मेरे पीछे एक छोटा-सा घर देख रहे हैं। यह छोटा, मामूली कुटिया-सा मकान ज़रूर है, पर यह विश्व प्रसिद्ध मीडिया दार्शनिक मार्शल मक्लूहन का निवास रहा है। कनाडा के अल्बर्टा प्रांत की राजधानी एडमॉन्टन की हाइलैंड्स बस्ती में स्थित इस घर में मक्लूहन का बचपन और किशोरावस्था बीती। यहीं से उन्होंने भाषा और संचार माध्यम की दृष्टि यात्रा शुरू की। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है – अंडरस्टैंडिंग मीडिया (Understanding Media)।
इस घर से परिचित होना संयोग है। इस मकान से केवल चंद कदमों की दूरी पर मेरी छोटी बेटी त्रीना का घर है। बेहद सलीकेदार, शांत बस्ती में टहलते हुए त्रीना ने मक्लूहन के निवास से मुलाकात करा दी। आर्ट्स हैबिटैट एडमॉन्टन की देखरेख में यह घर विशेष अवसरों पर गुलज़ार होता रहता है; युवा लेखन और काव्य उत्सव के आयोजन होते हैं, कार्यशालाएँ होती हैं। संक्षेप में, मीडिया दार्शनिक मक्लूहन की मीडिया दृष्टि जीवंत रहती है।

वैसे, 1911 में एडमॉन्टन में जन्मे इस मीडिया दार्शनिक का 1980 में टोरंटो में निधन हुए 45 वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन, वर्तमान दौर में उनकी मीडिया दृष्टि और चेतावनियाँ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। मीडिया की अंतर्वस्तु और बाह्य काया को तार्किक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए मीडिया शिक्षकों और विद्यार्थियों को चाहिए कि वे मक्लूहन के साहित्य से दोस्ती करें।
मार्शल मक्लूहन से मेरा परिचय दशकों पुराना है। अंडरस्टैंडिंग मीडिया को पढ़कर संचार की विभिन्न शाखाओं के संबंध में कुछ विवेचनात्मक समझ अंकुरित हुई। विभिन्न संचार शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के साथ मक्लूहन के संदेशों को साझा किया। आज भारत समेत विभिन्न लोकतांत्रिक देशों में ‘मीडिया स्वतंत्रता’ लगभग मरणासन्न स्थिति में है। जैसे-जैसे निर्वाचित शासकों की सत्तालिप्सा और शासकीय निरंकुशता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे मीडिया की स्वतंत्रता का हाशियाकरण होता जाता है; विवेचनात्मक चेतना संपन्न मीडियाकर्मी शासकीय-प्रशासकीय आतंक की चपेट में आने लगते हैं; मीडिया का एकाधिकारीकरण होने लगता है।
इसकी ताज़ा मिसाल है भारत का चैनल संसार; कॉरपोरेटपति अंबानी और अडानी के मीडिया साम्राज्य में झाँक लीजिए। इसी प्रकार अखबारपति अब चैनलपति बन गए हैं। इस साँचे में टाइम्स समूह, भास्कर, जागरण, राजस्थान पत्रिका जैसे प्रिंट घरानों को सजाया गया है। देश के मीडिया संसार में ‘क्रॉस ओनरशिप’ धड़ल्ले से अमरबेल बनकर फैल रही है। मोदी सरकार की खामोश अदालत में मीडिया का एकाधिकारीकरण आक्रामकता के साथ अपनी बाहें ताने खड़ा है।
वास्तव में, मक्लूहन ने दशकों पहले ही अपनी विशद पुस्तक के माध्यम से चेतावनी दे दी थी कि कालांतर में मीडिया का कॉरपोरेटीकरण का विस्फोट होगा। राजनैतिक शासक और कॉरपोरेट घराने मीडिया पर कब्ज़ा जमाएँगे। मीडिया की स्वतंत्रता को हाँका जाएगा। मीडिया के माध्यम से उपभोक्ता, जनता या मतदाता के मानस को अनुकूलित किया जाएगा। आज विकसित और पिछड़े, दोनों ही प्रकार के देशों में जनमानस के अनुकूलन का कारोबार ज़बर्दस्त ढंग से हो रहा है। ‘सत्ता, कॉरपोरेट, याराना पूँजी, धर्म-मज़हब, और नौकरशाही के गठजोड़’ के माध्यम से संचार माध्यमों का उपनिवेशीकरण तेज़ी से किया जा रहा है।
ज़ाहिर है, ‘मीडिया उपनिवेशीकरण’ से लोकतंत्र और संविधान का अपंगीकरण भी होता जा रहा है। दार्शनिक ने इसकी चेतावनी दी थी। भारत में भी 1925 में बाबूराव विष्णु पराडकर ने अपने लेखों के माध्यम से प्रेस की दासता के प्रति चेताया था। उन्होंने कहा था कि पत्र-पत्रिकाएँ चिकने-चुपड़े कागज़ पर प्रकाशित होंगी, विज्ञापनों से सनी रहेंगी, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आत्मा सुप्त रहेगी।

आज प्रौद्योगिकी और सूचना क्रांति की वजह से हम लोग ‘विश्वग्राम’ या ‘ग्लोबल विलेज’ में बदल चुके हैं। दुनिया के किसी भी कोने की घटना पलभर में सभी महाद्वीपों के कोनों में पहुँच जाती है। विश्वग्राम की अवधारणा काफी मोहक ज़रूर है, लेकिन इसका अकूत लाभ दुनिया के शक्तिशाली वर्गों को हो रहा है। जहाँ संचार माध्यम के ज़रिए कॉरपोरेट घराने अपने उत्पादों की मार्केटिंग सुविधापूर्वक विश्व स्तर पर कर रहे हैं, वहीं बहुआयामी गठजोड़ के माध्यम से मुक्त अर्थव्यवस्था विचारधारा का विस्तार भी करते हैं।
चैनल, सोशल मीडिया आदि ‘डिजिटल जिन्न’ बन जाते हैं; चरम दक्षिणपंथी विचारधारा, अंधराष्ट्रवाद, धार्मिक कट्टरता, व्यक्तिपूजा, पुनरुत्थानवाद, मिथकीकरण, फासीवाद-नाज़ीवाद जैसी प्रवृत्तियाँ आनन-फानन में दुनिया को दबोचने लगती हैं। मीडिया की मेहरबानी से स्थानीय स्तर के मंदिर-मस्जिद मुद्दे राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर का रूप ले लेते हैं। सारांश में, जनमानस के ब्रह्मांड पर ‘सत्य का असत्य और असत्य का सत्य में रूपांतरण की अपसंस्कृति’ का आधिपत्य हो जाता है। दूसरे शब्दों में, शासक वर्गों ने ‘उत्तर-सत्य मीडिया’ और ‘उत्तर-सत्य राजनीति’ का मायाजाल फैला रखा है।
यह अकारण नहीं है कि ऑपरेशन सिंदूर के समय गोदी मीडिया ने भारतीय सेना का इस्लामाबाद, लाहौर पर कब्ज़ा करवा दिया था, कराची तबाह हो गया और पाक सेनाध्यक्ष गिरफ्तार हो गया। यह और भी अकारण नहीं है कि ग़ज़ा में करीब 60 हज़ार लोगों की मौत और एक लाख से अधिक लोगों के हताहत होने की त्रासदी विश्व त्रासदी नहीं बन पाती, केवल क्षेत्रीय त्रासदी बनकर रह जाती है। सब कुछ मीडिया की बदौलत है। अब छोटे पर्दे या मोबाइल पर ड्रोनों द्वारा बमबारी की घटनाएँ मीडिया उपभोक्ता को भयभीत नहीं, बल्कि रोमांचित करती हैं।
रॉकेटों की आसमानी जंग पतंगों की ‘वो मारा-वो काटा’ जैसे भाव पैदा करती है। ज़ाहिर है, ऐसी जंगों से जंगखोर और शस्त्र सौदागर जंगी मुनाफा लूटते हैं। इस लूट में बहुआयामी माध्यम दृश्य-अदृश्य भूमिका निभाते हैं। ये माध्यम जंग को आकर्षक, रोमांचक और अनिवार्य घटना के रूप में चित्रित करते हैं। उपभोक्ता में जंग से नफरत के भाव के स्थान पर पर्वतारोहण जैसे भाव जागते हैं; अमेरिका ने ईरान के कितने बम नष्ट किए या ईरान ने इज़राइल के कितने शहरों को तबाह किया, इस जानकारी में जनता रमने लगती है।

रिमोट कंट्रोल (मीडिया) से बहुआयामी गठजोड़ के नियंता जनता की मनोवृत्ति की दशा-दिशा निर्धारित करते रहते हैं। अमूक संदेश के लिए अमूक माध्यम (सोशल मीडिया, चैनल, पत्र-पत्रिका, वृत्तचित्र, फिल्म, ऑनलाइन चर्चा आदि) सटीक रहेगा, इसका चयन नियंता वर्ग द्वारा होता रहता है। अतः संदेश संचार में माध्यम चयन की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। जंग की अनिवार्यता के संदेश के लिए मेगा मीडिया ही चुना जाएगा, नौटंकी या मुंहफट अखबार नहीं। आजकल संदेशों के लिए व्हाट्सएप विश्वविद्यालय काफी प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है; खूब फल-फूल रहा है ‘फर्ज़ी खबरों’ का कारोबार भी।
ऐसे माहौल में मीडिया के चरित्र को समझने के लिए विवेचनात्मक चेतना की ज़रूरत है। हिंदी राज्यों में जनसंचार के अनेक शिक्षण संस्थान चलाए जा रहे हैं, पूर्णकालिक विश्वविद्यालय भी चल रहे हैं। फिर भी गोदी मीडिया का विस्तार हो रहा है। जब पत्रकार सरकारी निरंकुशता के प्रतिरोध में खड़ा होता है, तो उसे दंडित किया जाता है। इसकी ज्वलंत मिसाल है जनप्रतिबद्ध पत्रकार अजीत अंजुम के खिलाफ पुलिस में एफआईआर का दर्ज होना। उनका कथित अपराध यह है कि उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग की वास्तविक कारस्तानियों को उजागर किया।
असली पत्रकार का बुनियादी कर्तव्य और ज़िम्मेदारी है कि वह देश की ज़मीनी वास्तविकता को जनता के समक्ष उजागर करे। यही मीडिया दर्शन है मार्शल मक्लूहन का। उम्मीद है, इस विवेचनात्मक समझदारी से लैस होकर मीडियाकर्मी गोदी कैद से मीडिया को आज़ादी दिलाएँगे। मीडिया दार्शनिक के इस प्यारे निवास से इसी ‘संदेश’ की गूँज आ रही है।
(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और इस समय कनाडा में हैं)