महिलाओं ने भी समूह रूप में कांवड़ यात्रा निकाली है। इसी तरह अलकनंदा और भागीरथी का जल रामेश्वर में चढ़ाया जाता है। बुंदेलखंड मध्यप्रदेश में कांवड़िए कतारबद्ध शिव मंदिरों में शिवभक्ति गीत गाते आज भी सौहार्द पूर्ण तरीके से यह कार्य सम्पन्न करते हैं। वे भक्तिभाव में डूबे तन्मयता से ये कार्य करते हैं। उन्हें किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं रहती।

बहरहाल, आज जिस हाल में उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा होती है वह अनूठी है। उसके प्रायोजक होते हैं जो अपनी मनोकामना पूरी करने खुद नहीं जाते बल्कि कहीं सैकड़ों और कहीं हज़ारों हज़ार कांवड़ियों को तैयार करते हैं उनके लिए खाना पीना मुहैया कराया जाता है। सावन आने से पहले कांवड़िए का काम ढूंढने वाले सक्रिय हो जाते हैं। इनमें बेरोजगार पिछड़ी और दलित जातियों के युवा ज्यादा होते हैं। इन्हें पूरे एक माह प्रायोजक ऐश करने की अनुमति देते हैं।

प्रायोजक राजनैतिक गुट से जुड़े होते हैं। प्रायोजक को ज़रूरत पड़ने पर गुंडे चाहिए और कांवड़िए को दाना पानी और दादागिरी का अंदाज उनके लिए दुर्लभ होता है बस दोनों खुश। मस्त रहो और मौज करो। दूरदर्शिता वाले ये प्रायोजक राजनैतिक इशारे पर आगे चुनाव में या जहां  ज़रूरत होती है इनका दोहन करते हैं। इसलिए उनके आक्रामक रुख के ख़िलाफ़ कभी कोई कुछ नहीं बोलता और ना ही उनके लिए कोई आचार-संहिता होती है। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक कांवड़ियों का जमघट होता है। पतित पावन गंगा इन दिनों कांवड़ियों की कांवर में बैठकर भी क्या इतराती होगी।

कांवडिय़ों के हुकुम को सरकार भी नज़र अंदाज़ करती है क्योंकि एक तो ये आस्था का सवाल होते हैं दूसरे ये ही कांवड़िए उनका जनाधार बढ़ाते हैं।

इनके रास्ते में मुस्लिम दुकानदार दुकान नहीं लगा सकते। लहसुन प्याज का इस्तेमाल वर्जित है। जहां से जो सामग्री चाहिए नि: शुल्क चाहिए। कांवड़ के डंडे का इस्तेमाल सुरक्षा हेतु करने की छूट है। वीवीआईपी की तरह इनकी अगवानी में पुलिस और अधिकारी मौजूद रहते हैं। वे कहीं भी विश्राम स्थल बना सकते हैं।

पिछले दिनों एक ई-रिक्शा चालक कुसुम पाल पुत्र रघुवीर सिंह अपने ई-रिक्शा में 19 कांच की शीट्स लेकर ग़ाज़ियाबाद के शालीमार गार्डन से सीलमपुर की ओर जा रहा था। उसके ई-रिक्शा को पीछे से टक्कर लगी, जिससे कांच की शीट्स टूटकर सड़क पर गिर कर बिखर गईं। जिस पर कांवड़ियों के निकलने को लेकर इस घटना को दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने ‘दूसरा’ रंग देते हुए पोस्ट की!

उसके बाद सड़क पर कांच पड़े होने की इस घटना पर मुस्लिम विरोधी मीडिया और फ्रिंज एलिमेंट्स ने मुसलमानों के खिलाफ जमकर नफ़रत फैलाई है। जब दिल्ली पुलिस ने उक्त मामले की जांच की तो जांच में पुलिस ने नफ़रती तत्वों द्वारा फैलाई जा रही अफवाह को पूर्णतः खारिज कर दिया है। अब सवाल यह है कि जिन एंकर्स, फ्रिंज एलिमेंट्स ने इस अफवाह को फैलाया था, उनके खिलाफ भी कोई कार्रवाई होगी?

शायद नहीं। क्योंकि यह तो उस राजनैतिक सिस्टम के लिए अनिवार्य है कि वह किसी भी आपदा में अपना फायदा देखती है। कांवड़िए आज के दौर में राजनीति के सिस्टम का एक अंग हैं। इसी तरह नवरात्रि पर्व पर हज़ारों मीटर चुनरिया चढ़ाना भी राजनीतिक हथियार बन गया है। कहने का आशय यह है कि जनमानस में व्याप्त भक्ति भाव का दोहन षड्यंत्र पूर्वक धड़ल्ले से हो रहा है। सरकार में दम हो तो ऐसे प्रायोजकों को दूर कर देखें कितने श्रद्धालु ऐसे जलसों में जुटते हैं। ये हर्गिज संभव नहीं होगा क्योंकि ये जो बड़े ठेकेदार हैं उनके हित भी सरकार से जुड़े होते हैं और सरकार इनके दम पर ही तो चलती है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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