CAG की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार की प्रमुख स्वास्थ्य सेवाओं में 49%पद रिक्त हैं। WHO के मानक के अनुसार प्रदेश में 124919 डॉक्टर होने चाहिए, लेकिन हैं केवल 58144 डॉक्टर। स्वास्थ्यकर्मियों के 13340 पदों पर भर्ती लंबित है। ओपीडी में बुनियादी सेवाओं का अभाव है। सब डिविजनल अस्पतालों में आपातकालीन ऑपरेशन थिएटर नहीं हैं। CAG की रिपोर्ट के अनुसार सभी स्तरों पर स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है। 399 स्वीकृत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में से केवल 191का निर्माण किया गया है। 44% PHC 24 घंटे चालू नहीं रहते, वहां आवश्यक सुविधाओं का अभाव रहता है।
नीतीश-भाजपा सरकार जनता के स्वास्थ्य के प्रति कितनी संवेदनशील है इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि कुल स्वीकृत बजट 69790.83 करोड़ में से केवल 69% ही खर्च किया गया। सचमुच इससे दुर्भाग्यपूर्ण और अमानवीय प्रशासनिक विफलता और क्या हो सकती है कि एक ओर लाखों लोगों को राज्य के अंदर उचित ईलाज नहीं मिल पा रहा है और अगर वे समर्थ हैं तो दूसरे राज्यों में जाकर इलाज करवाने या प्राइवेट अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं, वहीं बजट का 21743 करोड़ रुपये सरकार सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए खर्च ही नहीं कर सकी।
जनता के स्वास्थ्य के साथ नीतीश भाजपा सरकार का इससे बड़ा खिलवाड़ क्या हो सकता है ! नीति आयोग के 2023/24 के सतत विकास सूचकांक में 57 अंक के साथ बिहार सबसे निचले मुकाम पर रहा जबकि केरल सबसे ऊपर था।2019/20 में 31 स्कोर के साथ बिहार 18वें स्थान पर था। OPD में 76% रोगियों का ही ईलाज हो पाता है। PHC की हालत बेहद खराब है। गर्भवती महिलाओं की न जांच हो पाती है न उन्हें पोषक दवाएं मिल पाती हैं। 11% से लेकर 67% तक को iron और फोलिक एसिड की गोलियां नहीं मिल पातीं, न एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध हो पाती है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों में 45% से 68% तक दवाएं अनुपलब्ध हैं। 60% वेंटिलेटर बेकार पड़े हैं क्योंकि उनको संचालित करने वाला स्टाफ ही उपलब्ध नहीं है।
विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया है कि अस्पतालों में मरीजों को भर्ती नहीं लिया जा रहा है। पटना में चार-चार मेडिकल कॉलेज होने के बावजूद मरीजों को बेड नहीं मिल पा रहा है। PMCH में दुष्कर्म पीड़ित को 6 घंटे तक बेड नहीं मिल पाया और ईलाज के अभाव में उसकी मौत हो गई। विपक्ष के तमाम दलों ने पीड़िता की मौत के लिए जिम्मेदार मानते हुए स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का इस्तीफा मांगते हुए उनके खिलाफ आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन किया।
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि NDA के राज में स्वास्थ्य विभाग लगातार भाजपा के कोटे में था लिहाजा स्वास्थ्य सेवाओं की इस बदहाली की जिम्मेदार भाजपा और उसके मंत्री रहे हैं। विपक्ष ने स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने, निजीकरण पर रोक लगाने, अस्पतालों को 24 घंटे खुला रखने, रिक्त पदों पर नियुक्ति करने, रात में मरीज भर्ती करने की मांग की है। एक मरीज को 200/रु नहीं देने पर उसको ट्राली नहीं मिली, मजबूरन उसके परिजन गोद में लेकर उसे डॉक्टर के पास गए। मरीजों के प्रति सरकार की संवेदनहीनता और क्रूरता की यह पराकाष्ठा है। बिहार में सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है। लेकिन मात्र आलीशान बिल्डिंग और संसाधन से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो जाता। उसके लिए जो सबसे आवश्यक कारक है वह है योग्य स्वास्थ्य कर्मियों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति।
बिहार में रेफरल अस्पताल कुटुंबा को स्वास्थ्य व्यवस्था का एक टेस्ट केस मानते हुए वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है। वहां स्वीकृत 214 पदों में से 130 पद रिक्त हैं और केवल 84 कर्मियों के बल पर अस्पताल चल रहा है अर्थात मात्र 39%पदों पर नियुक्ति हुई है। जाहिर है मरीजों को भारी कठिनाई हो रही है और वे प्राइवेट डॉक्टरों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। एक-एक डॉक्टर को रात दिन काम करना पड़ रहा है। कभी-कभी दो से तीन दिन लगातार काम करना पड़ रहा है।
इस अस्पताल में 250 मरीज रोज ओपीडी में आते हैं और 25 से 30 मरीज इमर्जेंसी में होते हैं और एक या दो चिकित्सकों पर पूरा भार आ जाता है। यहां चिकित्सा पदाधिकारी के लिए 27 पद स्वीकृत हैं जिसमें से मात्र दो पदों पर नियुक्ति हुई है। फार्मासिस्ट के 11 में से एक भी पद पर नियुक्ति नहीं हुई है। ANM के 70 में से 30 पद रिक्त हैं। परिचारिका के दस में से एक भी पद पर नियुक्ति नहीं हुई है।बुनियादी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तीन में से दो पद रिक्त हैं। मलेरिया निरीक्षक और स्वच्छता निरीक्षक के दोनों पद रिक्त हैं। चालक, शल्य कक्ष सहायक X रे तकनीशियन कंप्यूटर ऑपरेटर के पद खाली हैं। अधिकांश डॉक्टर वहां टिकते नहीं है, बल्कि इस्तीफा देकर चले जाते हैं।
ऐसे ही भोजपुर जिले में एक अस्पताल की बिल्डिंग 5 साल से खड़ी है लेकिन वहां कोई डॉक्टर नहीं है केवल गार्ड रहता है। ANM कभी-कभार आती हैं और लोगों को दवाएं दे देती हैं जबकि वहां दो MBBS समेत तीन डॉक्टर होने चाहिए।
इसलिए चमचमाती बिल्डिंग नहीं स्वास्थ्य कर्मियों की बहाली की जरूरत है बिहार में। ऐसा नहीं है कि बिहार में योग्य डॉक्टरों का अभाव है लेकिन शासन प्रशासन की कृपा से उनकी नियुक्ति नहीं हो रही है और लोग दस-दस साल से कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं। नए मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं लेकिन वहां टीचर नहीं हैं। CAG के अनुसार आवंटित बजट ही खर्च नहीं हो पाया उसका कारण यह है कि जिलों से मांगपत्र ही नहीं प्राप्त हुआ। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के 1.33% से लेकर 1.73% के बीच ही स्वास्थ्य के लिए खर्च हो रहा है। राजधानी पटना में 18%नर्स की कमी है। पूर्णिया में 72% जमुई में 45% पैरा स्टाफ की कमी है। आयुष चिकित्सा में 35% से 81% तक की कमी है। CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि IPS मानकों के अनुसार प्राथमिक स्तर पर 61%, द्वितीयक स्तर पर 56%, तीसरे स्तर पर 49% और आयुष के 62%पद रिक्त हैं।
इससे समझा जा सकता है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के सरकार के सारे दावे किस तरह खोखले हैं। बिना पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति के सेवाओं में सुधार की बात बेमानी है। इसके लिए नागरिक समाज और विपक्ष द्वारा दबाव तथा बिहार में राजनीतिक बदलाव जरूरी है।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)