ग्यारह साल पहले, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, भाजपा के प्रमुख लक्ष्यों में से एक राज्यों से क्षेत्रीय व अन्य विपक्षी दलों को सत्ताच्युत करना था। इस रणनीति का एक अंश दक्षिणी राज्यों, जहां भाजपा की उपस्थिति नगण्य थी, में पैर पसारना भी था।
अब एक दशक के बाद उड़ीसा को छोड़कर, भाजपा किसी दूसरे राज्य में अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल नहीं रही है। उनकी जगह सत्ता में आने की बात जाने दें, भाजपा इन दक्षिणी राज्यों में सत्तारूढ़ दलों को कोई खास नुकसान तक नहीं पहुँचा पाई है।
काँग्रेस राजनीति की भी विडंबना बनी हुई है। काँग्रेस के अखिल भारतीय नेतृत्व ने चुनावी राजनीति में अपनी जगह और खोया जनाधार पाने के लिए पिछड़ों का कार्ड मुख्य राजनीतिक उपकरण के तौर पर खेलने का निर्णय किया है।
लेकिन, विडंबना है कि काँग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्रियों में से एक मात्र ओबीसी मुख्यमंत्री कर्नाटक में है – सिद्धारमैया और उन्हें भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, वह भी किसी और से नहीं बल्कि एक काँग्रेसी – अपर कास्ट वोक्कलिगा नेता डीके शिवाकुमार – से ही।
काँग्रेस के शासन में दूसरे राज्य तेलंगाना में काँग्रेस के मुख्यमंत्री को ओबीसी चुनौती दे रहे हैं। ओबीसी संगठनों ने कुछ दिन पहले सफल तेलंगाना बंद किया था। जमीनी सच्चाई है कि काँग्रेस के तीन में से दो अपर कास्ट से हैं। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू राजपूत हैं और तेलंगाना मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी रेड्डी समुदाय से जो अपर कास्ट है।
यह दिखाता है कि विपक्षी राजनीतिक रिकवरी की गतिकी जटिल है। यह राज्य स्तरीय कारकों से निर्देशित है। काँग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी लेकिन काँग्रेस की विरोधाभासी जमीनी सच्चाईयों के बावजूद अपने ओबीसी समर्थक मुद्दे को टिकाए रखना चाहते हैं खासकर दक्षिणी राज्यों में जहां काँग्रेस की उपस्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है।
इस लेख में उक्त दोनों परिघटनाओं को समझने के लिए हम दक्षिणी राज्यों की राजनीति की पड़ताल करेंगे। इस बीच, चुनाव आयोग ने दक्षिणी राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की है। भाजपा विरोधी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। यह विरोध तमिलनाडु और केरल में चुनावी अभियान में गुणात्मक नया तत्व जोड़ेगा और इसका अन्य दक्षिणी राज्यों में भी प्रभाव हो सकता है, खासकर यदि बड़े पैमाने पर चुनिंदा मतदाताओं के नाम काटे गए तो।
तमिलनाडु : चूंकि विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई 2026 में होने वाले हैं, इसलिए राज्य में राजनीतिक तौर पर चुनावी बुखार जकड़ चुका है। मुख्य मुद्दा है कि चुनावी लड़ाई द्विपक्षीय होगी या त्रिकोणीय। ज्यादा ठोस अर्थों में क्या लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा गठित नई पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी और सत्तारूढ़ डीएमके और विपक्षी एआईएडीएमके-भाजपा मोर्चों से भिड़ेगी या एआईडीएमके-भाजपा विजय को अपने पाले में खींचने में सफल होंगे।
विजय की अपील युवाओं में ज्यादा थी, खासकर पार्टी लॉन्च करते समय इसके इस दावे के कारण कि वह डीएमके और भाजपा का विकल्प देंगे। अब किसी तरह का विचलन विजय के लिए राजनीतिक हाराकिरी साबित हो सकता है।
इसके अलावा, चूंकि एआईएडीएमके-भाजपा गठजोड़ इस नए चुनावी कसौटी पर अब तक न कसे गए दल को ज्यादा सीटें नहीं दे सकते और विजय हाशिये के खिलाड़ी बन कर रह जाएंगे और उससे उनकी शुरुआती अपील को भी नुकसान ही होगा। करूर भगदड़ से काफी हद तक पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा है और ऐसे में इस तरह का आत्मघाती चुनाव पूर्व गठजोड़ इसकी पहली चुनावी परीक्षा से पहले पार्टी का समाधि लेख बन सकता है।
चुनाव का दूसरा केन्द्रीय मुद्दा है कि आने वाले चुनावों में डीएमके को किस कदर नुकसान होगा। पहली बात, सत्तारोधी लहर तो है है, दूसरी बात चुनावी गणित बदल चुका है। भाजपा और एडप्पाडी पलनीस्वामी नीत एआईएडीएमके का फिर साथ आना, हालांकि यह 2021 में अलग हो चुके थे, ने दोनों का मनोबल बढ़ाया है।
243 सदस्यीय विधानसभा में 188 सीटों पर लड़कर डीएमके ने 133 सीटें जीती थीं और एआईएडीएमके 191 से 66 पर अटक गई थी। वोट शेयर के मामले में एआईएडीएमके को 33.29 फीसदी वोट मिले थे जबकि डीएमके को 37.7 फीसदी। डीएमके गठबंधन को कुल मिलकर 45.7 फीसदी वोट शेयर के साथ 159 सीटें मिलीं और एआईएडीएमके-भाजपा गठजोड़ को 40 फीसदी वोट शेयर के साथ 75 सीटें मिलीं।
केवल 5.7 फीसदी वोट के अंतर के कारण डीएमके गठजोड़ के खिलाफ 3 फीसदी से अधिक वोट स्विंग नतीजों और सीटों की संख्या में बड़ी तब्दीली ला सकता है। इस तरह डीएमके शासन चुनावी तौर पर उतना मजबूत नहीं दिख रहा। क्या विजय की पार्टी इतने ज्यादा डीएमके विरोधी वोट एआईएडीएमके के पास जाने से रोक पाएगी कि डीएमके को फायदा हो या फिर वह गैर-एआईएएडीएमके वोट डीएमके के वोट से छीन लेगी और एआईएडीएमके को फायदा होगा?
2021 में डीएमके गठजोड़ ने 54 सीटें 5000 वोटों से कम के अंतर से जीती थीं, यह देखते हुए कहा जा सकता है कि एम के स्टालिन व उसके सहयोगियों की जमीन कमजोर है। यदि डीएमके गठजोड़ आने वाले चुनाव में थोड़ी कम सीटों के साथ भी जीतने में कामयाब होता है तब भी वैचारिक धरातल पर द्रविड मॉडल की चमक मद्धिम आने वाले चुनाव में पड़ सकती है। एआईएएडीएमके का राज्य में मजबूत जनाधार है, जो भाजपा का नहीं है और इसलिए वह गठजोड़ में बड़े भाई की भूमिका में है।
राजनीतिक रूप से लेकिन, चूंकि भाजपा केंद्र में सत्ता में है और एआईएडीएमके आंतरिक विभाजन और गुटबाजी से त्रस्त, भाजपा उसकी बांह मरोड़कर ज्यादा सीटें हथिया सकती है। कुछ भाजपा नेताओं ने पुराने एमजीआर फार्मूले, अर्थात विधानसभा चुनाव में एक तिहाई सीटें केंद्रीय पार्टी के लिए और दो तिहाई सीटें क्षेत्रीय पार्टी के लिए और लोकसभा चुनाव में इसका उल्टा, का राग पहले से ही छेड़ दिया है।
इससे एआईएडीएमके के दूसरी पंक्ति के नेताओं में निराशा फैल सकती है और इसीलिए एआईएडीएमके कार्यकर्ताओं में यह बात भी चल रही है कि पार्टी भाजपा के बदले विजय से गठजोड़ करे। खैर, यदि भाजपा गठजोड़ के कारण और डीएमके के खिलाफ सत्तारोधी लहर के कारण दहाई में सीटें भी जीत लेती है तो दावा करेगी कि उसने तमिलनाडु के अभेद्य द्रविड़ किले, जहां लोग मूल रूप से केंद्र विरोधी होते हैं, का मिथक तोड़ दिया है।
चुनावी अर्थ में डीएमके सरकार द्रविड मॉडल पर अपना दावा मुख्य रूप से तमिलनाडु में परिवारों की मुखिया महिलाओं को 1000 रुपये मासिक देने के कारण है। यह देखना होगा कि क्या भाजपा-एआईएडीएमके गठजोड़ इसका प्रभाव बड़ी रकम से कम कर सकता है क्या, बिहार चुनावों में भाजपा ने 10 हजार रुपये महिलाओं के खातों में जमा करवाए थे।
हालांकि महत्वपूर्ण फर्क यह है कि डीएमके का 1000 रुपये मासिक भुगतान है जो सीधे राज्य के सरकारी खजाने से आता है जबकि बिहार में मोदी के 10 हजार रुपये के वायदे के अनुसार यह एक बार का भुगतान होगा जो बैंक स्वरोजगार के लिए सेल्फ हेल्प समूहों की लगभग 1.2 करोड़ महिलाओं, अधिकांश जीविका दीदियों में बांटेगी।
दूसरे शब्दों में किसी महिला को दस हजार रुपये मिलेंगे या नहीं यह स्थानीय बैंक शाखा प्रबंधक पर निर्भर करेगा और ऐसी स्वरोजगार मदद के लिए कैवीएट भी जुड़े होंगे। चूंकि डीएमके जनवादी लोकलुभावन के पुराने खिलाड़ी हैं, तमिलनाडु में बीजेपी के प्रतिस्पर्धात्मक लोकलुभावन को मुश्किलें पेश आएंगी ही।
एक और संदर्भ में राज्य की राजनीति पूर्वोत्तर मानसून के दौरान बार बार आने वाली बाढ़ से निबटने की तैयारियों के जाल में भी फंसी है। 2021 के बाढ़ ने चेन्नई में तबाही मचाई, 2023 की बाढ़ ने दक्षिणी जिलों को नुकसान पहुंचाया और 2015 के अभूतपूर्व दु:स्वप्न ने राज्य की राजधानी को डुबो ही दिया था। ऐसी तबाही का दोहराव हुआ तो सत्तारूढ़ डीएमके के लिए चुनाव पूर्व यह बड़ी राजनीतिक आपदा होगी।
इस तरह चुनावी अभियान इस समय डीएमके नेताओं के बारिश प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री की जांच के लिए पानी में उतारने के लिए अपनी कमर कसने पर केंद्रित है। विपक्ष बारिश प्रभावित लोगों के विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में लगा है। वर्तमान चुनाव पूर्व बारिश ने हालांकि चुनावी गर्मी को कम नहीं किया है।
इस बीच, दूसरे सबसे विकसित राज्य में आम लोगों को हाथों में खर्च की जा सकने वाली नकदी दिख रही है। टीएएसएमएसी दुकानों, जो तमिलनाडु में सरकार के स्वामित्व वाली शराब बिक्री की दुकानें हैं, ने दिवाली के दिन 790 करोड़ रुपये की बिक्री दर्ज की।
केरल : पड़ोसी केरल, दूसरा राज्य है जहां मई 2026 से पहले चुनाव होने हैं। यहाँ सोने की चमक लाल की आभा को मद्धिम कर रही है। 2018-19 में सामने आए सोना तस्करी स्कैन्डल में फंसी माकपा नीत पिनराई विजयन सरकार अब मंदिर सोना घोटालों की शृंखला से परेशान है।
सोना तस्करी घोटाले में एलडीएफ सरकार के स्वामित्व वाली केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड का एक पूर्व अधिकारी स्वप्ना सुरेश, जो रंगे हाथ पकड़ा गया था, ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर आरोप लगा दिया कि उन्होंने कूटनीतिक चैनलों के जरिए गैरकानूनी आयात से सोना तस्करी का रास्ता साफ किया था।
स्वप्ना सुरेश पर 2023 में छह करोड़ रुपये का जुर्माना लगा था लेकिन पिनराई विजयन किसी तरह अदालतों की कार्रवाई से बच गए। लेकिन उनकी सरकार की छवि तो खराब हुई ही है।
अब, चुनावी राज्य में सोना चोरी की घटनाओं की शृंखला दिखाई दे रही है। सबरीमाला और गुरुवायुर मंदिरों में सोना स्कैन्डल उनकी सरकार की छवि बिगाड़ रहे हैं क्योंकि उनकी सरकार केरल देवास्वम बोर्ड को प्रशासित करती है जो कि इन मंदिरों का संचालन करता है।
सबरीमाला सोना घोटाला तब विस्फोटक हो गया जब एक एसआईटी द्वारा अदालती जांच के दौरान बताया गया कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर को दान में दिए गए सोने में एक पूर्व देवास्वम बोर्ड कर्मचारी मुरारी बापू और उनीकृष्णन (उसी के लगाए मंदिर अधिकारी) ने घोटाला किया था। एसआईटी सितंबर में गड़बड़ी की शिकायत के बाद अदालत के आदेश से बनी थी। दोनों को अब एसआईटी ने गिरफ्तार किया गया है और यह एलडीएफ नेताओं के करीबी माने जाते हैं।
एलडीएफ नेतृत्व से उनकी करीबी और मंदिर का सोना कैसे कुछ मूर्तियों की गोल्ड प्लेटिंग के नाम पर किया गया, का विवरण अब सामने आ रहा है। केरल में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति सोने का उपभोग किया जाता है। हर साल 200-225 टन सोना राज्य में उपभोग किया जाता है। प्रसिद्ध मंदिरों की समृद्धि मुख्य रूप से सोने के आभूषणों के कारण है। सबरीमाला सोना घोटाले के बाद गुरुवायुर मंदिर में सोना घोटाले का खुलासा हुआ, जब 2019 में की गई ऑडिट की रिपोर्ट अब सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार मंदिर के खजाने से सोने की कई चीजें गायब हैं। इसके बाद कई अन्य मंदिरों में भी सोने की चोरी के आरोप लग रहे हैं, उदाहरण पूमथरेईशा मंदिर। धीरे-धीरे लोगों के जहाँ में यह बात बैठने लगी है कि यह केवल मंदिरों में हो रहे घोटाले नहीं हैं बल्कि केरल देवास्वम बोर्ड, जो एलडीएफ के नियंत्रण में है, भ्रष्टाचार में धंसा है। एलडीएफ जो सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के कारण नैतिकता के ऊंचे स्थान पर बैठ था, भ्रष्टाचार के कीचड़ में धँसने लगा है।
विडंबना ही है कि गुरुवायुर और सबरीमाला मंदिरों की पवित्रता नष्ट न होने देने के कारण महिलाओं को प्रवेश नहीं करने देते थे। पर ऐसा लग रहा है कि इन पवित्र रूढ़िवादी संस्थानों का नेतृत्व कुछ चोर कर रहे हैं।
पिनराई विजयन जो वाम खेमे में शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे हैं, ने सभी असंतुष्टों को किनारे कर आंतरिक असंतोष को समाप्त कर दिया है। पर यह शक्तिशाली नेता चुनावों के बाद अपनी इस छवि की परछाई भी नहीं रह जाएगा यदि चुनाव हार गया तो। अनुमान है कि यूडीएफ चुनाव जीतने वाला है। पिनराई विजयन माकपा के निर्विवाद बॉस हैं और इसकी केन्द्रीय समिति और महासचिव पर भी हावी हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि जब यह नेता, जिसे देश के वाम आंदोलन पर सबसे बुरा अफसरशाही श्राप माना जाता है, की हार के बाद माकपा का क्या होगा?
(जारी)
(बी सिवरामन का लेख। अनुवाद : महेश राजपूत)