बिहार इस बार करेगा विपक्ष के भाग्य का फैसला

दिल्ली की आंखों से जो लोग बिहार को देख और निहार रहे हैं और बिहार में रहने वाले लोग जिस अंदाज़ से बिहार को समझ रहे हैं उसमें बड़ा अंतर है और सबसे बड़ा अंतर तो यही है कि बिहार के लोग बदलाव तो चाह रहे हैं लेकिन किस नेता पर दांव लगाया जाए इसको लेकर बड़ा असमंजस की हालत है। सच तो यह है कि लगातार चुनाव जीतने वाली पार्टी भी इस बार सरकार बनाने का दावा कर रही है। बीजेपी और जदयू को आप इस रूप में देख सकते हैं।

उधर विपक्ष की पार्टियां राजद, माले और कांग्रेस के लोगों को इस बड़ी उम्मीद है कि जनता कोई बड़ा निर्णय ले सकती है और सत्ता बदल सकती है। इसी उम्मीद में सत्तापक्ष और विपक्ष के नेता तरह-तरह के खेल और तमाशा करने से बाज नहीं आ रहे हैं। लेकिन सभी पार्टियों के समर्थकों को अगर आप छोड़ दीजिए तो बिहार में एक बड़ा तबका ऐसे वोटरों के रूप में उभरा है जो न किसी सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में खड़ा है और न ही विपक्ष में। बिहार का यह नया बदलाव आगामी राजनीति को प्रभावित करने के लिए काफी है।

हिंदी पट्टी का एक महत्वपूर्ण राज्य, बिहार हमेशा से ही पार्टियों और नेताओं के लिए राजनीतिक एजेंडा तय करने वाला क्षेत्र रहा है। इस बार यह राज्य कई लोगों का करियर बना और बिगाड़ सकता है। जैसे-जैसे चुनाव का समय नज़दीक आ रहा है, ध्यान फिर से इस बात पर केंद्रित हो रहा है कि राज्य और बिहार के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं। इस बार जब मतदाता बिहार में सरकार चुनने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, तो ज़रूरतों और चाहतों के दुष्चक्र का वास्तविकता से सामना होगा। लेकिन, बिहार अपनी सरकार से वास्तव में क्या चाहता है?

चुनाव जीतने के लिए कई ज़मीनी मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वर्ष 2025 मतदाता सूची पर हुए विवाद के लिए याद किया जाएगा। इस साल जून में भारत के चुनाव आयोग द्वारा घोषित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और विपक्षी दल इंडिया ब्लॉक के बीच प्रमाणों की लड़ाई साबित हुआ। ईसीआई ने बिहार में मतदाता सूची में मृत या अन्यत्र चले गए लोगों के नामों को समायोजित करने के बाद, संशोधन करने के लिए पूरी मतदाता सूची को संशोधित करने का एक बड़ा अभियान चलाया। विपक्ष ने कहा कि यह बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ब्लॉक की मदद के लिए मतदाताओं को हटाने की एक कवायद है। एसआईआर को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और इस बीच, विपक्ष ने ईसीआई पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हुए ‘मतदाता अधिकार’ मार्च निकाला।

सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन अदालत ने आधार कार्ड को पहचान पत्र के प्रमाण के रूप में स्वीकार न करने के चुनाव आयोग के विचार को खारिज कर दिया। चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले, इस महीने के अंत तक नई मसौदा सूची प्रकाशित करने की समय सीमा तय की है।

केंद्र में एक और प्रमुख मुद्दा युवाओं के लिए रोज़गार सृजन होगा। राजद नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार सरकार से पूछे गए अपने 12 बड़े सवालों में बिहार के लोगों की प्रमुख चिंताओं में बेरोज़गारी और पारदर्शिता की कमी का ज़िक्र किया है। यादव ने नीतीश की 20 साल की सरकार पर कई सवाल उठाते हुए कहा, “भर्ती परीक्षाएं अनियमित, विलंबित और पारदर्शिता की कमी क्यों हैं?”

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में बिहार में बेरोज़गारी दर (15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग) 7 प्रतिशत थी। यह दर 2018-19 में बढ़कर 9.8 प्रतिशत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, उसके बाद के वर्षों में (2021-22 को छोड़कर) बेरोज़गारी दर में गिरावट आई है। रेलवे परीक्षाओं, बीपीएससी परीक्षाओं आदि के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पहले से ही नीतीश सरकार के लिए परेशानी का सबब रहा है, जिसमें प्रशांत किशोर जैसे नेता भी शामिल थे।

बिहार से दूसरे राज्यों में पलायन करने वाले लोग उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच विवाद का विषय रहे हैं। तेलंगाना और तमिलनाडु में हुई कई आपराधिक घटनाओं ने राजनीतिक अराजकता पैदा कर दी है और इन राज्यों के नेताओं ने हिंसक घटनाओं के लिए बिहारियों को ज़िम्मेदार ठहराया है। जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन बिहार में विपक्ष की रैली में शामिल हुए, तो सत्तारूढ़ एनडीए ने यह कहते हुए हमला किया कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव उन लोगों के साथ हैं जो बिहार और उसके लोगों का अपमान करते हैं।

बिहार दशकों से बुनियादी ढांचे, आर्थिक और औद्योगिक विकास के मामले में संघर्ष कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ की तुलना लालू यादव के ‘जंगलराज’ से करते हुए कहा है कि एनडीए के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य में विकास की गति को तेज़ी से बढ़ाया है। जनता इसे भी देख रही है और ठहाका भी लगा रही है। जनता कहने से बाज नहीं आ रही है कि नीतीश सरकार जिस बात का खिलाफ पहले करते थे अब चुनाव से पहले नकदी बांटने का खेल करते आ रहे हैं। जाहिर है बिहार के गांव में इसका बड़ा असर पड़ेगा। महिलाओं को दस हज़ार नकदी देने का पूरा माहौल तैयार है।

बिहार में कृषि क्षेत्र का दबदबा बना हुआ है, जो राज्य की लगभग 70% आबादी को रोज़गार देता है। सिंचाई, उचित फ़सल मूल्य, फ़सल बीमा और बाज़ारों तक पहुंच जैसे मुद्दे ग्रामीण बातचीत में छाए रहते हैं। उत्तर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखा भी किसानों के लिए अनिश्चितता का चक्र पैदा करता है। हर साल अत्यधिक बारिश, बाढ़ और फ़सलों का नुकसान एक ऐसा मुद्दा होगा जिसका समाधान सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधन दोनों को करना होगा।

विपक्ष ने यह भी कहा है कि राज्य डेयरी क्षेत्र की अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाया है। तेजस्वी यादव ने पूछा था, “बिहार घी, मक्खन, पनीर, खोया और पनीर का निर्यात देश-विदेश में क्यों नहीं कर सकता?”

महिलाएं एक ऐसा वर्ग है जो लंबे समय से नीतीश कुमार का समर्थन करता रहा है और माना जाता है कि वे उनकी प्रबल समर्थक हैं। लड़कियों के लिए मुफ़्त साइकिल और पंचायतों में आरक्षण जैसी मुख्यमंत्री की नीतियां महिलाओं के बीच उनके समर्थन को फिर से मज़बूत कर सकती हैं। उन्होंने महिलाओं और उनके व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना भी शुरू की थी।

लेकिन इस सब के बाद भी जातियों का खेल आज भी सारे मुद्दों पर भारी है। एक बात तो दिख रहा है वह यह है कि बिहार से साफ हो चुकी कांग्रेस अब जाग गई है। बड़े स्तर पर युवाओं, पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के नए वोट बैंक कांग्रेस से जुड़ते जा रहे हैं। यह एक बड़ा बदलाव है। अगर कांग्रेस ने कुछ ज़्यादा सीटें जीतने का कमाल दिखाया तो बिहार में बदलाव की संभावना बढ़ती दिख रही है। लेकिन क्या चुनाव आते-आते ऐसा माहौल बना रहेगा कोई नहीं जानता क्योंकि बीजेपी की अपनी तैयारी है।

संघ के लोग घर-घर दस्तक देते नज़र आ रहे हैं। नीतीश कुमार का रोज़गार देने का खेल तीव्र होता दिख रहा है और फिर हिंदू-मुसलमान या धार्मिक खेल की कहानी अपनी जगह है। ऐसे माहौल में बिहार क्या कुछ करेगा कहना मुश्किल है। कह सकते हैं कि दांव सत्तारूढ़ पार्टी का नहीं, दांव तो विपक्ष का लगा है। चुनाव में अगर विपक्ष मात खा गया तो बिहार में बीजेपी की पैठ गहरी होगी जो विपक्ष को लंबे समय तक सदमा ही देता रहेगा।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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