बीएचयू में ‘संघ मॉडल’ की घुसपैठ? कार्यकारिणी में भाजपा नेताओं की नियुक्ति पर विपक्ष भड़का, शिक्षा के भगवाकरण पर धर्मेंद्र प्रधान पर उठे सवाल

वाराणसी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की कार्यकारिणी परिषद (Executive Council-EC) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े तीन नेताओं की नियुक्ति ने न केवल विश्वविद्यालय परिसर, बल्कि देशभर के शिक्षाविदों, पूर्व छात्रों और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित इस ऐतिहासिक संस्था की प्रशासनिक सर्वोच्च परिषद में ऐसी राजनीतिक नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह शिक्षा और शुद्ध अकादमिकता की संस्था को राजनीतिक अखाड़े में बदलने की शुरुआत है?

बीएचयू अधिनियम के तहत कार्यकारिणी परिषद में कुछ सदस्यों का मनोनयन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, जो विश्वविद्यालय के विज़िटर भी हैं। हाल ही में इस प्रक्रिया के तहत तीन नेताओं को परिषद में शामिल किया गया, जो भाजपा या उससे संबद्ध संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से गहरे जुड़े हैं। इनमें चंदौली के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय, वाराणसी के महापौर अशोक तिवारी, और मिर्ज़ापुर के चुनार में आदर्श जनता महाविद्यालय चलाने वाले भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष दिलीप पटेल शामिल हैं। पांडेय का राजनीति में लंबा अनुभव है, लेकिन शिक्षा में उनकी विशेषज्ञता सीमित है। तिवारी को शैक्षणिक क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय अनुभव नहीं है, और पटेल की शैक्षिक नीति निर्माण में सक्रियता नगण्य रही है।

इसके अलावा, परिषद में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग के प्रो. ओमप्रकाश भारतीय और प्रो. श्वेता प्रसाद, तथा प्राणीशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर बेचन लाल को भी शामिल किया गया है। आलोचकों का दावा है कि इनमें से कई प्रोफेसर नियमित रूप से आरएसएस की शाखाओं में भाग लेते हैं, जिससे परिषद की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

बीएचयू की स्थापना से यह संस्था अकादमिक स्वायत्तता, शैक्षणिक उत्कृष्टता और बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रतीक रही है। कार्यकारिणी परिषद विश्वविद्यालय की नीतियाँ बनाती है, नियुक्तियाँ करती है, शोध की दिशा तय करती है, और बजट व अकादमिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में राजनीतिक नियुक्तियाँ यह सवाल उठाती हैं कि क्या शैक्षिक योग्यता और बौद्धिक प्रतिबद्धता की जगह अब पार्टी निष्ठा ही एकमात्र कसौटी बन गई है?

आरएसएस की प्रयोगशाला

बीएचयू, जिसे एशिया का सबसे बड़ा शैक्षणिक केंद्र माना जाता है, पंडित मदन मोहन मालवीय ने चंदे से स्थापित किया था। उन्होंने विश्व भर के विद्वानों को यहाँ शिक्षण के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन, आलोचकों का कहना है कि आरएसएस ने चुपके से विश्वविद्यालय में प्रवेश किया और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया।

1937 में मालवीय जी के समय आरएसएस को ‘डंडा शाखा’ संचालित करने के लिए परिसर में भूमि दी गई थी, जिसे ‘आर्मरी’ या ‘पवेलियन’ कहा गया। 1975 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन कुलपति कालू लाल श्रीमाली ने इसे ध्वस्त कर दिया। आरएसएस इसे “सांस्कृतिक केंद्र” कहता है, लेकिन परिसर में किसी विचारधारा की स्थायी और संगठित उपस्थिति शिक्षा की तटस्थता और लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल उठाती है।

बीएचयू एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है, जिसकी आत्मा अकादमिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता में निहित है। आरएसएस की शाखाएँ और उनका “शारीरिक प्रशिक्षण आधारित अनुशासन मॉडल” आलोचकों के अनुसार सैन्यीकरण को बढ़ावा देता है और विश्वविद्यालय के बौद्धिक परिवेश को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

पिछले वर्ष आरएसएस ने अदालत में याचिका दायर कर दावा किया कि ‘आर्मरी हाउस’ एक सांस्कृतिक भवन था। लेकिन इसका ऐतिहासिक स्वरूप बताता है कि यह संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र था, जहाँ ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की विचारधारा का प्रचार होता था। बीएचयू ने अदालत में कहा, “शैक्षणिक परिसर में धार्मिक या वैचारिक संगठनों की स्थायी उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है।” यह उत्तर विश्वविद्यालय की तटस्थता की रक्षा के लिए तार्किक और आवश्यक है।

परिसर में मंदिर और पूजा स्थल निजी उपासना के लिए हैं, न कि किसी संगठन के प्रचार या अनुशासन थोपने के लिए। बीएचयू को वैचारिक अखाड़े में बदलना न तो संवैधानिक है और न ही इसके बौद्धिक उद्देश्यों के अनुरूप।

क्या हैं समस्याएँ?

संकट मोचन मंदिर के महंत और बीएचयू के इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं, “पहले बीएचयू में कुलपति पद के लिए आवेदन नहीं मँगाए जाते थे। कार्यकारिणी परिषद प्रतिष्ठित व्यक्तियों से कुलपति बनने का आग्रह करती थी। ऐसे लोग विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ाते थे और उनके अधीन प्राध्यापक निष्ठापूर्वक काम करते थे।”

छात्रों की शिकायतें भी कम नहीं हैं। बिड़ला छात्रावास के शोध छात्र सुमित कहते हैं, “छात्रसंघ न होने के बावजूद छात्र विभिन्न राजनीतिक दलों में बँटे हैं। सबसे खतरनाक यह है कि इस राजनीति में छात्र और अध्यापक एक साथ खड़े दिखते हैं।” छात्रों को इस बात का मलाल है कि विश्वविद्यालय का विशाल बजट होने के बावजूद शोध की उच्चस्तरीय व्यवस्था नहीं है, और पिछले कुछ वर्षों में हुई शिक्षक नियुक्तियाँ इसकी जिम्मेदार हैं।

छात्र राजनीति से तीखी प्रतिक्रियाएँ

बीएचयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव ने इन नियुक्तियों को “बौद्धिक संस्कृति का गला घोंटने वाला” बताया। वे कहते हैं, “भाजपा नेताओं की नियुक्ति महामना के सपनों का अपमान है। बीएचयू को सांस्कृतिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और बहुलता का केंद्र बनाना था, लेकिन अब विचारधारा प्राथमिकता बन गई है। मनोनीत लोगों का शैक्षणिक परंपरा से कोई संबंध नहीं। यह विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र चिंतन के स्थान से सत्ता की प्रचार मशीन में बदलने की साजिश है।”

कांग्रेस नेता संजीव सिंह ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से सवाल किया, “क्या इन मनोनीत भाजपा नेताओं की कोई शैक्षणिक उपलब्धि है? क्या इन्होंने कभी शोध, शिक्षण या विश्वविद्यालय संचालन में योगदान दिया है, या सिर्फ़ पार्टी निष्ठा उनकी पहचान है? यह निर्णय शिक्षा की आत्मा को छलनी कर देगा।”

छात्र संगठनों का प्रतिरोध

बीएचयू परिसर में आइसा, एसएफआई, एनएसयूआई और समाजवादी छात्र सभा जैसे संगठनों ने साझा प्रतिरोध शुरू किया है। छात्र जितेंद्र यादव कहते हैं, “यह नियुक्तियाँ शिक्षा के स्वायत्त चरित्र पर हमला हैं। कार्यकारिणी परिषद में राजनीतिक चेहरों के बैठने से प्रोफेसरों की नियुक्ति, शोध और अकादमिक स्वतंत्रता के निर्णय निष्पक्ष कैसे होंगे?”

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), जो भाजपा की छात्र शाखा मानी जाती है, इन नियुक्तियों का समर्थन करती है। एबीवीपी के प्रशांत पांडेय कहते हैं, “विश्वविद्यालय को राष्ट्रवादी मूल्यों के अनुरूप चलाना आज की ज़रूरत है। विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि वामपंथी और सेक्युलर तबकों की एकाधिकारवादी स्थिति टूट रही है।”

विपक्ष के निशाने पर धर्मेंद्र प्रधान

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा, “बीएचयू में शिक्षाविदों की जगह भाजपाई बैठाए जा रहे हैं। महामना का सपना ज्ञान और तप का केंद्र था, लेकिन भाजपा इसे संघ का अड्डा बना रही है।” उन्होंने चेतावनी दी, “यह सरकार विश्वविद्यालयों को संघ के प्रचार केंद्र में बदलना चाहती है। हम सड़क से संसद तक आंदोलन करेंगे।”

समाजवादी पार्टी और वाम दलों ने भी इस मुद्दे को उठाया। सपा नेता मनोज राय धूपचंदी कहते हैं, “शिक्षा मंत्रालय की अपारदर्शिता दर्शाती है कि सरकार विश्वविद्यालयों को ‘विचारधारा केंद्र’ बनाना चाहती है।”

‘डिग्री की दुकान न बन जाए बीएचयू’

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष शिवकुमार सिंह कहते हैं, “पहले बीएचयू का सिस्टम लोकतांत्रिक था। छात्रसंघ, कर्मचारी संघ और अध्यापक संघ स्वस्थ राजनीति का मंच थे। लेकिन अब विश्वविद्यालय को कोचिंग सेंटर बना दिया गया है।” वे कहते हैं, “जातिवाद का ज़हर विश्वविद्यालय तक फैल चुका है। आरएसएस के लोग बीएचयू को रसातल में ले जा रहे हैं।”

पूर्व छात्र और किसान नेता चौधरी राजेंद्र सिंह कहते हैं, “बीएचयू अब शिक्षा का केंद्र नहीं, व्यापार और दलाली का अड्डा बन रहा है। पढ़ाई का स्तर गिर चुका है, शोध की दिशा नहीं है, और छात्रावासों की स्थिति दयनीय है।”

वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं, “इन नियुक्तियों से बीएचयू का आरएसएसकरण हो रहा है। यह महामना की भावना और शिक्षा की आत्मा के खिलाफ है।” पत्रकार राजीव सिंह जोड़ते हैं, “चयन सिफारिश और नजदीकी पर आधारित है। यह विश्वविद्यालय की नीतिगत संरचना के साथ मज़ाक है।”

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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