बिहार विधानसभा चुनाव में अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की राजनीतिक उपेक्षा एकदम स्पष्ट है। एक बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह इन 112 मान्यता प्राप्त जातियों के बीच गठबंधन सहेजा जाए। ईबीसी एक विविध जाति समूह है जो बिहार की आबादी का 36% है। उच्च ओबीसी या उच्च पिछड़े वर्ग के साथ मिलकर, वे पिछड़ी जातियों की श्रेणी में गिने जाते हैं, जो बिहार की कुल आबादी का 63% हिस्सा हैं।
राजनीतिक विमर्श और अति पिछड़ा वर्ग
जहां पिछड़ी जातियों की राजनीति कम से कम 1990 के दशक से बिहार के राजनीतिक विमर्श पर हावी रही है, वहीं अति पिछड़ी जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में हाशिए पर रखा गया है। संख्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण होने के बावजूद, बिहार विधानसभा में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व शायद ही कभी 10% के आंकड़े से ऊपर गया हो।
जब 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट पेश की गई, तो वह महज़ एक नौकरशाही फ़ाइल नहीं थी—वह भारत के सब-आलटर्न समुदायों की स्वतंत्रता की घोषणापत्र थी। मंडल आरक्षण के बारे में नहीं था, सदियों से यह कहा जाता रहा है कि आत्म-सम्मान एक विशेषाधिकार है, इसका बदला। पर केवल आत्म-सम्मान से पेट नहीं भरता। 1990 के दशक के अंत तक, बिहार की सड़कें उसकी राजनीति का प्रतीक बन गईं और विकास जातिगत पहचान की सीमाओं पर रुक गया।
भारतीय जनता पार्टी ने “हिंदू एकता” का आविष्कार नहीं किया—उसने इसका मार्केटिंग किया। 1990 के दशक में, जब मंडल की आंधी सवर्ण गणित को चुनौती दे रही थी, तब भाजपा को इसका काउन्टर मिल गया: अयोध्या। “मंदिर वहीं बनाएंगे” का नारा महज़ धार्मिक नहीं था—यह एक अटूट राजनीतिक नशे की खुराक था। इस तरह राम, मंडल के ओबीसी का भगवा मारक बन गए। लालू जहां जातिगत चेतना को संगठित कर रहे थे, वहीं भाजपा धार्मिक भावनाओं को हथियार बना रही थी।
ईबीसी को लेकर चल रही राजनीति
2025 के बिहार चुनाव में ईबीसी की स्थिति समझने के लिए सामाजिक-आर्थिक डेमोग्राफी और राजनीतिक का अवलोकन मौजूदा वास्तविक दर्जा को प्रतिबिंबित करेगी। वास्तव में राजनीतिक दलों ने ईबीसी को एक विशिष्ट राजनीतिक ताकत के रूप में मान्यता नहीं दी है।
बिहार में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ा सामाजिक समूह होने के बावजूद राजनीतिक परिदृश्य में लगभग अदृश्य हैं। राजनीतिक स्थान और उससे जुड़ी नरेटिव बड़े पैमाने पर सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समूहों के नेताओं द्वारा नियंत्रित है। निर्णय लेने की शक्ति कुछ प्रमुख जातियों के पास निहित है।
उदाहरण से नीतीश कुमार (कुर्मी), राजीव प्रताप रूडी (राजपूत), संजय जायसवाल (वैश्य), सम्राट चौधरी (कोइरी), तेजस्वी यादव (यादव), दीपांकर भट्टाचार्य (ब्राह्मण), प्रशांत किशोर (ब्राह्मण), आर.के. सिंह (राजपूत), संजय झा (भूमिहार), विजय सिन्हा (भूमिहार), ललन सिंह (भूमिहार) और उपेंद्र कुशवाहा (कोइरी) जैसे नेता बार-बार चुनाव संबंधी और सत्ता साझेदारी के विमर्श के केंद्र में आते हैं।
अति पिछड़ी जातियों में से केवल मुकेश सहनी (मल्लाह) ही मुख्यधारा की बातचीत में दिखाई देते हैं, और उनकी उपस्थिति भी मूल रूप से केवल प्रतीकात्मक ही है। यानि मुकेश साहिनी अति पिछड़ी जातियों के वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में नही है।
बिहार विधानसभा चुनाव के द्विध्रुवीय मुकाबले में अति पिछड़ी जातियों की संख्यात्मक शक्ति का महत्व सभी दलों ने तो महसूस किया है, पर उसे मानने को तैयार नहीं। महागठबंधन और नैशनल डेमक्रैटिक एलयन्स (एनडीए) ने अति पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाकर अपने सामाजिक गठबंधन का विस्तार करने की आकांक्षाओं को व्यक्त किया है।
इस दिशा में महागठबंधन ने पटना में ‘अति-पिछड़ा न्याय संकल्प’ का आयोजन किया है, और नीतीश के नेतृत्व में एनडीए ने अति पिछड़ी जातियों के हितों की रक्षा करने का दावा किया। पर दोनों दावेदारों के सामाजिक न्याय के दावों की पोल अति पिछड़ी जातियों के संगठन “अति-पिछड़ा आरक्षण बचाओ मोर्चा” (एपीएबीएम) ने खोल दी है।
दोनों प्रमुख गठबंधनों ने खुद को सामाजिक न्याय का ध्वज वाहक बताते हुए, उत्पीड़ित वर्गों के सच्चे मुक्तिदाता होने का दावा किया है। उनकी रैलियों में नारा हर समुदाय के लिए उचित प्रतिनिधित्व का वादा था और पूर्ण सामाजिक न्याय की बहाली का लक्ष्य रहा।
दोनों गठबंधनों ने भारत में जाति-आधारित जनगणना का समर्थन किया, जिसका उद्देश्य प्रत्येक समुदाय की जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करके कल्याणकारी नीतियां निर्धारित करना और हाशिए पर पड़े समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था।
उचित प्रतिनिधित्व की बात तो दूर, अति पिछड़ा वर्ग संगठन एपीएबीएम की पांच महत्वपूर्ण मांगों को भी उनके राजनीतिक घोषणापत्रों में शामिल नहीं किया। कई अरसे से एपीएबीएम की मांग हैं कि:
क) तेली, तमौली और दांगी जैसी नई जोड़ी गई जातियों को अति पिछड़ा वर्ग सूची से हटाया जाना;
ख) अति पिछड़ा वर्ग पर जाति आधारित अत्याचार और हिंसा को रोकने के लिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम के अनुरूप कानून बनाना;
ग) पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण को 20 फीसदी से बढ़ाकर 33 फीसदी करना;
घ) रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का तत्काल कार्यान्वयन;
ङ) और अंत में अब्दुल कयूम अंसारी और दशरथ मांझी को ‘भारत रत्न’ देने की मांग।
अति पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक लामबंदी
जाति के चश्मे से देखने पर बिहार की राजनीति को कई चरणों में विभाजित किया जा सकता है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक बिहार में कांग्रेस के शासन के दौर में ब्राह्मण-भूमिहार-राजपूत और कायस्थों जैसे द्विज जातियों के गठबंधनों का बोलबाला रहा।
हालांकि बिहार में पिछड़ी जातियों की लामबंदी 20वीं सदी के अंत में त्रिवेणी संघ (कुर्मियों, कोइरियों और यादवों के बीच सहयोग स्थापित करना) और जनेऊ आंदोलन (एक ऐसा आंदोलन जिसके तहत बिहार में पिछड़ी जातियों ने उच्च जातियों के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए जनेऊ पहनना शुरू किया) जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से शुरू हो गई थी।
लेकिन उच्च पिछड़ी जातियों के बीच कई जातिगत संघों के प्रसार ने भी उनके राजनीतिक एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई। पिछड़ी जातियों की राजनीतिक लामबंदी का यह चरण 1990 के दशक में अपने चरम पर पहुंच गया। 1990 से 1995 के विधानसभा चुनावों और 1991 के लोकसभा चुनावों में पिछड़ी जाति के विधायकों की संख्या अंततः उच्च जाति के प्रतिनिधियों की संख्या से अधिक हो गई, जो बिहार में राजनेताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था, जिसे बाद में कभी नहीं बदला गया।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को कई पर्यवेक्षकों ने बिहार में इस सामाजिक पुनर्गठन का श्रेय दिया है। जिन्हें कर्पूरी ठाकुर को हैरी ब्लेयर ने ‘पिछड़ा राज’ का प्रवर्तक बताया है।
मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट (1976) को कार्यान्वयन मे लाया, जिसमे उच्च शिक्षा और राज्य सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की सुविधा प्रदान की। इसके साथ उन्होंने दो प्रमुख नीतिगत फैसले किए, जिसने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत गतिशीलता को बदल दिया।
इनमें से पहला था कक्षा 10 की परीक्षाओं के लिए अनिवार्य विषय के रूप में अंग्रेजी भाषा को हटाना, जिससे बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियों के हिंदी माध्यम के छात्रों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अवसर प्राप्त करने में मदद मिली। दूसरा था 1978 में पंचायत स्तर पर स्थानीय चुनाव कराने का निर्णय, जिसने जमीनी स्तर पर लोकतंत्र में भागीदारी के अवसर पैदा किए।
इस निर्णय के कई वर्षों बाद 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ईबीसी समर्थन को मजबूत करने के अपने प्रयासों में, बिहार में “बिहार पंचायती राज संशोधन अधिनियम” लागू करके पंचायती राज संस्थाओं में ईबीसी (20% तक) और महिलाओं (50% तक) के लिए आरक्षण लागू करके इस लोकतंत्रीकरण को सुगम बनाया। सु
भेश कुमार, नीतू शरण और श्रीकांत पांडे द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, इस बदलाव से ईबीसी वर्ग से लगभग 1,464 मुखिया, 18,901 ग्राम पंचायत सदस्य, 1,464 सरपंच और 18,900 पंच चुने गए, जिससे ईबीसी वर्ग के सदस्यों की लोकतंत्र के जमीनी स्तर में भागीदारी सुनिश्चित हुई।
हालांकि, राज्य स्तर पर, उच्च पिछड़े ओबीसी की तुलना में ईबीसी प्रतिनिधि चुनावी राजनीति में हाशिए पर बने रहे, क्योंकि पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व का दावा यादवों, कुर्मियों, कोइरी और बनियों द्वारा किया गया है।
श्रीकांत और प्रसन्ना कुमार चौधरी के मुताबिक, 1957 से 1962 के बीच बिहार विधानसभा में ईबीसी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। 1967 से 1995 के बीच यादव, कुर्मी, कोइरी और बनिया जातियों (उच्च ओबीसी) के 753 विधायक थे, जबकि इसी अवधि में बिहार में ईबीसी विधायकों की संख्या 55 थी।
1990 से 2000 के बीच बिहार में ईबीसी विधायकों की संख्या 6 से 16 के बीच थी। 2005 में राज्य विधानसभा के लिए 19 ईबीसी विधायक चुने गए, जो 2010 में घटकर 17 रह गए। 2020 में यह संख्या बढ़कर 29 हो गई; यह पहली बार भी था जब बिहार विधानसभा में ईबीसी विधायकों की हिस्सेदारी कुल विधायकों के 10% से ऊपर गई।
राज्य की आबादी में 36 फीसदी हिस्सेदारी वाले समुदाय के लिए, यह अभी भी एक बहुत बड़ा अंडर-रिप्रेजेंटेशन है।
अति पिछड़े वर्गों का राजनीतिक उपेक्षा
दोनों गठबंधनों में अति पिछड़े वर्ग “समावेश” का दावा करने वाले अपवाद के रूप में ज़्यादा काम करते हैं, बजाय इसके कि वे “अति पिछड़े वर्ग के राजनीतिक एजेंडे” को आकार देने वाले एक वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में काम करें।
हाल ही में, जाति-आधारित जनगणना के आंकड़ों से हुए खुलासे ने दोनों गठबंधनो के पाखंड को उजागर कर दिया है। वे सामाजिक न्याय का समर्थन करने का दावा करते हैं, लेकिन उनके कार्य कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
2025 के विधानसभा चुनावों के लिए टिकट आवंटन व्यवस्था एक स्पष्ट असमानता को उजागर करती है, जिसमें कुछ समुदायों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी से बहुत कम है। जबकि यह माना जाता है कि चुनाव में निष्पक्ष टिकट आवंटन, विधानसभा में हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के अनुपात में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक बुनियादी कदम है।
पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मुसलमानों को घटाकर जनसंख्या का 23.32 फीसदी है। इसके अनुसार उनके हिस्से में 56 सीट आने चाहिए। एनडीए ने उन्हे 76 निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा किया जबकि महागठबंधन नें 108 टिकट दिए।
अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) मुसलमानों को घटाकर जनसंख्या का 26.30 फीसदी है। इसके अनुसार उनके हिस्से में 66 सीट आने चाहिए। एनडीए ने 37 प्रत्याशी उतारे और महागठबंधन नें मात्रा 30।
मुसलमानों को घटाकर सामान्य की जनसंख्या 11.40 फीसदी है। इसके अनुसार उनके हिस्से में 27 सीट आएंगी। एनडीए ने उन्हे 85 सीट दीं जबकि महागठबंधन नें 42।
प्रदेश के एससी/ एसटी की जनसंख्या 21.33 फीसदी है। इसके अनुसार उनके हिस्से में 51 सीट बनता है। दोनों एनडीए और महागठबंधन नें 40-40 टिकट दिए है।
बिहार में कुल मुसलमानों की जनसंख्या 17.70 फीसदी है। जनसंख्या के अनुपात में 43 सीट आनी चाहिए। एनडीए ने उन्हे 5 निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा किया जबकि महागठबंधन नें 30 टिकट दिए।
प्रदेश में महिलाओं की जनसंख्या का 49 फीसदी है। इसके अनुसार उनके हिस्से में 80 सीट आनी चाहिए। एनडीए ने महिलाओं को 34 निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा किया जबकि महागठबंधन नें 31 टिकट दिए।
इन राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को बारीकी से देखें तो पता चलता है कि मैदान में उतारे गए उम्मीदवारों में ईबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ा है, खासकर जेडी(यू), आरजेडी और वीआईपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों में। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही अपने टिकट वितरण में ईबीसी प्रतिनिधित्व के मामले में पीछे हैं।
वास्तव में, उम्मीदवारों के नामांकन पर बारीकी से नज़र डालने से पता चलता है कि विभिन्न ईबीसी जातियों में, राजनीतिक दल ज़्यादातर कुछ प्रमुख समुदायों जैसे हिंदू ईबीसी में से धनुक, मल्लाह, नोनिया, तेली, और मुस्लिम ईबीसी में अंसारी या मोमिन जैसे समुदायों से उम्मीदवार उतारते है। शेष सारे समुदाय चुनावी उम्मीदवार की श्रेणी से ही बाहर है।
उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट हैं कि बिहार की राजनीति में समुदाय का वजूद, वास्तविक स्थान, आवाज़ और सौदेबाज़ी की शक्ति सवर्ण जातियों के पास ही है। वे नेतृत्व और निर्णय लेने वाली सीटों पर नियंत्रण रखते हैं। लेकिन प्रदेश में सबसे बड़ा जनसंख्या समूह और चुनावों में सबसे बड़ी निर्णायक शक्ति होने के बावजूद अति पिछड़ा वर्ग अथवा अति पिछड़ी जातियों को मुख्य नेतृत्व की भूमिका से बाहर रखा जाता है।
उनकी राजनीतिक महत्ता को मान्यता नहीं दी जाती और उनकी संख्या बल की तुलना में उन्हें नगण्य माना जाता है। बिहार में विभिन्न दलों द्वारा समावेशी राजनीति के बजाए ईबीसी राजनेताओं को काफी हद तक प्रतीकात्मक बनाकर रखे है। इस समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कोई बुनियादी जातिगत परिवर्तन नहीं आया और आज भी ईबीसी अत्यधिक हाशिए पर है।