राजनीति के खेल में राष्ट्रवाद जेब में

राष्ट्रवाद क्या है? यह सवाल यदि आपके प्रश्नपत्र में पूछा जाए और इसे 200 शब्दों में लिखना हो, तब आप उसी स्वीकार योग्य परिभाषा को लिखेंगे, जिस पर कोई विवाद न हो। तब आप ज्यां बोदां, जेन ऑस्टिन की कानून सम्मत प्रभुसत्ता, हाब्स, लॉक, रूसो त्रयी के स्वतंत्रता और काण्ट के दर्शन का हवाला देते हुए इनकी आलोचना मार्क्सवाद के आलोक में नहीं करने जाएंगे। आप सीधे इसे पूंजीवाद के उद्भव के साथ जोड़ेंगे और आधुनिक राष्ट्र-राज्य के उद्भव के साथ अपने लेख का समापन कर देंगे।

लेकिन, यदि आपको भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में लिखना हो तब आप क्या करेंगे? इसकी कानून सम्मत प्रभुसत्ता, स्वतंत्रता के जनक और दर्शन के लिए आप किन्हें याद करेंगे? इसे लिखना बेहद जटिल है। विपिन चंद्र जैसे इतिहासकार, गांधी की अहिंसा, विवेकानंद का अद्वैतवाद, टैगोर की आशंकाएं, कांग्रेस का उद्भव, आरएसएस के दावे और मुस्लिम लीग के झगड़े के बीच आप को डा. आंबेडकर की उपस्थिति और भगत सिंह के सपने आप को उलझा देने के लिए काफी होंगे। इस दौरान भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की उपस्थिति को भी देखना पड़ेगा।

यह सब तो इतिहास की बात हुई। यदि आपको राष्ट्रवाद को समसामयिक अवस्था में परिभाषित करना हो तब इसे कैसे परिभाषित करेंगे? ऐसा मैं इसलिए लिख रहा हूं कि यह मेरे लिए सचमुच बेहद बेहद कठिन लगने लगा है। कहते हैं कि किताबी बातें बीती हुई बातें होती हैं। जो चल रहा है वही मूल बात है। जो चल रहा है, वह कहीं से आ तो रहा ही है। मसलन, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अचानक ही अमेरिकी नागरिकों के लिए बेहद चिंतित दिखने लगे हैं और इससे भी अधिक वह अमेरिकी राष्ट्रवाद की बात करने लगे हैं। यही हालत फ्रांस, जर्मनी, इटली से लेकर रूस तक फैला हुआ दिखाई दे रहा है।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपने राष्ट्रवाद को पूरा करने के लिए यूक्रेन पर युद्ध लादे हुए उस पर कब्जा करने की ओर बढ़ रहा है। इजरायल पूरा फिलिस्तीन ही चबाकर खा जाने पर उतावला है और कई मायनों में तो जर्मनी के हिटलर को भी मात दे दिया है। अमेरिकी दुनिया के देशों पर अपना सीमा कर, टैरिफ लगाकर उन्हें पीछे की ओर धकियाता रहा है। ऐसे में, अपने देश का राष्ट्रवाद क्या कर रहा है?

पिछले दस सालों से अधिक समय से भारत की वह राष्ट्रवादी विचारधारा राज कर रही है मैजिनी के जर्मन एकीकरण को आदर्श मानता रहा है, धर्म की सत्ता को प्रमुखता देता रहा है और शस्त्र पूजन में आस्था रखता रहा है। भाजपा के नेतृत्व में इन तीनों क्षेत्र में खूब दावा किया गया है। भारत के एकीकरण करने का दावा पूरा कर दिया गया है। धर्म की सत्ता को भी पूरा किया गया। भारत को सशस्त्र और मजबूत बनाने का दावा भी किया गया। यह भी दावा किया गया कि भारत का दुनिया में डंका बज रहा है। इस राष्ट्रवाद का आत्मविश्वास इतना बढ़ चुका था कि भारत के प्रधानमंत्री अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिकी सदन के राष्ट्रपति चुनाव में खड़े ट्रंप का प्रचार तक कर आये। यह दुनिया की राजनीति में एक अभूतपूर्व घटना थी।

लेकिन, अचानक ही दृश्य में बदलाव आ गया। इस भारतीय राष्ट्रवाद का अमेरिकी प्रेम किशोरावस्था के टूटे प्रेम की तरह बिखर गया। ट्रंप मोदी का नाम लिए जा रहे हैं लेकिन मोदी हैं कि पलटकर देखने को तैयार नहीं हैं। लेकिन, यह सवाल है कि ट्रंप और मोदी के बीच जो रिश्ता चल रहा था, वह दो राष्ट्रों के बीच का रिश्ता था या यह दो ऐसे राष्ट्राध्यक्षों के बीच था जो उनके अपने निर्णयों से निर्धारित हो रहा था?

अभी चंद महीनों पहले, जब भारत पाकिस्तान के भीतर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चला रहा था उस समय पाकिस्तान को खुली सहायता करने वालों में दो नाम प्रमुखता से आये। पहला, तुर्की और दूसरा, चीन। इन दोनों देशों के खिलाफ भारत का राष्ट्रवाद चुनौती दे रहा था और इनसे निपटने की तैयारी करने की बात कर रहा था। इस काम में सबसे मुखर मीडिया था और उसके बाद नेता और छुटभैया समूह।

बस चंद महीनों के बाद, भारत के प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति के बुलावे पर भी अमेरिका नहीं गये, लेकिन वह चीन ज़रूर पहुंच गये। वह रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ त्रिकोण बनाते हुए बड़ी अदा के साथ फोटो खिंचाते हुए दिख रहे हैं। भारत के एक बड़े अखबार ने लिखा है: ‘थियानजिन त्रोईका, हेल्लो ट्रंप’। इन मुलाकातों के समय में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी वहां मौजूद थे। निश्चित भारत के मीडिया के लिए भारत की खबर मुख्य है तो फोटो का चुनाव भी इसी तरह का है।

हैरानी की बात है कि एक या दो महीने पहले भारत के प्रधानमंत्री चीन के सामानों के बहिष्कार की बात कर रहे थे। और, चंद दिनों पहले वह स्वदेशी पर जोर दे रहे थे। कुछ महीने पहले वह इंग्लैंड में वह वहां की विलासिता वाले सामानों के आयात पर टैक्स कम कर रहे थे और बदले में वहां के पूंजी निवेश को आकर्षित करने वाली नीतियों पर हस्ताक्षर कर रहे थे।

अब यहां सबसे अहम सवाल यही है कि भारत के राष्ट्रवाद का हम क्या करें? इसे कैसे परिभाषित करें? चंद महीनों पहले अमेरिका जिंदाबाद नारे लगाने वाले अब क्या करें? चंद महीनों पहले चीन को कोसने वाले और उसके खिलाफ जंग छेड़ने तक की बात करने वाले अब क्या करें? क्या राष्ट्रवाद और विदेश नीति के बीच कोई संबंध नहीं बचा? क्या भारतीय राजनय की कोई दार्शनिक अवस्थिति नहीं है? इसकी कोई ठोस विचारधारा नहीं है? क्या इसकी यह नीति हो गई है कि जहां से हित पूरा हो, उसी के साथ हो लो?

यदि ऐसा है तो यह भयावह है। चीन के राजनीतिक प्रमुखों ने एक कहावत गढ़ी थी कि भारत एक ऐसा अंडा है जो रूस और अमेरिका दोनों की टोकरी में समा जाता है। क्या भारत अब चीन की टोकरी में भी समा जाने की स्थिति में आ चुका है? इस संदर्भ में काफी पहले विदेश मंत्री जय शंकर ने ठोस बयान दिया था। लोगों ने उनकी बात का मर्म नहीं समझा। इस मर्म को मोदी की चीन यात्रा ने खोल कर दिखा दिया है। आज चीन रूस और अमेरीका जैसा बड़ी टोकरी बन चुका है।

भारत एक विशाल देश दुनिया के तीन टोकरियों, अमेरिका, रूस और चीन में से अमेरिका को छोड़कर चीन और रूस की टोकरी में उतरने के लिए बढ़ गया है। यह सब चंद महीनों में होते हुए दिख रहा है। भारत का राष्ट्रवाद मोदी की जेब के साथ घूम रहा है। भारत के राष्ट्रवादी उतनी तेज गति से यात्रा करते हुए नहीं दिख रहे हैं जितनी तेज गति से प्रधानमंत्री मोदी विदेश की यात्रा कर रहे हैं।

यही कारण है कि भारत राष्ट्रवाद की परिभाषा अकादमिक तौर पर जितना जटिल है उससे भी जटिल है इसकी राजनीतिक परिभाषा करना। भारतीय राजनय में ऐसा कोई कंपास नहीं जिसके आधार पर आप राष्ट्रवाद की दिशा पकड़ लें। यही कारण है कि राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। इसके नाम पर कानूनी प्रक्रिया बनाकर इसके समानान्तर शब्दावली, मसलन प्रभुसत्ता, अखंडता, सरकार, व्यवस्था आदि को रेखांकित कर आपको निपटाया जा सकता है, यहां तक कि फांसी के तख्ते पर झुलाया जा सकता है। लेकिन, इस राष्ट्रवाद को इसकी राजनीतिक परिभाषा, इसका दर्शन, इसकी विदेश नीति, इसका राजनय आदि को ठोस ढंग से पेश नहीं किया जाएगा। ऐसी समस्या आप हाल ही के दिनों में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के भाषण और प्रधानमंत्री मोदी के राजनय में देख सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि भारत के राष्ट्रवाद को परिभाषित करना संभव नहीं है। राष्ट्रवाद मूलतः जनवाद ही है। जिस देश की 80 प्रतिशत आबादी अनुत्पादक समूह में बदल दिया जाए। जहां संगठित उत्पादन की पद्धति 5 प्रतिशत हिस्से तक सिमट जाए और असंगठित उत्पादन ही मुख्य हो जाए, जहां मेले, ठेले को ही आर्थिक गतिविधियों का केंद्र माना जाने लगे और धर्म से अर्थव्यवस्था को ठेले जाने की नीति अपनाई जाने लगे, जहां देश की संपदा चंद हाथों में सिमटती जाए और उत्तरदायित्व का सारा भार गरीबों पर डाल दिया जाए, उनकी झोपड़ियों को तोड़ कर शहर से दर बदर कर दिया जाए, प्राथमिक स्कूलों को बंद कर देने की घोषणा की जाए, जहां जन का कोई अर्थ ही नहीं बचे वहां राष्ट्रवाद की तलाश मुश्किल होगी। जन के बिना जितना राष्ट्र बचता है उतने का ही राष्ट्रवादी चीखें सुनाई देंगी। बिके हुए मीडिया, धर्मगुरू, राजनेता, उद्योगपति आदि के राष्ट्रवाद को देखिये, इन्हें ही समझिये। भारत का राष्ट्रवाद इन्हीं तक सिमट गया है और सिमटता जा रहा है।

जो राष्ट्रवाद जितना ही संकीर्ण होता जाता है, जन से दूर होता जाता है,…उसका जनवाद उतना ही कम होता जाता है। शासकों का एक छोटा समूह राज्य की सारी सत्ता को अपने हाथ में लेते जाता है और सरकार को एक कानून की मशीन में बदल देता है। ऐसा करते हुए शासकों का यह छोटा समूह राष्ट्रवाद को छोड़ता नहीं है बल्कि इसे बनाये रखने के लिए इसकी आवाज की ऊंचाई को बढ़ाते हुए चीख में बदलने लगता है। देखते-देखते यह एक शोर में बदल जाता है। यह राष्ट्रवाद का शोर होता है। पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का शोर तेजी से भयावह चीख में बदल रहा है।

भारत का राष्ट्रवाद इससे कहीं अधिक नायाब है। इस राष्ट्रवाद को समझने के लिए किसी किताब को पढ़ने की जरूरत नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर भारत के राष्ट्रवाद की नियति देश के प्रधानमंत्री के साथ बंधी हुई है। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ यह पहले से कहीं अधिक गतिमान हो चुकी है और फोटो क्लिक के समय में अधिक अभिव्यक्त होती है। प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा इस मामले में एक लंबी छलांग है।

(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।) 

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