खाते में दस हजार,10 वीं बार भी नीतीश कुमार 

नीतीश कुमार ने दसवीं बार शपथ लेकर अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा है। इससे पहले कुमार सातवीं, आठवीं और नौवीं बार सीएम की शपथ ले कर रिकॉर्ड बना चुके हैं। उनके बाद सूची में तमिलनाडु की सीएम जयललिता और हिमाचल के सीएम वीरभद्र सिंह का नाम आता है।

तमाम अटकलों के बाद नीतीश कुमार ने गुरुवार यानी 20 नवम्बर को पटना के गांधी मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और दूसरे एनडीए नेताओं की मौजूदगी में 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। यह शपथ हालिया राजनीति को चुनौती देने के लिए काफी है। कुमार ने यह शपथ लेकर अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा है। इससे पहले कुमार सातवीं, आठवीं और नौवीं बार सीएम की शपथ ले कर रिकॉर्ड बना चुके हैं।

उनके बाद सूची में तमिलनाडु की सीएम जयललिता और हिमाचल के सीएम वीरभद्र सिंह का नाम आता है। दोनों नेता 6-6 बार सीएम की शपथ ले चुके हैं। नीतीश अब तक 19 वर्ष दो महीने मुख्यमंत्री रह चुके हैं। जबकि देश में सर्वाधिक समय मुख्यमंत्री पद पर रहने का रिकॉर्ड पवन कुमार चामलिंग के नाम है। वे लगातार 24 वर्ष 165 दिन तक सिक्किम के सीएम रहे हैं। इसके बाद नवीन पटनायक हैं। वे 24 वर्ष 96 दिन तक ओडिशा के सीएम रहे। ज्योति बसु 23 वर्ष 137 दिन तक बंगाल के सीएम थे। 

इस बात में कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार आज भी बिहार के पॉलिटिकल मास्टर बने हुए हैं। उनका विरोध और सपोर्ट कोई कर सकता है लेकिन उनके ऊपर कोई दाग नहीं लगा सकता। वे परिवारवाद से परे हैं और घपले घोटाले से भी कोसों दूर। नीतीश की सहयोगी कोई भी पार्टी चले वह बीजेपी ही क्यों न हो वह दावा नहीं कर सकती कि उनकी पार्टी या उनके नेता पाक साफ़ हैं और बेदाग़ भी। जिस तरह से बिहार विधान सभा में इस बार 130 आपराधिक तत्वों की एंट्री हुई है उसमें बीजेपी, जदयू और बाकी नेताओं की बड़ी सूची है।

इसके साथ ही जिस अंदाज में सदन में करोड़पतियों की एंट्री हो रही है उससे एक बात साफ़ हो गयी है कि बिहार में राजनीति पूंजी से संचालित होती है और कॉर्पोरेट घराने पूंजी का खेल करने से नहीं कतरा रहे हैं। ऐसे में समाजवादी धड़े से आये नीतीश कुमार इस विषय पर कितना चिंतन कर पाते हैं या देखने की बात होगी। क्योंकि इस चुनाव ने यह साफ़ कर दिया है कि बिहार भले ही गरीब और पिछड़ा राज्य है लेकिन यहाँ करोड़पति लोगों की बड़ी तादाद भी खड़ी हो गई है। और अब आगे यही करोड़पति राजनीति को अपनी तरह से संचालित करेंगे। गरीबों को अब बिहार में चुनाव लड़ना मुश्किल हो जायेगा। 

बिहार के इस बार के चुनावी खेल में महिला वोटरों ने बड़ा कमाल किया है। अब यह कहने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि चुनाव के दौरान बिहार की लगभग सवा करोड़ महिलाओं के खाते में दस हजार की नकदी डाली गई जो गरीब बिहारी समाज के लिए एक बड़ी रकम थी। कायदे से चुनाव आयोग को इस पर रोक लगानी थी लेकिन वह सरकार के साथ मिलकर इस बड़े खेल को अंजाम देता रहा। विपक्ष आज अगर चुनाव आयोग पर कोई सवाल खड़ा कर रहा है तो इसे बकवास तो नहीं ही कहा जा सकता है। 

बड़ी बात तो यह है कि इस चुनाव में भले ही बीजेपी की बड़ी जीत हुई है लेकिन इस जीत के पीछे कोई बिहार का नीतीश मॉडल काम नहीं कर रहा था और न ही इसमें कोई मोदी के प्रति सहानुभूति ही थी। अगर ऐसा होता तो साल भर पहले लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जदयू पिछड़ता नहीं। इसलिए आज बीजेपी अगर मोदी के नाम पर बिहार जीत का सेहरा बाँध रही है तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। बिहारी समाज की नजर में नीतीश के प्रति सहानुभूति थी और बड़ी बात कि इस सहानुभूति के साथ दस हजार की नकदी ने बिहार चुनाव के पूरे मिजाज को ही बदल दिया। इसे नीतीश कुमार भी इंकार नहीं कर सकते। रही सही कहानी को चुनाव आयोग ने पूरा कर दिया। 

लेकिन अब जो हो गया सो हो गया। सच तो यही है बिहार चुनाव में एनडीए की बड़ी जीत हुई है और दसवीं बार नीतीश कुमार फिर से सत्ता पर काबिज हुए हैं। उन्होंने उन सभी आलोचकों को चुप करा दिया जो राज्य चलाने की उनकी काबिलियत पर सवाल उठा रहे थे।

चुनाव से पहले की बेहतरीन स्ट्रैट्जी, जोशीला चुनाव कैंपेन और शानदार नतीजों ने एक बार फिर भारत के सबसे अप्रत्याशित पॉलिटिकल एरिया में ढलने, टिकने और असर बनाए रखने की उनकी काबिलियत को दिखाया।

नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार की पॉलिटिक्स में सेंट्रल फीगर रहे हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर, उन्होंने बिहार के पॉलिटिकल और सोशल स्ट्रक्चर पर बहुत असर डाला है, जिससे उन्हें ‘सुशासन बाबू’ का टाइटल मिला है। राम मनोहर लोहिया के सोशलिस्ट विचारों, कर्पूरी ठाकुर की गाइडेंस और 1974 से 1977 तक जयप्रकाश नारायण के बड़े आंदोलन ने उनके पांच दशक के पॉलिटिकल सफर को दिशा दी- एक युवा एक्टिविस्ट से राज्य के सबसे अहम नेताओं में से एक बनने तक।

उन्होंने 1985 में हरनौत असेंबली सीट जीतकर चुनावी पॉलिटिक्स में कदम रखा, और 1989 तक लोकसभा MP के तौर पर नेशनल लेवल पर पहुंच गए थे। इसके बाद वे 1991, 1996 और 1998 में लोकसभा के लिए चुने गए, और रेलवे से लेकर रोड ट्रांसपोर्ट और एग्रीकल्चर जैसे डिपार्टमेंट संभालते हुए यूनियन मिनिस्टर के तौर पर काम किया।

इस दौरान, लालू प्रसाद बिहार में छाए रहे, और उन्हें पिछड़ी जातियों का ज़बरदस्त सपोर्ट मिला। जब करप्शन के आरोपों ने लालू का वोटर बेस कम कर दिया, तो इंजीनियर से पॉलिटिशियन बने नीतीश कुमार को बिहार की पॉलिटिक्स में आगे बढ़ने का मौका मिला।

नीतीश धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों, खासकर कुर्मी-कुशवाहा समुदाय को अपनी ओर खींचने लगे। उन्होंने बहुत पिछड़े वर्गों में भी अपनी पैठ बनाई। इस जाति समीकरण का इस्तेमाल करके, उन्होंने लालू प्रसाद के साथ यादव समुदाय की एकजुटता का मुकाबला किया।

2000 में टूटे-फूटे जनादेश के बाद, नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, यह कार्यकाल सिर्फ़ सात दिनों तक चला, क्योंकि उनके पास बहुमत नहीं था। उन्हें असली सफलता 2005 में मिली, जब जदयू -बीजेपी गठबंधन को साफ़ जनादेश मिला और उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला। नीतीश ने ईबीसी, जिनकी आबादी लगभग 36 प्रतिशत है, के लिए कल्याण और आरक्षण के उपायों को मज़बूत करके अपना सपोर्ट बेस मज़बूत किया, जिसमें महिलाएं और पसमांदा मुसलमान शामिल हैं। उन्होंने महिलाओं के बीच भी एक असरदार वोट बैंक बनाया, जो अब राज्य के लगभग आधे वोटर हैं।

इसका असर 2010 के चुनावों में दिखा, जब नीतीश कुमार ने ज़बरदस्त जीत हासिल की। जदयू और बीजेपी गठबंधन ने 243 में से 206 सीटें जीतीं। एनडीए का वोट शेयर भी लगभग 40 परसेंट तक पहुंच गया। अपने दूसरे पूरे टर्म (2010-15) के दौरान, उन्होंने ‘सुशासन बाबू’ की इमेज बनाई।

इसके बाद के सालों में नीतीश की ज़बरदस्त पॉलिटिकल समझ सामने आई। वह 2013 में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन से बाहर हो गए, 2015 में लालू प्रसाद के साथ मिलकर एक मज़बूत ग्रैंड अलायंस बनाया, और फिर दो साल बाद BJP में वापस आ गए। पिछले पांच सालों में भी इसी तरह के पॉलिटिकल बदलाव होते रहे, फिर भी हर मोड़ पर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में कामयाब रहे।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply