जरूरत है वर्ग चेतना, श्रमिक आंदोलन और राजनैतिक क्रांति! 

(भाग दो और अंतिम)

सैंडर्स कहते हैं कि अमेरिका में फिर से शक्तिशाली ट्रेड यूनियन आंदोलन के निर्माण की ज़रुरत है। तीन साल पहले 2022 तक  श्रमिक  सगठनों की शक्ति बेहद कमज़ोर रही है। 50 साल पहले राष्ट्रपति रूजवेल्ट के समय सबसे अच्छी थी। लेकिन, पिछले एक अर्से से डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने परंपरागत आधारों की उपेक्षा की है। श्रमिक व वंचित वर्गों को भुला दिया है, और  धनकुबेरों को महत्व दिया है।

नतीजा है कि  चरम दक्षिण पंथियों  और ट्रम्प ने उपेक्षित आधारों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया है। ( यही सच देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की दुर्दशा और संघ परिवार के उत्सव काल पर लागू होता है)। इसलिए अमेरिका में श्रमिक आंदोलन को शक्ति के साथ पुनर्निर्मित किया जाना चाहिए। देश में वर्ग चेतना को विकसित किया जाना चाहिए।

वैसे “ अमेरिका के विभिन्न राज्यों में  वर्ग संघर्ष चल रहा है। हमारे मीडिया में इस पर कभी चर्चा नहीं होती है। यहाँ तक कि राजनैतिक चुनाव अभियानों में भी चर्चा नहीं की जाती है। बॉस लोग यही चाहते हैं कि उनके लिए वर्ग टकराव पर चर्चा नहीं करना ही बेहतर है।” ( पृ. 182 ) 

मीडिया द्वारा उपेक्षा 

लेखक दुःख के साथ कहते हैं कि  एक समय था जब अख़बारों व चैनलों में ‘ श्रमिक  बीट (रिपोर्टर)’ हुआ करती थीं। लेकिन, पिछले एक अर्से से कॉर्पोरेट मीडिया ने श्रमिक और अन्य बुनियादी मुद्दों पर चर्चा को तिलांजलि दे दी है।

(सातवें दशक में यह  पत्रकार  दूरदर्शन के लिए श्रमिकों और संगठनों पर कई कार्यक्रम करता रहा है और पत्र-पत्रिकाओं में  आवरण कथाएं भी  लिखता रहा है। अब इनका स्थान मंदिर -मस्ज़िद, भजन-कीर्तन, प्रवचन आयोजन, फैशन शो, सौंदर्य प्रतियोगिता, व्यापार चर्चा, अयोध्या दीपोत्सव  आदि ने ले लिया है। पिछले 20 सालों में श्रमिक सगठनों को अपंग  बना दिया गया है। श्रमिक कानूनों को लचीला बना कर प्रबंधकों को मज़बूत किया गया है। पत्रकारों को ठेके पर रखा जाता है। वेज बोर्ड प्रभावहीन बना दिए गए हैं। अब कतिपय धनकुबेर अपने श्रमिकों- कर्मचारियों से प्रति सप्ताह 70 -90 घंटे काम लेने की बात कर रहे हैं)।  

सैंडर्स लिखते हैं “ सीबीएस, एनबीसी, सीएनएन, एमएसएनबीसी और रुपर्ट मर्डोक के फॉक्स न्यूज़ के लिए श्रमिकों की दयनीय स्थिति कोई ख़बर नहीं है।” ( पृ. 183 ) (क्या भारत में है? टाइम्स नाउ, एनडीटीवी, जी टीवी, इंडिया टुडे, आज तक, एबीपी, दूर दर्शन, रिपब्लिक, ईटीवी, जागरण टीवी, पत्रिका व भास्कर टीवी आदि पर श्रमिकों, किसानों, दलितों और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर कितनी चर्चा होती है?) 

सैंडर्स का मत है कि  मार्टिन लूथर किंग जूनियर के प्रसिद्ध नारे को पुनः गुंजित करने की आवश्यता है। उनका नारा था “ मेरा एक स्वप्न है”। यह नारा लगा कर श्रमिक चेतना व यूनियन आंदोलन को जाग्रत किया जा सकता है।

यहूदी राजनीतिज्ञ सैंडर्स की चिंताओं में मशीन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि आर्टफिशल इन्टेलिजन्स के मनुष्य के साथ संबंध भी शामिल हैं।  लेखक के  मत में मशीन का आविष्कार मानव की सेवा के लिए हुआ था लेकिन, आज यह श्रमिक मानव समाज पर हावी होती जा रही है। (यहां महात्मा गांधी की दृष्टि प्रासंगिक लगती है। उन्होंने हिन्द स्वराज में कहा था कि मशीन मनुष्य की सहायक होनी चाहिए, न कि उसका स्वामी। ) इसने कई क्षेत्रों में मानव श्रम को अपदस्थ कर दिया है। परिणामस्वरूप, बेरोज़गारी बढ़ी जा रही है। 

श्रम  की दृष्टि से 2055 तक आधी श्रम मानवता निरर्थक हो सकती है; एआई और ऑटोमेशन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करेंगे। मालिक अपनी श्रमिक मानवता को मानव बनाम मशीन प्रतिस्पर्द्धा में झौंक रहा है। हड्डी तोड़ काम लिया जा  रहा है। अमेजोन में श्रमिकों की यही दयनीय हालत है।

होना यह चाहिए कि मनुष्य और मशीन परस्पर पूरक बने। लेकिन, प्रबंधकों को अधिकाधिक मुनाफा चाहिए। उन्होंने  रोबोट को श्रमिक मानवता के सामने खड़ा कर दिया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां रोबोट को जोतने में सबसे आगे हैं। अतः रोबोट की  बढ़ती आबादी श्रमिक आबादी को प्रतिस्थापित करेगी।

लेखक सैंडर्स का एक नायाब सुझाव है कि  रोबोट के प्रयोग पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई प्रबंधक मानव श्रम के स्थान पर रोबोट से 50 हज़ार डॉलर का काम लेता है तो उसी राशि का उपयोग  श्रमिकों के पुनर्प्रशिक्षण में लगाया जाना चाहिए। नई आवश्यकताओं के मद्देनज़र श्रमिकों को नए ढंग से तैयार किया जाना चाहिए। ‘रोबोट टैक्स’ को श्रमिक कल्याण में लगाना होगा।

सैंडर्स का तर्क है कि यदि श्रमिकों से प्रति सप्ताह 28 घंटे काम लिया जाता है तो इससे उत्पादकता बढ़ेगी। ऐसा करके  जर्मन श्रमिक संगठनों ने दिखा दिया है। कई उद्योगों में इस परिवर्तन पर अमल भी किया जा रहा है। प्रबंधन और श्रमिक संबंधों में सुधार के लिए कई क्रांतिकारी सुझाव भी दिए हैं; श्रमिकों को कार्यस्थल (कारखाना आदि) का नियंत्रण सौंपा जाना चाहिए; कर्मचारी स्वामित्व व्यापार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए; कॉर्पोरेट बोर्डरूम में कर्मचारियों  का  सशक्त  प्रतिनिधित्व रहे;  बहुराष्ट्रीय निगमों के खिलाफ रहनेवाले खुदरा व्यापारियों और छोटे किसानों को समर्थन दिया जाना चाहिए।   

विवेचनात्मक शिक्षा की ज़रुरत 

बर्नी सैंडर्स मानते हैं कि रूपांतरकारी बदलाव के लिए विवेचनात्मक शिक्षा बेहद ज़रूरी है। इसके साथ ही नागरिकों का सूचना संपन्न होना भी अति आवश्यक है। लेखक का निष्कर्ष है कि  आज “ महान अमेरिका समाचार रेगिस्तान बना हुआ  है”(पृ.  249)। नागरिकों का पांचवें भाग से भी अधिक ‘ समाचार रेगिस्तान’ में रहता है। अनेक समुदाय  समाचार -रेगिस्तान में तब्दील होने के कगार पर खड़े हैं; 208 काउंटइस में  7 करोड़ लोग अखबार के बग़ैर रहते हैं या देश की 1, 630 कॉउंटीएस में औसतन एक साप्ताहिक पत्र होता है।

अस्तित्व संघर्षरत दैनिक अपने स्टाफ की छंटनी कर रहे हैं।  2005 से लेकर अब तक न्यूज़रूम में 60  प्रतिशत स्टाफ की कमी हो गयी है। वास्तव में, मीडिया कंपनियों  ने  स्थानीय पत्रकारिता को छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें ज़रूरी मुनाफ़ा नहीं हो रहा है। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए ‘पत्रकारिता के लिए नई व्यवस्था ‘ की ज़रुरत है। इसके लिए चाहिए कि प्रमुख  मीडिया घरानों  के स्वामित्व एकाधिकारीकरण को रोका जाए। इसका विभिन्न हाथों में विस्तार होना चाहिए। मीडिया स्वामित्व का जितना अधिक विकेन्द्रीकरण होगा, लोकतंत्र उतना ही मज़बूत बनेगा।

(भारत में नेहरू काल में पहला प्रेस आयोग बना था।  इसके बाद दूसरा आयोग इंदिरा काल (1980) में गठित हुआ। दोनों आयोग की सिफारिशों को सही ढंग से लागू नहीं किया गया।  तीसरे  बहु आयामी आयोग के गठन की मांग उठी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।  क्रॉस ओनरशिप को समाप्त करने की भी सिफारिश हुई थी, वह भी लागू नहीं हुई है; एक मालिक अखबारपति भी है, और वही चैनलपति  भी है। इस स्थिति से  भी गोदी मीडिया की आबादी  बोराई है।)

अमेरिका में इस पत्रकार का भी अनुभव है कि औसत अमेरिकी सूचनाहीन  व विमुख रहता है। हालांकि, न्यू यॉर्क टाइम्स, बोस्टन ग्लोब, अमेरिका टुडे, वाशिंगटन पोस्ट, बाल्टीमोर टाइम्स जैसे प्रसिद्ध अखबार निकलते हैं। देश -दुनिया की ख़बरें रहती हैं। 

लेकिन, आम लोगों में समाचारों के प्रति विरक्ति का भाव देखा; राजनीति, अकेडमिक, आईटी, उद्योग धंधों आदि  क्षेत्रों  से जुड़े लोग ख़बरों से बाख़बर रहते हैं; पब्लिक ब्राडकास्टिंग मीडिया और अन्य स्वतंत्र माध्यमों को सुनते-देखते भी हैं।

अमेरिका में ग़ज़ा और ट्रम्प को लेकर ज़बरदस्त प्रदर्शन भी चलते रहे हैं। इजराइल के ख़िलाफ़ व्यापक रोष है. फिर भी समाचारों के प्रति वांछित उदासी भी है। इसलिए सीनेटर चाहते हैं कि “ ख़बरों को रेगिस्तान से निकालकर वापस जीवंत “ बनाओ। प्रतिरोधी राजनेता का सुझाव है कि’ समुदाय आधारित सार्वजानिक मीडिया केंद्रों’ को विकसित किया जाना चाहिए। इस काम के लिए संघीय सरकार आर्थिक पहल करे।  

वेरमोंट से सेनेटर सैंडर्स का यह स्पष्ट मत है कि अमेरिका को फिर से पटरी पर लाने के लिए देश की राजनीति में तीखे सवाल उठाने की आवश्यकता है।  वास्तविक राजनीति के पक्षधरों को चाहिए कि वे मीडिया सहित हर संभव मंच से निम्न सवाल उठायें: 

  1. देश में विशाल आय व संपत्ति गैर -बराबरी कैसे है ? क्योंकि कॉर्पोरेट शक्ति ने विषमता पैदा करदी है और पूरा समाज इसकी गिरफ़्त में क्यों है?
  2. हम किस तरह के ‘लोकतंत्र’ हैं, जबकि धनकुबेर हमारे चुनावों की खरीद -फ़रोख़्त करते हैं?
  3.  पिछले 5 दशकों में मध्य वर्ग की विशाल दौलत को 1% के हाथों को क्यों सौंप दिया गया है?
  4. भूमि की बहुतायत के बावजूद ‘बचपन निर्धनता ‘ क्यों है?
  5. मेगा भवनों और विलासितापूर्ण नौकाओं  के लिए धन क्यों उपलब्ध कराया जाता है?
  6.  हमारे राजनीतिक  विमर्श को नियंत्रित करने के लिए चंद कॉर्पोरेट मीडिया घरानों को छूट क्यों दी जाती है? ( भारत में भी यही हो रहा है। )
  7.  अमेरिका  द्वारा वियतनाम और इराक़ में लड़े गए दो युद्ध सिर्फ झूठ पर ठीके हुए थे। इस  पर भी  सवाल किए जाने चाहिए।
  1. हमने इस धरा को बर्बाद करने के लिए हमने  जीवाश्म ईंधन उद्योग को अनुमति क्यों दे रखी है?

वास्तविक राजनीति को चाहिए कि इन सवालों से टकराये। इस सवालों के आधार पर जनता को शिक्षित और संगठित करे; धनशक्ति से राजनीति को आज़ादी दिलाये; सभी को वोट देने के अधिकार की गारंटी मिले।

(इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी समाज में निचले तबके के लोग वोट देने से वंचित रहते हैं। विशेष रूप से अश्वेत समाज के लोग वोट देने के अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। भारतीय समाज की स्थिति बेहतर कहाँ है? यहां तो ‘ वोट चोरी ‘ का धंधा फलफूल रहा है।  चुनाव आयोग पर शासक दल का उपांग बनने के आरोप जड़े गए हैं। सर्वोच्च न्यायलय में यह मामला उठ चुका है।)

सैंडर्स ने अपनी किताब में यह ज़बरदस्त मांग उठाई है कि  ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ को समाप्त किया जाना चाहिए। संविधान में संशोधन होना चाहिए। याद रहे, 2016 के आम चुनावों में ट्रम्प की जीत इलेक्टोरल कॉलेज से हुई थी, वरना आम मतदाता मतदान में  डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रतिद्वंद्वी  हिलेरी क्लिंटन की भारी जीत हुई थी। कॉलेज की व्यवस्था बेहद अलोकतांत्रिक और कुलीन वर्गीय है। इस व्यवस्था के अंतर्गत आम मतदाता के वोट की कोई हैसियत नहीं रह जाती है।

(हमारे देश में ईवीएम मशीन के स्थान पर बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग की जा रही है। चुनाव प्रणाली में भी व्यापक सुधार की मांग उठ रही है। दागी निर्वाचित प्रतिनिधियों की  संसद और विधानसभाओं में उपस्थिति बढ़ती जा रही है। लोकतंत्र की सेहत के लिए यह ख़तरनाक़ है।)

इसके साथ ही सैंडर्स चाहते हैं कि अमेरिका में कट्टरवादिता के सभी चेहरों को समाप्त किया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंने अपने माता -पिता के अनुभवों को साझा किया। सैंडर्स बतलाते हैं कि उनके परिवार को पोलैंड से यहूदी होने के कारण भागना पड़ा था। यहूदियों के विरुद्ध हिटलर का महाविनाश चक्र (होलोकॉस्ट) चल रहा था।

भुग्तभोगी अनुभवों की  पृष्ठभूमि में उनका कहना है “ मैं अमेरिका में इस (सम्भावी  महाविनाश) की अनदेखी नहीं कर सकता। मुझे मालूम है कि चरम श्वेत राष्ट्रवाद अमेरिका के लिए कितना बढ़ा खतरा है। इस दृष्टि से आज यह देश नस्लवाद, आप्रवासी विरोधीवाद, यौनवाद (स्त्रीविरोधी), होमोफोबिआ और अन्य प्रकार के कट्टरवादी  रूपों से ग्रस्त है।”

वे आगे कहते हैं “ मुसलमानों को खतरनाक आतंकवादी के रूप में चित्रित किया जा रहा है।” (पृ 269, 284)  (क्या भारत इन आत्मघाती रोगों से मुक्त है ? हमारे देश में गोरक्षकों का आतंक, लव जेहाद, वोट जेहाद, हिज़ाब जेहाद,  और भी  कई प्रकार के अल्पसंख्यक विरोधी जेहाद चल रहे हैं। बुलडोज़र का इस्तेमाल कर सबक़ सिखाया जा रहा है। दलितों के विरुद्ध ऊंची जातियों का आतंक अलग से है। उग्र सवर्णवाद का दौर है।)

सैंडर्स का स्पष्ट मत है कि इस स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका में “ ट्रम्प विरोधी आंदोलन का निर्माण करना चाहिए।” 

क्या भारत में राष्ट्रीय स्तर के किसी  सक्रिय  राजनेता से  देश की यथार्थवादी तस्वीर सामने रखने के लिए ऐसी हिलादेनेवाली किताब लिखने अपेक्षा की जा सकती है? वामपंथियों को छोड़ कर, क्या  मध्यमार्गी व उदारवादी नेता ताल ठोक कर कह सकते हैं ‘ हां , हम पूंजीवाद से आक्रोशित हैं ?’ सैंडर्स का स्पष्ट आहवान है : आज देश को राजनैतिक क्रांति की आवश्यकता है!

और अंत में, 

लावा ठंडा हो सकता है, मरता नहीं है ; पुस्तक भेंटकर्ता हैं कोलकाता निवासी देवाशीष सरकार।

पुस्तक : इट्स ओके टू बी ऐंग्री अबाउट कैपिटलिज़्म  

लेखक : बर्नी सैंडर्स

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