बिहार चुनावों में कांग्रेस का अपरकॉस्ट हिंदू प्रेम और मुसलमानों को हाशिए रखने का तर्क क्या था?

कांग्रेस ने बिहार में 10.57 प्रतिशत आबादी वाले हिंदू अपरकॉस्ट को 22 सीटों पर उम्मीदवार बनाया था, जीते शून्य। कांग्रेस ने हिंदू अपरकॉस्ट को अपनी कुल सीटों का करीब 40 प्रतिशत सीटें दिया। 16.5 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस ने सिर्फ 10 सीटों पर उम्मीदवार बनाया था, जीते दो। 

इसी तरह बिहार में कांग्रेस ने अत्यधिक पिछड़े वर्ग ( EBC) के सिर्फ 5 लोगों को उम्मीदवार बनाया था, इसमें 1 की जीत हुई। इस समुदाय की कुल आबादी बिहार में करीब 36 प्रतिशत है।

कांग्रेस के इस अपरकॉस्ट प्रेम और मुसलमानों से संभव दूरी बनाने का आधार क्या है?

पहली बात तो यह कि कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य पार्टियों को अभी तक यह शायद समझ में नहीं आया है कि इस देश का अपरकॉस्ट हिंदू पूरी तरह संघ-भाजपा के साथ पूरी प्रतिबद्धता और समर्पण के साथ खड़ा है। पूरे देश मे हिंदू अपरकॉस्ट का 70 से 80 प्रतिशत वोटर भाजपा को वोट कर रहा है। यूपी के पिछले लोकसभा (2024) के चुनाव में 89 प्रतिशत ब्राह्मणों और 80 प्रतिशत राजपूतों ने भाजपा को वोट दिया था। ( लोकनीति-सीएसडीएस)।

हिंदू अपरकॉस्ट सिर्फ किसी भावनात्मक कारणों से भाजपा के साथ नहीं है। वह पार्टी उसके आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सभी हितों को अच्छी तरीके से पूरा कर रही है।

कांग्रेस पिछले 10 सालों से इस मोह में है कि अपरकॉस्ट हिंदू उसके पास लौट आएगा, क्यों लौट आएगा? इसका कोई उत्तर नहीं है।

जहां तक मुसलमानों को वाजिब राजनीतिक प्रतिनिधित्व न देने का प्रश्न है। उसके पीछे की सोच बहुत ही खतरनाक है। वह सोच यह है कि यदि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व देंगे तो निम्न नुकसान होगा-

1- पहला कांग्रेस पर यह आरोप लग सकता है कि वह हिंदुओं की नहीं मुसलमानों की ओर झुकी पार्टी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मुसलमानों को कम से कम प्रतिनिधित्व देकर यह साबित करने में लगे हैं कि नहीं हम ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ नहीं करते हैं। मतलब खुद को हिंदू साबित करने पर ज्यादा जोर।

2- कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों की यह समझ बनी है कि मुसलमानों को टिकट दें या न दें। वह वोट तो देंगे ही। आखिर वे जाएंगे कहां, यदि उन्हें भाजपा को हराना है, तो हमें वोट देने के अलाव उनके पास विकल्प क्या है? मुसलमानों को प्रतिनिधित्वहीन करके भी उनकी जरूरत या मजबूरी का फायदा उठा कर वोट हासिल करने की सोच ज्यादा हावी है। 

3- कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की यह समझ बन गई है कि जिस विधान सभा या लोकसभा में मुसलमान सिर्फ अपने वोट के बहुमत के आधार पर किसी मुस्लिम समाज के उम्मीदवार को जिता सकते हैं, वहां ही सिर्फ मुसलमानों को टिकट दिया जाए। जहां मुसलमान 50 या 60 प्रतिशत से कम हैं, वहां उन्हें टिकट न दिया जाए। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों के भीतर यह विश्वास नहीं रह गया है कि वे अपने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को हिंदुओं का वोट दिला सकते हैं। हां उन्हें यह विश्वास ज़रूर है कि वे अपने हिंदू उम्मीदवारों को मुस्लिम का वोट दिला सकते हैं। मतलब साफ है कि कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के वोटरों के बड़े हिस्से का इतना संघीकरण-भाजपायीकरण तो हो ही चुका है कि वे किसी मुस्लिम उम्मीदवार को वोट न दें। 

बिहार में कांग्रेस के पास दो विकल्प था- 

1-पहला यह कि वह संघी-भाजपाई हो चुके बिहार के हिंदू अपरकॉस्ट का मोह छोड़कर निर्णायक तरीके से उन समुदायों के साथ खड़ी हो जो भाजपा के खिलाफ वोट देते हैं या वोट देने की संभावना ज्यादा रखते हैं या भाजपा के चंगुल से निकलने की ज्यादा संभावना रखते हैं। लेकिन ऐसा करने की जगह कांग्रेस ने हिंदू अपरकॉस्ट को उसकी आबादी से करीब चार गुना टिकट दिया। 

2- दूसरा कांग्रेस को इस डर से निकलना चाहिए था कि वह यदि वह मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में सीटें देगी, तो उसे मुस्लिमपरस्त घोषित कर दिया जाएगा। इसके साथ ही उसको यह हिम्मत जुटानी चाहिए थी कि वह हिंदू धर्म के वोटरों से भी यह खुलकर कह सके कि जैसे मुसलमान हिंदू उम्मीदवारों को वोट देते हैं, जिताते हैं, वैसे हिंदू वोटरों को भी मुसलमान उम्मीदवारों को वोट देना चाहिए।

लेकिन बिहार विधान सभा के इस चुनाव में कांग्रेस अपरकॉस्ट हिंदू वोटर और नेताओं के मोहफांस ने निकल नहीं पाई और न ही खुद को हिंदू साबित करने की मंशा से बाहर आ पाई। 

इस देश में असली हिंदू सिर्फ अपरकॉस्ट है। यदि कोई पार्टी, संगठन या नेता खुद को असली हिंदू साबित करना चाहता है, तो उसे अपरकॉस्ट को ही आगे करना होगा। असली हिंदू साबित करने के लिए मुसलमानों और गैर- अपरकॉस्ट हिंदुओं से थोड़ी या ज्यादा दूरी तो बनानी ही पड़ेगी और अपरकॉस्ट हिंदुओं को आगे करना ही पड़ेगा। कांग्रेस ने बिहार में यही किया। सीट तो नहीं जीत पाई, अपनी वैचारिकी और एजेंडे की भी रक्षा नहीं कर पाई।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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