”सवा सेर गेहूं ” को चरितार्थ करता बिहार और पीके के खुलासे से तार-तार होता नीतीश का इकबाल 

प्रख्यात कहानीकार प्रेमचंद की चर्चित कहानी ”सवा सेर गेहूं ” का सार तो यही है कि कैसे एक गरीब किसान अपने द्वार आये ब्राह्मण देवता को खिलाने के लिए गांव के महाजन से ही सवा सेर गेहूं उधार लाता है और उसका आटा तैयार कर भरपेट भोजन उस ब्राह्मण को कराता है। ब्राह्मण रात बिताने के बाद चले जाते हैं लेकिन कई वर्षों के बाद उस गांव के ही महाजन से लिए गए उस सवा सेर गेहूं के बदले पहले वह किसान मजदूर बनता है और फिर वह और उसकी अगली पीढ़ी भी गुलामी के जाल में जकड़ते चले जाते हैं। 

बिहार का मौजूदा हाल भी कुछ ऐसा ही है। बिहार में अब देखने के लिए वह सब आप देख सकते हैं। चौड़ी और लम्बी चमकती सड़कें आप को मिल जाएंगी। बड़े -बड़े शहरों में ऊंचे -ऊँचे मॉल और मार्केट काम्प्लेक्स आप देख सकते हैं। लोगों के पहनावे बदले मिल सकते हैं। बड़ी-बड़ी नामी और ब्रांडेड कंपनियों के शो रूम आप देख सकते हैं। गांव में जाइये तो हर घर पानी की व्यवस्था आपको देखने को मिल सकती है।

अधिकतर घरों के सामने दो पहिये की गाड़ी मिल जाएगी, कुछ फीसदी लोगों के घर पर बड़ी -बड़ी महंगी गाड़ियां भी आप देख सकते हैं। यह सब देख कर आप अनुमान लगा सकते हैं कि बिहार बदल गया है। यह आधुनिक होता जा रहा है। लेकिन यह सब सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि यहाँ के स्कूल -कॉलेजों में कोई पढ़ाई नहीं होती।

हजारों की तनख्वाह पर शिक्षक आपको मिल जायेंगे लेकिन वे न तो कॉलेज जाते हैं और न ही पढ़ाने में उनकी कोई रुचि ही है। ट्यूशन का बड़ा खेल चलता है। हर प्रोफ़ेसर ट्यूशन पढ़ाने में ज्यादा रुचि लेता है। जो आर्थिक रूप से सबल लोग हैं वे अपने बच्चों को प्रदेश से बाहर पढ़ाई के लिए भेज देते हैं और जो बाहर नहीं जा पाते वे बिहार के तिलिस्म में जीने को अभिशप्त हैं। 

कहने को बिहार में केंद्र और राज्य सरकार बड़े -बड़े अस्पताल बनाने का दावा ज़रूर करती है और ऐसा दिखता भी है। लेकिन इन अस्पतालों का सच बड़ा ही भयानक है। सरकारी अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था नहीं और घपले घोटाले की वजह से अस्पताल की सारी चीजें ख़त्म सी हो गई हैं। घूसखोरी के बिना ईलाज नहीं और ईलाज हो भी जाए तो नकली दवाई खाकर आप जिंदगी और मौत के बीच केवल हांफ सकते हैं। और प्राइवेट अस्पतालों में चले गए तो आप अपनी बची जमीन भी बेचने के लिए बाध्य हो सकते हैं। और यह सरकार की देखरेख में हो रहा है। किसी पर सरकार का कोई नकेल नहीं। जब सरकार के लोगों को ही हर वक्त लूटने की आदत बनी हो तो फिर कोई किसी पर कार्रवाई कैसे कर सकता है? 

सरकारी कर्मचारी जनता का खून पीने को तैयार हैं और जिन युवाओं को कोई काम नहीं है वे गांव में रहकर ही सरकारी योजनाओं को लूट कर पेट पाल रहे हैं। हर युवा का अंतरंग सम्बन्ध अब विधायक, सांसद से हो गया है। सब खाते हैं और लूटते हैं। किसी का किसी पर कोई जोर नहीं। 

बिहार के इस परिदृश्य के बीच बिहार की सरकार केंद्र सरकार के साथ मिलकर फ्री अनाज ,कुछ पैसों की नकदी गांव के लोगों के सामने परोसकर सिर्फ और सिर्फ वोट लूटने का काम कर रही है। सरकार को पता है कि जो जनता और युवा उनके दिए पर जीने को अभिशप्त है उसकी क्या मजाल कि वह उसके खेल पर अंगुली उठा सके। गरीबी, बेरोजगारी इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी जो होती है। इस हालत में इंसान अपने पूरे ईमान को भी बेच देता है। एक गुलाम और कठपुतली की तरह जीने को अभिशप्त हो जाता है। बिहार का असली सच यही है। 

बिहार कर्ज में डूबा हुआ है। हर बिहारी पर करीब 24 हजार रुपये से ज्यादा का कर्ज चढ़ा हुआ है। ये सरकार ने लिए हैं लेकिन कर्जखोर बिहारी समाज बना हुआ है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के मुताबिक, मार्च 2024 में बिहार पर कुल कर्ज 3.19 लाख करोड़ रुपए था, जो अब और बढ़ गया होगा। ऐसे में चुनाव से पहले फ्रीबीज के ऐलान से यहां की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?

जरा इन आंकड़ों पर गैर कीजियेगा। नवंबर, 2005 में जब नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तब बिहार पर कुल कर्ज साढ़े 42 हजार करोड़ रुपए था। अब 20 साल बाद बिहार पर कुल कर्ज 3.19 लाख करोड़ से ज्यादा है। इस पर सरकार तर्क यह दे सकती है कि इतने वर्षों में महंगाई भी बढ़ी है और सरकार ने कई योजनाओं को भी चलाया है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि बिहार अगर विकसित हुआ है तो बिहारी कर्ज में कैसे डूब गए। उनकी आमदनी क्यों नहीं बढ़ी ?

उनकी हालत क्यों नहीं सुधरी? उनका पलायन और वह भी सिर्फ मजदूरी करने के लिए क्यों नहीं रुका ? फिर शिक्षा ,स्वास्थ्य की हालत क्यों नहीं सुधरी ? कोई उद्योग धंधा क्यों नहीं लगा ? और फिर जब सरकारी पांच सेर अनाज और कुछ हजार की नकदी पर ही लोगों को जीना है तो इतने ताम-झाम की क्या जरुरत है ? जाहिर है ये सारे ताम-झाम इसलिए किये जाते हैं ताकि नेताओं से लेकर नौकरशाहों की जेब भरती रहे। समाज का एक तबका मालामाल होता रहे।

अभी पिछले दिनों जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर ने नीतीश सरकार में शामिल कुछ बड़े मंत्रियों के बारे में जो कुछ भी कहा है वह एक बानगी भर हो सकती है। सच इससे कहीं आगे का है। खैर इस पर भी हम बात करेंगे लेकिन पहले कुछ आंकड़ों पर गौर करने की जरुरत है। 

कह सकते हैं कि 2005 के बाद नीतीश राज में बिहार पर 8 गुना ज्यादा कर्ज बढ़ा है। इसके बावजूद चुनावी साल में नीतीश सरकार लोकलुभावन योजनाओं पर खजाने को खाली करने पर उतारू हैं। 

अभी हाल में ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फ्री बिजली, बेरोजगार ग्रेजुएट्स के लिए भत्ता, सामाजिक पेंशन योजना में वृद्धि और 75 लाख महिलाओं के खाते में 10 हजार ट्रांसफर करने जैसे बड़ी फ्रीबीज योजनाओं का ऐलान कर चुके हैं। इन चुनावी घोषणाओं से राज्य के खजाने पर सालाना 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना है। ऐसे में सवाल है कि इन योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा?

जानकार मानते हैं कि सरकार के पास इन योजनाओं को चलाने के लिए तीन ही विकल्प हैं- केंद्र सरकार के खजाने से बिहार को अतिरिक्त पैसा मिले। बिहार सरकार इन योजनाओं के लिए कर्ज ले और या तो विकास की योजनाओं में कटौती करे। फ्रीबीज स्कीम सत्ता हासिल करने में भले ही मददगार साबित हों, लेकिन नई सरकार की वित्तीय स्थिति व आम आदमी की आर्थिक सेहत पर क्या असर होगा? 

जाहिर है यह सब चुनाव जीतने के लिए नीतीश सरकार जुआ खेल रही है। जीत गए तो अच्छी बात और हार गए तो सब कुछ चौपट। जिम्मेदारी कौन लेगा ? इस देश में कोई तो जिम्मेदारी लेता नहीं फिर नीतीश कुमार जवाबदेह कैसे हो सकते हैं ? 

अब एक नजर प्रशांत किशोर के खुलासे पर। अभी हाल में प्रशांत किशोर ने बिहार के कई नामी नेताओं के बारे में सबूत के साथ कई तथ्य पेश किये हैं। किशोर के खुलासे पर बिहार में सनसनी फ़ैल गई है। लेकिन अजीब बात तो यह है कि न तो जदयू से किसी का इस्तीफा हो रहा है और न ही बीजेपी से। 

जनता के बीच भी केवल कानाफूसी हो रही है लेकिन बिहार की जनता इसका विरोध नहीं कर रही। कारण है कि फ्री में जो चीजें मिल रही हैं वह कहीं बंद न हो जाएं। 

राजनीतिक रणनीतिकार और अब जन सुराज पार्टी का नेतृत्व कर रहे प्रशांत किशोर, चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीखों की घोषणा से कुछ हफ़्ते पहले, बिहार की राजनीति में सबसे चर्चित नामों में से एक बन गए हैं। यह मान लेना सही होगा कि किशोर की पार्टी, जो लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले रोज़मर्रा के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है, बिहार में धीरे-धीरे समर्थन हासिल कर रही है, जहाँ मतदान आमतौर पर जाति पर निर्भर करता है। किशोर अपनी राय को लेकर काफ़ी मुखर रहे हैं, ख़ासकर एनडीए नेताओं के बारे में, जिनमें से एक नीतीश कुमार भी हैं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि वह आरोपों पर आधारित राजनीति का समर्थन नहीं करते, लेकिन बिहार दौरे के दौरान उन्हें व्यापक भ्रष्टाचार की कई शिकायतें मिलीं। उन्होंने राज्य की मौजूदा एनडीए सरकार को आज़ादी के बाद की सबसे भ्रष्ट सरकारों में से एक बताया। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार ख़ुद ईमानदार हैं, और समस्याएँ उनके आस-पास के लोगों की वजह से हैं, खासकर जब नीतीश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उन्होंने इसकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से की, जो ईमानदार थे, जबकि उनकी सरकार पर बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।

उन्होंने कहा, “मैं स्पष्ट कर दूँ कि नीतीश कुमार ईमानदार हैं। उनके आस-पास के कुछ लोगों ने ही एक तरह की अराजकता फैलाई है, जबकि नीतीश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। यह वैसा ही है जैसे डॉ. मनमोहन सिंह एक ईमानदार प्रधानमंत्री हों, लेकिन कांग्रेस सरकार पर भारी भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हों।”

किशोर ने यह भी कहा, “मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का कार्यकाल लगभग समाप्त हो चुका है।” उन्होंने बताया कि मतदाताओं के लिए एक संभावना यह है कि एनडीए नीतीश कुमार के बिना सरकार बनाए, लेकिन सुशील कुमार मोदी के निधन के बाद से भाजपा के पास एक मज़बूत राज्यव्यापी नेता का अभाव है।

किशोर ने कहा कि चूँकि भाजपा और एनडीए “चाल, चरित्र और चेहरा” की बात करते रहते हैं, इसलिए उनकी टीम ने कुछ एनडीए नेताओं के रिकॉर्ड की जाँच की। उन्होंने पाया कि मौजूदा सरकार में भ्रष्टाचार लालू प्रसाद के शासनकाल की तुलना में कहीं ज़्यादा है।

उन्होंने बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि उन्होंने किशनगंज के एक मेडिकल कॉलेज पर कैसे नियंत्रण हासिल कर लिया, जबकि नियमानुसार इसे सिखों द्वारा चलाया जाना चाहिए था। किशोर ने कहा, “मैंने भाजपा नेता और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे से भी पूछा कि दिलीप जायसवाल ने किशनगंज मेडिकल कॉलेज को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा कैसे दिलाया।” उन्होंने आगे कहा कि जायसवाल ने अभी तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया है।

किशोर ने बताया कि जहाँ राजद नेता तेजस्वी यादव के 9वीं कक्षा तक पढ़े होने की चर्चा अक्सर होती है, वहीं बिहार के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अदालती हलफनामे में विरोधाभासी जानकारी दी है कि उन्होंने केवल 7वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। लेकिन उन्होंने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामे में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि का भी दावा किया है। किशोर ने कहा कि वह चौधरी से केवल यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उन्होंने 10वीं और 12वीं कक्षा कब पास की।

उन्होंने लगभग 200 करोड़ रुपये की ज़मीन ख़रीदने को लेकर जदयू नेता और मंत्री अशोक कुमार चौधरी पर भी सवाल उठाए। किशोर ने कहा कि अगर ये आरोप झूठे हैं, तो वे उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं।

जब उनसे पूछा गया कि उनकी पार्टी को फंडिंग देने के भाजपा के दावों के बारे में उनका क्या कहना है, तो प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी के फंडिंग के स्रोत पूरी तरह से पारदर्शी हैं।उन्होंने कहा कि भाजपा को इसे इतना तूल देने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि बिहार और दिल्ली की सरकारों पर उनका पहले से ही नियंत्रण है। किशोर ने आगे कहा कि अगर कोई गड़बड़ी हुई है, तो ईडी, सीबीआई या रॉ जैसी एजेंसियां उनकी जाँच कर सकती हैं, और उनके पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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