पच्चीस साल का उत्तराखंड: नैतिकता, आदर्शवाद का संकट और पतनशील समाज

उत्तराखंड के विगत को याद किया जाए तो पता लगेगा कि इसका गठन भले ही आंदोलनों की पृष्ठभूमि से हुआ हो, लेकिन इसका श्रेय स्वघोषित नैतिकता की अलम्बरदार भाजपा और संघ की अटल सरकार ने शुरुआत में ही झटक लिया।

श्रेय ही नहीं झटका, बल्कि एक ही झटके में उत्तराखंड के आंदोलन को अप्रासंगिक कर दिया।

गांधीजी ने भारतीय समाज के संदर्भ में राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए जो शुचिता की कल्पना की थी, -जैसे सिद्धांत के बिना राजनीति, परिश्रम के बिना सम्पत्ति, अन्तर-आत्मा के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना विज्ञान, और त्याग के बिना पूजा, यह सबके सब धरे के धरे रह गए। 

हालांकि भाजपा ने गांधीजी को अपना बुजुर्ग मानकर उनके आदर्शो पर चलने और, विरासत को आगे बढ़ाते के दावे तो बहुत किए , पर उसकी कार्यप्रणाली और एक्शन गांधीजी के आदर्शों से जरा भी मेल नहीं खाती। भाजपा ने ना तो राजनैतिक शुचिता ही बचाए रखी ही रही और ना ही नैतिकता।

 कांग्रेस बहुत ख़राब है कांग्रेस ये है, कांग्रेस वो है वगैरह-वगैरह यह बात कहते और सुनते हुए कांग्रेस को सत्ता के प्लेटफार्म से हटा दिया गया, और उसकी जगह महान राष्ट्रवादी स्वयं को चारित्रिक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का प्रतीक बताने वाली और नैतिकता की विरुदावलि गाने वाली विचारधारा सत्ता में विराजमान हुई।

भाजपा कांग्रेस के शासन को कोसते हुए नैतिकता के दावे करते हुए सत्ता में पहुंची थी, कांग्रेस ने नैतिकवान होने का दावा नहीं किया इसलिए दावा जिसने किया सवाल उसके ऊपर ही है।

जो लोग बैलेंस बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस को एक ही तराजू में तोलते हैं उनको नैतिकता और चारित्रिक शुचिता की ना तो समझ है और नाही इससे उनका कोई लेना-देना है।

उत्तराखंड को देवभूमि कहके खूब प्रचार किया जाता है, लेकिन क्या सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक संदर्भ में कहीं देवत्व की बात की जाती है, या किसी तरह मन मे, कर्म में, आचरण में, देवत्व बचा भी है। यहां सिर्फ अगला और अगला चुनाव जीतने की तिकड़में, राजनीति में मानवीयता के स्थान पर दानवीयता का अट्टहास ही बचा है।

यहाँ के मुख्यमंत्री उत्तराखंड में तय नहीं होते हैं, आयातित या अवतरित होते हैं, इसलिए इस राजनीति ने उत्तराखंड को सतत् “मुख्यमंत्री प्रयोगशाला” बना दिया है, वो क़रीब क़रीब पर्ची वाले मुख्यमंत्री की तरह है।

पच्चीस साल में बारह मुख्यमंत्री बदल जाना कोई संयोग नहीं, बल्कि इस राज्य की राजनीतिक प्रवृत्ति का स्थायी चरित्र है।

अब अगर पर्चीबाज मुख्यमंत्री रहे तो ज़ाहिर है उसका स्वविवेक नहीं होगा। उसका विरोध पर्ची पर निर्भर रहेगा यही इस प्रदेश का हासिल वसूल है।

नारायण दत्त तिवारी, भुवन चंद्र खंडूरी और हरीश रावत को थोड़ा बहुत क्रेडिट दे सकते हैं(बाद में खंडूरी भी लम्बवत् हो गए थे)।

अब भाजपा के नित्यानंद में क्या कमी थी कि उनको एक साल में चलता करके भगत सिंह कोश्यारी को मोहरा बनाकर फिट किया गया।

कांग्रेस ने हरीश रावत जैसे ज़मीनी नेता को दरकिनार करके स्टोर में रखे नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया। हां, इतना ज़रूर हुआ कि तिवारी जी ने जो किया चाहे वो अच्छा था या बुरा अपने बलबूते पर किया।

तिवारी सरकार के काम और उपलब्धियों और राज्य की आंदोलनकारी शक्तियों पर अभी कुछ कहा जाना बाकी है। नटशैल में यह कहा जा सकता है तिवारी जी के दौर में बहुत कुछ किया जा सकता था लेकिन प्रेशर ग्रुप के अभाव में होने वाले काम भी नहीं हो सके।

कांग्रेस के हारने के बाद ईमानदारी की चाशनी और अनुशासन के कड़के के साथ राष्ट्रवादी चोले में भुवन चंद्र खंडूरी आए लेकिन पर्चीबाजी की सियासत ने उनके पर्चे को 2 साल में ही दाखिल दफ़्तर कर दिया।

दो साल मेरठवादी साहित्यकार निशंक का प्रहसन चला, बहुत सी कहानियां बनी और चलीं, वो केशवकुंज की गौरव गाथाओं में शामिल रही होंगी लेकिन आम जनता का उनसे कोई सरोकार नहीं रहा।

इसके बाद फिर दो साल कड़कनाथ भुवन चंद्र खंडूरी अवतरित हुए और अपने साथ पार्टी की लुटिया डुबोकर संघ के शो रूम में सुशोभित हुए।

कांग्रेस ने फिर न जाने कहां से महा ईमानदार खोज लिया, नामनिहाद बहुगुणी विरासत के हाईकोटिया विजय बहुगुणा को उत्तराखंड में बैठा दिया, जो दो साल तक का अपना पहला राजनैतिक जीवन नहीं जी सके उनके दौर में, केदारनाथ आपदा हुई थी। जिसमें उनकी और उनके पुत्रश्री की नकारात्मक भूमिका की भाजपा ने खूब आलोचना की थी, लेकिन बाद उसे संघी वाशिंग मशीन में धोकर और झाड़झूड़ कर अलगानी पर लटका दिया। पुत्रश्री पर भगवा कृपा तब से अब तक बनी हुई है।

उत्तराखंड में सबसे क्रिटिकल वक्त और मुकद्दर हरीश रावत का रहा, उत्तराखंड बनने से पहले बाबरी मस्जिद और राममंदिर की राजनीति ने यूपी में कांग्रेस को हाशिए में ढकेल दिया था। ऐसे हालात में हरीश रावत ने कांग्रेस को उत्तराखंड में अपने पैरों पर खड़ा किया था, जिसके बल पर उत्तराखंड की विधानसभा के पहले आम चुनाव में कांग्रेस बहुमत से जीती, लेकिन कांग्रेस ने हरीश रावत को धक्का देकर अपने स्टोर से लाकर नारायण दत्त तिवारी को देहरादून में बैठा दिया। नारायण दत्त तिवारी अपनी खुन्नस में कांग्रेस के सीने पर मूंग दलते रहे, और हरदा रोते रहे। यह कांग्रेस की तरफ से राजनैतिक मूल्यों का सबसे बड़ा वार था।

खैर विजय बहुगुणा की बदनामी के बाद कांग्रेस की कमान हरीश रावत को सौंपी गई, 2013 की केदारनाथ आपदा और प्रशासनिक अक्षमता के आरोपों के बाद कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को हटाकर 1 फरवरी 2014 को हरीश रावत को मुख्यमंत्री नियुक्त किया। हरदा को उस कांग्रेस के विधायक दल की कमान सौंपी गई जिसका हर विधायक मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहा था।

उधर संघी टोला घात लगाए बैठा था। हरीश रावत ऐसे मुख्यमंत्री रहे जो वैधानिक होते हुए भी दो बार शपथ लेने को मजबूर हुए, उनके मुख्यमंत्री काल का पहला चरण 1 फरवरी 2014 – 27 मार्च 2016 तक रहा, रावत ने कांग्रेस की आंतरिक गुटबाज़ी के बावजूद सरकार चलाई। उनके शासन में कई लोक-कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की गईं, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, पलायन नियंत्रण के प्रयास, और पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल।

केन्द्रीय सरकार में बैठे हुए मोदी को हरीश रावत किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं थे। तो आपरेशन/षड्यंत्र शुरू हुआ जिसमें अटैचियां घूमी, विषकन्याएं घूमाई गई, स्टिंग बाजी से भयादोहन हुआ। मार्च 2016 में बजट पास करते वक्त राजनीतिक षड़यंत्र स्टार्ट हुआ।

कांग्रेस के 9 विधायकों, हरक सिंह रावत, विजय बहुगुणा, रेखा , शैलारानी वगैरह से बगावत करवाई गई, विपक्ष ने इसको आधार बनाकर कहा कि सरकार का बहुमत समाप्त हो गया। 27 मार्च 2016 को मोदी सरकार ने अपने मन माफिक राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया, भाजपा को पता था उत्तराखंड में उसे जमना है तो हरीश रावत की जड़ों में मट्ठा डालना होगा। और यह काम कांग्रेस के ही अति महत्वाकांक्षी गुट ने लालच में कर दिया, और इसके साथ ही अपनी राजनैतिक हाराकिरी कर ली।

इस बीच राजनैतिक लेन-देन का स्टिंग आपरेशन हुआ। वोडाफोन के कुत्ते की शक्ल वाले मध्य भारत के एक संघी नेता ने बम्बई की कालगर्ल्स ( उनके राजनैतिक सिद्धान्तों और स्मृतियों में विषकन्याओं का प्रयोग मान्य है) से भयादोहन और हित साधने का षड़यंत्र किया। 

आरोप लगे कि इस पूरे धर्म-कर्म में राष्ट्रवादी लोगों के साथ साथ राष्ट्रवादी मीडिया भी सम्मिलित हैं। सम्बद्ध पक्षों के अटैची भर भर कर आर्थिक हित भी पूरे किए गए।

देवभूमि के किन्हीं देवपुरुषों और हितैषियों ने इस अनैतिकता और चारित्रिक पतन पर बोलने की ज़रूरत नहीं समझी। यह मान लिया गया कि देवभूमि की यही नियति है।

यह धत्कर्म अदालत में जाना ही था, जिसकी थोड़ी बहुत इज़्ज़त बची हुई थी।

मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट होते हुए विधानसभा सभा में तय हुआ। और इस तरह हरदा उत्तराखंड में दूसरी बार और कांग्रेस के तीसरे लेकिन क्रम में चौथे मुख्यमंत्री बने लेकिन इस बार एक साल भी नहीं रह सके। दसवें महीने में ही विधानसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गए।

हरीश रावत का कार्यकाल उत्तराखंड के इतिहास में “संवैधानिक संकट और पुनर्बहाली” के उदाहरण के रूप में दर्ज है। वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने जिनकी सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाकर षड़यंत्रपूर्वक हटाया गया था,और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुए फ्लोर टैस्ट से फिर बहाल किया गया। 

उनके दो-टुकड़े वाले कार्यकाल ने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि भारत के राज्यों में निर्वाचित सरकारें केंद्र की राजनीतिक कुचक्रों षड़यंत्रों से सुरक्षित क्यों नहीं हैं?

सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए था जो राजनैतिक शुचिता, उच्च चारित्रिक मापदंडों की बात करते थे,और कहते थे अब कांग्रेसी कल्चर नहीं चलेगा। कांग्रेस में जो चला सो चला अब तो अनैतिकता और षड़यंत्र की चालों ने शकुनि को भी पीछे छोड़ दिया है। शायद एक देश एक सरकार के तानाशाही की लोकतांत्रिक स्वरूप देने के लिए यह ज़रूरी हो गया होगा।

उसके बाद राजनैतिक नैतिकता और शुचिता की बात करना बेमानी हो गया। तो 25 साल की उम्र में उत्तराखंड राजनैतिक संदर्भ में वैसा ही है, बल्कि उसके ज़्यादा बौना हो गया है जैसे मुल्क के दूसरे ख़राब राज्य हैं।

यहां यह रेखांकित करना पड़ेगा कि चारित्रिक मूल्य और व्यक्तिगत नैतिकता के बारे यह राज्य कोई अपने मूल्य स्थापित नहीं कर सका है।

उत्तराखंड के शुरूआती दौर में बैडरूम की नैतिकता की फुसफुसाहटें शुरू हो गई थी। नेताओं के साथ रहने वाले सुरक्षाकर्मियों को इस बारे में सख़्त हिदायतें दे दी गई थीं। वो कसम खाकर और कसम लेकर मुस्कुराते हुए यह बातें किसी को नहीं बताते थे।

तीसरे मुख्यमंत्री तिवारी बहुसंख्यक समाज की नैतिकता के मारे हुए थे, फिर भी कुछ काण्डों के कारण उनके नाम के वीडियो बने और समाज ने खूब मजे लिए, एक और मंत्री का नाम भी एक अनैतिक कांड से जुड़ा था, उसका इस्तीफा भी हुआ जिसकी उसकी खूब चर्चाएं हुईं।

लेकिन उन कांडों के बाद क्या नैतिकता के मापदंड स्थापित हो गए थे ? क्या तिवारी कांड के बाद नैतिक शुचिता स्थापित हो गई थी ? इस देवभूमि समाज ने इस पर कोई बात करना ज़रूरी नहीं समझा।

इसके बाद जो संगठन मंत्री वाला कल्चर चलने लगा वो अन्दर ही अन्दर बहुत घृणित और भ्रष्टतम रहा। इस क्रम में राजधानी में रिपोर्ट हुई, तो संगठन मंत्री को बचाने के लिए सफाई आई कि “आदमी है आदमी से गलती हो ही जाती है” और इस तरह गलती करने की स्थाई स्वीकृति हो गई। जो चलती रही जिसकी परिणिति में अंकिता कांड हुआ।

अंकिता कांड में जो प्रश्न उठे उसका जवाब अभी तक नहीं आया। यह कैसा समाज रहा जो 19 साल की बेटी के साथ घृणित अपराध करने वाले दरिंदों को और उनके समर्थकों को ना तो इंगित कर सका और ना ही उनको अपराध बोध करा सका। और अब वो ही वर्ग झूठ पर झूठ बोलकर समाज में समाज में विषवमन करने के लिए स्वतंत्र हैं।

सबसे खराब बात यह है जिस प्रदेश में महिलाओं की अस्मिता को लेकर उच्च मापदंड बनाने चाहिए थे उस प्रदेश में सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े तत्वों ने महिलाओं के ख़िलाफ़ बहुत जरायम किए हैं और लगातार कर रहे हैं। साथ ही वो अपने जुर्मों से ध्यान हटाने के लिए हथकंडे भी चला रहे हैं।

तो इस तरह देव भूमि में राजनैतिक शुचिता और मूल्यों से लेकर नैतिक मापदंडों तक क्षरण ही हुआ है। कथित धार्मिक श्रेष्ठता और महात्म के बीच उत्तराखंड की चारित्रिक शुचिता बस दिखावे की चीज रह गई है, वास्तविकता से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

फिर झूठ, भ्रष्टाचार, वादा खिलाफ़ी, हक़मारी और नफ़रत फैलाने की बात पर क्या कहिएगा।

(लेखक, पत्रकार के रूप में 1975 से उत्तराखंड में कार्यरत हैं।  वर्तमान में इस्लाम हुसैन देश की शीर्ष गांधीवादी संस्था सर्व सेवा संघ की ईकाई उत्तराखंड सर्वोदय मण्डल के अध्यक्ष हैं। लेखक की चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।)

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