ट्रम्प अमेरिका का असली चेहरा : ज़रुरत है राजनीतिक क्रांति की, गुस्सा है चरम पूंजीवाद से!

(भाग एक)

हाल ही में धन कुबेरों के टापू न्यूयॉर्क के सर्वोच्च मेयर पद निर्वाचित जोहरान ममदानी की जीत को अमेरिका में नई राजनीति के आग़ाज़ के रूप में देखा जा रहा है। धनकुबेरों की मदद के बिना उन्होंने कड़ा मुक़ाबला जीत कर यह स्थापित कर दिया कि उत्पीड़ित आम जन के साथ जुड़ कर ही वैकल्पिक राजनीति का निर्माण किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य होने  के बावज़ूद भारतवंशी ममदानी  ने विविधापूर्ण अमेरिकी समाज के अधिकांश वर्गों का विश्वास  प्राप्त कर बहुलतावाद और उदारसमाजवाद का परचम न्यूयॉर्क की गगनचुम्बी इमारतों पर लहरा दिया है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ममदानी पर ‘ कम्युनिस्ट पागल इंसान’ का तमगा चस्पा दिया है। वास्तव में, ममदानी की जीत में प्रसिद्ध प्रतिरोधी सीनेटर बर्नी सैंडर्स की समाजवादी राजनीति की धारा भी बहती हुई दिखाई देती है। उनकी ताज़ा पुस्तक ” इट इज़ ओके टू बी ऐंग्री अबाउट कैपिटलिज़्म’ ने अमेरिका में धूम मचा रखी है। ममदानी की जीत की पृष्ठभूमि में भारतीय सन्दर्भों के साथ  इस पुस्तक पर विस्तार से चर्चा की गयी है।

“ देश के आधुनिक इतिहास में डोनाल्ड ट्रम्प सबसे ख़तरनाक़ राष्ट्रपति हैं। “

बर्नी सैंडर्स 

इतिहास गवाह है, कभी किसी फासीवादी + नाजीवाद तानाशाह ने अपने अवसान की आहटों को सुना–समझा है? नहीं सुना। उसका पटाक्षेप आत्महत्या, देश पलायन या प्रतिरोधी जनता ने ही किया है। दीवारों पर उभरती इबारतों से जो सबक़ लेगा, इतिहास में वही सच्चा लोकतांत्रिक नायक कह लाएगा। इस दृष्टि से अमेरिका सहित भारत भी अपवाद नहीं है। 

यह इत्तफ़ाक़ ही था। मैं अपनी  ताज़ा बोस्टन यात्रा के अंतिम पड़ाव  में हार्वर्ड स्क्वायर के एक कोने में खड़ा हुआ था। एक अधेड़  भारतीय बंगाली टकराता है। दोनों के बीच  मोदी -शासन और ट्रम्प शासन पर सामान्य चर्चा होने लगती है। चर्चा के दौरान फासीवाद, कॉर्पोरेट पूंजीवाद, उदार लोकतंत्र, संविधान, समाजवाद -साम्यवाद, दक्षिण पंथ -वामपंथ जैसे विस्फोटक शब्द वातावरण को गरमा रहे थे।

विस्फोटक विशेषण का प्रयोग इसलिए है कि वर्तमान अमेरिका और भारत में ऐसे शब्दों का प्रयोग समाज विरोधी, अर्बन नक्सल, विकास विरोधी, राष्ट्र विरोधी, सनातन विरोधी जैसे तमगों से सुशोभित होना है। अचानक अजनबी  भारतीय मेरी बांह पकड़ कर  सड़क के दूसरी पार हार्वर्ड बुक स्टोर ले जाते हैं और पूरे जोश-ख़रोश के साथ खरीद कर एक पुस्तक भेंट करते हैं। मैं अचम्भित हूं। अमेरिकी यात्राओं में पहली दफ़ा ऐसा अनोखा अनुभव हुआ था।  

क़रीब 310 सफ़ों में सिमटी पुस्तक ‘ पूंजीवाद के प्रति क्रोधित होना उचित है’ में यांकी राष्ट्र यानि संयुक्त राज्य अमेरिका के सामाजिक + आर्थिक + राजनैतिक यथार्थ की परत -दर -परत उघड़ती हुई चली गई हैं। लम्बे समय से डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा समर्थित निर्दलीय सीनेटर व लेखक बर्नी सैंडर्स ने अमेरिका की शासन- प्रशासन संरचना की बखिया उधेड़ कर रख दी है। अमेरिकी जीवन का शायद ही कोई पक्ष छूटा हो जिसकी लेखक ने  चीरफाड़ न की हो।

सीनेटर सैंडर्स के माता -पिता श्रमिक वर्ग से थे। सो, आज़ भी लेखक के चिंतन -मनन में  श्रमिक वर्ग की चिंताएं और समतावादी अमेरिका के स्वप्न की अन्तर्धारा बहती हुई दिखाई देती है।

पुस्तक के शीर्षक को देखते हुए भारत के प्रसिद्ध चिंतक राजनेता  मीनू  मसानी की टिप्पणी याद आ गई।  स्वतंत्रता सेनानी रह चुके दिवंगत सांसद मसानी ने अपने जीवन काल में कहा था कि व्यक्ति को  युवाकाल तक वामपंथी होना चाहिए। प्रौढ़ काल में यदि वह वामपंथी बना रहता है तो बुद्धू कह लाएगा।

लेकिन, वेरमोंट  से प्रतिरोधी सीनेटर सैंडर्स 84 बसंत – पतझड़ देख लेने के बावज़ूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान से भिड़ने के लिए तत्पर रहते हैं। वे लिखते हैं “ मैं जितना वृद्ध होता जाता हूँ, मैं उतना ही अति  पूंजीवादी व्यवस्था से गुस्से से भर जाता हूं। और मैं चाहता हूं कि हमारे  देश में आमूलचूल परिवर्तन आये।” 

शायद यही वजह थी कि बुक स्टोर में उनकी पुस्तक को खरीदने वालों में युवक अधिक दिखाई दिए। पुस्तक को आद्योपान्त पढ़ते हुए लगा कि लेखक अपने देश अमेरिका के साथ साथ भारत की भी छिलाई कर रहा है।

शायद इस सोच की वजह यह हो सकती है कि दोनों देशों के शासक वर्ग का चरित्र समान है। डिग्री का फ़र्क हो सकता है, लेकिन चरित्र पदार्थ में समानता है; राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की राजनैतिक व्यवहार शैलियों में सादृश्यताओं को चिन्हित करना दुर्लभ काम नहीं है। यह अलग बात है कि लेखक ने पुस्तक में मोदी का कोई ज़िक्र नहीं किया है। अलबत्ता, उनके प्यारे दोस्त ट्रम्प का उल्लेख सफ़ों पर बिखरा हुआ है। 

मूलतः पोलिश आप्रवासी सैंडर्स ने  ‘अति पूंजीवाद ( उबर कैपिटलिज्म)’ की कारगुज़ारियों और शासन तंत्र पर उसकी अभेद्य पकड़ का अकाट्य तथ्यों -आंकड़ों के साथ बारीक़ विश्लेषण किया है। लेखक की दृष्टि में मौजूदा व्यवस्था अन्यायपूर्ण और प्रचंड रूप से अनैतिक है। इस सदी की अर्थव्यवस्था ‘ कुत्ता -कुत्ता काटन अर्थव्यवस्था’ है।

कुलीनतंत्र ने  राजनीति और मीडिया, दोनों को क़ब्ज़ा लिया है। सत्ताधारियों से कचोटनेवाले के स्थान पर मनभावन सवाल किये जाते हैं। ( इस सन्दर्भ में मोदी – अभिनेता अक्षयकुमार इंटरव्यू को याद करें जिसमें प्रधानमंत्री से आम खाने के सलीके पर सवाल थे)।

सैंडर्स का मत है कि  जलवायु परिवर्तन, विषमता, कट्टरवाद, उभरता नवफासीवाद ,नस्लवाद, विदेशी-घृणा, यौनवाद जैसे  बुनियादी मुद्दों से जुड़े सवालों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। अमेरिकी समाज में निराशा, हताशा, आत्महंता  जैसी बीमारियों की प्रवृत्तियां क्यों बढ़ती जा रही हैं, इस सवाल पर सन्नाटा पसरा रहता है। 

पिछले 50 सालों में पगार वृद्धि रुंध क्यों गयी है, प्रतिघंटा  न्यूनतम दर 20 डॉलर निर्धारित क्यों नहीं की जा रही है, सभी इस पर खामोश हैं। बढ़ती  बेघरी,  बेरोज़गारी, अस्पतालों में स्टाफ अभाव, बंद होते स्कूल, मानवाधिकारों का हनन, खाद्यान आश्रमों की कमी, मुद्रास्फीति, घटता जीवन स्तर, बचपन निर्धनता, अश्वेत व  भूरे परिवारों तथा श्वेत परिवारों के बीच व्याप्त विसंगतिपूर्ण हालात, पहुँच से बाहर होती उच्च शिक्षा जैसे बुनियादी सवाल कांग्रेस ( संसद) और वाइट हाउस , दोनों को ललकार रहे हैं।

लेखक का स्पष्ट मत है “  सत्य यह  है कि आर्थिक सुरक्षा व आत्मनिर्भरता के अभाव में  व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व नहीं है।”

अमेरिकी समाज का यथार्थ:

सैंडर्स का कहना है कि अमेरिका में प्रतिवर्ष 60 हज़ार लोग चिकित्सा सुविधा  के अभाव में मर जाते हैं और 8 करोड़ 50 लाख लोग अपना बीमा नहीं करा सकते हैं।  सर्दियों के दिनों में लाखों वरिष्ठ नागरिकों के पास अपने घरों  को गर्म रखने की सामर्थ्य नहीं है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका में अरबपति-खरबपतियों की आबादी तेज़ी से बढ़ती जा रही है।

कोविड महामारी काल में भी इस वर्ग ने अपनी दौलत व मुनाफे में बेतहाशा ईजाफ़ा किया है; तीन खरबपतियों के पास  देश की आधी से अधिक आबादी  यानि 16 करोड़ 50 लाख डॉलर की संयुक्त सम्पति से भी अधिक दौलत है। संक्षेप में,  वर्तमान अमेरिका में शिखर के 1 प्रतिशत वर्ग की  दौलत निम्न  92 प्रतिशत वर्ग की कुल  दौलत से भी कहीं ज़्यादा है।

कॉर्पोरेट घरानों के सीईओ अपने कर्मचारियों की तुलना में 400 गुना अधिक कमाते हैं। “सीईओ  ने अमेरिकी जनता और वैश्विक समुदाय के साथ विश्वासघात किया है। क्या इनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है? क्या इनकी करतूतों को लेकर टेलीविज़न और प्रमुख समाचारपत्रों के सम्पादकों के बोर्ड में निंदा हो सकी है? क्या कभी इनके खिलाफ कोर्ट में केस चला और अपराधों के लिए जेल भेजे गए ?” लेखक अमेरिका के शासकों से  दृढ़ता के साथ पूछता है।

इतना ही नहीं तंबाकू उद्योग को भी कटघरे में खड़ा किया जाता है। प्रतिवर्ष हज़ारों अमेरिकी तम्बाकू रोग से मर जाते हैं। सिर्फ 2018 में ही धूम्रपान से  4 लाख 80 हज़ार अमेरिकी मरे थे। अपने माल की खपत के लिए टोबैको कंपनियां दुनियाभर में अपार धन खर्च करती हैं। लेकिन, परिणामस्वरूप पैदा होनेवाली जानलेवा बीमारियों के प्रति कोई ज़िम्मेदार नहीं होता है। देश के अकेले  तीन कॉर्पोरेट घराने वाल स्ट्रीट फर्म्स – ब्लैक रॉक, वैनगार्ड और स्टेट स्ट्रीट के पास 20 लाख खरब डॉलर के शेयर हैं। लेखक का मत यह भी है कि मुनाफ़ाखोर कॉर्पोरेटपतियों  पर 60% सम्पत्ति  कर  लगाया जाना चाहिए।

सैंडर्स की दृष्टि में ट्रम्प कॉर्पोरेट घरानों के नुमाइंदे हैं; “ वास्तव में चुनाव ट्रम्प और लोकतंत्र के मध्य है, और लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए….. चुनावी धांधलियों के माध्यम से ही वे ( ट्रम्प व विरोधी पार्टी रिपब्लिकन ) चुनाव जीत सकते हैं।” ( और हुआ भी ऐसा ही.. भारत में भी  ‘वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा गूँज रहा है। भारत के विभिन्न राज्यों में हुई वोट-धांधली के सुबूत भी दिये गए हैं और चुनाव आयोग को कठघरे में भी खड़ा किया गया है)।

कॉर्पोरेट लूट की वजह से अमेरिका में  करीब 2 करोड़ 50 लाख लोग बेरोज़गार हैं। देश में भुखमरी चरम पर है, और लाखों लोगों को  आपातकालीन ‘फ़ूड पैकेज’ लेने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ता है। कॉर्पोरेट घरानों के पास ही  20% से अधिक दवाई निर्माता कंपनियां हैं। नशीली दवाइयों की वज़ह से 6 लाख अमेरिकियों की मौत हुई है। 

कॉर्पोरेट पति “ घरों में नहीं रहते हैं, महलों में रहते हैं। दुनिया भर में फैले  इनके भवनों में बड़े बड़े लॉन और  विशाल गेट हैं।”  आम अमेरिकी करदाताओं की कीमत पर चंद कोर्पोरेट पति और उनके सर्वोच्चअधिकारी विलासिता का जीवन जीते हैं; वाशिंगटन, न्यूयॉर्क और अन्य बड़े शहरों में इनके विशाल भवनों में  सुसज्जित 25 -25 बाथ रूम रहते हैं; खुद के जहाज व जेट प्लेन रखते हैं; विशाल निजी ज़मीनें होती हैं।

लेकिन, ये धन कुबेर अपने कर्मचारियों की पगार में वृद्धि करेंगे नहीं। अमेज़ॉन और जेफ्फ बेज़ोस की कंपनियों, गोदामों, कारखानों में काम करनेवाले श्रमिक व कर्मचारी हमेशा मौत की जद में रहते हैं। सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं होता है।  

अनुभवों का दायरा 

वास्तव में सैंडर्स की यह किताब उनके निजी अनुभवों पर आधारित है। सीनेट सहित वे विभिन्न पदों के चुनाव सफलतापूर्वक लड़ चुके हैं। राष्ट्रपति का प्रारम्भिक  चुनाव ( कुछ राज्यों की  प्राइमरी ) भी जीते थे। लेकिन, उनकी अपनी ही पार्टी डेमोक्रेट के धनपतियों ने उनका जमकर विरोध  किया था। चंदा देने से कतराये।  अंततः  राष्ट्रपति पद के लिए  सैंडर्स के मुक़ाबले में हिल्लेरी किलटन को पार्टी का नामांकन ( राष्ट्रपति चुनाव 2016 )  मिला था। लेकिन, वे ट्रम्प से हार गयी थीं।

आम धारणा है कि यदि सैंडर्स को पार्टी का नामांकन मिल जाता तो ट्रम्प की करारी हार हो सकती थी। चुनाव अभियान के दौरान लेखक ने जहां अमेरिकी समाज की विभिन्न छिपी-ढकी परतों के यथार्थ को देखा, वहीँ उन्हें यह भी अनुभव हुआ कि अरबपतियों-खरबपतियों ने विरोधी पार्टी रिपब्लिकन पर  ही नहीं, उनकी अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसों पर कब्ज़ा कर रखा है।

यह वर्ग हमेशा  अमेरिका में क्रांतिकारी सामाजिक -आर्थिक- राजनैतिक परिवर्तन के मार्ग में चट्टान बन कर खड़ा रहेगा. ( क्या आज के भारत की स्थिति इससे भिन्न है? पिछले ही दिनों सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बताना पड़ा कि  धनपतियों ने चुनावी बांड ख़रीद कर शासक दल  भाजपा को कितना मालामाल किया।  इसके बदले मोदी सरकार ने भी उन्हीं धनपतियों को किस तरह से फायदा पहुंचाया थ।

मोदी +शाह सरकार के साथ अडानी+अम्बानी के रिश्ते जगज़ाहिर हैं।  विरोधी दलों के हाथ बांड की खुरचन ही हाथ लगी)  अतः लेखक सैंडर्स धन कुबेरों से  भारी कर वसूली से प्राप्त राशि को जन कल्याण में खर्च करने के सुझाव देते हैं। इस सम्बन्ध में लेखक का प्रस्ताव है कि  कुख्यात वालमार्ट के मालिक  वाल्टों फॅमिली, बहु चर्चित  एलोन मस्क,  जेफ्फ बेज़ोस, फेस बुक के जुकरबर्ग,  अमेज़ॉन,  डेल्टा जैसे धन कुबेरों से उच्च कर वसूली की जानी  चाहिए।

लेखक के मत में इस पैसे को स्वास्थ और शिक्षा के क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए। वाक़ई, अमेरिका में स्वास्थ क्षेत्र की दयनीय स्थिति है. लेखक के अनुसार हेल्थ बीमा कंपनियां बेतहाशा कमा रही हैं। उन्होंने ऐसी कंपनियों की सूची दी है जिन्होंने 2021 में  19 मिलियन से लेकर 60 बिलियन डॉलर तक का मुनाफ़ा कमाया।

इसके विपरीत लाखों अमेरिकी उचित चिकित्सा के अभाव में मर जाते हैं। लाखों के पास बीमा -सुरक्षा नहीं है।  क्या अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान को इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए? ( क्या हमारे देश में ऐसा नहीं किया जा सकता ? भारत के धन कुबेरों के लाखों करोड़ रुपयों के बैंक क़र्ज़ को बट्टे -खाते में डाल दिया जाता है। सरकारी बैंकों के 15 -16 लाख करोड़ रु.  एनपीए माफ़ किये गए हैं। चंद  सफेदपोश दस्यु बैंकों से  हज़ारों करोड़ रु. लेकर देश से ही फ़रार हो गए हैं। विदेशों में विलासिता का जीवन जी रहे हैं।  क्या शासकों से नज़रें चुरा कर इन धन- पशुओं का फ़रार होना संभव था?)

लेखक ने धन कुबेरों से अति उच्च कर वसूली के पक्ष में पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट के मत का उल्लेख किया है, जिन्होंने 1935 की मंदी के दौरान अमीरों पर “बहुत ऊंचे कर” लगाने की पेशकश की थी। सैंडर्स ने आंकड़े दे कर यह भी बताया है कि अमेरिका में अमीर लोग लम्बा जीवन जीते हैं, लेकिन निर्धन वर्ग के लोगों की आयु छोटी रहती है। इसकी वजह है विभिन्न जानलेवा रोग।

लेखक कहता है “ लाखों अमेरिकी युवा अवस्था में मर रहे हैं क्योंकि वे ह्रदय रोग, कैंसर, डायबिटीज, अस्थमा के शिकार हो जाते हैं। “  लेखक कहते हैं कि इस दुर्दशा का कारण है कि उनकी जीवन -स्थितियां अत्यंत दयनीय रहती है। ये शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी टूट जाते हैं। लेखक का मत है कि ‘ निर्धनता का मनोविज्ञान ‘ को समझा जाना चाहिए।

सैंडर्स ने मार्के का सवाल किया है -” क्या निर्धनता मृत्यु दण्ड है ?” इसके साथ ही वे सभी से सवाल करते हैं – आप किस तरफ खड़े हैं ? ( यहीं मुझे मुक्तिबोध का सवाल याद आ रहा है – पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?) लेखक बतलाता है कि अमेरिका में 1979 – 2020 के बीच 61. 8 प्रतिशत उत्पादकता बढ़ी है, जबकि कामगारों की वेतन वृद्धि सिर्फ 17 प्रतिशत ही रही है।

वे  शासकों से तल्ख़ी के साथ सवाल करते हैं कि  क्या हम श्रमिकों के साथ ‘डिस्पोज़बल ह्यूमन बीइंग्स’ जैसा व्यवहार नहीं कर रहे हैं ? इसे बंद किया जाना चाहिए।

श्रमिकों -कर्मचारियों को कारखानों व फर्म से आनन् -फ़ानन में फ़ालतू समझ कर बाहर फेंक दिया जाता है। धनपति अपने उद्योग को मेक्सिको या चीन ले जाते हैं, जहां बेहद सस्ती मज़दूरी मिल जाती है। श्रमिक वर्ग की दशा पर कोई चर्चा नहीं होती है। मीडिया और विज्ञापनों के माध्यम से  वर्ग चेतना को कुंठित किया जाता है, उनकी चेतना को अनुकूलित किया जाता है। सहमति का निर्माण किया जाता है।

इस सन्दर्भ में लेखक प्रसिद्ध प्रतिरोधी विचारक नोम चोमस्की का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने “मैन्युफैक्चरिंग कॉन्सेंट” की अवधारणा को सामने रखा है. . 

लेखक का कहना यह भी है कि अमेरिका अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए अपनी सेना पर प्रतिवर्ष 775 बिलियन डॉलर खर्च करता है। यह राशि दस देशों की संयुक्त राशि से भी बड़ी है। लेकिन दुःख की बात यह है कि पेंटागन ( सैन्य गतिविधियों का मुख्यालय ) कभी भी अपने बजट को पूरी तरह से उजागर नहीं करता है. निःसंदेह, भारी भरकम राशि का बड़ा हिस्सा फालतू चीजों पर खर्च होता है। अनावश्यक शस्त्रों का निर्माण होता है।  इस बजट में कटौती करके ज़रूरतमंद क्षेत्रों की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।  

(जारी)

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