बिहार विधानसभा चुनाव में साहेब और उनके चाणक्य की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यानि पहली बार, कम-से-कम हम जैसों और राज्य की अधिकतर आबादी को भी आरिफ मोहम्मद खान को प्रदेश में राज्यपाल नियुक्त करने के औचित्य का पता चला है। या कहें कि चलेगा।
जो तस्वीर उभरती दिख रही है, उसमें एनडीए की अगुवा पार्टी और स्वयं नीतीश कुमार – दोनों ही – एक-दूसरे के बिना सरकार बनाने की स्थिति में हैं — साहेब की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी”, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ मिलकर और नीतीश कुमार का जनता दल—यू, तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल, तीनों वामपंथी पार्टियों, कांग्रेस के साथ मिलकर।
दोनों ही रही-सही कसर पूरी करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी के निर्वाचित विधायकों और बसपा का आसरा कर सकते हैं। ओवैसी की मजलिस—ए—इत्तहादुल मुसलमीन ने पांच विधायक जिताने का पिछले चुनाव का अपना रिकार्ड बरकरार रखा है और दोनों गठबंधनों से अलग लड़कर बहुजन समाज पार्टी ने एक विधायक जिताने में कामयाबी हासिल की है।
जबकि, महागठबंधन में शामिल मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी और आईपी गुप्ता की इंडियन इन्क्लुसिव पार्टी इन चुनावों में सिफर पर रही है।
मुश्किल यह है कि ओवैसी का दल और उनके पांच नव—निर्वाचित विधायक खुले तौर पर साहेब की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” की अगुवाई वाले एनडीए का समर्थन नहीं कर सकते। वे केवल विपक्षी दलों के साथ जा सकते हैं। या फिर राजद में विलय कर सकते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने यही किया था।
बसपा का एकमात्र विधायक कभी भी एनडीए का समर्थन कर सकता है, वैसे भी पार्टियां तोड़ने और उसके “स्प्लिंटर ग्रुप” को पार्टी में मिला लेने या कम-से-कम अलग दल के रूप में मान्यता दिला देने और उससे समर्थन हासिल कर लेने में विशेषज्ञ, साहेब की पार्टी के लिए यहां कोई बड़ी चुनौती नहीं होनी चाहिए।
नीतीश के बिना सरकार बनाने और प्रदेश में पहली बार अपना मुख्यमंत्री नियुक्त करने की उनकी किसी भी कोशिश में चुनौती साहेब की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” के लिए ओवैसी और उनके पांच विधायक होंगे। वह भी इसलिए कि ओवैसी और उनके पांचों विधायकों को यह सब खुले तौर पर करना होगा।
दूसरी तरफ, महागठबंधन की पार्टियों के विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने के जद-यू के किसी भी प्रयास में सबसे बड़ी बाधा शायद महामहिम होंगे। जद-यू तो यह तभी कर पायेगी, जब राज्यपाल इसकी इजाजत देंगे और नीतीश कुमार को वह इसकी इजाजत देंगे ही नहीं।
साहेब के लिए संवैधानिक प्रावधानों, नियमों, कानूनों और अदालती व्यवस्थाओं का कोई मतलब भले न हो, आरिफ मोहम्मद खान के लिए इन सबका और औचित्य का एक मतलब है और चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर साहेब की पार्टी ने राज्यपाल के लिए यह औचित्य पैदा कर दिया है।
तो क्या साहेब को, उनके चाणक्य को और दोनों की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” को साल भर पहले भी औचित्य पैदा करने का यह खयाल था? क्या साल भर पहले भी “औचित्य पैदा करने” की उनकी कोई योजना थी?
क्या साहेब को और उनके चाणक्य को विधानसभा के चुनावों में 160 सीटें जीतकर एनडीए सरकार बनाने की तथाकथित चाणक्य की अभी दो—तीन दिन पहले की घोषणा, एनडीए को 200 सीटों तक दे रहे पोल्स्टरों की भविष्यवाणियों और प्रदेश में चुनाव से पहले आनन-फानन में एसआईआर कराने और करीब 60 लाख वोटर्स के नाम वोटर—लिस्ट से हटाये जाने से पहले ही मालूम था कि प्रदेश के चुनावों के बाद “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” का काम राजेन्द्र आर्लेकर से नहीं चलेगा।
उन्हें केरल में सीएम पिनरई विजयन के सामने साहेब के लिए अपनी उपयोगिता साबित कर चुके आरिफ मोहम्मद की साल भर बाद ही बिहार में जरूरत पड़ेगी। इस कड़ी में अगला और जायज सवाल यह है कि तब क्या एनडीए का सबसे बड़ा चुनाव-पूर्व गठबंधन बनना ही नहीं, साहेब की “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” का सबसे बड़ा दल बनकर उभरना भी पूर्व—नियोजित था?
आरिफ मोहम्मद खान पिछले वर्ष 24 दिसम्बर को ही बिहार के राज्यपाल नियुक्त किये गये थे और इसी साल 2 जनवरी को उन्होंने अपना नया पदभार ग्रहण किया था। और राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान अब औचित्य के किसी सवाल के दरपेश होने, उससे उलझने की कोई जुगत लगाये बिना, सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्यौता दे सकेंगे और नीतीश कुमार को दूसरे चुनाव-पूर्व गठबंधन के राजद, काग्रेस, वाम दलों के साथ सरकार बनाने से रोक भी सकेंगे।
प्रदेश के राज्यपाल के तौर पर करीब साल भर का आरिफ मुहम्मद खान का कार्यकाल, केरल में उनकी सक्रियता और राज्यसरकार के साथ विवाद—ग्रस्तता से इतना उलट रहा कि उनके होने का पहला संकेत, करीब साल भर बाद अभी विधानसभा चुनाव से पहले तब आया, जब साहेब और उनके चाणक्य ने जनता दल— यू के तमाम दवाबों के बावजूद “2025 से 2030, फिर से नीतीश” की घोषणा करने से साफ इंकार कर दिया।
साहेब के चाणक्य ने तो एक गोदी चैनल के साथ इंटरव्यू में एक सवाल पर यह तक कह दिया कि “मुख्यमंत्री के नाम का फैसला तो गठबंधन के दलों के निर्वाचित विधायकों की बैठक में होगा।” गो वह यह भूल गये कि तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से पहले, बल्कि एक साल बीत जाने के बाद भी, अब तक साहेब ने अपनी पार्टी के नव—निर्वाचित लोकसभा सदस्यो की कोई बैठक नहीं की है। वैसे भी, दोनों की |प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” अब पर्चियों से सीएम बनाने के लिए मशहूर है।
अलबत्ता गोदी चैनल और “एम्बेडेड इंटरव्यूअर” ने साहेब के चाणक्य से यह प्रतिप्रश्न नहीं पूछा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कॉन्स्टीच्यूशन क्लब के चुनाव में तथाकथित चाणक्य के करीबी एक सदस्य को हरानेवाले राजीव प्रताप रूडी और कुछ अन्य नेताओं ने प्रदेश में एनडीए के नेतृत्वकारी घटक दल का नेता होने के बावजूद, नाराज नीतीश कुमार द्वारा पीएम की रैली और पटना में पीएम के “रोड शो” से अनुपस्थित रहने के बाद उन्हे नयी सरकार में सीएम बनाने की कुछ रस्मी घोषणाएं जरूर कीं।
पर साहेब और उनके चाणक्य ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की। तब भी नहीं, जब रूडी ने तो एक चुनावी रैली में पीएम के साथ मंच साझा करते हुए “आगे भी नीतीश कुमार के सीएम बने रहने” की बात कही थी।
केरल से उलट, बिहार में राज्यपाल के तौर पर आरिफ मोहम्मद खान का पिछला एक साल चुपचाप बीता और लगा कि यह चुप्पी राज्य में सहयोगी दल का सीएम होने के कारण है। उन्हें केरल से बिहार लाने के कारणों का पहला संकेत भी कम-से-कम मुझसे तो अन—नोटिस्ड गया ही, वरना मतों की गिनती से पहले 12 नवम्बर के अपने फेसबुक पोस्ट में मैं, शायद यह नहीं कह पाता कि नीतीश कुमार के सीएम बनने की संभावना सर्वाधिक है, सरकार चाहे एनडीए की बने, न बने।
यह जरूर है कि राज्य विधानसभा के चुनावों के नतीजे लगभग स्थिर हो जाने और एनडीए की अगुवा के “'”सबसे बड़ी पार्टी” बनकर उभरने के बाद साहेब की पार्टी के कुछ नेताओं ने जोर देकर कहा है कि नीतीश कुमार ही प्रदेश के अगले सीएम होगे। “2025 से 2030 तक, फिर से नीतीश” उन्होंने नहीं कहा है, पर अगर वह एक-डेढ़ साल भी मुख्यमंत्री रहे और उन्होंने चिराग पासवान की पार्टी के करीब 20 विधयकों में तोड़फोड़ कर अपने जद—यू को निचले सदन में सबसे बड़ी पार्टी बना लिया तो?
फिर तो आरिफ मुहम्मद खान के लिए औचित्य का सवाल भी होगा। और मुख्यमंत्री के तौर पर एक बार सदन में विश्वास-मत हासिल करने के बाद तो नीतीश कुमार कभी भी साहेब की और एनडीए के दलों के मंत्रियों को बर्खास्त कर विपक्षी महागठबंधन के दलों को सरकार में शामिल कर सकेंगे।
(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)