लद्दाखी चिंगारी को हवा देकर आग बना रही है भाजपा 

लद्दाख में राज्य के दर्जे व संवैधानिक सुरक्षाओं की मांग को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन में चार लोगों की मौत के बाद कड़ी पाबंदियों के बीच तनावपूर्ण शांति है। भाजपा सरकार के पास हर हालात के लिए एक ही प्रतिसाद है। जैसा कि इसकी आदत है, इसने लद्दाख संकट का प्रतिसाद अपने चिर परिचित फार्मूले – अत्यधिक बलप्रयोग, इंटरनेट बंदी, निष्ठुरता और कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ़्तारी से दिया है। 

इससे हालात बिगड़े ही हैं। 

सम्मानित मेगासेसे पुरस्कार विजेता, पर्यावरणविद, इनोवेटर वांगचुक पाँच वर्षों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे थे, जबकि सरकार लद्दाखी नेताओं से निष्फल वार्ताएं करती रही। यह विडंबना ही है कि वांगचुक उन लोगों में  शामिल थे, जिन्होंने शुरू में अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने का जश्न मनाया। वास्तव में, वह लेह में लंबे समय से पनप रही भावना की ही अभिव्यक्त कर रहे थे। 

ऐतिहासिक संदर्भ 

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग 50 के दशक से लद्दाखी राजनीति के केंद्र में है। इस मांग को बल मिला 1989-90 में जब लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन ने बड़े विरोध प्रदर्शन किए। इससे क्षेत्र में दरार भी पनपी चूंकि  बौद्ध बहुल लेह इस मांग का समर्थन कर रहा था जबकि मुस्लिम बहुल कारगिल विरोध, जिससे सांप्रदायिक तनाव, झड़पें हुईं। 

यह तनाव आंशिक रूप से कश्मीर प्रभुत्व वाले नेतृत्व के अविश्वास और भेदभाव की भावना से उपजा था। अलावा इसके, 1947 के बाद लद्दाख महत्वपूर्ण इलाके से नियंत्रण रेखा  से कटा,  पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्वोत्तर में चीन की शत्रुतापूर्ण सीमाओं से फंसा इलाका बन गया। 

पहले लेह में और फिर कारगिल में पहाड़ विकास परिषदें बनने से वर्षों तक यह मांग शांत पड़ी हालांकि कभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो गई। इसका प्रमुख कारण आरएसएस और हिन्दू दक्षिणपंथी  कारक था। 

आरएसएस कारक 

भाजपा-आरएसएस ने 1990 के बाद धीरे-धीरे क्षेत्रीय विभाजन का फायदा उठाते हुए अपना प्रभाव विकसित किया। सिंधु दर्शन उत्सव जैसे कार्यक्रम बौद्ध बहुल क्षेत्र में हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा लाने के लिए बनाए गए थे। 

जैसे जम्मू में भी आरएसएस ने अस्थिरता और क्षेत्रीय विभाजनों से उपजे राजनीतिक शून्य को भरा था। नई दिल्ली ने इसे कश्मीर के नैरेटिव के मुकाबले बढ़ावा ही दिया और अदूरदर्शी कश्मीरी नेतृत्व ने अन्य इलाकों की जटिलताएं समझने के बजाय इनसे  पृथक टापुओं की तरह व्यवहार किया। 

अगस्त 2019 तक आरएसएस-भाजपा का प्रभाव लेह में पूरी तरह जम चुका था, यही कारण है शुरू में लद्दाखवासियों ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने का जश्न मनाया। 

मोहभंग 

मोहभंग तब हुआ जब यह महसूस किया गया कि भाजपा के वायदे खोखले थे। अनुच्छेद 370 हटाए जाने का जश्न मनाने के एक साल बाद ही लद्दाखवासियों ने समझ लिया कि उन्हें राजनीतिक रूप से, आर्थिक रूप से और पर्यावरणीय नजरिए से नुकसान ही हुआ। लद्दाख की अनूठी चुनौतियों ने भी भाजपा के विकास मॉडल के खतरे सामने लाए। लद्दाख में जीवन वैसे ही कठिनाइयों से भरा है, जहां तीन लाख से कम की  आबादी 60 हजार किलोमीटर में फैले विशाल ठंडे इलाके में  इलाके में, जो बाकी दुनिया से कटा हुआ है और हर गाँव या नगर मीलों के फासले पर है,, में रह रही है। दुर्गम इलाका, नाजुक पारिस्थिकी तंत्र और ऊपर से रणनीतिक स्थान, यह सब लद्दाखवासियों को असुरक्षित बनाता है। 

पर्यटन पर जोर, बाहरियों को नौकरियां देने पर सरकार का बल और बड़ी विकास योजनाएं जो  पूंजीपति मित्रों के हित में हों, पर्यावरणीय जोखिमों से भरी हों, पूर्व के जम्मू कश्मीर के सभी इलाकों के हितों को नुकसान पहुँचाती हों तो लद्दाख के स्थानीय समुदायों के लिए और बड़ा खतरा बन जाती हैं।

देर से सही, लद्दाखवासियों को समझ में आया

एक साल में, लद्दाखवासियों को समझ में आया कि जिस अनुच्छेद 370 को वह शत्रु मानते थे, से उन्हें कई सुरक्षाएं मिली हुई थीं। सो उन्होंने इस बदलाव के खिलाफ जुटान शुरू किया। वांगचुक इस मुहिम के रचयिता नहीं थे लेकिन वह अन्य निराश स्थानीय लोगों से उत्साहपूर्वक जुड़ गए और इस अभियान का चेहरा बन गए। 

नब्बे के दशक के विरोध प्रदर्शनों के विपरीत 2020 के बाद के अभियान में एकता थी। पहली बार, लेह और कारगिल जिलों से बौद्ध और मुस्लिम लद्दाख पेक्स बॉडी और कारगिल कोऑर्डनैशन कमिटी के तहत साथ आए। 

लद्दाख संकट के सबक 

लद्दाख संकट से महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकते हैं। उनका मोहभंग पूर्वी जम्मू कश्मीर राज्य भर की भावनाओं का ही प्रतिबिंब है। लद्दाखवासियों की तरह, सभी क्षेत्रों ने विशेष सुरक्षाएं जैसे स्थानीय रोजगार, ज़मीन और संसाधन खोए हैं। लद्दाखवासियों को दोष देने अथवा पुराने जख्म कुरेदने के बजाय यह समय है कि सहमति बिन्दु  पहचाना जाए। हर क्षेत्र की शिकायतें, वास्तविक और काल्पनिक, कभी भी सुलझाई नहीं गई हैं और अक्सर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बनाई गई हैं जिससे शून्य पैदा हुए और उसका फायदा हिन्दू दक्षिणपंथ ने उठाया। 

भाजपाई नीतियों के चलते राजनीतिक नियंत्रण खोने और पर्यावरणीय नुकसान का सामना समूचा हिमालियाई क्षेत्र कर रहा है। हिमाचल से सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों  तक, हिमालियाई इलाका विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाए जाने वाले और भाजपा की तरफ से तो पूरी रफ्तार से चलाए जाने वाले आक्रामक विकास मॉडल के खतरों के साये में है।   

लद्दाखी संकट गठजोड़ तैयार करने और हिमालियाई क्षेत्र व जम्मू कश्मीर में नेटवर्क मजबूत करने के अवसर बनाए हैं और भारत सरकार को खतरनाक नतीजों की चेतावनी भी दी है। 

शांत लद्दाखियों को उकसाकर सरकार ने नई दरारें पैदा की हैं जो लोकतान्त्रिक व पर्यावरणीय आंदोलनों की प्रेरणा बन सकती हैं और जिन्हें काबू करना मुश्किल होगा। 

उचित भीड़ नियंत्रण के बजाय चार लोगों को मारना और फिर वांगचुक को गिरफ्तार करने के साथ “विदेशी हाथ” के बारे में विचित्र और हास्यास्पद षड्यंत्रकारी सिद्धांतों की अफवाहें फैलाना क्षेत्र और जन भावनाओं के प्रति सरकार की नासमझी को दर्शाता है। 

क्या भाजपा सबक सीखेगी? या फिर वह अपनी आँखों पर बंधी पट्टियाँ खोलने से इनकार करती रहेगी और समुदायों व उनके नेताओं को दबाने, गिरफ्तार करने और उन्हें खलनायक साबित करने की अपनी सर्वविदित टूलकिट का इस्तेमाल जारी रखेगी?  

लद्दाख को दबाना एक ऐसी बड़ी भूल है जिससे आंतरिक बगावत पैदा हो सकती है और जिनका फायदा उठाने का अवसर चीन और पाकिस्तान को मिल सकता है। सरकार का कठोर प्रतिसाद एक पहले से बद हालात को बदतर बना रहा है। यह अपने तुच्छ स्वार्थों के कारण पर्यावरणीय और राष्ट्रीय हितों  को खतरे में डाल रहा है। 

(अनुराधा भसीन का लेख ‘कश्मीर टाइम्स’ से साभार। अनुवाद महेश राजपूत)

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