हालिया “आई लव मोहम्मद” प्रकरण दर्शाता है कि कैसे एक सांप्रदायिक तौर पर ध्रुवीकृत परिदृश्य में भारत में अपनी धार्मिक पहचान का प्रदर्शन करते मुस्लिम अल्पसंख्यकों के एक अहानिकर नारे की हिंदू बहुसंख्यवादी हिंदू राज्य जानबूझ कर सांप्रदायिक और विभाजनकारी नारे के रूप में व्याख्या कर सकता है ताकि अल्पसंख्यकों पर सवारी गांठ सके।
जब हम सांप्रदायिक तौर पर ध्रुवीकृत माहौल की बात करते हैं तो हमारा मतलब यह नहीं है कि दो धार्मिक समुदाय एक दूसरे से भिड़े हुए हैं। यह दो धर्मों के शक्तिशाली तबकों के बीच संघर्ष भी नहीं है। भारत में, जो हम देख रहे हैं वह एक अल्पसंख्यक धर्म का बहुसंख्यक वर्ग द्वारा किया जाने वाला उत्पीड़न है अर्थात हिन्दुत्व के बहुसंख्यकवादी फासीवादी ताकतों, खासकर बहुसंख्यवादी राज्य में, अल्पसंख्यकों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दमन।
अल्पसंख्यक हितों, आकांक्षाओं की किसी भी अभिव्यक्ति को दबाया जाता है। जब हम “ध्रुवीकरण” या “ध्रुवीकृत माहौल” की बात कर रहे हैं तो इस संदर्भ में बात कर रहे हैं। हालिया “आई लव मोहम्मद” प्रकरण का विश्लेषण इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए।
मुस्लिम युवाओं की तरफ से “आई लव मोहम्मद” का बैनर लगाने को लेकर मुस्लिम बुद्धिजीवी बंटे हुए हैं। केंद्र सरकार में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी, जो अल्पसंख्यक समुदाय से है, ने जनचौक से कहा, “हालांकि “आई लव मोहम्मद” जैसे नारे में कुछ भी गलत नहीं है लेकिन कुछ खास ध्रुवीकृत हालात में ऐसा अहानिकर नारा भी भड़काऊ माना जा सकता है और सांप्रदायिक बहुसंख्यवादी सामाजिक ताकतों के न सही, बहुसंख्यवादी राज्य के कोप का शिकार हो सकता है। ऐसा होता है तो गरीब मुस्लिम लोग ही भुगतेंगे। भले वैसे यह अहानिकर नारा है और संविधान के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे व अपने धर्म के पालन के अधिकार में आता है, लेकिन व्यवहारिक संदर्भ में तकाजा यही है कि इसे टाला जाए।
इस बिन्दु पर और रौशनी डालते हुए वह कहते हैं, “राजनीतिक संदर्भ जिसमें कि यह नारा लगाया जा रहा है, उससे भी फर्क पड़ता है। यदि, उदाहरण के लिए मुस्लिम युवाओं ने तमिल नाडु में यह नारा लगाया होता तो सरकार इतना कड़ा रुख नहीं अपनाती। लेकिन प्रतिसाद, स्वाभाविक रूप से, उस राज्य में अलग होगा जहां योगी आदित्यनाथ जैसे खुलेआम संप्रदयिक नेता का शासन हो और जहां राज्य की संस्थाओं का सम्प्रदायिकीकरण हो चुका हो। ऐसे में जो भी बात भड़काऊ बनने की संभावना लिए हो, टाली जानी चाहिए। इस तरह मुस्लिमों के लिए बेहतर होगा कि इस तरह सामूहिक पहचान पर जोर देने से बचा जाए क्योंकि नारे का अहानिकारक होने से उन्हें कोई राहत नहीं मिलने वाली।” कई मुस्लिम बुजुर्गों का भी यही मानना है।
इससे विपरीत राय व्यक्त करते हुए मिर्जापुर के वामपंथी कार्यकर्ता मोहम्मद सलीम ने जनचौक से कहा, “अपने धार्मिक नेता के प्रति प्यार जताना सांप्रदायिक कैसे हुआ? ‘आई लव मोहम्मद’ नारा भारतीय संविधान के अनुसार अपने धर्म का पालन करने के अधिकार में पूरी तरह फिट होता है। यह बहुसंख्य समाज के खिलाफ नहीं है। हिंदुओं के खिलाफ किसी तरह से हिंसा को बुलावा नहीं देता है। यदि हिंदू “जय श्री राम” सार्वजनिक रूप से बोल सकते हैं तो मुस्लिम युवाओं का “आई लव मोहम्मद” बोलना गलत कैसे हो गया? मुस्लिम युवाओं को यह नारा बोलने के अपने अधिकार पर जोर देना जारी रखना चाहिए।”
प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं के बीच भी मोटे तौर पर लोकतान्त्रिक राय लगभग इसी आधार पर बंटी हुई है।
इन अलग-अलग विचारों से अंतत: एक ही सवाल उपजता है कि बहुसंख्यवादी हिंदू सांप्रदायिक आक्रामकता का प्रतिसाद क्या होना चाहिए। दोनों तरीकों के अपने गुणदोष हैं और महत्वपूर्ण है कि हालात को देखते हुए उचित रणनीति की पहचान की जाए। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी कुछ अन्य तरीके भी प्रस्तावित करते हैं।
मुस्लिम विरोधी आक्रामकता का सही जवाबी रवैया
पुणे में निवेश सलाहकार सुल्तानजी कहते हैं, “नारे का योगी सरकार विभाजनकारी युक्ति के रूप में दुरुपयोग किया जा रहा है। अब मुस्लिम इस नारे के बचाव में लगे रहेंगे और अपने वास्तविक मुद्दों को छोड़ देंगे।”
वाम का भी यही रुख है कि फोकस सुरक्षा समेत मुस्लिमों के बुनियादी मुद्दों पर होना चाहिए।
बेशक, मुस्लिम सभी मुद्दों पर हमेशा बचावात्मक मुद्रा में नहीं हो सकते। अपनी नागरिकता पर आंच आने पर वह सीएए के खिलाफ आक्रामक हुए जो सही ही था। वह वक्फ संशोधन अधिनियम को चुनौती देकर भी सही कर रहे हैं जो सांप्रदायिक शासकों द्वारा वक्फ के नियंत्रण में उनकी ज़मीनें छीनने के लिए लाया गया है। लेकिन, उन्हें यह पता होना चाहिए कि किस मुद्दे को कितना खींचा जा सकता है।
बेशक, अयोध्या जैसे कुछ अन्य मुद्दों जो हिंदुओं के लिए भावनात्मक मुद्दे थे, पर अल्पसंख्यकों ने व्यवहार कुशल और लचीला रुख अपनाया। लेकिन तीन तलाक और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर मुस्लिम रूढ़िवादियों का रुख मोदी को मुस्लिम महिलाओं के रक्षक होने का दावा करने का मौका देने वाला था। जब प्रगतिशील मुस्लिम अपने धार्मिक समुदाय में आंतरिक सुधारों के लिए पहल करेंगे तभी वह अपने आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी के मौके समाप्त कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण, कई ऐसे बुनियादी मुद्दे हैं जो हिंदुओं और मुस्लिमों, दोनों समुदायों के हैं। यह दोनों समुदायों को मिलकर संघर्ष का मौका देते हैं। सुरक्षा के मामले पर भी, कई मांगें हैं जिन्हें लेकर लड़ना चाहिए और इनमें योगी का बुलडोजर आक्रमण भी है जो सुप्रीम कोर्ट की पाबंदियों और कड़ी टिप्पणियों के बावजूद जारी है।
मुस्लिमों और लोकतंत्र के लिए मुख्य चुनौती राज्यसत्ता का सांप्रदायिक चरित्र है। आदर्श रूप से, एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को सांप्रदायिक और सामुदायिक कलेश के मामलों में निष्पक्ष भूमिका निभानी चाहिए। राज्य को किसी एक समुदाय की तरफ नहीं दिखना चाहिए। कई गंभीर गलतियों और कमियों के बावजूद पहले की काँग्रेस, वाम और कई धर्मनिरपेक्ष क्षेत्रीय दलों की सरकारें ऐसा निष्पक्ष रवैया अपनाती रही हैं। लेकिन भाजपा सरकारें दिखावे के लिए भी ऐसा नहीं करतीं। सबसे बुरे सांप्रदायिक तत्व भी असम मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयानों और नीतियों के उन्माद का मुकाबला नहीं कर सकते। सांप्रदायिक सत्ता सांप्रदायिक आग को भड़काती ही हैं।
योगी सरकार का सांप्रदायिक फासीवाद
“आई लव मोहम्मद’ प्रकरण से निबटने में योगी सरकार की भूमिका को समझते हैं। शुरुआत तब हुई जब कुछ मुस्लिम युवाओं ने कानपुर में 4 सितंबर 2025 को ईद-ए-मिलाद-उन-नबी जुलूस के दौरान “आई लव मोहम्मद” लिखा बैनर लगाया। मिलाद-उन-नबी के दो दिन बाद ही यह भुला दिया जाता। लेकिन यह बड़ा मुद्दा बन गया जब कानपुर पुलिस ने बैनर हटा दिया और 24 लोगों के खिलाफ बैनर प्रदर्शन को लेकर मामला दर्ज किया, इसे अपराध करार दिया।
मीडिया में यह देखने के बाद और जगहों पर मुस्लिम युवाओं ने एकजुटता में प्रतिसाद दिया। उन्होंने कई जगह ऐसे बैनर लगाए। बरेली में स्थानीय मुस्लिमों ने स्थानीय मौलवी और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउन्सल के प्रमुख तौकीर रज़ा खान “आई लव मोहम्मद” बैनर के साथ 26 सितंबर को प्रदर्शन की योजना बनाई। प्रशासन के भारी दबाव के कारण तौकीर रज़ा खान ने कुछ घंटे पहले ही इसे रद्द कर दिया।
लेकिन इसकी जानकारी न होने के कारण कई मुस्लिम युवा 26 सितंबर को जमा हुए और जुम्मे की नमाज़ के बाद मार्च निकाला। बरेली पुलिस ने उन्हे तितर-बितर किया। युवकों और पुलिस में टकराव हुआ और थोड़ा पथराव भी हुआ। यदि बरेली पुलिस ने मार्च को अनदेखा किया होता तो यह शांतिपूर्वक समाप्त हो जाता लेकिन उन्हें ऊपर से आदेश था कि मुस्लिमों को सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं करने दिया जाए।
इन झड़पों के बाद भी मामला दो दिनों में शांत हो जाता लेकिन योगी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया। पहले नारे की गलत तरीके से सांप्रदायिक नारे के रूप में व्याख्या कर। फिर पुलिस की निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर 40-50- युवकों के प्रदर्शन करने को राष्ट्र के लिए सुरक्षा खतरा बनाकर पेश कर। उन्होंने कहा, “अराजकता की अनुमति नहीं दी जाएगी” और कार्यक्रम को सांप्रदायिक टकराव बताया जबकि विरोध में पुलिस के अलावा कोई हिंदू नहीं आगे आया।
एक सप्ताह बाद जाकर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे कुछ हिंदू दक्षिणपंथी समूहों ने मुस्लिमों के “आई लव मोहम्मद” बैनरों के खिलाफ प्रदर्शन किया और इस प्रदर्शन को होने दिया गया और पुलिस सुरक्षा भी मुहैया कराई गई।
हालांकि, मुस्लिम युवाओं के इस निष्फल विरोध प्रदर्शन के बाद योगी के आदेशों के तहत बरेली पुलिस हरकत में आई और केवल 39 मुस्लिम युवाओं को कानून का उल्लंघनकर्ता के रूप में चिन्हित कर पाई और 10 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर पाई। लेकिन ऐसी मामूली घटना को योगी ने खुद बड़ा किया। उन्होंने मौलाना तौकीर रज़ा खान को “मुख्य साज़िशकर्ता” करार दिया और अगले दिन गिरफ्तार करवाया।
योगी ने यहाँ तक घोषणा की, “छेड़ेंगे तो छोड़ेंगे नहीं!” हालांकि 40-50- युवाओं का मार्च किसीको उकसाने के उद्देश्य से नहीं था। योगी भड़क गए। उनके निर्देश पर स्थानीय मुस्लिमों का दमन तीव्र हुआ। गिरफ्तारियों की संख्या 73 हो गई। इत्तेहाद-ए-मिलाद काउन्सल के जिला अध्यक्ष ताज़ीम को पैर में गोली मारी गई और पुलिस ने दावा किया कि जब वह उसे गिरफ्तार करने गए तो पहले उसने गोली चलाई जबकि स्थानीय लोगों का दावा था कि वह निशस्त्र था।
मुस्लिम युवाओं का दमन
गिरफ्तार लोगों के खिलाफ कड़ी धाराएं लगाईं गईं। भारतीय न्याय संहिता की धारा 109(1) और (2) (हत्या का प्रयास), 118(2) (खतरनाक हथियारों से गंभीर चोट पहुंचाना), 121(1) (किसी सरकारी कर्मचारी को गंभीर चोट पहुंचाना और उसे अपना कार्य करने से रोकना), 189(5) (गैरकानूनी जमावड़ा), 191 (2) (3) (दंगा करना), 195(1) (सरकारी कर्मचारी को अपना काम करने से रोकना), 196 (1)(2) (दो समूहों में वैमनस्य पैदा करना), 223 (कैदी को हिरासत से छुड़ाना), 310(2) (डकैती), 324(5)(6) (शरारत करना जिसका उद्देश्य किसीको मारना अथवा चोट पहुंचाना हो), 61(2) (आपराधिक षड्यन्त्र), 62 (अपराध जिनकी सजा उम्र कैद हो) और 317(2) चुराई संपत्ति रखना)।
ऐसी कड़ी धराएं “आई लव मोहम्मद” बैनर लगाने और प्रदर्शन का प्रयास करने के लिए मुस्लिम युवाओं की तीव्र प्रताड़ना का कारण बनेंगी और उन्हें पृथक करेगी और आक्रोशित करेंगी। उनकी नजर में राज्य सारी वैधता खो देगा। लेकिन, क्या उन्हें इसकी परवाह है?
सांप्रदायिक राज्य मशीनरी
उत्तर प्रदेश में राज्य मशीनरी में न सिर्फ संख्यात्मक आधार पर हिंदुओं का प्रभुत्व है बल्कि बेहद सांप्रदायिक है और कई सांप्रदायिक अपराधों को अंजाम दे चुकी है। 1987 मलयाना नरसंहार में उत्तर प्रदेश की पीएसी की कुख्यात भूमिका के बारे में सभी जानते हैं। सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता दारापुरी एक लेख में याद करते हैं कि 1979 में वाराणसी में वह पीएसी की 34 वीं बटालियन के कमांडेन्ट थे तो उस समय के दंगों में पक्षपाती सांप्रदायिक भूमिका निभाने से पीएसी को रोकने में उन्हें कैसी मशक्कत करनी पड़ी थी। वह कहते हैं, “ न सिर्फ पीएसी बल्कि सीमा सुरक्षा बल में भी ऐसा सांप्रदायिक पूर्वाग्रह था।
राज्य का सांप्रदायिक चरित्र ध्वस्त करना बुनियादी और दीर्घावधि का मुद्दा है। मुस्लिम यह अपने बूते नहीं कर सकते। उन्हें हिंदुओं में लोकतान्त्रिक और दमन के शिकार तत्वों तक पहुंचना होगा और एकता बनानी होगी। समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियां और काँग्रेस भी उन्हें केवल सहनशील वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। जब यूपीए सत्ता में था, सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ कानून नहीं पाए। जब वह सत्ता में नहीं होते, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पैरोकारी और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका कमजोर होती है। इन पार्टियों के लिए सिर्फ वोट बैंक बनने के बजाय मुस्लिमों को इन पार्टियों से जवाबदेही की मांग करनी होगी, केवल सत्ता में रहते अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा के उनके रिकार्ड की ही नहीं बल्कि विपक्ष में रहते मुस्लिमों के बचाव में उनकी भूमिका की भी।
कानूनी मशीनरी में मुस्लिमों का अल्प प्रतिनिधित्व
राज्य मशीनरी की पक्षपाती सांप्रदायिक भूमिका का एक कारण पुलिस बलों में अल्पसंख्यकों का अल्प प्रतिनिधित्व होना भी है। एसआर दारापुरी 2014 के आँकड़े देते हैं: उत्तर प्रदेश पुलिस बल में कांस्टेबल की बात करें तो मुस्लिमों का हिस्सा 4 फीसदी था, हेड कांस्टेबल के मामले में 3 फीसदी और उप निरीक्षकों के मामले में 2 फीसदी से थोड़ा ही ज्यादा। लेकिन राज्य की आबादी में उनका हिस्सा 21 फीसदी था। 2481 क्लास वन अधिकारियों (आईएएस, आईपीएस समेत) केवल 55 मुस्लिम थे। ऐसे राज्य में जहां शासन में बाबूशाही की तूती बोलती हो, शक्ति ढांचे में मुस्लिम हाशिये पर धकेल दिए गए हैं। यह सचेत भर्ती नीति के कारण है।
धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की कमियाँ
दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह नीति न सपा के शासन में सुधारी गई न मायावती के शासन में। वास्तव में जब भाजपा सपा पर मुस्लिमों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती है, सपा हिंदू बहुसंख्यकों के तुष्टीकरण की दोषी है जैसा कि 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान देखा गया जब मुलायम सिंह ने खुद उस समय की अखिलेश सरकार से हिंदू दंगाइयों से नरमी से पेश आने की वकालत की थी।
बाद के चुनाव अभियानों में भी सपा और काँग्रेस भी अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों के मुद्दे उठाने से बहुसंख्यक वोटों के दूर हो जाने की आशंका के कारण डरती रहीं। इसका अर्थ है कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने अपने अनुयायियों पर नैतिक-राजनीतिक दबाव का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया कि वह धर्मनिरपेक्षता की लाइन न छोड़ें और दबी जुबान सांप्रदायिक तत्वों को खुश न करें। इन पार्टियों पर लोकतान्त्रिक ताकतों की तरफ से पर्याप्त दबाव बनाना होगा कि वह अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर अपनी नीतियाँ ठीक करें।
उत्तर प्रदेश दिखाता है कि भारतीय राज्यसत्ता का फासीवादीकरण लगभग पूरा हो चुका है
यदि अल्पसंख्यक पहचान का अहानिकारक प्रदर्शन भी राज्य की ओर से शारीरिक हमलों को आमंत्रित कर सकता है तो इसका मतलब है कि भारतीय राज्यसत्ता का फासीवादीकरण काफी आगे बढ़ चुका है।
नस्लवाद हो या यहूदी विरोधी भावना या सांप्रदायिकता, यह खुली दक्षिणपंथी धाराएं “अन्य” वर्गों की किसी भी पहचान प्रदर्शन, चाहे वह कितना भी अहानिकर हो, के प्रति असहिष्णु हैं। उदाहरण के लिए 2023 में न्यू यॉर्क शहर में एक यहूदी व्यक्ति पर किप्पा (एक टोपी जो यहूदी पहनते हैं) पहनने के कारण हमला हुआ था। अल्पसंख्यक विरोध में उछाल एक वैश्विक समस्या है। केवल लोकप्रिय प्रतिरोध ही ऐसे दक्षिणपंथी आक्रमण को रोक सकता है।
(अनुवाद : महेश राजपूत)