आरएसएस के सौ साल पूरा होने पर दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान माला में इसके सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि बस तीन की बात है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर आंदोलन में संघ शामिल हुआ था और उसे अंत तक ले गया था। काशी-मथुरा में संघ शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वयंसेवक इसमें भागीदारी कर सकते हैं। उनका यह भी कहना है कि यह भाईचारा का मामला है और उन्हें इसे दे देना चाहिए। 100 साल पूरा होने पर मूल जमा यही बात है कि काशी, मथुरा बाकी है।
मोहन भागवत जिस अदा से बात कर रहे हैं, क्या सचमुच यह काशी और मथुरा तक का ही मामला है। अभी हाल के दिनों में राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तक में जिस तरह मजारों, मस्जिदों और धार्मिक उपासना स्थलों पर दावा किया गया, उन पर हमले किये गये, उन्हें नुकसान पहुंचाया गया, ये घटनाएं उनके बयान से मेल नहीं खाती हैं। यह सिर्फ इन उपासना स्थलों पर हमला ही नहीं किया गया, इस पूरी प्रक्रिया में धार्मिक समूहों को नुकसान पहुंचाया गया। इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासन, पुरातत्व विभाग तक को शामिल करा लिया गया। ऐसे में, पहला सवाल यही बनता है कि जिस भाईचारा की वह बात कर रहे हैं, उसकी जमीन कितनी बची हुई है!
काशी, मथुरा के लिए संघ आंदोलन नहीं चलाएगा, तब यह सवाल ज़रूर बनता है कि इसे कौन चलाएगा? उनके बयान में यह बात निहित है कि इसे कोई चलाएगा जिसमें संघ के स्वयंसेवक शामिल होंगे। ‘रामजन्म भूमि आंदोलन’ को तो सीधे भाजपा के बैनर तले चलाया गया और बाकी संगठन इसके पीछे गोलबंद हुए। क्या इसे भी भाजपा अपने नेतृत्व में अंजाम देगी? मुझे लगता है कि ऐसा ही होने वाला है।
साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण की नीतियों ने दुनिया भर के संसदीय उदारवादी लोकतंत्र को संसद के मुखौटे में तानाशाह लोकतांत्रिक ढांचे की ओर ले गया जिसमें चुनाव प्रभुत्वकारी समूहों का एक खिलौना बन गया। इस दौर में अमेरीका बेलगाम युद्ध की नीति पर चला और मनमाने तरीके से दूसरे देशों पर अपनी आर्थिक नीतियों को लादता गया। यही वे नीतियां हैं जिनके भीतर से साम्राज्यवादी आकांक्षाएं फासीवादी राष्ट्रवाद में अभिव्यक्त हो रही हैं और इस विचारधारा पर कई सरकारें उभर कर आई हैं।
भाजपा और आरएसएस के कई विचारक इसी फासीवादी राष्ट्रवाद को एकाधिकारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में पेश कर रहे हैं और राष्ट्रीय एकात्मवाद को आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक मान रहे हैं। इसे ही हिंदू होने की परिभाषा, भाईचारा, साथ-साथ चलने, एक हो जाने आदि के माध्यम से पेश कर रहे हैं। ये खुद को ऐसे समुद्र की तरह पेश कर रहे हैं जिसमें सभी का आ गिरना एक नियति की तरह है।
इस राष्ट्रीय एकात्मवाद में जो शीर्षस्थ है वही निर्णायक है। वह चाहे उद्योगपति हो, राजनीतिक पार्टी हो, नेता हो, धार्मिक आचार्य हो या ऐसा कोई और हो। नीचे होने का अर्थ यह नहीं है कि वह इसका हिस्सेदार है। वह सिर्फ उनके आदेशों का ताबेदार है। किसी आंदोलन में हिस्सेदारी करना और न करना, उसकी इच्छा का मसला नहीं है। दरअसल, जो शीर्षस्थ है, वह आंदोलन के समय में होने वाली हिंसा की जिम्मेदारियों से खुद को अलग करने की रणनीति अपनाता है और हिंसा के जिम्मेदार अनाम स्वयंसेवकों को खुले सांड की तरह छोड़ देता है। आज देश भर में सैकड़ों ऐसे संगठन उभर कर आ गये हैं जो न तो पंजीकृत हैं और न ही उनकी ठोस उपस्थिति है। वे ज्यादातर डिजिटल माध्यमों पर दिखते हैं और अचानक ही गोलबंद होकर सड़क पर उतर आते हैं। वे न सिर्फ हिंसा को अंजाम देते हैं, उसका विडियो बनाकर उसे डिजिटल माध्यमों से प्रसारित करते हैं।
हम भारत की अर्थव्यवस्था में भी यही स्थिति पाते हैं। मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार 10 साल पूरे कर आगे जा रही है। इन दस सालों में कम से कम तीन बार ऐसी आर्थिक स्थितियां बनी हैं जिसमें अर्थव्यवस्था का निचला हिस्सा तबाह होने की ओर गया है। पहला, नोटबंदी जिसने किसानों से लेकर छोटे उद्योगपतियों की कमर तोड़ दी। वहीं सट्टाबाजारियों, सूदखोरों को खुली छूट मिली और अडानी-अंबानी समूहों का उभार हुआ। दूसरा, कोविड महामारी के समय में किया गया लॉकडाउन। इसने छोटे उद्योगपतियों, मझोले उद्यमियों से लेकर पूरे मजदूर वर्ग को तबाही के गर्त में धकेल दिया।
तीसरा, अमेरिकी टैरिफ, इसके प्रभाव में सिर्फ छोटे, मझोले उद्योगपति ही नहीं बड़े उद्यमी और व्यापारी भी तबाह होने के कगार पर हैं। तेल के खेल और आपदा को अवसर बनाने की नीति भारत की विदेश नीति उस जगह जाकर खड़ी हो गई जहां भारत को रूस-यूक्रेन युद्ध में एक अपराधी बना देने की अमेरिकी धौंस में बदल दिया है। इस पूरे प्रकरण का पूरा फायदा अडानी, अंबानी और कुछ बड़े उद्योगपतियों को मिला है जबकि भारत का अन्य उद्यमी समूह और जनता इससे न सिर्फ वंचित है, इससे होने वाली तबाही का भार उठा रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था जिस तबाही के मंजर से गुजर रही है, वैसी ही स्थिति राजनीतिक पटल की है। कानून और लोकतंत्र को बराबर कर जनतंत्र का नजारा पेश किया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि कानून की नजर में सब बराबर है। जबकि कानून में इतने संशोधन कर दिये जा रहे हैं जिसमें से लोकतंत्र की आत्मा खोजे भी नहीं मिल रही है। कानून संशोधनों में संसद को महान बना दिया जा रहा है और संसद में बहुमत को पवित्र घोषित कर दिया जा रहा है। इसे पहले मुर्गी या अंडा के तर्क पद्धति में उलझाया जा रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस बनाम मोदी, भाजपा के सूत्र पर कयास लगाने वाला बुद्धिजीवी समुदाय मोहन भागवत के तीसरे दिन दिये गये वक्तव्य से, जिसमें वह काशी, मथुरा के बाकी होने को दुहराया है, कैसे पढ़ेगा? उदारवादी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा समूह है जो लंबे समय से इस उम्मीद में बैठा है कि मोदी और आरएसएस के बीच कब विवाद बढ़ेगा और कब मोदी की विदाई हो जाएगी? वह यह भूल जाता है कि आरएसएस की भाजपा में भूमिका संघर्ष की नहीं एकत्व की ही है। यह उससे अलग और विवाद की स्थिति में जा ही नहीं सकता।
सरसंघचालक मोहन भागवत का तीसरे दिन के बयान का केंद्र उत्तर-प्रदेश है। निश्चित ही अगला राजनीति उभार इस राज्य से होने वाला है। आरएसएस इस गोलबंदी की ओर जाएगा, उसका नेतृत्व बनाएगा। भाजपा में इसमें अग्रिम भूमिका निभाने की तरफ बढ़ेगी। यही सच है।
ऐसे में कयास लगाने वाले बुद्धिजीवी समुदाय को ज़रूर ही इस ओर बढ़ जाना चाहिए कि आने वाले समय में भारतीय राजनीति, समाज और आर्थिक तबाही किस स्तर पर होने वाली है और इसका दूरगामी असर क्या होगा! इसके लिए सबसे पहले स्वदेशी का राग अलापना बंद करना होगा और खुली आंखों से देश की तबाही को पढ़ना होगा। उन नीतियों और कारणों को पढ़ना होगा जिसमें तबाही का पैटर्न एक तरह का है। यह पढ़ना जनवाद के पक्ष में खड़ा होने की पहली शर्त है। कम से कम इस शर्त को पूरा करना चाहिए।
(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)