जमीन का बंटवारा बिहार चुनाव में मुद्दा क्यों नहीं है?

कोई भी अखबार उठा लीजिए, सोशल मीडिया पर नजर दौड़ा लीजिए, या बिहार में चुनाव से पहले किसी रैली में शामिल हो जाइए, आपको वही परिचित राजनीतिक रणनीति काम करती हुई नजर आएगी।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अपने मूल आधार, यादवों और मुसलमानों, से उम्मीदवार खड़े करना जारी रखे हुए है। लेकिन इस रणनीति की सीमाओं को समझते हुए, अब वह स्थिर आय के लिए परेशान आबादी को सरकारी नौकरियों का वादा कर रहा है।

वर्षों से चली आ रही कमज़ोर आर्थिक वृद्धिदर ने लाखों लोगों को काम की तलाश में बिहार से पलायन करने पर मजबूर किया है। राजद इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाने और उन मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की उम्मीद कर रहा है जिनके लिए पलायन एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

कांग्रेस, जो अगड़ी जातियों’ के बीच अपने पुराने जनाधार को भाजपा के हाथों गँवा चुकी है, अब बिहार में अपने राष्ट्रीय आख्यान लेकर आई है। ये आख्यान हैं, समावेशी विकास, संवैधानिक मूल्य और धर्मनिरपेक्षता। वह इन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विभाजनकारी सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़ा कर रही है।

यह संदेश बिहार के अर्ध-शहरी इलाकों में गूंज रहा है। लेकिन यह स्पष्ट है कि पार्टी के सुनहरे दिन अब बीत चुके हैं।

वामपंथी दल जरूर अधिकारों और पुनर्वितरण की भाषा बोलते हैं। उनके मुद्दे हैं : भूमि सुधार, श्रम अधिकार, मज़दूरों के सम्मान की बात। लेकिन कुछ इलाकों को छोड़कर, उन्होंने कोई जनाधार नहीं बनाया है।

विकासशील इंसान पार्टी जैसे छोटे दलों को हाशिए पर पड़े उन समुदायों का समर्थन छीनने के लिए लाया गया है, जो परंपरागत रूप से सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) या जेडी(यू) का समर्थन करते रहे हैं।

दूसरा पहलू

दूसरी तरफ़ जेडी(यू) और उसके नेता नीतीश कुमार हैं। यह पार्टी कर्पूरी ठाकुर के फॉर्मूले की उत्तराधिकारी है, यानि अति पिछड़े वर्गों (ईबीसी) और ‘महादलितों’ के साथ-साथ कुर्मी और कोइरी जैसे छोटे लेकिन शक्तिशाली गैर-यादव अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को एकजुट करना। इस आधार से आगे बढ़ने के लिए, नीतीश ने कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए महिला मतदाताओं को साधने में वर्षों बिताए हैं।

अब वह इस चुनाव में जीत के लिए महिलाओं को एकमुश्त नकद हस्तांतरण योजना की लोकप्रियता पर पूरा दांव लगा रहे हैं।

भाजपा उन ‘अगड़ी’ जातियों का समर्थन बनाए रखना चाहती है, जो ओबीसी के राजनीतिक प्रभुत्व को नाराज़गी से देखती हैं। लेकिन वह केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और हिंदुत्व की ज़ोरदार अपील के ज़रिए एक व्यापक गठबंधन बनाने की भी कोशिश कर रही है, जिसका उद्देश्य जातिगत आधार पर हिंदू मतदाताओं को एकजुट करना है।

मध्यम वर्ग और शहरी मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए, वह “विकास” पर ज़ोर दे रही है, जिसका बिहार में मुख्यतः मतलब सड़कें बनाना और नदियों पर पुल बनाना है। भारत के कुछ सबसे ख़राब मानव विकास सूचकांकों वाले इस राज्य में, विकास की यह सीमित परिभाषा बहुत कुछ कहती है।

भाजपा और जद(यू) के अलावा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल, छोटी जाति-आधारित पार्टियां हैं, लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम), जिनमें से प्रत्येक पार्टी विशिष्ट गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करती है।

और फिर एक नया चेहरा है: जन सुराज पार्टी (जेएसपी), जो कुछ अलग पेश करने का दावा करती है, जैसे जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति पर कम, बेहतर प्रशासन के माध्यम से सुशासन और कल्याणकारी कार्यों पर अधिक जोर।

संक्षेप में, बिहार का 2025 का चुनाव उन तीन ताकतों को दर्शाता है जिन्होंने 1990 के दशक से भारतीय राजनीति को आकार दिया है: मंडल (जाति-आधारित आरक्षण और पहचान की राजनीति), मंदिर (हिंदुत्व का एकीकरण), और बाज़ार (विकासवाद)। हर पार्टी अलग-अलग संयोजनों में इन पर ज़ोर देती है, लेकिन मंडल राजनीति सबसे प्रमुख कारक बनी हुई है।

रोज़गार, कल्याणकारी योजनाओं, महिला सशक्तीकरण और विकास के वादों वाला यह मुकाबला एक बुनियादी हक़ीक़त को छुपाता है। चुनावी ताक़त की कमी वाले वामपंथी दलों को छोड़कर, कोई भी बड़ा खिलाड़ी बिहार की मूल समस्या, जिसके दो पहलू आपस में जुड़े हुए हैं, उस पर बात नहीं कर रहा है।

पहला है ज़मीन का सवाल। दशकों के विखंडन के बावजूद, बिहार में ज़मीन का स्वामित्व मुख्यतः अगड़ी जातियों के अभिजात वर्ग के हाथों में है। कृषि भूमि का यह संकेन्द्रण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है; यह उस सामाजिक और राजनीतिक शक्ति का आधार भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

दूसरा है लुप्त उद्योग-धंधे। बिहार की एक प्राकृतिक ताकत है: उपजाऊ कृषि भूमि। इससे एक फलते-फूलते कृषि-प्रसंस्करण उद्योग को जन्म मिलना चाहिए था। इसके तहत रोज़गार पैदा करने वाली और कृषि उपज के मूल्य में अभिवृद्धि करने वाली खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, पैकेजिंग सुविधाओं और आपूर्ति शृंखला का बुनियादी ढाँचा विकसित होना चाहिए था।

इसके बजाय, आज भी बिहार अपने कच्चे कृषि उत्पादों और अपने लोगों का निर्यात करता है। ऐतिहासिक रूप से पूँजी निवेश के बजाय लगान वसूलने को तरजीह देने वाले अभिजात वर्ग के हाथों में ज़मीन का संकेन्द्रण एक गतिशील कृषि-औद्योगिक क्षेत्र के उदय को रोक रहा है।

ये दो मुद्दे, भूमि का संकेन्द्रण और कृषि-प्रसंस्करण का अभाव, यह समझने की कुंजी हैं कि दशकों से चली आ रही “सामाजिक न्याय” की राजनीति और वर्षों से चली आ रही “विकास” की सरकार के बावजूद बिहार गरीब क्यों बना हुआ है। यही वे मुद्दे भी हैं जिनसे हर बड़ी पार्टी सावधानी से बच रही है क्योंकि इन पर ध्यान देने का मतलब होगा जड़ जमाए बैठी उन ताक़तों के हितों को चुनौती देना।

ये ताक़तें हैं : बड़े ज़मींदार (इनमें ओबीसी समुदायों के धनी किसान भी शामिल हैं), अगड़ी जातियों का आर्थिक प्रभुत्व, और वह पूरी राजनीतिक अर्थव्यवस्था जो मौजूदा व्यवस्था को चलाए रखती है।

बिहार के पिछड़ी जाति के नेता, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और अन्य, 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में सत्ता में आए। ज़्यादातर लोग इसका श्रेय 20वीं सदी के मध्य के समाजवादी आंदोलनों को देते हैं।

लेकिन इसकी जड़ें और भी पुरानी, 1920-30 के दशक के त्रिवेणी संघ आंदोलन में हैं। उस समय, पिछड़ी जाति के नेताओं ने उन अगड़ी जातियों (राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, कायस्थ) के प्रभुत्व को चुनौती दी थी, जो ज़मीन, संपत्ति और सत्ता पर कब्ज़ा जमाए हुए थे। वे साक्षरता, शिक्षा और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की मांग कर रहे थे।

लगभग एक सदी बाद भी, बिहार की मूल समस्या जस की तस बनी हुई है: एक छोटा सा अल्पसंख्यक वर्ग अभी भी अधिकांश धन को नियंत्रित करता है।

बिहार का जाति सर्वेक्षण एक कठोर वास्तविकता को उजागर करता है। अगड़ी जातियां जनसंख्या का केवल 15.5% हैं, फिर भी उनके पास सभी सरकारी नौकरियों का 31% हिस्सा है। जबकि अगड़ी जाति के 10% परिवार प्रति माह 50,000 रुपये से अधिक कमाते हैं।

ओबीसी में ऐसे परिवार केवल 4%, ईबीसी और अनुसूचित जातियों में 2% और अनुसूचित जनजातियों में 1% से भी कम है।

भारत मानव विकास सर्वेक्षण (2011) और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (2019) के अनुसार 80% से अधिक बड़े भू-स्वामियों (20 एकड़ से अधिक जमीन वाले) का स्वामित्व अगड़ी जातियों के पास है। संसाधनों का यह संकेंद्रण न केवल आज भी कायम है, बल्कि इसने अपने नेटवर्क, अपने प्रभाव तथा सत्ता में अपनी पैठ के माध्यम से इसे और भी मजबूत कर लिया है।

जनता के पास आर्थिक परिवर्तन के बिना राजनीतिक शक्ति

बिहार में राजनीतिक लोकतंत्र तो आ गया है। पिछड़ी जातियों के पास दशकों से सत्ता रही है। लेकिन यह आर्थिक लोकतंत्र में रूपांतरित नहीं हुआ है। संपत्ति अब भी उन्हीं हाथों में है।

यह समझने के लिए कि बिहार के राजनीतिक नेता, इन बुनियादी मुद्दों से क्यों बचते रहे, हमें यह देखना होगा कि उन्होंने कौन सी लड़ाइयाँ लड़ने का विकल्प चुना। इनमें यहाँ तक कि पिछड़ी जातियों के वे नेता भी शामिल रहे, जिन्होंने सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया था।

लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय की वकालत ज़ोरदार तरीके से की। लेकिन उन्होंने अगड़ी जातियों को चुनौती देने पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि अन्य पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों की उपेक्षा की, या यहाँ तक कि उनका दमन भी किया। उन्होंने भूमि पुनर्वितरण या आर्थिक असमानता पर कोई बात नहीं की। उन्होंने केवल “इधर-उधर की लड़ाइयां” लड़ीं। उन्होंने केवल उन जातियों को चुनौती दी जो पदानुक्रम में यादवों से ठीक ऊपर थीं, न कि असमानता की पूरी व्यवस्था को। इस दृष्टिकोण ने यादवों और अन्य ओबीसी/ईबीसी समूहों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया।

नीतीश कुमार ने एक अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने सड़कें, स्कूल और बिजली की व्यवस्था की। ऐसा बुनियादी ढाँचा तैयार किया जिससे सभी को फ़ायदा हुआ। यह किसी की संपत्ति को ख़तरे में डाले बिना की गयी प्रगति जैसा लग रहा था। उन्होंने शुरुआत में ही भूमि सुधार आयोग भी बनाया, लेकिन जल्द ही बड़े ज़मींदारों को चुनौती देने वाली हर चीज़ को त्याग दिया। नतीजा? बुनियादी ढाँचा तो सुधरा, लेकिन संपत्ति का वितरण नहीं बदला।

यहां तक कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार अपनी ही जातियों (यादव और कुर्मी) के बड़े ज़मींदारों तक को चुनौती देने को तैयार नहीं थे, हालाँकि उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।

अगर बिहार की अर्थव्यवस्था की स्थिति शासन की पहचान होती, तो दो दशकों से सत्ता में रहे नीतीश कुमार अब तक सत्ता से बाहर हो चुके होते। लेकिन विपक्षी महागठबंधन ने सफल रैलियों और लामबंदी के बावजूद खुद को एक स्पष्ट विकल्प के रूप में पेश नहीं किया है।

बिहार के सामने अब दो संभावित रास्ते हैं। पहला है, विकास के मौजूदा मॉडल को जारी रखना, जो मात्र कुछ लोगों के लिए विकास है, जिससे बड़े व्यवसायों और ज़मींदारों को फ़ायदा होता है, और साथ ही आम जनता को संतुष्ट करने के लिए कुछ कल्याणकारी योजनाएँ भी जारी रखना। दूसरा है समावेशी विकास, इसके तहत धन के अंतर को पाटना, भूमि का पुनर्वितरण, यह सुनिश्चित करना कि सभी जातियों तक रोज़गार और आय पहुँचे, और व्यापक रोज़गार पैदा करने वाले कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों का निर्माण।

राजनीतिक में प्रवेश करने वाली नयी ताक़तों ने भी पहले रास्ते का ही उदाहरण पेश किया है। लोजपा के चिराग पासवान खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का वादा करते हैं, जबकि जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर सेवा क्षेत्र के विकास और बेहतर प्रशासन पर ज़ोर देते हैं। दोनों ही विकास की बात करते हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी धन के पुनर्वितरण या भूमि सुधार पर ध्यान नहीं देता। उनके मॉडल बड़े ज़मींदारों, व्यवसायों और नौकरशाहों के हाथों में संसाधनों के संकेंद्रण को स्वीकार करते हैं, और केवल व्यवस्था को और अधिक कुशलता से चलाने का वादा करते हैं।

एनडीए और महागठबंधन दोनों ही बहुजातीय गठबंधन हैं। यह स्थिति इन्हें किसी भी दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ने से रोकती है। हलांकि महागठबंधन के हालिया नीतिगत दस्तावेज़, ‘परिवर्तन पत्र’, ‘माई-बहिन मान योजना’, और ‘अति-पिछड़ा न्याय पत्र,’ समावेशी विकास की कुछ समझ दर्शाते हैं, जिसमें महिलाओं, अति पिछड़ों और दलितों को सशक्त बनाने की योजनाएँ शामिल हैं। लेकिन अतीत में किए गए वादों को देखते हुए, मतदाता संशय में हैं।

वामपंथी दलों के पास धन के पुनर्वितरण की आर्थिक योजनाएँ तो हैं, लेकिन वे इन्हें सामाजिक न्याय के मुद्दों से जोड़ने में नाकाम रहे हैं। उनकी राजनीति अभी तक ऐसे तथ्यों पर विचार नहीं कर पाई है, जैसे कि एक अगड़ी जाति के भूमिहीन मज़दूर को दलित या अति पिछड़ी जाति की महिला से बहुत अलग बाधाओं का सामना करना पड़ता है, भले ही दोनों गरीब हों। कई दलित, जिन्हें आधिकारिक तौर पर ज़मीन का मालिकाना हक आवंटित किया गया है, सामाजिक बाधाओं के कारण आज तक अपनी ज़मीन पर भौतिक कब्ज़ा नहीं कर पा रहे हैं।

एनडीए के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में देखे जाने के लिए, महागठबंधन को एक स्पष्ट और विश्वसनीय संदेश देना ज़रूरी था कि वे केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि समावेशी विकास के लिए गंभीर हैं। उन्हें मतदाताओं तक कल्याणकारी वादे करने के बजाय, पुनर्वितरण और अवसर का संदेश पहुँचाना चाहिए था। उन्हें एनडीए के साथ एक स्पष्ट वैचारिक विरोधाभास प्रस्तुत करना चाहिए था। अब उनकी सारी उम्मीदें केवल वोटरों के सत्ता-विरोधी मिजाज़ पर टिकी हैं।

(अपराजय और श्रीनिवासन रमानी का लेख ‘द हिंदू’ से साभार। अनुवाद : शैलेश)

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