क्या है सर सैय्यद की प्रासंगिकता?

‘सर सैय्यद डे’ (17 अक्तूबर) आज पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। दुनिया भर में जहाँ-जहाँ अलीगढ़ के विद्यार्थी और शिक्षक मौजूद हैं, वे इस दिन को गर्व और श्रद्धा के साथ मना रहे हैं। अलीगढ़ समुदाय के लिए सर सैय्यद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जज़्बा और श्रद्धा का प्रतीक हैं। हर कोई अपनी दर्स-गाह से प्रेम करता है, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का उससे एक गहरा और आध्यात्मिक संबंध दिखाई देता है।

हालाँकि सर सैय्यद की कुछ रचनाओं को लेकर विवाद भी रहे हैं—विशेषकर उनकी पुस्तक ‘अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिन्द’ पर यह आरोप लगाया गया कि वे मुस्लिम अशरफ़ वर्ग के हितों की वकालत कर रहे थे और पसमंदा मुसलमानों के प्रति जातिवादी दृष्टिकोण रखते थे—लेकिन इस विषय पर बहुत कुछ कहा जा चुका है और आगे भी कहा जाता रहेगा। आखिर कोई भी महान व्यक्ति आलोचना से परे नहीं होता। मतभेद और विवाद होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर युग में किसी भी कार्य का मूल्यांकन अलग-अलग दृष्टिकोणों से किया जाता है।

फिर भी, सर सैय्यद के आलोचक इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान का गहन अध्ययन किया और सोचा कि भारत उससे क्या सीख सकता है। उन्होंने न केवल शिक्षा और विचार के नए द्वार खोले, बल्कि अपने समय के प्रमुख सामाजिक और वैचारिक मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाई। एक अनुमान के अनुसार, सर सैय्यद की प्रकाशित रचनाएँ लगभग छह हज़ार पृष्ठों में फैली हुई हैं। इनमें से कुछ भाग अब उपलब्ध नहीं है, फिर भी जो बचा है, वह इतना मूल्यवान है कि उस पर कई शोधग्रंथ लिखे जा सकते हैं।

सर सैय्यद अहमद खान उस दौर में पैदा हुए जब भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम राजनीतिक शक्ति का पतन हो चुका था। 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में जन्मे सर सैय्यद को प्रारंभिक शिक्षा अरबी और पारंपरिक इस्लामी प्रणाली में दी गई। उनके पिता मीर मुत्तकी दरबार से पेंशन प्राप्त करते थे, लेकिन 1838 में उनके निधन के बाद वह पेंशन बंद हो गई। इसके बाद सर सैय्यद ने दिल्ली की एक अदालत में क्लर्क के रूप में नौकरी शुरू की। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में होने के कारण उन्हें कुछ लोगों की आलोचना भी झेलनी पड़ी।

वे अत्यंत अध्ययनशील, ज्ञान-प्रेमी और सक्रिय व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों का गहन अध्ययन किया और उसका परिणाम ‘आसार-उस-सनादीद’ के रूप में सामने आया—जो आज भी पुरातत्त्व के विद्वानों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है। इस पुस्तक को असाधारण सराहना मिली; इसका फ़्रांसीसी भाषा में अनुवाद हुआ और सर सैय्यद को ‘रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’, लंदन का फेलो चुना गया।

1857 के विद्रोह के समय, जब भारतीयों ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा, सर सैय्यद उस समय बिजनौर में कार्यरत थे। उन्होंने कई अंग्रेज़ अधिकारियों और उनके परिवारों की जान बचाई। विद्रोह की असफलता के बाद अंग्रेज़ों ने विशेष रूप से मुसलमानों को निशाना बनाया। तब सर सैय्यद ने दूरदर्शिता दिखाते हुए मुसलमानों को संघर्ष के बजाय शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक उन्नति पर ध्यान देने की सलाह दी। अंग्रेज़ों और भारतीय मुसलमानों के बीच गलतफहमियों को दूर करने के लिए उन्होंने ‘अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिन्द’ की रचना की।

इसी उद्देश्य से उन्होंने अलीगढ़ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मॉडल पर एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की और अपने प्रसिद्ध पत्र ‘तहज़ीब-उल-अख़लाक़’ के माध्यम से समाज में जागरूकता और सुधार का संदेश फैलाया। उनका मानना था कि पश्चिमी विज्ञान और सभ्यता की सकारात्मक बातों को अपनाना ही प्रगति का मार्ग है, जबकि अंग्रेज़ों से सीधी राजनीतिक टक्कर देश के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। यही कारण था कि जब कांग्रेस की स्थापना हुई, उन्होंने बदरुद्दीन तैयबजी को पत्र लिखकर अपने विचार प्रकट किए और कांग्रेस की राजनीति की आलोचना की।

राष्ट्रीय इतिहासलेखन में इस पत्र को प्रायः नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। दुखद यह है कि पाकिस्तान उन्हें अपना संस्थापक मानता है, जबकि वे पाकिस्तान की स्थापना से लगभग आधी सदी पहले ही इस दुनिया से विदा हो गए थे। यदि उनके विचारों को वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि सर सैय्यद ने बहुमत पर आधारित राजनीति के ख़तरों की ओर बहुत पहले ही संकेत कर दिया था। लोकतंत्र में जब बहुसंख्यक वर्ग सत्ता में आता है, तो प्रायः अल्पसंख्यकों के हितों की उपेक्षा हो जाती है। इसी समस्या की ओर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि बहुमत का शासन अल्पसंख्यकों की अनदेखी का पर्याय नहीं बनना चाहिए।

कई बार सर सैय्यद को कांग्रेस-विरोधी या अलगाववादी कहा गया, लेकिन यह धारणा सर्वथा गलत है। उन्होंने बार-बार धार्मिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की बात की। उनके शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं:

“भारत में दो समुदाय हैं—हिंदू और मुसलमान। मेरा मानना है कि यदि एक समुदाय प्रगति करे और दूसरा पीछे रह जाए, तो भारत की स्थिति कभी अच्छी नहीं हो सकती; वह एक आंख वाले व्यक्ति के समान होगा। लेकिन यदि दोनों समुदाय साथ-साथ प्रगति करें, तो भारत का नाम सम्मान से लिया जाएगा, और वह एक आंख वाली, बिखरे बालों वाली, दाँतहीन वृद्धा कहलाने के बजाय एक सुंदर और आकर्षक दुल्हन बन जाएगा।”

सर सैय्यद का उद्देश्य कभी विभाजन नहीं था। वे तो चाहते थे कि सत्ता और विकास में सबको समान अवसर मिले, क्योंकि सबकी उन्नति ही देश की उन्नति है। आज की राजनीति में यह विचार और भी प्रासंगिक हो गया है। अफ़सोस की बात यह है कि सत्ता में बैठे कुछ लोग यह मान बैठे हैं कि कमजोर और वंचित वर्गों को और दबाकर ही राष्ट्र को आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ फ़िरक़ापरस्त यह भ्रम पाल चुके हैं कि नफ़रत और धर्म के नाम पर वोट बटोरकर देश को मज़बूत बनाया जा सकता है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यदि नाव में कहीं छेद हो जाए और उसे भरा न जाए, तो पूरी नाव डूब जाती है।

सर सैय्यद का संदेश स्पष्ट था—सौहार्द, शिक्षा और सामाजिक-धार्मिक सुधार ही देश को मज़बूत बनाते हैं। उनके धार्मिक विचारों पर अनेक बार प्रश्न उठे, उन्हें धर्म से भटकने का आरोप भी झेलना पड़ा, लेकिन वे नास्तिक नहीं थे। उनका मानना था कि समय के साथ धर्म पर अनावश्यक रस्में और जड़ता की धूल जम जाती है, जो मनुष्य की सोच को सीमित कर देती है। वे चाहते थे कि इंसान चिंतन और तर्क करे, तथा धर्म और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करे। उनका विश्वास था कि बुद्धि, विवेक और लोकहित के आधार पर सुधार किए जाएँ, ताकि मानवता निरंतर आगे बढ़ती रहे।

(लेखक को भारतीय मुसलमानों के इतिहास में गहरी रुचि है। उनकी आगामी पुस्तक मुस्लिम पर्सनल लॉ पर आधारित है।)

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